Thursday, June 15, 2006

अपनी भाषा

मैं इन दिनों अमरीकी पुलित्ज़र पुरस्कार से तीन बार सम्मानित पत्रकार थोमस फ्रीडमैन की पुस्तक The World is Flat (Thomas Friedman, दुनिया समतल है, Allen Lane publications, 2005) पढ़ रहा था. इस पुस्तक के अंत के करीब वह अब्राहम जोर्ज की बात बताते हैं. केरल में जन्मे, भारतीय सेना के अफसर रहे, फिर अमरीका जा कर वहाँ एक सोफ्टवेयर की कम्पनी खोली.

1998 में अब्राहम अमरीका में नौकरी छोड़ कर वापस भारत आये जहाँ उन्होंने बँगलौर के पास पत्रकारों को तैयार करने की संस्था बनायी क्योंकि उनका सोचना था कि भारत की उन्नति के लिए ज़िम्मेदार और स्वतंत्र पत्रकारों का होना बहुत आवश्यक है. साथ ही साथ, उन्होंने दलित बच्चों को पढ़ाने के लिए एक गाँव में एक विद्यालय भी खोला, शांति भवन.

फ्रीडमैन शांति भवन विद्यालय को देखने गये और उसके बारे में लिखते हैं कि कैसे सुंदर, स्वच्छ वातावरण में गरीब परिवारों के बच्चों को आम शिक्षा के साथ साथ, क्मप्यूटर आदि भी शुरु से ही सिखाया जाता है. फ़िर बताते हैं कि जिस दिन वह वहाँ गये, बच्चे केलिफोर्निया आचीवमैंट का इम्तहान दे रहे थे और विद्यालय की प्रिंसिपल श्रीमति लाव ने फ्रीडमैन से कहा, "हम इन्हें अँग्रेज़ी में शिक्षा देते हैं ताकि ये भारत में या विश्व में उच्च शिक्षा के लिए कहीं भी जा सकते हैं. हमारा उद्देश्य है कि बच्चों को उच्च स्तर की शिक्षा दें ताकि ये वैसे काम करने के सपने देख सकें जैसे इनके परिवारों में कभी नहीं देखे... यहाँ आसपास तो ये हमेशा दलित ही रहेंगे, अछूत माने जायेंगे. पर अगर ये यहाँ से दूर जा सकें, अच्छा बोलना सीखें, अभिजात्य तरीके से बात कर सकें, तो इस बंधन से मुक्त हो सकते हैं."

पढ़ कर सोच रहा कि यह बिल्कुल सच है. आप दूसरों से अच्छी अँग्रेज़ी में बात करेंगे तो भारतीय समाज में आप की इज़्ज़त करने वालों की कमी नहीं होगी. आप बहुत अच्छी हिंदी बोलते हों, या कन्नड़ या मलयालम पर अँग्रेज़ी न आती हो तो न तो कोई उच्च स्तर का काम मिलेगा, न ही इज़्ज़त. यह बात सब निम्न मध्य वर्गियों और गरीब लोगों को मालूम है और अँग्रेज़ी माध्यम के शिक्षा संस्थानों के कुकरमुत्तों की तरह फैलना का यही कारण है.

यह सोचना कि एक दिन मराठी, बँगाली या हिंदी जैसी भाषाएँ अपनी प्रतिष्ठा पायेंगी और अँग्रेज़ी की शान कुछ कम होगी, शायद ठीक सोचना नहीं है ? जैसा वातावरण है उसमें अँग्रेज़ी घटेगी नहीं, और भी तेज़ी से बढ़ेगी.

बात शायद "अँग्रेज़ी या भारतीय भाषाएँ" की नहीं "अँग्रेज़ी तथा भारतीय भाषाएँ" की होनी चाहिए ? बात यह नहीं हो कि हम कैसे अँग्रेज़ी हटा कर अपनी घर की भाषा को प्रमुखता दे, बल्कि यह हो कि, कैसे काम में और विश्व से जोड़ने में अँग्रेज़ी का इस्तमाल करने के साथ साथ, अपनी भाषा में, अपने साहित्य में, अपने इतिहास में, अपनी सभ्यता में, गर्व बढ़ा सकें ?

Comments:
सुनील जी, एक अच्छा और ज्वलंत मुद्दा उठाया है आपने !
आप सही कहते है "अंग्रेजी या भारतिय भाषा" की जगह बात "अंग्रेजी और भारतिय भाषा" की होनी चाहिये।
जहां व्यव्सायिक हित की बात है वंहा अंग्रेजी से कोई गुरेज नही होना चाहिये. अंग्रेजी एक विश्व भाषा है, जिसके बिना विश्व स्तर पर कार्य करना दूष्कर है। आज का युग सहअस्तित्व का है। कीसी को भी स्थानापन्न करना कठिन है।
लेकिन साहित्य, शिक्षा, आम बोल चाल, रंगमण्च, मिडीया मे भारतिय भाषाओ को प्रमुखता देनी चाहिये।
 
भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है। विश्व-गाँव की संकल्पना में भाषा का महत्त्व बहुत अधिक है। भारत के संबंध में अँगरेजी के साथ-साथ हिंदी भी उतनी ही आवश्यक है।
राष्ट्र-भाषा समरुपता (एकता) की भी परिचायक होती है। उन्नति की एक सीढ़ी राज-भाषा-समृद्धि भी है।
प्रेमलता
 
शायद अंग्रेजी के महत्व को नकारा नहीं जा सकता है| अक्सर हिन्दी के आड़े कुछ हिन्दी प्रेमी आ जाते हैं| दूसरी भाषा के शब्द, खास कर अंग्रेजी के, हमें हिन्दी मे स्वीकार कर लेने चाहिये| अंग्रेजी मे बहुत से शब्द हिन्दी के हैं |
 
भारतीयों को हर वह भाषा सिखनी चाहिए जो उनके विकास में सहायक हो, पर अंग्रेजी के मोह का कारण अपने आप को निम्न समझते भारतीयों का लघुग्रंथी से ग्रस्त होना हैं.
बिना अंग्रेजी अपनाए अगर दलित दलित ही रहेगा तो क्या उनको अपना धर्म भी त्याग देना चाहिए, आखिर दलितता का मुल तो वहीं हैं.
 
पर मुद्दा यह है कि यह प्रसार होगा कैसे? गर इंटरनेट पर तीन सौ से बढ़कर तीन लाख ब्लाग हो जायें उससे? कल कुछ हिंदी समाचार चैनल देख रहा था। एक छोटी सी घटना की रिपोर्ट देने में कुल चार वाक्य बारह बार घुमाये गये, हर वाक्य के अस्सी प्रतिशत शब्द अँग्रेजी के थे। यही हाल अभिनेताओं का है। बात सिर्फ इतनी नही कि ये लोग हिंदी बोलने में शर्माते हैं, इन्हें ढँग से आती ही नही। वरना एलओसी कारगिल की शूटिंग के दौरान जेपी दत्ता को सैफ से यह न कहना पढ़ता "जाओ, मनोज बाजपेयी से कुछ हिंदी सीखो।"
 
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सुनिल जी मेरी उपरोक्त टिप्पणी गलती से यहाँ चिपक गयी | कृपया हटा दें |
 
अंगरेजी का महत्व अपनी जगह पर है किन्तु इससे अपनी भाषा का महत्व कम नहीं हो जाता | खासकर हिन्दी का, जिसके बोलने वाले अंगरेजी बोलने वालों से भी से अधिक संख्या में हैं | अंगरेजी का महत्व है लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि जो काम हिन्दी में होना चाहिये उसे अंगरेजी में किया या कराया जाय | भाषा का अपना एक जटिल अर्थतन्त्र है | यदि हम अपनी भाषा को आगे नहीं लायेंगे तो जरा सोचिये कि अरबों हिन्दीभाषी लोगो को अनन्त काल तक अंगरेजी पढाने(रटाने) में कितना "मैन-आवर" नष्ट करना पडेगा | अपनी भाषा के आ जाने से यह समय अन्य सृजनात्मक कार्यों में लगाया जा सकेगा | विश्व में हमारी इज्जत बढेगी वह अलग |

इतिहास परिवर्तनशील है | कभी संस्कृत की चमक थी, ग्रीक की चमक थी, कभी लैटिन की चमक थी | कुछ समय पहले तक फ्रेन्च को अंगरेजी से अधिक सम्मान प्राप्त था | अब अंगरेजी सम्मानित है | कुछ लोगों का विचार है कि अब स्थिति बदलेगी और चीनी को सम्मान मिलना शुरू हो जायेगा | हिन्दी भी कहाँ पीछे रहेगी ?
 

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