Thursday, December 07, 2006
बम और जहाज़
जितनी बार टेलीविजन पर या अखबारों में लंदन में हुए रुसी जासूस के खून की बात पढ़ता हूँ, थोड़ी सी खीझ आती है. हमारे कैंची या क्रीम और शेम्पू ले जाने पर पिछले सालों से हवाई जहाज़ों पर सुरक्षा जाँच के बहाने इतने चक्कर होते हैं और दूसरी ओर ब्रिटिश एयरवेस के कुछ जहाज़ों में रेडियोएक्टिविटी (radioactivity) पायी गयी है, जिसका असर करीब 36 हजार यात्रियों पर पड़ सकता है, यह पढ़ कर सोचता हूँ कि क्या सुरक्षा जाँच करने करवाने का क्या फ़ायदा!
यह बात भी नहीं कि हर हवाई अड्डे के सुरक्षा जाँच नियम एक जैसे हों, और उसी हवाई अड्डे से अमरीका या इँग्लैंड जाने वाले जहाज़ के यात्रियों की जाँच एक तरीके से होती है और अन्य जगह जाने वाले यात्रयों की जाँच दूसरे तरीके से. तो क्या ले जा सकते हें या क्या नहीं, यह मालूम नहीं चलता.
अँग्रेजी पत्रिका इकोनोमिस्ट (Economist) में एक अन्य समाचार पढ़ा था. हवाई जहाज में मोबाईल टेलीफ़ोन के प्रयोग न कर पाने का. हमेशा कहते हैं कि अगर आप जहाज में टेलीफोन का प्रयोग करें तो जहाज के इलेक्ट्रोनिक उपकरणों में खराबी आ सकती है. यह सुन कर मन में डर सा आ जाता है और अगर कोई जहाज़ में मोबोईल का उपयोग करने की कोशिश करे तो उसके आस पास वाले यात्री गुस्से से उसके पीछे पड़ जाते हैं कि क्यों हमारी जान को खतरे में डाल रहे हो! इकोनोमिस्ट के अनुसार, मोबाईल से जहाज़ के उपकरणों को कुछ नहीं होता बल्कि जिस जगह के ऊपर से जहाज़ गुजर रहा है वहाँ के मोबाईल जाल में दखलअंदाज़ी होती है. उनके अनुसार जहाज़ कम्पनियाँ मोबाईल जालों से समझोता कर रही हैं और अगले साल तक यह फैसला हो जायेगा कि कौन इस तरह के मोबाईल प्रयोग से कितना कमायेगा, तब हवाईजहाज़ों यात्रा के दौरान मोबाईल का प्रयोग करना आसान हो जायेगा.
यानि कि सारी बात पैसे के बाँटने की थी?
इस लेख को पढ़ कर मुझे थोड़ा सा दुख भी हुआ. रेलगाड़ी में सफर करते समय मोबाईल पर बातचीत करने वालों से बचना मुश्किल है. कुछ लोग तो अपना कच्चा पक्का सारा चिट्ठा लोगों के सामने बघार देते हैं, और एक से बात करना बँद करते हें तो दूसरे से शुरु कर देते है. हवाईजहाज़ में अब तक इस झँझट से शाँती थी, अगर यह बात सच है तो वह शाँती भी जाती रहेगी.
****
नोर्वे ने अपील की है कि गुच्छे वाले बमों (cluster bombs) का प्रयोग निषेध कर दिया जाये. फरवरी 2007 में नोर्वे ने एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया है जिसका विषय होगा कि गुच्छे वाले बमों का बनाना और प्रयोग करना अंतर्राष्ट्रीय कानून में गैरकानूनी घोषित किया जाये जैसे कि मानवघाती माईनस् (antihuman mines) के साथ कुछ वर्ष पहले किया गया था.
मेरा बस चले तो दुनिया के सारे हथियार बनाने बंद हो जायें. कितनी बार यात्राओं के दौरान युद्ध में और युद्ध के बाद बचे हुए बमों से मरने वाले और घायल हो कर हाथ पाँव खोने वाले लोगों को देखा है. जब मानवघाती माईनस् को निषेध करने की बात चली थी तो मैं उनसे पूरी तरह सहमत था.
पर अहिँसावादी निति, सभी हथियार न बनाने की नीति को अव्याव्हारिक माना जाता है. यह मान सकते हें कि युद्ध में भाग लेने वाला सिपाही जब तनख्वाह लेता है तो यह भी मानता है कि मैं अपनी तरफ़ वालों के लिए मरने, कैदी होने, घायल होने के लिए तैयार हूँ. इसलिए युद्ध में उसे मारने के लिए कुछ भी हथियारों का प्रयोग किया जाये, शायद जायज होगा.
पर जब मालूम हो कि हथियार किसी सिपाही को मारने के लिए नहीं हों बल्कि सारे क्षेत्र को असुरक्षित करने के लिए हों जिनसे युद्ध के बाद भी आम लोग, स्त्री, पुरुष, बच्चे, जिन्होंने युद्ध में भाग लेने की तनख्वाह नहीं ली, वे भी कई सालों तक मरते रहेंगे, तो उन हथियारों का प्रयोग करने वाला जानता है कि वह केवल सिपाहियों को नहीं मार रहा, बल्कि आम लोगों को मार रहा है और इस तरह का उपयोग किसी भी हालत में नैतिक नहीं कहा जा सकता.
मानवघाती माईनस् की यही बात थी. ज़मीन के नीचे दबा दो, जब ऊपर से कोई गुजरे तो बम फट जाये. अँगोला, मोजामबीक, लाओस जैसे देशों में युद्धों के समाप्त होने के दस साल बाद तक इनसे लोग मरते और घायल होते रहे.
वैसी ही बात गुच्छे वाले बमों की है. एक बम के भीतर छोटे छोटे कई बम होते हैं, गिरने पर उनमें से बहुत से नहीं फटते, और युद्ध समाप्त होने के बाद जान लेते रहते हैं. द्वितीय महायुद्ध में इनका आविष्कार किया गया था और अमरीका और रुस जैसे देशों ने इनका बहुत सी लड़ाईयों में प्रयोग किया है. अभी हाल में इज़राईल ने जब इनका उपयोग लेबनान में किया तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुछ हल्ला मचा.
कोई भी बम या माईनस् हों, दुख होता कि स्वतंत्रता और मानव अधिकारों की बात करने वाले देश जो अंतर्राष्ट्रीय हथियारों के बाजार से करोड़ों कमाते हैं, इनके निषेध के लिए तैयार नहीं. मानईस् के निषेध की बात हुई तो अमरीका और रुस जैसे देश इसके लिए तैयार नहीं थे, आज गुच्छे वाले बमों की बात हो रही है तो भी यही देश नहीं मान रहे.
पर मैं नोर्वे के साथ हूँ. और आप?
यह बात भी नहीं कि हर हवाई अड्डे के सुरक्षा जाँच नियम एक जैसे हों, और उसी हवाई अड्डे से अमरीका या इँग्लैंड जाने वाले जहाज़ के यात्रियों की जाँच एक तरीके से होती है और अन्य जगह जाने वाले यात्रयों की जाँच दूसरे तरीके से. तो क्या ले जा सकते हें या क्या नहीं, यह मालूम नहीं चलता.
अँग्रेजी पत्रिका इकोनोमिस्ट (Economist) में एक अन्य समाचार पढ़ा था. हवाई जहाज में मोबाईल टेलीफ़ोन के प्रयोग न कर पाने का. हमेशा कहते हैं कि अगर आप जहाज में टेलीफोन का प्रयोग करें तो जहाज के इलेक्ट्रोनिक उपकरणों में खराबी आ सकती है. यह सुन कर मन में डर सा आ जाता है और अगर कोई जहाज़ में मोबोईल का उपयोग करने की कोशिश करे तो उसके आस पास वाले यात्री गुस्से से उसके पीछे पड़ जाते हैं कि क्यों हमारी जान को खतरे में डाल रहे हो! इकोनोमिस्ट के अनुसार, मोबाईल से जहाज़ के उपकरणों को कुछ नहीं होता बल्कि जिस जगह के ऊपर से जहाज़ गुजर रहा है वहाँ के मोबाईल जाल में दखलअंदाज़ी होती है. उनके अनुसार जहाज़ कम्पनियाँ मोबाईल जालों से समझोता कर रही हैं और अगले साल तक यह फैसला हो जायेगा कि कौन इस तरह के मोबाईल प्रयोग से कितना कमायेगा, तब हवाईजहाज़ों यात्रा के दौरान मोबाईल का प्रयोग करना आसान हो जायेगा.
यानि कि सारी बात पैसे के बाँटने की थी?
इस लेख को पढ़ कर मुझे थोड़ा सा दुख भी हुआ. रेलगाड़ी में सफर करते समय मोबाईल पर बातचीत करने वालों से बचना मुश्किल है. कुछ लोग तो अपना कच्चा पक्का सारा चिट्ठा लोगों के सामने बघार देते हैं, और एक से बात करना बँद करते हें तो दूसरे से शुरु कर देते है. हवाईजहाज़ में अब तक इस झँझट से शाँती थी, अगर यह बात सच है तो वह शाँती भी जाती रहेगी.
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नोर्वे ने अपील की है कि गुच्छे वाले बमों (cluster bombs) का प्रयोग निषेध कर दिया जाये. फरवरी 2007 में नोर्वे ने एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया है जिसका विषय होगा कि गुच्छे वाले बमों का बनाना और प्रयोग करना अंतर्राष्ट्रीय कानून में गैरकानूनी घोषित किया जाये जैसे कि मानवघाती माईनस् (antihuman mines) के साथ कुछ वर्ष पहले किया गया था.
मेरा बस चले तो दुनिया के सारे हथियार बनाने बंद हो जायें. कितनी बार यात्राओं के दौरान युद्ध में और युद्ध के बाद बचे हुए बमों से मरने वाले और घायल हो कर हाथ पाँव खोने वाले लोगों को देखा है. जब मानवघाती माईनस् को निषेध करने की बात चली थी तो मैं उनसे पूरी तरह सहमत था.
पर अहिँसावादी निति, सभी हथियार न बनाने की नीति को अव्याव्हारिक माना जाता है. यह मान सकते हें कि युद्ध में भाग लेने वाला सिपाही जब तनख्वाह लेता है तो यह भी मानता है कि मैं अपनी तरफ़ वालों के लिए मरने, कैदी होने, घायल होने के लिए तैयार हूँ. इसलिए युद्ध में उसे मारने के लिए कुछ भी हथियारों का प्रयोग किया जाये, शायद जायज होगा.
पर जब मालूम हो कि हथियार किसी सिपाही को मारने के लिए नहीं हों बल्कि सारे क्षेत्र को असुरक्षित करने के लिए हों जिनसे युद्ध के बाद भी आम लोग, स्त्री, पुरुष, बच्चे, जिन्होंने युद्ध में भाग लेने की तनख्वाह नहीं ली, वे भी कई सालों तक मरते रहेंगे, तो उन हथियारों का प्रयोग करने वाला जानता है कि वह केवल सिपाहियों को नहीं मार रहा, बल्कि आम लोगों को मार रहा है और इस तरह का उपयोग किसी भी हालत में नैतिक नहीं कहा जा सकता.
मानवघाती माईनस् की यही बात थी. ज़मीन के नीचे दबा दो, जब ऊपर से कोई गुजरे तो बम फट जाये. अँगोला, मोजामबीक, लाओस जैसे देशों में युद्धों के समाप्त होने के दस साल बाद तक इनसे लोग मरते और घायल होते रहे.
वैसी ही बात गुच्छे वाले बमों की है. एक बम के भीतर छोटे छोटे कई बम होते हैं, गिरने पर उनमें से बहुत से नहीं फटते, और युद्ध समाप्त होने के बाद जान लेते रहते हैं. द्वितीय महायुद्ध में इनका आविष्कार किया गया था और अमरीका और रुस जैसे देशों ने इनका बहुत सी लड़ाईयों में प्रयोग किया है. अभी हाल में इज़राईल ने जब इनका उपयोग लेबनान में किया तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुछ हल्ला मचा.
कोई भी बम या माईनस् हों, दुख होता कि स्वतंत्रता और मानव अधिकारों की बात करने वाले देश जो अंतर्राष्ट्रीय हथियारों के बाजार से करोड़ों कमाते हैं, इनके निषेध के लिए तैयार नहीं. मानईस् के निषेध की बात हुई तो अमरीका और रुस जैसे देश इसके लिए तैयार नहीं थे, आज गुच्छे वाले बमों की बात हो रही है तो भी यही देश नहीं मान रहे.
पर मैं नोर्वे के साथ हूँ. और आप?
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मैने भी अभी कुछ दिनों पहले ही "क्लस्टर बम" के बारे में जाना था. वह तो खैर मेरी खुद की जिज्ञासा थी जो हथियारों के प्रति है।
मगर निसन्देह, इस तरह के विनाशक हथियारों का "प्रयोग" अनैतिक है, और किसी भी हाल में इनका विरोध होना ही चाहिये.
मगर यही तो विडंबना है, जहाँ किसी ताकतवर देश का स्वार्थ उनसे जुड़ गया तो फ़िर तो मुश्किल है कुछ साधारण देशों की गुहार सुनना.
हथियारों का विरोध वो ही देश करेंगे जो इनको झेल चुके होंगे और इनकी भयावहता से परिचित होंगे, इस्तेमाल करने वाले देशों से कुछ आशा रखना तो....!! शायद मुर्खता ही होगी।
मगर निसन्देह, इस तरह के विनाशक हथियारों का "प्रयोग" अनैतिक है, और किसी भी हाल में इनका विरोध होना ही चाहिये.
मगर यही तो विडंबना है, जहाँ किसी ताकतवर देश का स्वार्थ उनसे जुड़ गया तो फ़िर तो मुश्किल है कुछ साधारण देशों की गुहार सुनना.
हथियारों का विरोध वो ही देश करेंगे जो इनको झेल चुके होंगे और इनकी भयावहता से परिचित होंगे, इस्तेमाल करने वाले देशों से कुछ आशा रखना तो....!! शायद मुर्खता ही होगी।
मैं तो सम्पुर्ण निर्स्त्रीकरण के पक्ष में हूँ, पर निकट भविष्य में तो इसके आसार कम ही है.
इंतजार है उस दिन का जब फौजे मात्र आपदाओं में लोगो की जाने बचने का काम करेगी.
इंतजार है उस दिन का जब फौजे मात्र आपदाओं में लोगो की जाने बचने का काम करेगी.
"Emirates" ने अपने जहाजों पर मोबाइल फोन का प्रयोग शुरू कर दिता है।
नार्वे की विचारधारा सराहनीय है। अस्त्रों का रखना या ना रखना - यह विचारधारा कई तथ्यों से प्रभावित हो कर पनपती है।
इन कई तथ्यों में से एक है हमारी (देश) की भैगोलिक स्थिति।
स्कैडेनिविया के देश मूलत: शान्तिप्रिय देश हैं, उनमें परमाणु अस्त्र विकसित करने की क्षमता तो है लेकिन फिर भी वह ऐसा कर नहीं रहे हैं। कारण है पड़ोसी राष्ट्रों के बीच 'सच्चा' विश्वास।
इस तरफ़ भारत की भौगोलिक स्थिति देखिये - एक तरफ़ पाकिस्तान है, अफ़गानिस्तान है, चीन है, बांग्ला देश का नाम भी ले ही लिया जाये। किसी को एक दूसरे पर विश्वास नहीं। कश्मीर - अरुणाचल - सिक्किम मुद्दे भी अनगिनत। एक दूसरे को रौंद देने की - अपने अहंकार (और कद) को बढ़ाने की अभिलाषा भी है।
पारस्परिक विश्वास है नहीं और शायद चाहते हुये भारत के लिये निरस्तीकरण का मार्ग सुलभ या cयावहारिक नहीं रह जाता है।
इस स्थिति में हथियारों के प्रति भारत का रवैया शायद केवल आत्मरक्षा का ही है - विनाश या विध्वंस फैलाने का नहीं।
अटल बिहारी जी के शब्दों में - हम इतिहास तो बदल सकते हैं लेकिन भूगोल नहीं।
एक बात जो उन्होंने नहीं कही कि हम अपना रवैया भी बदल सकते हैं। काश यह रवैया बदले और एशियाई देश, नार्वे की सोच की महज़ तारीफ़ ना करते हुये, उसका अनुसरण भी कर सकें।
नार्वे की सोच 'मानवता' की सोच है।
नार्वे की विचारधारा सराहनीय है। अस्त्रों का रखना या ना रखना - यह विचारधारा कई तथ्यों से प्रभावित हो कर पनपती है।
इन कई तथ्यों में से एक है हमारी (देश) की भैगोलिक स्थिति।
स्कैडेनिविया के देश मूलत: शान्तिप्रिय देश हैं, उनमें परमाणु अस्त्र विकसित करने की क्षमता तो है लेकिन फिर भी वह ऐसा कर नहीं रहे हैं। कारण है पड़ोसी राष्ट्रों के बीच 'सच्चा' विश्वास।
इस तरफ़ भारत की भौगोलिक स्थिति देखिये - एक तरफ़ पाकिस्तान है, अफ़गानिस्तान है, चीन है, बांग्ला देश का नाम भी ले ही लिया जाये। किसी को एक दूसरे पर विश्वास नहीं। कश्मीर - अरुणाचल - सिक्किम मुद्दे भी अनगिनत। एक दूसरे को रौंद देने की - अपने अहंकार (और कद) को बढ़ाने की अभिलाषा भी है।
पारस्परिक विश्वास है नहीं और शायद चाहते हुये भारत के लिये निरस्तीकरण का मार्ग सुलभ या cयावहारिक नहीं रह जाता है।
इस स्थिति में हथियारों के प्रति भारत का रवैया शायद केवल आत्मरक्षा का ही है - विनाश या विध्वंस फैलाने का नहीं।
अटल बिहारी जी के शब्दों में - हम इतिहास तो बदल सकते हैं लेकिन भूगोल नहीं।
एक बात जो उन्होंने नहीं कही कि हम अपना रवैया भी बदल सकते हैं। काश यह रवैया बदले और एशियाई देश, नार्वे की सोच की महज़ तारीफ़ ना करते हुये, उसका अनुसरण भी कर सकें।
नार्वे की सोच 'मानवता' की सोच है।
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