Thursday, September 15, 2005
माँसाहारी दुनिया में शाकाहारी
फणीश्वरनाथ रेणू की कहानी "मारे गये गुलफाम" के नायक हीरामन की तीसरी कसम थी कि फिर कभी अपनी बैलगाड़ी में नाचने वाली बाई जी को नहीं बिठायेंगे. ऐसे ही कसम है हमारी, कहीं भी जायेंगे, किसी से नहीं पूछेंगे कि खाने में क्या है, बस जो भी हो चुपचाप खा लो. दुनिया में जाने क्या क्या खाते हैं लोग बंदर, कुत्ता, चूहा, घोड़ा, साँप, केंचुआ. अगर पूछो तो खाना ही न खाया जाये, और मतली हो जाये.
जिन सभ्यताओं में शाकाहारी खाने का कंसेप्ट ही नहीं है, वहाँ जरा यह बता कर देखिये कि साहब हम मीट नही खाते, वे कहेंगे, अच्छा तो चिकन ले लेजिये या मछली खा लीजिये. जब आप मीट, चिकन, हेम, पोर्क, मछली, अंडे इत्यादि की पूरी सफाई दे कर समझाते हैं कि आप कुछ नहीं खाते, तो वे आपको ऐसे देखते हें मानो आप हिमालय के येती हैं या फिर अस्पताल में बंद करने लायक पागल, और दया भरी आवाज में कहते हैं, अच्छा तो यह लीजिये, हमने इसमे से सारा माँस निकाल दिया है, कोई छोटा मोटा टुकड़ा रह गया हो तो आप खाते समय निकाल दीजियेगा.
अरे फिर भी आप इसे खाने से हिचकचा रहे हैं ? समझाईये आप उन्हें, कि माँस के साथ बने, मिले खाने को नहीं खा सकते या माँस न खाने का मतलब है कि आप माँस का सूप भी नहीं पीते!
पर बात मेरी कसम की हो रही थी. मानता हूँ कि यह कसम गाँधी जी के आँख मूंदे हुए बंदर जैसी है, पर जीने के लिए कोई न कोई बहाना तो निकालना ही पड़ता है. दिक्कत तब होती है जब पकवान ऐसे पकाया जाता है कि आप को जंतु को पहचानने में गलती नहीं हो सकती. कुछ पूछने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती. एक ऐसा अनुभव कोंगो में हुआ. वहाँ की राजधानी किनशासा में एक खाने में कानखजूरे बने थे. उन्हें शायद भाप में पकाया गया था, क्योंकि साफ दिख रहा था कि वे कानखजूरे ही थे. एक प्लेट में लाल या भूरे रंग के, दूसरी प्लेट में काले से. जिनके यहाँ खाना था वे बोले, बहुत प्रोटीन है इनमें. उनके बहुत जोर देने पर, बस एक ही खा पाया. मेरी चीन में केवल तीन मधुमक्खियों के खाने पर कुछ बेदर्द सी चुटकियाँ लीं गयीं तो जाहिर है कि सिर्फ एक कानखजूरा खाने पर कुछ और कहा जायेगा. कह लीजिये जनाब, जो मधुमक्खी या कानखजूरे खा सकते हैं वह आप की बात भी सुन लेंगे.
आज लंदन जाना है इसलिए दो दिन के लिए चिट्ठे की छुट्टी. आज की तस्वीरें कोंगो से.


जिन सभ्यताओं में शाकाहारी खाने का कंसेप्ट ही नहीं है, वहाँ जरा यह बता कर देखिये कि साहब हम मीट नही खाते, वे कहेंगे, अच्छा तो चिकन ले लेजिये या मछली खा लीजिये. जब आप मीट, चिकन, हेम, पोर्क, मछली, अंडे इत्यादि की पूरी सफाई दे कर समझाते हैं कि आप कुछ नहीं खाते, तो वे आपको ऐसे देखते हें मानो आप हिमालय के येती हैं या फिर अस्पताल में बंद करने लायक पागल, और दया भरी आवाज में कहते हैं, अच्छा तो यह लीजिये, हमने इसमे से सारा माँस निकाल दिया है, कोई छोटा मोटा टुकड़ा रह गया हो तो आप खाते समय निकाल दीजियेगा.
अरे फिर भी आप इसे खाने से हिचकचा रहे हैं ? समझाईये आप उन्हें, कि माँस के साथ बने, मिले खाने को नहीं खा सकते या माँस न खाने का मतलब है कि आप माँस का सूप भी नहीं पीते!
पर बात मेरी कसम की हो रही थी. मानता हूँ कि यह कसम गाँधी जी के आँख मूंदे हुए बंदर जैसी है, पर जीने के लिए कोई न कोई बहाना तो निकालना ही पड़ता है. दिक्कत तब होती है जब पकवान ऐसे पकाया जाता है कि आप को जंतु को पहचानने में गलती नहीं हो सकती. कुछ पूछने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती. एक ऐसा अनुभव कोंगो में हुआ. वहाँ की राजधानी किनशासा में एक खाने में कानखजूरे बने थे. उन्हें शायद भाप में पकाया गया था, क्योंकि साफ दिख रहा था कि वे कानखजूरे ही थे. एक प्लेट में लाल या भूरे रंग के, दूसरी प्लेट में काले से. जिनके यहाँ खाना था वे बोले, बहुत प्रोटीन है इनमें. उनके बहुत जोर देने पर, बस एक ही खा पाया. मेरी चीन में केवल तीन मधुमक्खियों के खाने पर कुछ बेदर्द सी चुटकियाँ लीं गयीं तो जाहिर है कि सिर्फ एक कानखजूरा खाने पर कुछ और कहा जायेगा. कह लीजिये जनाब, जो मधुमक्खी या कानखजूरे खा सकते हैं वह आप की बात भी सुन लेंगे.
आज लंदन जाना है इसलिए दो दिन के लिए चिट्ठे की छुट्टी. आज की तस्वीरें कोंगो से.


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सही कहा सुनील भाई, पहले मै भी पूछता फिरता था, ये क्या है, कैसे बना, कुछ गलत तो नही है, वगैरहा वगैरह.एक बार मेरा एक मित्र लन्दन मे मुझे एक अफ़्रीकन रेस्टोरेन्ट मे ले गया, वहाँ उसने मुझे कोई चीज खिलाई, बहुत लजीज थी, नाम भी बहुत अजीब था,खैर मैने दोबारा मंगा के खाई, तब से मैने पूछना छोड़ दिया, जो मिले खा लो, नही तो बेटा भूखे ही रह जाओगे.
Sunil ji, Ek baat to tay hai, London me aapko ye sab khane ko nahi milega.....should I say how sad ;)
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