Friday, November 30, 2007
पुरुष हारमोन टेस्टोस्टिरोन
होरमोन शरीर में उत्पन्न होने वाले उन पदार्थों को कहते हैं जो कि शरीर की किसी ग्रन्थी से बन कर रक्त द्वारा शरीर के विभिन्न भागों में अपना असर दिखाते हैं. शरीर में कई तरह के होरमोन बनते हैं जैसे कि एड्रीनलीन जो दिमाग की एक ग्रन्थी में बनता है और जब मानव डर या गुस्से की भावना को महसूस करे तो शरीर में छोड़ा जाता है जिससे शरीर में रक्त का संचार बढ़ जाता है, दिल की धड़कन बढ़ जाती है, साँसों की तेजी बढ़ जाती है. शरीर में दो होरमोन होते हैं जिनका असर यौन विकास पर पड़ता है, एक होरमोन पुरुष यौन विकास के लिए और दूसरा होरमोन स्त्री गुण विकास के लिए.
टेस्टोस्टिरोन हारमोन पुरुष गुणों को बनाने वाला हारमोन है जो पुरुषों में अण्ड ग्रंथियों में बनता है. आम तौर पर शरीर में दो अण्ड ग्रंथियाँ होती हैं, छोटे अण्डों या गोलियों की तरह, लिंग के नीचे. इन ग्रथियों में लेयडिक के कोष होते हैं जहाँ टेस्टोस्टिरोन बनता है. जब बच्चा किशोरावस्था में पहुँचता है तो शरीर में टेस्टोस्टिरोन का उत्पादन बढ़ जाता है और यह हारमोन शरीर में पुरुष शरीर के गुण बनाता है जैसे कि आवाज का भारी होना, दाढ़ी का बढ़ना, शरीर में बाल निकलना, माँसपेशियों का बढ़ना, यौन अंगों का विकास होना, इत्यादि.
एक वयस्क पुवक की अण्ड ग्रथियाँ प्रतिदिन 5 से 7 मिलीग्राम टेस्टोस्टिरोन बनाती हैं और उसे रक्त में छोड़ती हैं. करीब 98 प्रतिशत हारमोन दो प्रोटीनों के साथ बँध जाता है और हारमोन का प्रमुख प्रभाव 2 प्रतिशत के मुक्त होरमोन से होता है. जिन दो प्रोटीनों से हारमोन बँधता है वह हैं यौन हारमोन बाँधने वाला ग्लोबूलिन यानि सेक्सुअल होरमोन बाईंडिंग ग्लोबूलिन जिससे 60 प्रतिशत होरमोन बँधता है और बाकी का 38 प्रतिशत होरमोन एलबुमिन के प्रोटीन से बँधता है. एलबुमिन से होरमोन का बँधन कुछ कच्चा होता है और आवश्यकता पड़ने पर होरमोन का कुछ हिस्सा मुक्त हो सकता है.
होरमोन का अधिकतर उत्पादन सुबह सात बजे से ग्यारह बजे तक होता है, दिन के साथ साथ हारमोन का उत्पादन कम होता जाता है और शाम होते है अपने न्यूनतम स्तर पर आ जाता है. हारमोन उत्पादन मौसम के साथ भी बदलता है, अक्टूबर के महीने में सबसे अधिक होता है और अप्रैल के महीने में सबसे कम.
जीवन के विभिन्न क्षणों में टेस्टोस्टिरोन का काम भिन्न भिन्न तरीकों से होता है. माँ के गर्भ में इस हारमोन की वजह से भी अगर लड़का है तो उसमें पुरुष यौन अंग बनते हैं. अगर माँ के गर्भ में बच्चे में टेस्टोस्टिरोन कम मिले तो बच्चे में यौन अंगों का विकास ठीक से नहीं हो पाता.
किशोरावस्था में आ कर अगर पुरुष शरीर को सही मात्रा में होरमोन न मिले तो शरीर में पुरुष गुणों का विकास ठीक से नहीं होता. न कद बढ़ता है न दाढ़ी आती है, न आवाज भारी होती है. अण्डग्रँथियों की कुछ बीमारियाँ हो सकती हैं जिनसे वह सही मात्रा में इस होरमोन को नहीं बना पाती. कभी कभी मम्पस यानी कनपेड़ा या गलसुआ की बीमारी भी अण्डग्रंथियों पर असर कर सकती है. इस हालत में किशोर पर मानसिक दबाव पड़ता है और उसके मन में अपनी यौन पहचान के बारे में प्रश्न उठ सकते हैं.
वयस्कों में हारमोन का उत्पादन कम होने से थकान, यौन सम्बंधों के लिए उदासी, यौन सम्बंधों में कठिनाई से ले कर और बहुत से लक्षण दिखते हैं जैसे कि चमड़ी का सूखा होना, शरीर में चर्बी का बढ़ना, आदि. स्ट्रैस, तनाव, हमेशा बैठे बैठे काम करना, व्यायाम न करना, आदि से भी हारमोन के स्तर कम हो जाते हैं.
पर हारमोन कम होना केवल बीमारी नहीं, उम्र के साथ साथ पचास साल की उम्र पार करने पर धीरे धीरे टेस्टोस्टिरोन के स्तर कम होने लगते हैं. जो लोग चुस्त रहते हैं, नियमित व्यायाम करते हैं, उनमें इस कमी का असर कम होता है. जब होरमोन का स्तर कम हो जाये और साथ साथ कुछ शारीरिक लक्षण भी जुड़ जायें तो इसे एन्ड्रोपोज (Andropause) का नाम दिया गया जिसकी तुलना नारियों में होने मीनोपाज (Menopause) से की जाती है जब स्त्री में माहवारी आनी बंद हो जाती है.
एक समय सोचा जाता था कि समलैंगिकता बीमारी है जिसमें पुरुष शरीर में टेस्टोस्टिरोन हारमोन की कमी होती है पर यह बात शौध में सही नहीं निकली. समलैंगिक पुरुष और विषमलैंगिक पुरुषों में टेस्टोस्टिरोन के स्तरों में कोई भेद नहीं पाया गया. शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा अधिक होने को गँजेंपन से जोड़ा गया है. कई नवयुवक जब कसरत से शरीर की माँसपेशियाँ बढ़ाना चाहते हैं तो वे इसी हारमोन से मिलते जुलते पदार्थों के इन्जेक्शन लगवाते हैं, पर जिसके गलत प्रभाव भी पड़ सकते हैं.
टेस्टोस्टिरोन हारमोन पुरुष गुणों को बनाने वाला हारमोन है जो पुरुषों में अण्ड ग्रंथियों में बनता है. आम तौर पर शरीर में दो अण्ड ग्रंथियाँ होती हैं, छोटे अण्डों या गोलियों की तरह, लिंग के नीचे. इन ग्रथियों में लेयडिक के कोष होते हैं जहाँ टेस्टोस्टिरोन बनता है. जब बच्चा किशोरावस्था में पहुँचता है तो शरीर में टेस्टोस्टिरोन का उत्पादन बढ़ जाता है और यह हारमोन शरीर में पुरुष शरीर के गुण बनाता है जैसे कि आवाज का भारी होना, दाढ़ी का बढ़ना, शरीर में बाल निकलना, माँसपेशियों का बढ़ना, यौन अंगों का विकास होना, इत्यादि.
एक वयस्क पुवक की अण्ड ग्रथियाँ प्रतिदिन 5 से 7 मिलीग्राम टेस्टोस्टिरोन बनाती हैं और उसे रक्त में छोड़ती हैं. करीब 98 प्रतिशत हारमोन दो प्रोटीनों के साथ बँध जाता है और हारमोन का प्रमुख प्रभाव 2 प्रतिशत के मुक्त होरमोन से होता है. जिन दो प्रोटीनों से हारमोन बँधता है वह हैं यौन हारमोन बाँधने वाला ग्लोबूलिन यानि सेक्सुअल होरमोन बाईंडिंग ग्लोबूलिन जिससे 60 प्रतिशत होरमोन बँधता है और बाकी का 38 प्रतिशत होरमोन एलबुमिन के प्रोटीन से बँधता है. एलबुमिन से होरमोन का बँधन कुछ कच्चा होता है और आवश्यकता पड़ने पर होरमोन का कुछ हिस्सा मुक्त हो सकता है.
होरमोन का अधिकतर उत्पादन सुबह सात बजे से ग्यारह बजे तक होता है, दिन के साथ साथ हारमोन का उत्पादन कम होता जाता है और शाम होते है अपने न्यूनतम स्तर पर आ जाता है. हारमोन उत्पादन मौसम के साथ भी बदलता है, अक्टूबर के महीने में सबसे अधिक होता है और अप्रैल के महीने में सबसे कम.
जीवन के विभिन्न क्षणों में टेस्टोस्टिरोन का काम भिन्न भिन्न तरीकों से होता है. माँ के गर्भ में इस हारमोन की वजह से भी अगर लड़का है तो उसमें पुरुष यौन अंग बनते हैं. अगर माँ के गर्भ में बच्चे में टेस्टोस्टिरोन कम मिले तो बच्चे में यौन अंगों का विकास ठीक से नहीं हो पाता.
किशोरावस्था में आ कर अगर पुरुष शरीर को सही मात्रा में होरमोन न मिले तो शरीर में पुरुष गुणों का विकास ठीक से नहीं होता. न कद बढ़ता है न दाढ़ी आती है, न आवाज भारी होती है. अण्डग्रँथियों की कुछ बीमारियाँ हो सकती हैं जिनसे वह सही मात्रा में इस होरमोन को नहीं बना पाती. कभी कभी मम्पस यानी कनपेड़ा या गलसुआ की बीमारी भी अण्डग्रंथियों पर असर कर सकती है. इस हालत में किशोर पर मानसिक दबाव पड़ता है और उसके मन में अपनी यौन पहचान के बारे में प्रश्न उठ सकते हैं.
वयस्कों में हारमोन का उत्पादन कम होने से थकान, यौन सम्बंधों के लिए उदासी, यौन सम्बंधों में कठिनाई से ले कर और बहुत से लक्षण दिखते हैं जैसे कि चमड़ी का सूखा होना, शरीर में चर्बी का बढ़ना, आदि. स्ट्रैस, तनाव, हमेशा बैठे बैठे काम करना, व्यायाम न करना, आदि से भी हारमोन के स्तर कम हो जाते हैं.
पर हारमोन कम होना केवल बीमारी नहीं, उम्र के साथ साथ पचास साल की उम्र पार करने पर धीरे धीरे टेस्टोस्टिरोन के स्तर कम होने लगते हैं. जो लोग चुस्त रहते हैं, नियमित व्यायाम करते हैं, उनमें इस कमी का असर कम होता है. जब होरमोन का स्तर कम हो जाये और साथ साथ कुछ शारीरिक लक्षण भी जुड़ जायें तो इसे एन्ड्रोपोज (Andropause) का नाम दिया गया जिसकी तुलना नारियों में होने मीनोपाज (Menopause) से की जाती है जब स्त्री में माहवारी आनी बंद हो जाती है.
एक समय सोचा जाता था कि समलैंगिकता बीमारी है जिसमें पुरुष शरीर में टेस्टोस्टिरोन हारमोन की कमी होती है पर यह बात शौध में सही नहीं निकली. समलैंगिक पुरुष और विषमलैंगिक पुरुषों में टेस्टोस्टिरोन के स्तरों में कोई भेद नहीं पाया गया. शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा अधिक होने को गँजेंपन से जोड़ा गया है. कई नवयुवक जब कसरत से शरीर की माँसपेशियाँ बढ़ाना चाहते हैं तो वे इसी हारमोन से मिलते जुलते पदार्थों के इन्जेक्शन लगवाते हैं, पर जिसके गलत प्रभाव भी पड़ सकते हैं.
Tuesday, November 27, 2007
पँखहीन मानव
हिंदी की मासिक पत्रिका हँस में पंकज बिष्ट की नयी लम्बी कहानी "पँखोंवाली नाव" पढ़ी, जो तीन भागों में प्रकाशित हुई है. कहानी का मु्ख्य पात्र है अनुपम, एक समलैंगिक युवक. हिंदी कथानकों में इस तरह के हाशिये से बाहर रहने वाले जीवनों के बारे में बहुत कम लिखा जाता है.
हिंदी लेखन आम तौर से यौन सम्बंधों के बारे में भी कम बात करता है. अग्रेजी साहित्य में यौन सम्बंधों के बारे में जिस तरह से स्पष्ट रुप से बात हो सकती है, हिंदी में उस तरह की बात लिखना अश्लीलता या फ़िर भौंडापन माने जाते हैं. इस तरह की सोच, यौन सम्बंध और यौन आचरण, जो जीवन अनुभव का अभिन्न अंग हैं, गम्भीर हिंदी लेखन में अनछुए से रह जाते हैं. यौन सम्बंधों और आचरण के बारे में लिखा कुछ मिल भी जाये, इस तरह की बात को समलैंगिकता के संदर्भ में सोचा भी नहीं जा सकता.
पंकज जी अपनी इस कहानी से दोनों लक्ष्मण रेखाओं को पार करने की कोशिश करते हैं और मेरे विचार में यह सराहनीय बात है.
दलित जीवनों के बारे में लिखने का हक किसे है, इस बहस में एक तरफ से कहा जाता है कि दलित स्वयं ही अपने जीवन के बारे में लिख सकते हैं क्योंकि उनका लेखन अपने जीवन के अनुभव से निकलता है और उनका इस बारे में लिखना अधिक प्रमाणिक होता है. दूसरी ओर बात है कल्पना शक्ति की, लेखक को हर बात को अपने जीवन में अनुभव हो यह जरूरी नहीं, वे कहते हैं. अगर ये बात होती तो कोई कभी खून और चोरी के, या इतिहास के बारे में लिख ही न पाता. पर जब कोई लेखक अपनी कल्पना से किसी विषय में लिखता है तो यह प्रश्न उठता है कि लेखक को यह सब बातें कैसे मालूम हुईं, केवल इस विषय में पढ़ कर या फ़िर महाश्य स्वयं भी शायद .. क्या दलित जीवन के बारे में लिखने वाले लेखकों के बारे में इस तरह की बात उठती थी यह मुझे मालूम नहीं, पर अगर आप समलैंगिकता के बारे में लिखें तो शायद उठ सकती है?
शायद यही वजह है कि पंकज की कथा का समलैंगिक नायक अनुपम स्वयं अपनी आवाज़ में अपनी कहानी नहीं सुनाता, बल्कि उसकी कहानी सुनाता है उसका मित्र विक्रम, जो अनुपम को मित्र मानता है पर साथ ही अनुपम के अपने प्रति आकर्षण से डरता है और स्पष्ट कर देना चाहता है कि उसमें स्वयं में कोई समलैंगिक भावना नहीं:
इस तरह के विषयों पर हिंदी में लिखना आसान नहीं, और यह सब बातें विदेशी प्रभाव का नतीजा हैं, इसीलिए इन्हें केवल अँग्रेजी में ही कह सकते हैं? पंकज जी की कथा के पात्र भी बहुत सी बातें केवल अंग्रेजी में कहते हैं. पर शायद इसकी वजह यह भी है कि इस बारे में बात कम होती है, और जब हो सकेगी तो शायद उसके कहने और समझने के लिए हिंदी के शब्द भी मिल जायेंगे.
हिंदी लेखन आम तौर से यौन सम्बंधों के बारे में भी कम बात करता है. अग्रेजी साहित्य में यौन सम्बंधों के बारे में जिस तरह से स्पष्ट रुप से बात हो सकती है, हिंदी में उस तरह की बात लिखना अश्लीलता या फ़िर भौंडापन माने जाते हैं. इस तरह की सोच, यौन सम्बंध और यौन आचरण, जो जीवन अनुभव का अभिन्न अंग हैं, गम्भीर हिंदी लेखन में अनछुए से रह जाते हैं. यौन सम्बंधों और आचरण के बारे में लिखा कुछ मिल भी जाये, इस तरह की बात को समलैंगिकता के संदर्भ में सोचा भी नहीं जा सकता.
पंकज जी अपनी इस कहानी से दोनों लक्ष्मण रेखाओं को पार करने की कोशिश करते हैं और मेरे विचार में यह सराहनीय बात है.
दलित जीवनों के बारे में लिखने का हक किसे है, इस बहस में एक तरफ से कहा जाता है कि दलित स्वयं ही अपने जीवन के बारे में लिख सकते हैं क्योंकि उनका लेखन अपने जीवन के अनुभव से निकलता है और उनका इस बारे में लिखना अधिक प्रमाणिक होता है. दूसरी ओर बात है कल्पना शक्ति की, लेखक को हर बात को अपने जीवन में अनुभव हो यह जरूरी नहीं, वे कहते हैं. अगर ये बात होती तो कोई कभी खून और चोरी के, या इतिहास के बारे में लिख ही न पाता. पर जब कोई लेखक अपनी कल्पना से किसी विषय में लिखता है तो यह प्रश्न उठता है कि लेखक को यह सब बातें कैसे मालूम हुईं, केवल इस विषय में पढ़ कर या फ़िर महाश्य स्वयं भी शायद .. क्या दलित जीवन के बारे में लिखने वाले लेखकों के बारे में इस तरह की बात उठती थी यह मुझे मालूम नहीं, पर अगर आप समलैंगिकता के बारे में लिखें तो शायद उठ सकती है?
शायद यही वजह है कि पंकज की कथा का समलैंगिक नायक अनुपम स्वयं अपनी आवाज़ में अपनी कहानी नहीं सुनाता, बल्कि उसकी कहानी सुनाता है उसका मित्र विक्रम, जो अनुपम को मित्र मानता है पर साथ ही अनुपम के अपने प्रति आकर्षण से डरता है और स्पष्ट कर देना चाहता है कि उसमें स्वयं में कोई समलैंगिक भावना नहीं:
उसके शरीर से उठती पसीने की गंध से उबकाई महसूस होने लगी. किसी विदेशी डीओडरेंट ने इसे और विकृत कर रखा था. पुरुष शरीर की गंध से इस तरह की वितृष्णा मुझे शायद ही उससे पहले कभी हुई हो. यह श्रम के पसीने की नहीं बल्कि वासना और विकृति की गंध थी. और यह विकृत हिंस्र दुर्गंध मुझे कई दिनों तक परेशान करती रही.अगर पात्र समलैंगिक है तो उसकी जीवन कथा में अलग अलग लोगों से प्रेम सम्बंधों की बात होगी, अपमान और शोषण की बात होगी, हिंसा की बात होगी, एडस या अन्य बीमारियाँ होगी, तिरस्कार और ठुकराये जाने की बात होगी, नशे और बेलगाम जीवन की बात होगी, नौकरी बदलने की विवशता होगी ही. अगर हिंदी में इस बारे में कम लिखा गया है तो नया लग सकता है पर इसमें नया क्या है? समलैंगिक जीवनों का सत्य यही तो होता है? मुझे लगता है कि समलैंगिक जीवनों का यह सत्य केवल विषमलैंगिकों द्वारा देखा हुआ सच है और समलैंगिक जीवनों के अन्य सच भी हो सकते हैं जिन्हें समझना या कहना हमें नहीं आया?
इस तरह के विषयों पर हिंदी में लिखना आसान नहीं, और यह सब बातें विदेशी प्रभाव का नतीजा हैं, इसीलिए इन्हें केवल अँग्रेजी में ही कह सकते हैं? पंकज जी की कथा के पात्र भी बहुत सी बातें केवल अंग्रेजी में कहते हैं. पर शायद इसकी वजह यह भी है कि इस बारे में बात कम होती है, और जब हो सकेगी तो शायद उसके कहने और समझने के लिए हिंदी के शब्द भी मिल जायेंगे.
Monday, November 26, 2007
भारतीय मित्र
प्रियंकर ने बताया था कि उनके एक पुलिसवाले मित्र यहाँ इटली में एक कोर्स के सिलसिले में आ रहे हैं. नाम है महेन्द्र कुमार पूनिया और आईपीएस अफसर होने के साथ साथ कवि भी हैं. तो कुछ अजीब सा लगा.
पहले कभी पुलिस में काम करने वाले किसी को नहीं जानने का मौका मिला था. बचपन का एक साथी इन्जीनियर की पढ़ाई के बाद वायु सेना में भरती हुआ था तो मुझे लगा था कि वह बदल गया हो और जब छुट्टियों में घर आता तो उससे बहुत बहस होती. मुझे लगता कि उसे अपने से भिन्न बात सुनने की आदत ही न हो, बस "यस सर, यस सर" की आदत हो. शायद उस याद का प्रभाव था कि पुलिसवाला शब्द को सुन कर कविता का विचार तो बिल्कुल नहीं आता मन में.
कल संदेश भेजा महेंन्द्र ने कि उनका गुट रोम से वापस विचेंजा जाते हुए हमारे शहर बोलोनिया में यहाँ के स्थानीय पुलिस की मेस में खाना के लिए कुछ देर रुकेगा और यह मिलने का अच्छा मौका होगा. तो कल रात को बेटे को कहा कि वह मेरे साथ चले क्योंकि रात को वैसे ही गाड़ी चलाना मुझे अच्छा नहीं लगता और दूसरा यह कि, वह पुलिस मेस हमारे घर से बिल्कुल दूसरे कोने में है और उस इलाके की मुझे बिल्कुल जानकारी नहीं.
महेंद्र से मिलना बहुत अच्छा लगा. दिखने में वह पुलिसवाले कम कवि ही अधिक दिखते हैं. उन्होंने कुछ अपनी कविताएँ भी पढ़ने को दीं. उनमें से एक कविता "कश्मीर" की कुछ पंक्तियाँ हैं:
क्या चिनार के पेड़ पर
एक भी पत्ता नहीं है
बलात्कृत दोशीजा का तन ढकने को?
क्यों झुक गया है
पोपलर का आकाश में तना हुआ शीश?
क्यों रो रहे हैं विलो
झेलम के किनारे सिर झुकाए हुए?
क्यों सारी की सारी काँगलिड़याँ
ठण्डी हो गयीं हो हैं
और शीतल घाटियाँ आग उगल रही हैं?
महेंद्र से सिलीगुड़ी की कुछ बातें करके बचपन के दिनों की याद ताजा करली जब सिलीगुड़ी और अलीपुरद्वार की ओर गर्मियों की छुट्टियों में मौसी के पास जाते थे. महेंद्र ने मिलवाया अपने एक साथी सत्यानारायण सबत से हैं तो उड़िया, पर रहते हैं वाराणसी में और उत्तरप्रदेश में काम कर रहे हैं. सत्यनारायण जी भी लेखक हैं, मानव अधिकार पर लिखते हैं और इस सिलसिले में मानव अधिकार कमिशन का पुरस्कार भी पा चुके हैं.
दोनो लेखकों से बात करने का अधिक मौका नहीं मिला क्योंकि खाने के बाद तुरंत उन्हें यात्रा पर निकलना था. मौका मिला कि भारत से आये बाकी दल से भी नमस्ते कहने का मौका मिले. दल में 13 लोग हैं जिनमें तीन महिलाएँ भी हैं. कोई हिमाचल से, कोई तमिलनाड से, कोई मध्य प्रदेश से, कोई उत्तरप्रदेश से, सारे भारत के विभिन्न कोनों से आये यह पुलिस और सुरक्षा के विभिन्न विभागों के लोग यहाँ संयुक्त राष्ट्र संघ के शाँति मिशन के सिलसिले में कोर्स करने आये हैं. उनमें से कई लोग पहले भी शाँति मिशन में कोसोवो, बोसनिया जैसी जगहों पर काम कर चुके हैं.
जब वे लोग बस में बैठने लगे तो विदा कहते हुए मन में थोड़ा सा दुख सा, भारत से इतने लोग आये थे अगर सब को ठीक से जानने समझने का मौका मिलता तो कितना अच्छा होता!
प्रस्तुत हैं कल रात की इस मुलाकात की दो तस्वीरें. पहली तस्वीर में बायें से हैं सत्यनारायण, मैं, महेंद्र और मेरा बेटा मारको तुषार. दूसरी तस्वीर में भारतीय दल के कुछ लोग.


पहले कभी पुलिस में काम करने वाले किसी को नहीं जानने का मौका मिला था. बचपन का एक साथी इन्जीनियर की पढ़ाई के बाद वायु सेना में भरती हुआ था तो मुझे लगा था कि वह बदल गया हो और जब छुट्टियों में घर आता तो उससे बहुत बहस होती. मुझे लगता कि उसे अपने से भिन्न बात सुनने की आदत ही न हो, बस "यस सर, यस सर" की आदत हो. शायद उस याद का प्रभाव था कि पुलिसवाला शब्द को सुन कर कविता का विचार तो बिल्कुल नहीं आता मन में.
कल संदेश भेजा महेंन्द्र ने कि उनका गुट रोम से वापस विचेंजा जाते हुए हमारे शहर बोलोनिया में यहाँ के स्थानीय पुलिस की मेस में खाना के लिए कुछ देर रुकेगा और यह मिलने का अच्छा मौका होगा. तो कल रात को बेटे को कहा कि वह मेरे साथ चले क्योंकि रात को वैसे ही गाड़ी चलाना मुझे अच्छा नहीं लगता और दूसरा यह कि, वह पुलिस मेस हमारे घर से बिल्कुल दूसरे कोने में है और उस इलाके की मुझे बिल्कुल जानकारी नहीं.
महेंद्र से मिलना बहुत अच्छा लगा. दिखने में वह पुलिसवाले कम कवि ही अधिक दिखते हैं. उन्होंने कुछ अपनी कविताएँ भी पढ़ने को दीं. उनमें से एक कविता "कश्मीर" की कुछ पंक्तियाँ हैं:
क्या चिनार के पेड़ पर
एक भी पत्ता नहीं है
बलात्कृत दोशीजा का तन ढकने को?
क्यों झुक गया है
पोपलर का आकाश में तना हुआ शीश?
क्यों रो रहे हैं विलो
झेलम के किनारे सिर झुकाए हुए?
क्यों सारी की सारी काँगलिड़याँ
ठण्डी हो गयीं हो हैं
और शीतल घाटियाँ आग उगल रही हैं?
महेंद्र से सिलीगुड़ी की कुछ बातें करके बचपन के दिनों की याद ताजा करली जब सिलीगुड़ी और अलीपुरद्वार की ओर गर्मियों की छुट्टियों में मौसी के पास जाते थे. महेंद्र ने मिलवाया अपने एक साथी सत्यानारायण सबत से हैं तो उड़िया, पर रहते हैं वाराणसी में और उत्तरप्रदेश में काम कर रहे हैं. सत्यनारायण जी भी लेखक हैं, मानव अधिकार पर लिखते हैं और इस सिलसिले में मानव अधिकार कमिशन का पुरस्कार भी पा चुके हैं.
दोनो लेखकों से बात करने का अधिक मौका नहीं मिला क्योंकि खाने के बाद तुरंत उन्हें यात्रा पर निकलना था. मौका मिला कि भारत से आये बाकी दल से भी नमस्ते कहने का मौका मिले. दल में 13 लोग हैं जिनमें तीन महिलाएँ भी हैं. कोई हिमाचल से, कोई तमिलनाड से, कोई मध्य प्रदेश से, कोई उत्तरप्रदेश से, सारे भारत के विभिन्न कोनों से आये यह पुलिस और सुरक्षा के विभिन्न विभागों के लोग यहाँ संयुक्त राष्ट्र संघ के शाँति मिशन के सिलसिले में कोर्स करने आये हैं. उनमें से कई लोग पहले भी शाँति मिशन में कोसोवो, बोसनिया जैसी जगहों पर काम कर चुके हैं.
जब वे लोग बस में बैठने लगे तो विदा कहते हुए मन में थोड़ा सा दुख सा, भारत से इतने लोग आये थे अगर सब को ठीक से जानने समझने का मौका मिलता तो कितना अच्छा होता!
प्रस्तुत हैं कल रात की इस मुलाकात की दो तस्वीरें. पहली तस्वीर में बायें से हैं सत्यनारायण, मैं, महेंद्र और मेरा बेटा मारको तुषार. दूसरी तस्वीर में भारतीय दल के कुछ लोग.


Wednesday, November 21, 2007
लागा फेफड़ों मे दाग बचायें कैसे
आज के जीवन में प्रदूषण का कितना असर है इसे बड़े शहरों मे रहने वाले अच्छी तरह जानते हैं. घर से बाहर निकलो बस इसी से सब कपड़े मैले हो जाते हैं. बीस साल पहले जब दिल्ली में काम करता था तो लगता था कि प्रदूषण की वजह से साँस की तकलीफ़ वाले लोगों की सँख्या बढ़ती जा रही थी. जब दीवाली आती तो सभी दमे के मरीज कोशिश में लग जाते कि इस बार बढ़ते प्रदूषण की मार से कैसे बचा जाये. लोग घर के दरवाजों को गीले कपड़ों से बंद कर के बाहर की हवा को भीतर आने से रोकते, किसी के पास साधन होते तो वह दीवाली के दिनों में दिल्ली से बाहर चला जाता. दिल्ली छोड़ने के बाद जब भी वापस भारत जाता तो लगता कि दिल्ली का प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है. केवल पिछले कुछ सालों से जब से सभी टैक्सी, बसों और आटो को जीपीएल का उपयोग करने को बाध्य किया गया तो प्रदूषण कुछ कम हुआ लगता है पर कारों की और अन्य वाहनों की सँख्या बढ़ती जाती है तो प्रदूषण को तो बढ़ना ही है.
दो दिन पहले यहाँ बोलोनिया में भारत के आन्ध्र प्रदेश के गुँटूर शहर से मेयर श्री कन्ना नागाराजू आये. गुँटूर तथा बोलोनिया के बीच प्रदूषण कम करने का एक प्रजोक्ट चल रहा है, उसी सिलसिले में नागाराजू जी यहाँ आये हैं. वह गुँटूर में सामान्य प्रदूषण से कैसे लड़ रहे हैं इसके बारे में मैं उनका भाषण सुनने गया. 27 वर्षीय नागाराजू दो साल पहले मेयर बने, और शायद भारत में या विश्व में वह सबसे कम उम्र के मेयर हैं. मकेनिकल एनजींयर में बीटेक पास नागाराजू का कहना था कि उन्होंने गुँटूर में प्रदूषण को कम करने के लिए बहुत कुछ किया है जैसे कि पीने की पानी की जाँच ताकि घरों में स्वच्छ पानी दिया जाये, घर घर से कूड़ा इक्ट्ठा करने का नया तरीका, यातायात को सरल करने के तरीके और शहर में पेड़ों और हरियाली को बढ़ावा, नये बाग इत्यादि. उनके कहने से लगा कि गुँटूर शहर ने बहुत तरक्की की है. (तस्वीर में नागाराजु)

नागाराजू जी के कहने में कितनी सच्चाई है और कितनी राजनीतिक भाषणबाजी यह तो गुँटूर में रहने वाले ही बता सकते हैं, हालाँकि मुझे लगता है कि आज विकास और प्रदूषण दोनों साथ साथ कदम कदम मिला कर चलते हैं. गरीबों के साथ काम करने वाले कुछ मित्रों और साथियों को इस तरह के विकास के विरुद्ध बात करते सुना है पर मुझे नहीं लगता कि आज कोई यह मानेगा कि अपना सादा सरल जीवन जिसमें सदियों की चली आ रही परम्पराएँ बनी हैं, उसको बना कर रखने के लिए उद्योगिक विकास को रोकना चाहिये. यह कोशिश करना कि विकास इस तरह का हो जिसमें गरीब, कम पढ़े लिखे, दलित और अल्पसँख्यकों को भी विकसित होने का मौका मिले, यही आज सबसे बड़े सँघर्ष की बात है.
साथ ही यह चाहना कि विकास इस तरह का हो जिससे प्रदूषण न बढ़े भी महत्वपूर्ण है पर यह कहाँ तक हो पायेगा?
*****
एक नयी वेबसाईट बनी है कारमा डोट काम जहाँ दुनिया में सबसे अधिक प्रदूषण करने वाले बिजली उत्पादन के प्लाँट के बारे में जानकारी दी गयी है. दुनिया के पचास सबसे अधिक प्रदूषण करने वाले बिजली उत्पादन के प्लाँट में से 7 अमरीका में हैं, 2 जर्मनी में, 5 दक्षिण कोरिया में, 15 चीन में और 4 भारत में.
भारत के सबसे अधिक प्रदूषण करने वाले पावर प्लाँट हैं - वाराणसी के पास विंध्याचल प्लाँट जो प्रदूषण में दुनिया में छठे नम्बर पर है, उत्तरी आँध्रप्रदेश में रामागुंडम प्लाँट जो दुनिया में तीसवें स्थान पर है, तमिलनाडू में नेयवेली जो दुनिया में छत्तीसवें स्थान पर है और उत्तरी उड़ीसा में तलछेर जो दुनिया में सेंतिसवे स्थान पर है.
अच्छे कारखाने जहाँ बिजली का उत्पादन अधिक हो और प्रदूषण न के बराबार, अधिकतर पश्चिमी योरोप में हैं और कुछ एक अमरीका में. भारत में इस तरह का कोई पावर प्लाँट नहीं है.
पिछले सात सालों में विकास के साथ साथ भारत में कार्बन डाईओक्साईड की मात्रा बढ़ी है. सन 2000 में यह मात्रा थी करीब 46 करोड़ टन, आज यह मात्रा है 58 करोड़ टन और विकास की इसी दर पर भविष्य में यह मात्रा बढ़ कर हो जायेगी 148 करोड़ टन. यानि अगर आप अभी प्रदूषण का रोना रो रहे हैं तो भविष्य में यह तीन गुना बढ़ जायेगा क्योंकि विकास चाहिये तो प्रदूषण तो होगा ही और साँस की बीमारियाँ भी.
चीन में कार्बन डाईओक्साईड की वार्षिक मात्रा सन 2000 में थी 126 करोड़ टन, आज है 268 करोड़ टन और इसी दर से विकास होता रहा तो भविष्य में हो जायेगी 427 करोड़ टन. यानि भविष्य में चीन दुनिया का सबसे अधिक प्रदूषित देश होगा. इसी प्रदूषण से हम अंदाजा लगा सकता हैं कि भारत चीन से कितना पीछे है.
चीन की तो इतनी जनसँख्या है पर अमरीका जिसकी जनसँख्या चीन से चार या पाँच गुना कम है आज दुनिया का सबसे अधिक प्रदूषण करने वाला देश है. अमरीका की कार्बन डाईओक्साईड छोड़ने की वार्षिक मात्रा सन 2000 में थी 276 करोड़, आज है 303 करोड़ और भविष्य में हो जायेगी 368 करोड़. इन सबके मुकाबले में अफ्रीका सबसे दुनिया में प्रदूषण करने में सबसे पीछे है. पूरे अफ्रीका महाद्वीप की कार्बन डाईओक्साईड छोड़ने की वार्षिक मात्रा सन 2000 में थी 27 करोड़, आज है 34 करोड़ और भविष्य में बढ़ कर हो जायेगी 48 करोड़.
पर क्या हमें यही विकास चाहिये जिससे जीवन बीमारियों से भर जाये? या फ़िर प्रदूषण की वजह से वातावरण और मौसम सब बदल जायें?
पर योरोप को देखें तो लगता है कि प्रदूषण कम करके भी विकास सँभव है. पूरे यूरोप में कार्बन डाईओक्साईड की वार्षिक मात्रा सन 2000 में 157 करोड़ टन थी, आज है 178 करोड़ टन और भविष्य में बढ़ कर हो जायेगी 248 करोड़ टन.
जब कोई कहता है कि दुनिया का तापमान बढ़ रहा है, समुद्रों का स्तर ऊपर जा रहा है, दुनिया को भारत और चीन के विकास से खतरा है तो मुझे गुस्सा आता है. जो देश आज सबसे अधिक प्रदूषण करते हैं वही उपदेश दे रहे हैं कि भारत और चीन को विकास की गति कम कर देनी चाहिये या विभिन्न तरह का विकास खोजना चाहिये. पर फ़िर लोगों का प्रदूषण से क्या हाल होगा यह सोच कर लगता है भारतीय वैज्ञानिकों को नये तरीके खोजने होंगे जिनसे ऊर्जा तो मिले पर प्रदूषण कम हो. विकसित देशों ने अपने विकास और समृद्धी की नीव अपनी तकनीकी को कोपीराईट के पीछे छुपा कर उससे पैसा कमा कर बनायी है, क्या भारत ऐसा कर पायेगा कि कम प्रदूषण करने वाली नयी तकनीकों का आविष्कार करे और उनसे अन्य विकासशील देशों की सहायता करे ताकि अन्य देश भी उन तकनीकों का फायदा उठा सकें?
यह तो केवल सपने हैं, पर अगर आप को प्रदूषण के विषय में दिलचस्पी है तो कारमा की वेबसाईट को अवश्य देखियेगा.
दो दिन पहले यहाँ बोलोनिया में भारत के आन्ध्र प्रदेश के गुँटूर शहर से मेयर श्री कन्ना नागाराजू आये. गुँटूर तथा बोलोनिया के बीच प्रदूषण कम करने का एक प्रजोक्ट चल रहा है, उसी सिलसिले में नागाराजू जी यहाँ आये हैं. वह गुँटूर में सामान्य प्रदूषण से कैसे लड़ रहे हैं इसके बारे में मैं उनका भाषण सुनने गया. 27 वर्षीय नागाराजू दो साल पहले मेयर बने, और शायद भारत में या विश्व में वह सबसे कम उम्र के मेयर हैं. मकेनिकल एनजींयर में बीटेक पास नागाराजू का कहना था कि उन्होंने गुँटूर में प्रदूषण को कम करने के लिए बहुत कुछ किया है जैसे कि पीने की पानी की जाँच ताकि घरों में स्वच्छ पानी दिया जाये, घर घर से कूड़ा इक्ट्ठा करने का नया तरीका, यातायात को सरल करने के तरीके और शहर में पेड़ों और हरियाली को बढ़ावा, नये बाग इत्यादि. उनके कहने से लगा कि गुँटूर शहर ने बहुत तरक्की की है. (तस्वीर में नागाराजु)

नागाराजू जी के कहने में कितनी सच्चाई है और कितनी राजनीतिक भाषणबाजी यह तो गुँटूर में रहने वाले ही बता सकते हैं, हालाँकि मुझे लगता है कि आज विकास और प्रदूषण दोनों साथ साथ कदम कदम मिला कर चलते हैं. गरीबों के साथ काम करने वाले कुछ मित्रों और साथियों को इस तरह के विकास के विरुद्ध बात करते सुना है पर मुझे नहीं लगता कि आज कोई यह मानेगा कि अपना सादा सरल जीवन जिसमें सदियों की चली आ रही परम्पराएँ बनी हैं, उसको बना कर रखने के लिए उद्योगिक विकास को रोकना चाहिये. यह कोशिश करना कि विकास इस तरह का हो जिसमें गरीब, कम पढ़े लिखे, दलित और अल्पसँख्यकों को भी विकसित होने का मौका मिले, यही आज सबसे बड़े सँघर्ष की बात है.
साथ ही यह चाहना कि विकास इस तरह का हो जिससे प्रदूषण न बढ़े भी महत्वपूर्ण है पर यह कहाँ तक हो पायेगा?
*****
एक नयी वेबसाईट बनी है कारमा डोट काम जहाँ दुनिया में सबसे अधिक प्रदूषण करने वाले बिजली उत्पादन के प्लाँट के बारे में जानकारी दी गयी है. दुनिया के पचास सबसे अधिक प्रदूषण करने वाले बिजली उत्पादन के प्लाँट में से 7 अमरीका में हैं, 2 जर्मनी में, 5 दक्षिण कोरिया में, 15 चीन में और 4 भारत में.
भारत के सबसे अधिक प्रदूषण करने वाले पावर प्लाँट हैं - वाराणसी के पास विंध्याचल प्लाँट जो प्रदूषण में दुनिया में छठे नम्बर पर है, उत्तरी आँध्रप्रदेश में रामागुंडम प्लाँट जो दुनिया में तीसवें स्थान पर है, तमिलनाडू में नेयवेली जो दुनिया में छत्तीसवें स्थान पर है और उत्तरी उड़ीसा में तलछेर जो दुनिया में सेंतिसवे स्थान पर है.
अच्छे कारखाने जहाँ बिजली का उत्पादन अधिक हो और प्रदूषण न के बराबार, अधिकतर पश्चिमी योरोप में हैं और कुछ एक अमरीका में. भारत में इस तरह का कोई पावर प्लाँट नहीं है.
पिछले सात सालों में विकास के साथ साथ भारत में कार्बन डाईओक्साईड की मात्रा बढ़ी है. सन 2000 में यह मात्रा थी करीब 46 करोड़ टन, आज यह मात्रा है 58 करोड़ टन और विकास की इसी दर पर भविष्य में यह मात्रा बढ़ कर हो जायेगी 148 करोड़ टन. यानि अगर आप अभी प्रदूषण का रोना रो रहे हैं तो भविष्य में यह तीन गुना बढ़ जायेगा क्योंकि विकास चाहिये तो प्रदूषण तो होगा ही और साँस की बीमारियाँ भी.
चीन में कार्बन डाईओक्साईड की वार्षिक मात्रा सन 2000 में थी 126 करोड़ टन, आज है 268 करोड़ टन और इसी दर से विकास होता रहा तो भविष्य में हो जायेगी 427 करोड़ टन. यानि भविष्य में चीन दुनिया का सबसे अधिक प्रदूषित देश होगा. इसी प्रदूषण से हम अंदाजा लगा सकता हैं कि भारत चीन से कितना पीछे है.
चीन की तो इतनी जनसँख्या है पर अमरीका जिसकी जनसँख्या चीन से चार या पाँच गुना कम है आज दुनिया का सबसे अधिक प्रदूषण करने वाला देश है. अमरीका की कार्बन डाईओक्साईड छोड़ने की वार्षिक मात्रा सन 2000 में थी 276 करोड़, आज है 303 करोड़ और भविष्य में हो जायेगी 368 करोड़. इन सबके मुकाबले में अफ्रीका सबसे दुनिया में प्रदूषण करने में सबसे पीछे है. पूरे अफ्रीका महाद्वीप की कार्बन डाईओक्साईड छोड़ने की वार्षिक मात्रा सन 2000 में थी 27 करोड़, आज है 34 करोड़ और भविष्य में बढ़ कर हो जायेगी 48 करोड़.
पर क्या हमें यही विकास चाहिये जिससे जीवन बीमारियों से भर जाये? या फ़िर प्रदूषण की वजह से वातावरण और मौसम सब बदल जायें?
पर योरोप को देखें तो लगता है कि प्रदूषण कम करके भी विकास सँभव है. पूरे यूरोप में कार्बन डाईओक्साईड की वार्षिक मात्रा सन 2000 में 157 करोड़ टन थी, आज है 178 करोड़ टन और भविष्य में बढ़ कर हो जायेगी 248 करोड़ टन.
जब कोई कहता है कि दुनिया का तापमान बढ़ रहा है, समुद्रों का स्तर ऊपर जा रहा है, दुनिया को भारत और चीन के विकास से खतरा है तो मुझे गुस्सा आता है. जो देश आज सबसे अधिक प्रदूषण करते हैं वही उपदेश दे रहे हैं कि भारत और चीन को विकास की गति कम कर देनी चाहिये या विभिन्न तरह का विकास खोजना चाहिये. पर फ़िर लोगों का प्रदूषण से क्या हाल होगा यह सोच कर लगता है भारतीय वैज्ञानिकों को नये तरीके खोजने होंगे जिनसे ऊर्जा तो मिले पर प्रदूषण कम हो. विकसित देशों ने अपने विकास और समृद्धी की नीव अपनी तकनीकी को कोपीराईट के पीछे छुपा कर उससे पैसा कमा कर बनायी है, क्या भारत ऐसा कर पायेगा कि कम प्रदूषण करने वाली नयी तकनीकों का आविष्कार करे और उनसे अन्य विकासशील देशों की सहायता करे ताकि अन्य देश भी उन तकनीकों का फायदा उठा सकें?
यह तो केवल सपने हैं, पर अगर आप को प्रदूषण के विषय में दिलचस्पी है तो कारमा की वेबसाईट को अवश्य देखियेगा.
Tuesday, November 20, 2007
अंगों की फसल की कटाई
एक मित्र ने जब डाफोह यानि डाक्टर अगेंस्ट फोर्सड हारवेस्टिंग (Doctors Against Forced Harvesting) के बारे में बताया तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ. जिस हारवेस्टिंग यानि फसल कटाई की बात वे कर रहे हैं वे मानव अंगो की है. इस एसोसियेशन में काम करने वाले वे डाक्टर हैं जो कहते हैं कि वे पैसे कमाने के लिए लोगों के अंग जबरदस्ती निकाले जाने के विरुद्ध हैं. उनका कहना है कि चीन में यह हो रहा है कि जेल में बंद कैदी या अस्पताल में दाखिल गरीब लोगों के जबरदस्ती गुर्दे या अन्य भाग निकाल कर जरुरतमंद मरीजों को ट्राँसप्लाँट के लिए बेचे जाते हैं.
कोई कोई डाक्टर जो शायद मानसिक रुप से बीमार हो, पैसा कमाने के लिए इस तरह का काम कर सकता हो पर यह बात इतनी अधिक फैली हो यह मुझे विश्वास नहीं होता. मुझे लगता है कि आजकल चीन के विरुद्ध वैसे ही बहुत प्रचार हो रहा है, उस देश की तरक्की से सारे विकसित जगत में डर सा फैल गया है और कुछ भी बात हो चीन के विरुद्ध ही बोला जाता है चाहे वह प्रदूषित रंग से बने खिलौने हों या अफ्रीका में बने चीने कारखाने. तो क्या डाफोह का यह कहना भी विकसित देशों में बसे चीन के विरुद्ध पूर्वाग्रहों का चिन्ह है और इसमें सचाई नहीं है?
अपने किसे प्रियजन की बीमारी पर उसे अपने शरीर का वह अंग देना जिसके बिना भी जी सकते हैं, चाहे वह गुर्दा हो या हड्डी की मज्जा यह तो अक्सर होता है. अपने प्रियजन की मृत्यु पर, विषेशकर जब मृत्यु जवानी में हुई हो, उसके शरीर के अंगो का दान करना यह मानवता की निशानी है. मेरे पर्स में भी एक कार्ड है जिसपर मेरे हस्ताक्षर हैं और जो मेरी अकस्मात मृत्यु पर अस्पताल को मेरे अंगदान करने की अनुमति देता है. अंगदान के विरुद्ध बहुत से लोगों के मन में धार्मिक कारणों से पूर्वाग्रह होते हैं कि शरीर का कोई अंग दे दिया तो जाने परलोक में व्यक्ति पर क्या असर हो या जब उसका पुर्नजन्म हो तो वह अपाहिज न पैदा हो, पर धीरे धीरे यह चेतना जाग रही है कि शरीर को तो जलाने या गाड़ने से नष्ट होना है, जबकि अंगदान करके आप अपने प्रियजन के शरीर को जीवित रहने का मौका दे रहे हैं. मेरा अपना विश्वास भगवत् गीता के पाठ में है कि शरीर आत्मा का वस्त्र है और जब शरीर पुराना हो जाता है आत्मा उसे त्याग देती है इसलिए मैं चाहता हूँ कि अगर मेरा पुराना वस्त्र किसी के काम आ सकता है तो अवश्य आये.
पर अगर अंग दान मानवता की निशानी है तो किसी गरीब के शरीर से उसकी गरीबी का फायदा उठा कर अंग खरीदना या जबरदस्ती उसके शरीर से अंग निकालना दानवता की निशानी है. डाक्टर जिसने मानवता की कसम खाई हो वह इस तरह के काम करे यह मुझे विश्वास नहीं होता. कोई इक्का दुक्का हो, जो मानसिक रुप से बीमार हो और इस तरह का काम करे यह मान सकता हूँ, पर डाफोह का कहना है कि चीन में यह बड़े पैमाने पर हुआ है और होता है.
भारत से भी कभी कभी कुछ छुटपुट समाचार मिलते हैं कि गरीब ने बेटी के विवाह के लिए पैसा जोड़ने के लिए अपना गुर्दा बेचना का अखबार में इश्तहार दिया. कुछ इसी तरह की बात एक फ़िल्म में भी देखी थी, पर क्या ऐसा हमारे देश में भी हो सकता है?
*****
इटली की पुलिस जिसे काराबिन्येरी (carabinieri) कहते हैं, उनके बारे में यहाँ बहुत चुटकले होते हैं, वैसा ही एक चुटकला हैः
एक अंगों के ट्राँसप्लाँट करने वाले की दुकान पर बोर्ड लगा था, "आईन्स्टाईन का दिमाग 1000 रुपये, चर्चिल का दिमाग 700 रुपये, मार्कस का दिमाग 400 रुपये, इटालवी काराबिन्येरे का दिमाग 1500 रुपये" तो उसे देख कर व्यक्ति दुकान में गया और पूछा, "भला काराबिन्येरे के दिमाग में ऐसी क्या बात है कि उसे इतना मँहगा बेचा जा रहा है?"
दुकानदार ने उत्तर दिया, "क्योंकि वह दिमाग बिल्कुल नया है, उसका कुछ प्रयोग नहीं किया गया तो कीमत तो ज्यादा होगी ही!"
कोई कोई डाक्टर जो शायद मानसिक रुप से बीमार हो, पैसा कमाने के लिए इस तरह का काम कर सकता हो पर यह बात इतनी अधिक फैली हो यह मुझे विश्वास नहीं होता. मुझे लगता है कि आजकल चीन के विरुद्ध वैसे ही बहुत प्रचार हो रहा है, उस देश की तरक्की से सारे विकसित जगत में डर सा फैल गया है और कुछ भी बात हो चीन के विरुद्ध ही बोला जाता है चाहे वह प्रदूषित रंग से बने खिलौने हों या अफ्रीका में बने चीने कारखाने. तो क्या डाफोह का यह कहना भी विकसित देशों में बसे चीन के विरुद्ध पूर्वाग्रहों का चिन्ह है और इसमें सचाई नहीं है?
अपने किसे प्रियजन की बीमारी पर उसे अपने शरीर का वह अंग देना जिसके बिना भी जी सकते हैं, चाहे वह गुर्दा हो या हड्डी की मज्जा यह तो अक्सर होता है. अपने प्रियजन की मृत्यु पर, विषेशकर जब मृत्यु जवानी में हुई हो, उसके शरीर के अंगो का दान करना यह मानवता की निशानी है. मेरे पर्स में भी एक कार्ड है जिसपर मेरे हस्ताक्षर हैं और जो मेरी अकस्मात मृत्यु पर अस्पताल को मेरे अंगदान करने की अनुमति देता है. अंगदान के विरुद्ध बहुत से लोगों के मन में धार्मिक कारणों से पूर्वाग्रह होते हैं कि शरीर का कोई अंग दे दिया तो जाने परलोक में व्यक्ति पर क्या असर हो या जब उसका पुर्नजन्म हो तो वह अपाहिज न पैदा हो, पर धीरे धीरे यह चेतना जाग रही है कि शरीर को तो जलाने या गाड़ने से नष्ट होना है, जबकि अंगदान करके आप अपने प्रियजन के शरीर को जीवित रहने का मौका दे रहे हैं. मेरा अपना विश्वास भगवत् गीता के पाठ में है कि शरीर आत्मा का वस्त्र है और जब शरीर पुराना हो जाता है आत्मा उसे त्याग देती है इसलिए मैं चाहता हूँ कि अगर मेरा पुराना वस्त्र किसी के काम आ सकता है तो अवश्य आये.
पर अगर अंग दान मानवता की निशानी है तो किसी गरीब के शरीर से उसकी गरीबी का फायदा उठा कर अंग खरीदना या जबरदस्ती उसके शरीर से अंग निकालना दानवता की निशानी है. डाक्टर जिसने मानवता की कसम खाई हो वह इस तरह के काम करे यह मुझे विश्वास नहीं होता. कोई इक्का दुक्का हो, जो मानसिक रुप से बीमार हो और इस तरह का काम करे यह मान सकता हूँ, पर डाफोह का कहना है कि चीन में यह बड़े पैमाने पर हुआ है और होता है.
भारत से भी कभी कभी कुछ छुटपुट समाचार मिलते हैं कि गरीब ने बेटी के विवाह के लिए पैसा जोड़ने के लिए अपना गुर्दा बेचना का अखबार में इश्तहार दिया. कुछ इसी तरह की बात एक फ़िल्म में भी देखी थी, पर क्या ऐसा हमारे देश में भी हो सकता है?
*****
इटली की पुलिस जिसे काराबिन्येरी (carabinieri) कहते हैं, उनके बारे में यहाँ बहुत चुटकले होते हैं, वैसा ही एक चुटकला हैः
एक अंगों के ट्राँसप्लाँट करने वाले की दुकान पर बोर्ड लगा था, "आईन्स्टाईन का दिमाग 1000 रुपये, चर्चिल का दिमाग 700 रुपये, मार्कस का दिमाग 400 रुपये, इटालवी काराबिन्येरे का दिमाग 1500 रुपये" तो उसे देख कर व्यक्ति दुकान में गया और पूछा, "भला काराबिन्येरे के दिमाग में ऐसी क्या बात है कि उसे इतना मँहगा बेचा जा रहा है?"
दुकानदार ने उत्तर दिया, "क्योंकि वह दिमाग बिल्कुल नया है, उसका कुछ प्रयोग नहीं किया गया तो कीमत तो ज्यादा होगी ही!"
Monday, November 19, 2007
जब शरीर जेल बन जाये
यह लेख यौन विषय पर है, और यौन अंगो के बारे में बात की गयी है. अगर आप को इस विषय पर पढ़ना अच्छा नहीं लगता तो कृपया आगे न पढ़ें.
जब बच्चा पैदा होता हो तो आसान लगता है यह बताना कि वह बच्चा लड़का है या लड़की, पर मानव की यौन पहचान (gender identity) का बनना इतना आसान नहीं. बच्चे के कोषों में बंद जीन (Genes) में बच्चे की एक यौन पहचान बंद होती है. बच्चे के भीतरी और बाह्य यौन अंगों (genitals) में एक अन्य यौन पहचान बंद होती है. मानसिक रूप से बच्चे की एक अन्य यौन पहचान होती है, जिससे वह स्वयं को पुरुष या स्त्री महसूस करता है. अधिकतर इन विभिन्न यौन पहचानों में समानता होती है तो बच्चे को अपनी यौन पहचान की वजह से परेशान नहीं होना पड़ता. पर जब इनमें से कोई यौन पहचान का दूसरे से मेल न बैठे तो क्या होता है?
आम लोग इस बात को समलैंगिकता (homosexuality) और विषमलैंगिकता (heterosexuality) के दायरों मे बाँट कर देखते है पर असल में यौन पहचान और यौन सम्बंधों की पसंद दो भिन्न बातें हैं. जीन, यौन अंग और मानसिक रुप में यौन पहचान में मेल खाने वाला पुरुष या स्त्री समलैंगिक या विषमलैंगिक हो सकते हैं. स्वयं को पुरुष या नारी महसूस करना पर अपने से दूसरे लिंग के कपड़े पहनने की इच्छा रखना इस सब से भी भिन्न बात है. इसके बारे में भी लोगों में समझ कम होती है.
जब मानसिक यौन पहचान यौन अंगो से मेल न खाये तो वह व्यक्ति अपने आप को गलत शरीर में कैद पाता है. इस तरह पुरुष शरीर वाले लोग जो मानसिक रूप से स्वयं को स्त्री रुप में महसूस करते हैं अपने पुरुष शरीर को जेल की तरह से महसूस करते हैं. इसी तरह, स्त्री शरीर में स्वयं को पुरुष महसूस करने वाला व्यक्ति भी अपने नारी शरीर को कैद की तरह से महसूस करते हैं. दोनों ही हालातों में सेक्स बदलने की बात हो सकती है.
जब अपने शरीर को कैद की तरह महसूस करना सहन न हो तो शल्यचिकित्सा से सेक्स बदलने की बात की जाती है. कई देशों में कानून इस तरह के सेक्स परिवर्तन को नहीं मानता पर इटली में इस तरह सेक्स बदलने की अनुमति है और ओप्रेशन के बाद यहाँ का कानून आप को नाम बदल कर कानूनी तौर पर लिंग बदलने की स्वतंत्रता देता है. प्लास्टिक सर्जरी से नारी शरीर में पुरुष यौन अंग बनाना और पुरुष शरीर में नारी यौन अंग बनाना, दोनो ही हो सकते हैं, हालाँकि दोनो ओप्रेशन जटिल और कठिन हैं. इस लिए ओप्रेशन से पहले यह पक्का करना कि सचमुच उस व्यक्ति में यौन अंगों और मानसिक यौन पहचान में अंतर है आवश्यक है. इसके लिए कम से कम छह महीने तक व्यक्ति को मनोविज्ञान विषेशज्ञ के द्वारा परखा जाता है, यह जाँचा जाता है कि ओप्रेशन से होने वाली तकलीफ़ और कठिनाईयाँ सहने का उसमें साहस है या नहीं. अगर मनोविज्ञान विषेशज्ञ का निर्णय हो कि हाँ यह व्यक्ति सेक्स बदलाव की लिए उपयुक्त है तो उस व्यक्ति को हारमोन भी दिये जाते हैं, नारी बनने की चाह रखने वाले पुरुष को नारी हारमोन और पुरुष बनने की चाह रखने वाली नारी को पुरुष होरमोन, जिनसे उनके शरीर में बाह्य बदलाव आने लगता है. जैसे पुरुषों में स्तन बढ़ जाते हैं, शरीर के बाल कम हो जाते हैं, चमड़ी अधिक मुलायम हो जाती है और स्त्रियों में आवाज भारी होने लगती है, बाल निकल आते हैं. धीरे धीरे, व्यक्ति को प्रोत्साहित किया जाता है कि वह मानिसक रूप में अपने आप को जिस लिंग का महसूस करता है उसके हिसाब से कपड़े पहने.
पुरुष हो कर नारी कपड़े पहनना या नारी हो कर पुरुष भेष बनाना उतना आसान नहीं जितना आप सोच सकते हैं क्योंकि हारमोन लेने और ओप्रेशन होने के बावजूद लोग पहचान जाते हैं कि वे सामान्य नारी या पुरुष नहीं, और क्रूरता से उनकी हँसी उड़ाते हैं, या उनसे बात नहीं करना चाहते. जो व्यक्ति सेक्स बदलाना चाहता है उसमें इस तरह की स्थितियों का सामना करना साहस चाहिये. यह साहस भी चाहिये कि उनके मित्र, उनके परिवार के लोग शायद इस बात से खुश न हों और उनसे नाता तोड़ लें, तो उसे स्वीकार कर सके. जब यह पक्का हो जाये कि उस व्यक्ति में अपनी यौन पहचान बदल कर जीने का साहस है, वह सब कठिनाईयों से लड़ने के लिए तैयार है तभी ओप्रेशन किया जाता है. पुरुष से नारी बनने का ओप्रेशन कुछ सरल है जबकि नारी से पुरुष बनने का ओप्रेशन कुछ अधिक कठिन है. इस तरह के सेक्स बदले हुए नारी या पुरुष में यौन सम्बंध बनाने की सारी क्षमता होती है, पर न तो नारी बना पुरुष कभी गर्भवती बन सकती है और न ही नारी से पुरुष बनने वाला व्यक्ति में बच्चे पैदा करने के लिए वीर्य हो सकता है.
कुछ साल पहले इस विषय पर एक अमरीकी फ़िल्म आयी थी, ट्राँसअमेरिका (Transmaerica) जिसमें शल्य चिकित्सा से नारी बनने के ओप्रेशन की तैयारी करने वाले पुरुष की बात को संवेदना से दिखाया गया था. इन सब विषयों से जुड़े भारतीय कानून अठहारवीं सदी के विकटोरियन कानून हैं जो मानवता और मानव अधिकारों की बात नहीं करते बल्कि इस द्वंद में फँसे लोगों को अपराधी या बीमारी की दृष्टि से देखते हैं. इसलिए भारत में इस तरह के व्यक्तियों के पास समाज से बाहर जा कर हिँजड़ा बनने या समाज में छुप छुप कर रहने के अलावा दूसरा चारा नहीं.

इतालवी ट्राँससेक्सुअल एसोशियेशन के अनुसार इटली में करीब दस हजार व्यक्ति हैं जो अपने आप को गलत शरीर में बंद कैदी समझते हैं और सेक्स बदलना चाहते हैं. पर इस बात की जाँच करने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति व्यस्क हो क्योंकि किशोरावस्था में अपनी यौन पहचान के बारे में दुविधा होना सामान्य बात है और समय के साथ अधिकाँश किशोर अपनी यौन पहचान को समझ जाते हैं.
यौन विषयों पर मेरे अन्य आलेख कल्पना पर पढ़ सकते हैं.
जब बच्चा पैदा होता हो तो आसान लगता है यह बताना कि वह बच्चा लड़का है या लड़की, पर मानव की यौन पहचान (gender identity) का बनना इतना आसान नहीं. बच्चे के कोषों में बंद जीन (Genes) में बच्चे की एक यौन पहचान बंद होती है. बच्चे के भीतरी और बाह्य यौन अंगों (genitals) में एक अन्य यौन पहचान बंद होती है. मानसिक रूप से बच्चे की एक अन्य यौन पहचान होती है, जिससे वह स्वयं को पुरुष या स्त्री महसूस करता है. अधिकतर इन विभिन्न यौन पहचानों में समानता होती है तो बच्चे को अपनी यौन पहचान की वजह से परेशान नहीं होना पड़ता. पर जब इनमें से कोई यौन पहचान का दूसरे से मेल न बैठे तो क्या होता है?
आम लोग इस बात को समलैंगिकता (homosexuality) और विषमलैंगिकता (heterosexuality) के दायरों मे बाँट कर देखते है पर असल में यौन पहचान और यौन सम्बंधों की पसंद दो भिन्न बातें हैं. जीन, यौन अंग और मानसिक रुप में यौन पहचान में मेल खाने वाला पुरुष या स्त्री समलैंगिक या विषमलैंगिक हो सकते हैं. स्वयं को पुरुष या नारी महसूस करना पर अपने से दूसरे लिंग के कपड़े पहनने की इच्छा रखना इस सब से भी भिन्न बात है. इसके बारे में भी लोगों में समझ कम होती है.
जब मानसिक यौन पहचान यौन अंगो से मेल न खाये तो वह व्यक्ति अपने आप को गलत शरीर में कैद पाता है. इस तरह पुरुष शरीर वाले लोग जो मानसिक रूप से स्वयं को स्त्री रुप में महसूस करते हैं अपने पुरुष शरीर को जेल की तरह से महसूस करते हैं. इसी तरह, स्त्री शरीर में स्वयं को पुरुष महसूस करने वाला व्यक्ति भी अपने नारी शरीर को कैद की तरह से महसूस करते हैं. दोनों ही हालातों में सेक्स बदलने की बात हो सकती है.
जब अपने शरीर को कैद की तरह महसूस करना सहन न हो तो शल्यचिकित्सा से सेक्स बदलने की बात की जाती है. कई देशों में कानून इस तरह के सेक्स परिवर्तन को नहीं मानता पर इटली में इस तरह सेक्स बदलने की अनुमति है और ओप्रेशन के बाद यहाँ का कानून आप को नाम बदल कर कानूनी तौर पर लिंग बदलने की स्वतंत्रता देता है. प्लास्टिक सर्जरी से नारी शरीर में पुरुष यौन अंग बनाना और पुरुष शरीर में नारी यौन अंग बनाना, दोनो ही हो सकते हैं, हालाँकि दोनो ओप्रेशन जटिल और कठिन हैं. इस लिए ओप्रेशन से पहले यह पक्का करना कि सचमुच उस व्यक्ति में यौन अंगों और मानसिक यौन पहचान में अंतर है आवश्यक है. इसके लिए कम से कम छह महीने तक व्यक्ति को मनोविज्ञान विषेशज्ञ के द्वारा परखा जाता है, यह जाँचा जाता है कि ओप्रेशन से होने वाली तकलीफ़ और कठिनाईयाँ सहने का उसमें साहस है या नहीं. अगर मनोविज्ञान विषेशज्ञ का निर्णय हो कि हाँ यह व्यक्ति सेक्स बदलाव की लिए उपयुक्त है तो उस व्यक्ति को हारमोन भी दिये जाते हैं, नारी बनने की चाह रखने वाले पुरुष को नारी हारमोन और पुरुष बनने की चाह रखने वाली नारी को पुरुष होरमोन, जिनसे उनके शरीर में बाह्य बदलाव आने लगता है. जैसे पुरुषों में स्तन बढ़ जाते हैं, शरीर के बाल कम हो जाते हैं, चमड़ी अधिक मुलायम हो जाती है और स्त्रियों में आवाज भारी होने लगती है, बाल निकल आते हैं. धीरे धीरे, व्यक्ति को प्रोत्साहित किया जाता है कि वह मानिसक रूप में अपने आप को जिस लिंग का महसूस करता है उसके हिसाब से कपड़े पहने.
पुरुष हो कर नारी कपड़े पहनना या नारी हो कर पुरुष भेष बनाना उतना आसान नहीं जितना आप सोच सकते हैं क्योंकि हारमोन लेने और ओप्रेशन होने के बावजूद लोग पहचान जाते हैं कि वे सामान्य नारी या पुरुष नहीं, और क्रूरता से उनकी हँसी उड़ाते हैं, या उनसे बात नहीं करना चाहते. जो व्यक्ति सेक्स बदलाना चाहता है उसमें इस तरह की स्थितियों का सामना करना साहस चाहिये. यह साहस भी चाहिये कि उनके मित्र, उनके परिवार के लोग शायद इस बात से खुश न हों और उनसे नाता तोड़ लें, तो उसे स्वीकार कर सके. जब यह पक्का हो जाये कि उस व्यक्ति में अपनी यौन पहचान बदल कर जीने का साहस है, वह सब कठिनाईयों से लड़ने के लिए तैयार है तभी ओप्रेशन किया जाता है. पुरुष से नारी बनने का ओप्रेशन कुछ सरल है जबकि नारी से पुरुष बनने का ओप्रेशन कुछ अधिक कठिन है. इस तरह के सेक्स बदले हुए नारी या पुरुष में यौन सम्बंध बनाने की सारी क्षमता होती है, पर न तो नारी बना पुरुष कभी गर्भवती बन सकती है और न ही नारी से पुरुष बनने वाला व्यक्ति में बच्चे पैदा करने के लिए वीर्य हो सकता है.
कुछ साल पहले इस विषय पर एक अमरीकी फ़िल्म आयी थी, ट्राँसअमेरिका (Transmaerica) जिसमें शल्य चिकित्सा से नारी बनने के ओप्रेशन की तैयारी करने वाले पुरुष की बात को संवेदना से दिखाया गया था. इन सब विषयों से जुड़े भारतीय कानून अठहारवीं सदी के विकटोरियन कानून हैं जो मानवता और मानव अधिकारों की बात नहीं करते बल्कि इस द्वंद में फँसे लोगों को अपराधी या बीमारी की दृष्टि से देखते हैं. इसलिए भारत में इस तरह के व्यक्तियों के पास समाज से बाहर जा कर हिँजड़ा बनने या समाज में छुप छुप कर रहने के अलावा दूसरा चारा नहीं.

इतालवी ट्राँससेक्सुअल एसोशियेशन के अनुसार इटली में करीब दस हजार व्यक्ति हैं जो अपने आप को गलत शरीर में बंद कैदी समझते हैं और सेक्स बदलना चाहते हैं. पर इस बात की जाँच करने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति व्यस्क हो क्योंकि किशोरावस्था में अपनी यौन पहचान के बारे में दुविधा होना सामान्य बात है और समय के साथ अधिकाँश किशोर अपनी यौन पहचान को समझ जाते हैं.
यौन विषयों पर मेरे अन्य आलेख कल्पना पर पढ़ सकते हैं.
Sunday, November 18, 2007
भारतीय ईसाईयों में जाति भेद
इतालवी केथोलिक पत्रिका पोपोली के अक्टूबर अंक में फादर प्रकाश लुईस का लेख है जिसमें भारत में ईसाई धर्म कें जाति भेद की समस्या को उठाया गया है.
मेरा मानना है कि जाति भेद भारत की सबसे मूलभूत समस्याओं में से है और यह स्वीकार करना कि हमारे समाज में इंसानों से अमानवीय जाति भेद होता है इस सदियों पुराने शोषण से लड़ने का पहला कदम है. इस दृष्टि से मुझे फा. लुईस का लेख महत्वपूर्ण लगा. प्रस्तुत हैं उनके इस लेख के कुछ अंश, जिनका इतालवी से हिंदी में अनुवाद मेरा हैः
जहूर मेरे कश्मीरी मित्र कहते हैं कि भारत के मुसलमान भिन्न हैं अन्य सब देशों के मुसलमानों से, क्योंकि हमें अन्य धर्मों के साथ मिल कर रहना आता है. मुझे भारत के ईसाई समाज को करीब से देखने का मौका मिला है और मैं मानता हूँ कि भारतीय ईसाई भी बाकी सारी दुनिया के ईसाईयों से अलग हैं, उनमें विभिन्न धर्मों के साथ रहने की अपनी संवेदना है. पर इस सांझी भारतीयता का शायद यह भी अर्थ है कि चाहे हमारा धर्म कुछ भी हो, हम सबमें एक जैसी कुछ बुराईयाँ भी हैं जैसी कि जाति भेद?
पढ़े लिखे, अच्छी नौकरी करने वाले लोगों से जब मैं जाति और भेदभाव की बात सुनता हूँ तो मुझे ग्लानी भी होती है और क्षोभ भी. यह भेदभाव की जड़े हमारे दिलों में इतनी गहरी बैठीं हैं कि इनसे हम बार बार हार जाते हैं. दुर्भाग्य की बात है कि ईक्कीसिवीं सदी में भी कोई बड़ा हिंदू धर्म सुधारक नहीं हुआ जो इस बारे में खुल कर समस्त मानव जाति की समानता की बात कर सके और जाति भेद करने वालों को धर्म से बाहर घोषित कर सके. अगर अन्य धर्म वाले भी, चाहे वे मुसलमान हों, सिख हों या ईसाई, बजाय अपने धर्म के मूल संदेश को मान कर अगर हिंदू धर्म के जातिभेद को अपनाते हैं तो शोषित लोगों के लिए बाहर आने का क्या रास्ता बचेगा? इसीलिए आशा है कि ईसाई धर्म में भी फा. लुईस जैसे लोगों के हाथ मजबूत होंगे और वह अपने समाज में बदलाव लायेंगे जिससे बाकी के धर्मों को भी प्रेरणा मिल सके.
मेरा मानना है कि जाति भेद भारत की सबसे मूलभूत समस्याओं में से है और यह स्वीकार करना कि हमारे समाज में इंसानों से अमानवीय जाति भेद होता है इस सदियों पुराने शोषण से लड़ने का पहला कदम है. इस दृष्टि से मुझे फा. लुईस का लेख महत्वपूर्ण लगा. प्रस्तुत हैं उनके इस लेख के कुछ अंश, जिनका इतालवी से हिंदी में अनुवाद मेरा हैः
भारत के 24 मिलियन यानि 2 करोड़ 40 लाख इसाईयों मे से करीब 70 प्रतिशत लोग दलित मूल के हैं. चूँकि सब सोचते हें कि सभी ईसाई समान होते हैं, धार्मिक संस्थाएँ, सरकार और समाज इस दलित ईसाईयों के साथ होने वाले भेदभाव को नहीं पहचानता. इस वजह से इस बात की गम्भीरता को ठीक से नहीं समझा जाता और भारत के बाहर इस बात की जानकारी नहीं है....सरकारी नीतियों से हिंदू, सिख तथा बुद्ध मूल के दलितों को मिलने वाले संरक्षण ईसाई दलित लोगों को नहीं मिलते. बाकी के दलित सोचते हैं कि ईसाई बनने वाले लोग दलित नहीं होते. कानून के लिए ईसाई होना और साथ ही दलित होना संभव नहीं है... ईसाई संस्थाओं में अगर दलितों की गिनती की जाये तो मिलगा कि उनमें दलित मूल के लोगों की उपस्थिति बहुत कम है. 1999 में किये गये एक सर्वेक्षण के हिसाब से ईसाई हाई स्कूलों मे दलित केवल 15.5 प्रतिशत थे और ईसाई कालिजों में केवल 10.5 प्रतिशत. यह शिक्षा संस्थाएँ अधिकतर ऊँची जाति के लोगों के काम आती हैं. ईसाईयों में जाति भेद नया नहीं है बल्कि हमेशा से रहा है. तिरुचिरापल्ली का केथेड्रल जिसका निर्माण 1840 में हुआ था, उसमें विभिन्न जातियों के ईसाई लोग अलग अलग बैठाये जाते थे. कई जगहों पर दलित ईसाईयों के अपने अलग गिरजाघर होते थे, कूछ अन्य जगहों पर वह लोग गिरजाघरों के बाहर खड़े हो कर प्रार्थना में भाग लेते थे. अगर गिरजाघर में घुस सकते थे तो उनके बैठने की जगह सबसे पीछे होती थी और प्रार्थना के अंत में पादरी के हाथ से क्मयूनियन का प्रसाद लेने वह अन्य सब लोगों के बाद ही जा सकते थे. चर्च के अधिकारी इन बातों को जानते थे पर बहुत समय तक इन बातों पर विचार विर्मश नहीं किया गया है. आज भी दलित ईसाईयों से पादरी बनने, कोई महत्वपूर्ण कार्य पद देने आदि में भेदभाव किया जाता है. तमिलनाडू में दलित ईसाई, राज्य के ईसाईयों के 75 प्रतिशत है पर दलित मूल के पादरी और नन केवल 3.8 प्रतिशत...विभिन्न जातियों के ईसाईयों के बीच में विवाह होना या केवल साथ बैठ कर खाना खाना तक संभव नहीं जैसे कि विभिन्न जाति के हिंदुओं के बीच होता है...हमें अपने धर्म में बदलाव लाना है ताकि उनकी मानव मर्यादा और गरिमा को स्वीकारा जाये, केवल अध्यात्मिक रूप में नहीं बल्कि जीवित मानव के रूप में उस धर्म के हिस्से की तरह जो बिना भेदभाव के समाज को बनाने की घोषणा करता है. जब तक हम लोग आपस में अपने शब्दों में और आचरण में सचमुच का समुदाय नहीं बनेंगे, हम कट्टरपंथियों के आरोप कि हम केवल धर्म बदवाना चाहते हैं का सामना नहीं कर सकते.
जहूर मेरे कश्मीरी मित्र कहते हैं कि भारत के मुसलमान भिन्न हैं अन्य सब देशों के मुसलमानों से, क्योंकि हमें अन्य धर्मों के साथ मिल कर रहना आता है. मुझे भारत के ईसाई समाज को करीब से देखने का मौका मिला है और मैं मानता हूँ कि भारतीय ईसाई भी बाकी सारी दुनिया के ईसाईयों से अलग हैं, उनमें विभिन्न धर्मों के साथ रहने की अपनी संवेदना है. पर इस सांझी भारतीयता का शायद यह भी अर्थ है कि चाहे हमारा धर्म कुछ भी हो, हम सबमें एक जैसी कुछ बुराईयाँ भी हैं जैसी कि जाति भेद?
पढ़े लिखे, अच्छी नौकरी करने वाले लोगों से जब मैं जाति और भेदभाव की बात सुनता हूँ तो मुझे ग्लानी भी होती है और क्षोभ भी. यह भेदभाव की जड़े हमारे दिलों में इतनी गहरी बैठीं हैं कि इनसे हम बार बार हार जाते हैं. दुर्भाग्य की बात है कि ईक्कीसिवीं सदी में भी कोई बड़ा हिंदू धर्म सुधारक नहीं हुआ जो इस बारे में खुल कर समस्त मानव जाति की समानता की बात कर सके और जाति भेद करने वालों को धर्म से बाहर घोषित कर सके. अगर अन्य धर्म वाले भी, चाहे वे मुसलमान हों, सिख हों या ईसाई, बजाय अपने धर्म के मूल संदेश को मान कर अगर हिंदू धर्म के जातिभेद को अपनाते हैं तो शोषित लोगों के लिए बाहर आने का क्या रास्ता बचेगा? इसीलिए आशा है कि ईसाई धर्म में भी फा. लुईस जैसे लोगों के हाथ मजबूत होंगे और वह अपने समाज में बदलाव लायेंगे जिससे बाकी के धर्मों को भी प्रेरणा मिल सके.
Saturday, November 17, 2007
पड़ोसी देशों पर भारत का धार्मिक प्रभाव
आज के चीन में धर्म से जुड़ा कुछ भी आसानी से नहीं दिखता. हालाँकि लोगों ने कहा कि अगर किसी मंदिर में जाईये तो वहाँ बहुत लोग मिलेंगे और लोगों के मन में बहुत धार्मिक्ता है पर दक्षिण चीन के गाँवों में घूमते हुए मुझे इस धार्मिक्ता के बाह्य चिन्ह कुछ नहीं दिखे. 1960 में हुई माओ द्वारा की हुई साँस्कृतिक क्राँती (cultural revolution) के दौरान अधिकतर बुद्ध मंदिरों को तोड़ दिया गया था और वहाँ रहने वाले बुद्ध भिक्षुकों जेल में डाल दिया गया या कुछ कहते हैं, मार दिया गया. फ़िर पिछले बीस सालों में जो विकास हुआ तो कुछ मंदिर भी दोबारा बस गये. दक्षिण चीन के गावों में घूमते समय बहुत सी कहानियाँ सुनने को मिलीं कि उस क्राँती के समय में कहाँ पर क्या हुआ था, कैसे मंदिर तोड़े गये गये, कैसे कुछ मूर्तियाँ छुपा दी गयीं थीं और उन्हे तोड़ने से बचाया गया था. पर विकास के बाद नये बने समृद्ध गावों में कोई नया मंदिर नहीं बना दिखता. पचासों गाँव घूमने के बाद भी मैं एक भी मंदिर नहीं देख पाया.
फ़िर लूफेंग नाम के छोटे से शहर के सँग्रहालय में एक मूर्ती देखी जो दुर्गा से बहुत मिलती थी. पूछा तो बोले कि यह ताओ (Tao) धर्म की एक देवी की मूर्ती है. यह तो मालूम था कि चीन में बुद्ध धर्म भारत से पहुँचा था पर क्या हिंदू देवी देवताओं का भी कोई प्रभाव चीन में पहुँचा था, इसके बारे में कभी कुछ नहीं पढ़ा था.

बुद्ध धर्म का प्रभाव भारत से सारे एशिया में फैला था, चीन जापान, वियतनाम, कोरिया तक पर हिंदू धर्म का भी प्रभाव फैला था जिसके निशान इंदोनेशिया के बाली और कम्बोदिया के अंगकोरवाट मंदिर में दिखते हैं.
चीन यात्रा के बाद थाईलैंड आया तो वहाँ भी बुद्ध धर्म के साथ साथ हिंदू धर्म का प्रभाव दिखा. नीचे के चार तस्वीरों में हैं बैंकाक हवाईअड्डे पर बनी अमृतमंथन के दृश्य में मूँछों वाले विष्णु की मूर्ती, एक बुद्ध मंदिर में भगवान बुद्ध की प्रतिमाएँ, थाईलैंड के भूतपूर्व शासक राम तृतीय की मूर्ती, और एक सड़क के किनारे ब्रह्मा की मूर्ती.




इनको देखने के बाद मन में कई प्रश्न उठ रहे थे. बुद्ध धर्म के बारे में तो कहते हैं कि सम्राट अशोक के जमाने में बुद्ध धर्म का प्रचार हुआ पर हिंदू धर्म का प्रचार कब हुआ, किसने किया? भारतीय इतिहासकार बुद्ध धर्म के बारे में कहते हैं कि वह हिंदू धर्म के सुधारवाद का नतीजा था और जातिप्रथा आदि जैसी प्रथाओं को विरुद्ध सभी मानवों की बराबरी का संदेश देता था इसलिए हिंदू तथा बुद्ध धर्मों के बीच बहुत खिंचातानी और लड़ाई चली और बाद में बाहम्णवादियों ने बुद्ध धर्म को भारत से बिल्कुल हटा दिया, क्या अन्य देश जैसे थाईलैंड आदि, वहाँ हिंदू और बुद्ध धर्म की इस लड़ाई को कैसे देखा गया? हिंदू धर्म के साथ भारतीय जाति प्रथा क्यों अन्य देशों में नहीं फैली?
फ़िर लूफेंग नाम के छोटे से शहर के सँग्रहालय में एक मूर्ती देखी जो दुर्गा से बहुत मिलती थी. पूछा तो बोले कि यह ताओ (Tao) धर्म की एक देवी की मूर्ती है. यह तो मालूम था कि चीन में बुद्ध धर्म भारत से पहुँचा था पर क्या हिंदू देवी देवताओं का भी कोई प्रभाव चीन में पहुँचा था, इसके बारे में कभी कुछ नहीं पढ़ा था.

बुद्ध धर्म का प्रभाव भारत से सारे एशिया में फैला था, चीन जापान, वियतनाम, कोरिया तक पर हिंदू धर्म का भी प्रभाव फैला था जिसके निशान इंदोनेशिया के बाली और कम्बोदिया के अंगकोरवाट मंदिर में दिखते हैं.
चीन यात्रा के बाद थाईलैंड आया तो वहाँ भी बुद्ध धर्म के साथ साथ हिंदू धर्म का प्रभाव दिखा. नीचे के चार तस्वीरों में हैं बैंकाक हवाईअड्डे पर बनी अमृतमंथन के दृश्य में मूँछों वाले विष्णु की मूर्ती, एक बुद्ध मंदिर में भगवान बुद्ध की प्रतिमाएँ, थाईलैंड के भूतपूर्व शासक राम तृतीय की मूर्ती, और एक सड़क के किनारे ब्रह्मा की मूर्ती.




इनको देखने के बाद मन में कई प्रश्न उठ रहे थे. बुद्ध धर्म के बारे में तो कहते हैं कि सम्राट अशोक के जमाने में बुद्ध धर्म का प्रचार हुआ पर हिंदू धर्म का प्रचार कब हुआ, किसने किया? भारतीय इतिहासकार बुद्ध धर्म के बारे में कहते हैं कि वह हिंदू धर्म के सुधारवाद का नतीजा था और जातिप्रथा आदि जैसी प्रथाओं को विरुद्ध सभी मानवों की बराबरी का संदेश देता था इसलिए हिंदू तथा बुद्ध धर्मों के बीच बहुत खिंचातानी और लड़ाई चली और बाद में बाहम्णवादियों ने बुद्ध धर्म को भारत से बिल्कुल हटा दिया, क्या अन्य देश जैसे थाईलैंड आदि, वहाँ हिंदू और बुद्ध धर्म की इस लड़ाई को कैसे देखा गया? हिंदू धर्म के साथ भारतीय जाति प्रथा क्यों अन्य देशों में नहीं फैली?
Friday, November 09, 2007
ज्योति उत्सव
जब भी कोई त्योहार आता है तो घर से दूर विदेश में होना बहुत अखरता है. बाज़ारों का शोर और धक्का मुक्की, मिठाई के डिब्बे, पड़ोसियों, दोस्तों और रिश्तेदारों से बधाई, अँधेरी रात में टिमटिमाते दिये और मोमबत्तियाँ, आज दीवाली है तो उस सब की याद आना स्वाभाविक ही है.
यहाँ तो आज एक आम दिन है, अन्य दिनों जैसा, हालाँकि हमने शाम को बाहर खाना खाने जाने का प्रोग्राम बनाया है जहाँ भरतनाट्यम नृत्य भी होगा. कल यहाँ राजस्थान के लोकनर्तकों का कार्यक्रम भी है. फ़िर हम दिल को समझाते हैं कि चलो दूरी ही अच्छी है कम से कम पटाखों के शोर और प्रदूषण से तो बचेंगे!
आज दीपावली के शुभ अवसर पर मुझे बुद्ध प्रार्थना याद आती है, तमसो मा ज्योतिर्गमय. और यही शुभकामना है मेरी कि आप के परिवार में, घर में और दिलों में ज्योति का वास हो.
नीचे वाली तस्वीरें अभी हाल में चीन यात्रा में ली ज्यांग नाम के शहर में खींचीं थीं.



यहाँ तो आज एक आम दिन है, अन्य दिनों जैसा, हालाँकि हमने शाम को बाहर खाना खाने जाने का प्रोग्राम बनाया है जहाँ भरतनाट्यम नृत्य भी होगा. कल यहाँ राजस्थान के लोकनर्तकों का कार्यक्रम भी है. फ़िर हम दिल को समझाते हैं कि चलो दूरी ही अच्छी है कम से कम पटाखों के शोर और प्रदूषण से तो बचेंगे!
आज दीपावली के शुभ अवसर पर मुझे बुद्ध प्रार्थना याद आती है, तमसो मा ज्योतिर्गमय. और यही शुभकामना है मेरी कि आप के परिवार में, घर में और दिलों में ज्योति का वास हो.
नीचे वाली तस्वीरें अभी हाल में चीन यात्रा में ली ज्यांग नाम के शहर में खींचीं थीं.



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