Tuesday, April 24, 2007
मानव शरीरों से अमूर्त कला
रात को रायटर के अंतर्जाल पृष्ठ पर समाचार देख रहा था कि नज़र नीचे 15 अप्रैल के एक समाचार पर गयी. १५० लोगों नें हौलैंड में प्रसिद्ध अमरीकी छायाचित्रकार स्पेंसर ट्यूनिक (Spencer Tunick) के अमूर्त कला तस्वीरों के लिए निर्वस्त्र हो कर तस्वीरें खिंचवायीं. समाचार के साथ दिखाया जाना वाले दृष्य भी अनौखे थे. एक तरह स्त्री पुरुष आराम से कपड़े उतार रहे थे, फ़िर वे सब लोग ट्यूलिप के फ़ूलों के आसपास तस्वीरें खिचवाने लगे. एक पवनचक्की के सामने, जमीन पर साथ साथ लेटे शरीरों से बने पवनचक्की के पँखों का दृष्य बहुत सुंदर लगा.

बाद में गूगल से श्री ट्यूनिक के बारे में खौज की तो मालूम चला कि श्रीमान जी इस तरह के निर्वस्त्र अमूर्त कला तस्वीरों, यानि इतने शरीर साथ हो कि बजाय एक व्यक्ति की नग्नता देखने के सारे शरीर मिल कर अमूर्त कला बनायें, के लिए प्रसिद्ध हैं और इस तरह के प्रयोग न्यू योर्क के रेलवे स्टेशन, वेनेसूएला में काराकास शहर, इंग्लैंड में न्यू केस्ल के मिलेनियम ब्रिज और अन्य बहुत सी जगह पर कर चुके हैं. जो लोग इन तस्वीरों में भाग लेते हैं वह निशुल्क काम करते हैं, शुल्क के तौर पर बस उन्हें अपनी एक तस्वीर मिलती है. प्रस्तुत हैं ट्यूनिक जी की अमूर्त कला के कुछ नमूने.
सोचये कि अगर ट्यूनिक जी भारत में अगली तस्वीर खींवना चाहें तो क्या उसमें भाग लेना पसंद करेंगे? वैसे तो भारतीय संस्कृति की रक्षा करने वाले उन्हें ऐसा कुछ करने से पहले इतने दँगे करेंगे तो ट्यूनिक जी तस्वीर लेना ही भूल जायेंगे. पर मान लीजिये कि वह किसी तरह से इस काम में सफ़ल हो भी जायें तो क्या उन्हें भारत में इतने लोग मिलेंगे, स्त्रियाँ और पुरुष जो इस तरह की तस्वीरें खुली जन स्थलों पर खिंचवा सकें? मुझे तो शक है, क्योकि मुझे लगता हैं हम लोग अपने शरीरों के बारे में इतनी ग्रथियों में बँधे हैं कि शरीर को परदों से बाहर लाने का सुन कर घबरा जाते हैं. भारत में बस नागा साधू ही हैं जो यह कर सकते हें.
आप सोचेंगे कि हमसे पूछ रहा है, क्या इसमें स्वयं इतनी हिम्मत होगी? मेरा विचार है कि हाँ, मुझे इस तरह निर्वस्त्र तस्वीर खिचवाने में कोई दिक्कत नहीं होगी. शरीर तो केवल शरीर ही है, सबके पास जैसा है, वैसा ही, न कम न अधिक. क्या कहते हैं आप, यह सच बोल रहा हूँ या खाली पीली डींग मारने वाली बात है?
शायद यह खाली पीली डींग ही है कि क्योंकि दस साल पहले तक कोई पूछता तो मुझे शक न होता कि निर्वस्त्र तस्वीर खिंचवाने में हिचकिचाहट न होती पर आज मुझे लगता है कि शरीर बूढ़ा हो रहा है, पेट निकला है, बाल सफ़ेद हैं तो अधिक झिकझिकाहट सी होती है. यह आधुनिक समाज का ही प्रभाव है कि दुनिया में केवल सुंदर शरीर ही होने चाहिये, ऐसा लगने लगता है और अगर आप मोटे, छोटे, दुबले, बूढ़े हों तो यह समाज आप को अपने शरीर से शर्म करना सिखा देता है.






बाद में गूगल से श्री ट्यूनिक के बारे में खौज की तो मालूम चला कि श्रीमान जी इस तरह के निर्वस्त्र अमूर्त कला तस्वीरों, यानि इतने शरीर साथ हो कि बजाय एक व्यक्ति की नग्नता देखने के सारे शरीर मिल कर अमूर्त कला बनायें, के लिए प्रसिद्ध हैं और इस तरह के प्रयोग न्यू योर्क के रेलवे स्टेशन, वेनेसूएला में काराकास शहर, इंग्लैंड में न्यू केस्ल के मिलेनियम ब्रिज और अन्य बहुत सी जगह पर कर चुके हैं. जो लोग इन तस्वीरों में भाग लेते हैं वह निशुल्क काम करते हैं, शुल्क के तौर पर बस उन्हें अपनी एक तस्वीर मिलती है. प्रस्तुत हैं ट्यूनिक जी की अमूर्त कला के कुछ नमूने.
सोचये कि अगर ट्यूनिक जी भारत में अगली तस्वीर खींवना चाहें तो क्या उसमें भाग लेना पसंद करेंगे? वैसे तो भारतीय संस्कृति की रक्षा करने वाले उन्हें ऐसा कुछ करने से पहले इतने दँगे करेंगे तो ट्यूनिक जी तस्वीर लेना ही भूल जायेंगे. पर मान लीजिये कि वह किसी तरह से इस काम में सफ़ल हो भी जायें तो क्या उन्हें भारत में इतने लोग मिलेंगे, स्त्रियाँ और पुरुष जो इस तरह की तस्वीरें खुली जन स्थलों पर खिंचवा सकें? मुझे तो शक है, क्योकि मुझे लगता हैं हम लोग अपने शरीरों के बारे में इतनी ग्रथियों में बँधे हैं कि शरीर को परदों से बाहर लाने का सुन कर घबरा जाते हैं. भारत में बस नागा साधू ही हैं जो यह कर सकते हें.
आप सोचेंगे कि हमसे पूछ रहा है, क्या इसमें स्वयं इतनी हिम्मत होगी? मेरा विचार है कि हाँ, मुझे इस तरह निर्वस्त्र तस्वीर खिचवाने में कोई दिक्कत नहीं होगी. शरीर तो केवल शरीर ही है, सबके पास जैसा है, वैसा ही, न कम न अधिक. क्या कहते हैं आप, यह सच बोल रहा हूँ या खाली पीली डींग मारने वाली बात है?
शायद यह खाली पीली डींग ही है कि क्योंकि दस साल पहले तक कोई पूछता तो मुझे शक न होता कि निर्वस्त्र तस्वीर खिंचवाने में हिचकिचाहट न होती पर आज मुझे लगता है कि शरीर बूढ़ा हो रहा है, पेट निकला है, बाल सफ़ेद हैं तो अधिक झिकझिकाहट सी होती है. यह आधुनिक समाज का ही प्रभाव है कि दुनिया में केवल सुंदर शरीर ही होने चाहिये, ऐसा लगने लगता है और अगर आप मोटे, छोटे, दुबले, बूढ़े हों तो यह समाज आप को अपने शरीर से शर्म करना सिखा देता है.





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जब सभी नग्न हो जाएंगे तो फिर शर्म रहेगी भी कहाँ.
बात सही है. पर झिझक भी होती है, यह भी सही है. बचपन से ही हमे कपडो मे बांध दिया जाता है, और शरीर को छुपाना ही सिखाया जाता है.
बात सही है. पर झिझक भी होती है, यह भी सही है. बचपन से ही हमे कपडो मे बांध दिया जाता है, और शरीर को छुपाना ही सिखाया जाता है.
आपका यह लेख देख कर अच्छा लगा.
कपड़ो का महत्व मात्र मौसमी प्रहारो से शरीर को बचाने जितना ही रहना चाहिए, इसे सभ्यता संस्कृति से जोड़ना बेवकूफि है.
कपड़े अपना महत्व खो देंगे वही सभ्यता के चरम होगा. जहाँ से चले थे वहीं पहूँच जाएंगे.
मानव देह का कला से सिधा सम्बन्ध है, आखिर मानव देह से सुन्दर है भी क्या?
कपड़ो का महत्व मात्र मौसमी प्रहारो से शरीर को बचाने जितना ही रहना चाहिए, इसे सभ्यता संस्कृति से जोड़ना बेवकूफि है.
कपड़े अपना महत्व खो देंगे वही सभ्यता के चरम होगा. जहाँ से चले थे वहीं पहूँच जाएंगे.
मानव देह का कला से सिधा सम्बन्ध है, आखिर मानव देह से सुन्दर है भी क्या?
सुनील जी, ट्यूनिक जी के छविचित्रण को तो पहले भी कभी देखा था, कदाचित ई-स्वामी के चिट्ठे द्वारा या कहीँ और, यह नहीँ कह सकता।
परंतु लेख के उत्तरार्ध में आपने जो बातें उठाई हैं वे नि:सन्देह बहुत अधिक चिंतन व गहरी सोच को मजबूर करती हैं। इस प्रकार सामूहिक रूप से अपने शरीर का चित्रण तो दूर, मात्र प्रदर्शन अपने आप में दुष्कर प्रतीत होता है। कारण सोचने पर समझ में आता है कि हम सूक्ष्म की अपेक्षा स्थूल को महत्वपूर्ण मानते हैं, डरते हैं अपने ही रूप से, जो कि कभी भी सम्पूर्ण रूप से सुन्दर (perfect) हो ही नहीं सकता, बिना आंतरिक सुन्दरता के। बाहरी रूप को ही सच व सुन्दरता का पर्याय मान बैठे हैं। मेरे विचार से यह कार्य यदि बिना किसी दुराग्रह उद्देश्य व स्वार्थ के लिये सहज रूप से कोई कर सकता है तो वह योगी ही है|
इस प्रकार के कार्य कर सकने की क्षमता में भारतवासी को पाश्चात्य देश के नागरिक की अपेक्षा अधिक श्रेय मिलना चाहिये। क्योंकि सामाजिक रूप से निर्वस्त्र हो सकने में अपने यहाँ का परिवेश, सामाजिक मान्यताएं, अपनी विचारधाराएं जितना अवरोध उत्पन्न कर सकती हैं वह कदाचित पश्चिम में नहीं तो इस अवरोध पर विजय पा सकने में यहाँ के नागरिक को अपने ऊपर, मन पर विजय प्राप्त करनी होगी, पाश्चात्य निवासियों में अधिकतर को ऐसी किसी विचारधारा के अवरोध का ख्याल कम ही आयेगा।
यह तो परिस्थितियों व अपने दृष्टिकोण पर है कि यह मात्र उच्छश्रंखलता है, दिखावा है, व्यावसायिकता है, कला है, या कि उससे भी अलग एक दर्शन और गहन चिंतन।
परंतु लेख के उत्तरार्ध में आपने जो बातें उठाई हैं वे नि:सन्देह बहुत अधिक चिंतन व गहरी सोच को मजबूर करती हैं। इस प्रकार सामूहिक रूप से अपने शरीर का चित्रण तो दूर, मात्र प्रदर्शन अपने आप में दुष्कर प्रतीत होता है। कारण सोचने पर समझ में आता है कि हम सूक्ष्म की अपेक्षा स्थूल को महत्वपूर्ण मानते हैं, डरते हैं अपने ही रूप से, जो कि कभी भी सम्पूर्ण रूप से सुन्दर (perfect) हो ही नहीं सकता, बिना आंतरिक सुन्दरता के। बाहरी रूप को ही सच व सुन्दरता का पर्याय मान बैठे हैं। मेरे विचार से यह कार्य यदि बिना किसी दुराग्रह उद्देश्य व स्वार्थ के लिये सहज रूप से कोई कर सकता है तो वह योगी ही है|
इस प्रकार के कार्य कर सकने की क्षमता में भारतवासी को पाश्चात्य देश के नागरिक की अपेक्षा अधिक श्रेय मिलना चाहिये। क्योंकि सामाजिक रूप से निर्वस्त्र हो सकने में अपने यहाँ का परिवेश, सामाजिक मान्यताएं, अपनी विचारधाराएं जितना अवरोध उत्पन्न कर सकती हैं वह कदाचित पश्चिम में नहीं तो इस अवरोध पर विजय पा सकने में यहाँ के नागरिक को अपने ऊपर, मन पर विजय प्राप्त करनी होगी, पाश्चात्य निवासियों में अधिकतर को ऐसी किसी विचारधारा के अवरोध का ख्याल कम ही आयेगा।
यह तो परिस्थितियों व अपने दृष्टिकोण पर है कि यह मात्र उच्छश्रंखलता है, दिखावा है, व्यावसायिकता है, कला है, या कि उससे भी अलग एक दर्शन और गहन चिंतन।
नग्नता से पहले सुरक्षा ज़रूरी है। हमारे यहाँ पूरे कपड़े पहने लड़की सुरक्षित नहीं और आप कपड़े उतारने की बात कर रहे हैं। जिन देशों की आप बात कर रहे हैं वहाँ का कानून, पुलिस वगैरह देखें कैसे काम करती है।
दूसरी बात, नग्नता का भाव बचपन से ही विकसित होता है और होना चाहिए। बड़े होकर वे सब विकृतियां दिमाग से नहीं जाती हैं। यानि उसी सांस्कृति में बड़े होना ज़रूरी है।
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