Monday, November 21, 2005

एक नयी रामायण

रामायण का भारतीय जीवन पर गहरा प्रभाव है. यह कहना कठिन है कि रामायण ने भारतीय परम्पराओं को बदल दिया या फिर तुलसीदास जी रामायण लिखते समय उस समय की प्रचलित भारतीय परम्पराओं से प्रभावित थे. जो भी हो, भारतीय समाज को कुछ परम्पराएँ बनाये रखने में रामायण की तरफ से सामाजिक तथा धार्मिक स्वीकृति मिल गयी.

रामायण स्त्रियों और पुरुषों दोनो के लिए आचरण का मापदंड बनी. पर शायद पुरुष समाज पर उसका कम असर पड़ता है? जहाँ रामायण बड़े भाई और छोटे भाई के बीच प्यार और सम्मान की शिक्षा देती है, यह शिक्षा मुम्बई के सिनेमा में तो जगह पाती है पर समान्य जीवन में पैसे, जयदाद, शक्ति के लिए लड़ने वाले भाईयों की कमी नहीं. गरीब या कम पैसे वालों की ही बात हो यह भी नहीं, देश के सबसे बड़े ओद्योगिक अम्बानी परिवार के भाई जब आपस में लड़े तो हजारों बातें हुई पर किसी ने यह नहीं कहा कि वे दोनो रामायण की शिक्षा को भूल गये थे.

पर रामायण का भारत की स्त्रियों और लड़कियों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा? मेरे विचार में हिंदु धर्म की यह एक कमजोरी है कि हमारी किसी प्रमुख धार्मिक गाथा में हमारे देवी देवताओं की बेटियाँ नहीं होती. न रामायण में राम की कोई बहन है न बेटी, न कृष्ण की कोई बहन या बेटी, न शिव जी की, न हनुमान की... हाँ देवियाँ हैं, लक्ष्मी, पार्वती, सरस्वती पर यह सब किसी देवता की पत्नियाँ हैं. हो सकता है कि इतने वर्ष भारत से दूर रह कर मेरी यादाश्त कमजोर हो गयी हो और मैं ऐसे उदाहरण को भूल रहा हूँ जहाँ किसी प्रमुख देवता की बहन और बेटियाँ थीं. पर रामायण जिसका प्रभाव शायद सभी अन्य धार्मिक पुस्तकों से अधिक है, उसी आदर्श परिवार के उदाहरण देती लगती है जिसमें किसी की बहन या बेटी न हो.

अल्ट्रा साऊँड के सहारे जाँच कर स्त्री भ्रूण की हत्या, छोटी बच्चियों को जान से मार देना, स्कूल न भेजना, खाना कम देना, दहेज के लालच में जान ले लेना, सभी कुकर्म इतने आम हैं कि समाचार पत्र वाले भी छाप छाप कर थक जाते हें पर हमारे समाज को नहीं बदल पाते. और हमारे प्रमुख हिंदू गुरु, वे क्या कहते हें इन सबके बारे में ?

शायद आज भारत को एक नये तुलसीदास की आवश्यकता है जो नयी रामायण की संरचना करे. जिसमे राम की भी बहन हो जिसका लालन पालन दशरथ से पूरे गर्व और स्नेह से करें, जिसके सम्मानपूर्वक जीवन के लिए राम अपना भाई धर्म निभाएँ और जो स्वयं आत्मसम्मान और गौरव से जीवन बिताने का उदाहरण बने. नयी रामायण जिसमें राम की भी एक बेटी हो जिसे वह उतना ही प्यार करें जितना लव और कुश से करते हैं.




Comments:
हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ पढ़ने का शौंक बचपन से है। पर इस बात पर कभी भी नहीं सोचा।
 
बहुत कड़वी लेकिन बहुत सही बात कही है आपने। इन्सान को प्रथम शिक्षा प्रदाता तो उसके धर्म ग्रन्थ ही होते है, जो उसे संस्कार मे मिलते है। यदि उनमे ही बहुत सारे विरोधाभास हो तो बहुत परेशानी होती है।हालांकि मै किसी भी धर्मग्रन्थ के विरुद्द नही हूँ, लेकिन रामायण काफ़ी कुछ तत्कालीन आचार विचार,सामाजिक चिन्तन से प्रभावित थी। जो शायद आज के समय मे पूरी तरह से प्रासंगिक नही है।
 
सुनीलजी,

मैने लगभग सभी ग्रथों को पढा तो नही लेकिन अवलोकन जरूर किया है. आपने भारतिय समाज की सबसे बडी विसंगती को पकडा है.क्योंकि साहित्य समाज का दर्पण होता है.

आशीष
 
एक उदाहरण श्री कृष्ण का मिलता है...उनकी बहन थीं सुभद्रा, जिनका विवाह खुद श्री कृष्ण ने उन्हे "भगा" कर, अर्जुन से कराया था
 
सिक्ख लोग भी यह कहते हैं कि लंका की लड़ाई सीता या शूर्पनखा की वजह से हुई, महभारत की लड़ाई दरौपदी की वजह से हुई। यानि हिन्दू ग्रंथों में युद्ध औरत या संपत्ती की वजह से हुए हैं। सिक्खों के गुरू गोबिंद साहब ने निर्दोश इन्सानों के लिए युद्ध किए, बल्कि अपने पुत्र भी वार दिए। इसी तरह सुना है गांधी जी गीता को मां मानते थे जबकि गीता ने इतना बड़ा कुरुक्षेत्र का युद्ध करवाया, लेकिन गांधी जी तो हिंसा के खिलाफ़ थे। मैंने रामायण, महाभारत अथवा और कोई ग्रंथ पढ़ा नहीं, सिर्फ़ सीरियल देखे हैं। मुझे कभी कोई प्रेरणा का या किसी शिक्षा का आभास नहीं हुआ। जिस धर्म में बीसवीं शताब्दी तक भी मंदिरों में छोटी जात वालों को जाने की मनाही थी, उसे क्या मानूं।
 

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