Sunday, February 17, 2008
माघ पूजा (भारत यात्रा डायरी 2)
भुवनेश्वर से सुबह पाँच बजने से पहले ही निकल पड़े थे और छहः बजने से पहले कोणार्क पहुँच गये थे. आकाश बादलों से ढ़का था पर अँधेरे की कालिमा धीरे धीरे मध्यम पड़ रही थी. साथ में डा. मणि और डा. पति थे. बोले कि चलो पहले चाय पीते हैं. चाय के ढ़ाबे समुद्र तट की ओर थे, वहाँ पहुँचे तो समुद्र तट पर बैठी भीड़ को देखा. तट के साथ साथ राख जैसे समुद्र को ताकते बैठी थी उनकी कतार जैसे पानी पर तैरती धुँध में कुछ खोज रही हो.
कौन हैं वे लोग? मैंने डा. पति से पूछा तो उन्होंने बताया कि माघ के महीने में उगते सूर्य की पूजा करने वहाँ के आसपास के लोग हर सुबह वहाँ आते हैं और सूरज के निकलने की प्रतीक्षा कर रहे थे. सर्द सुबह में ठिठुरते हुए लोग रेत पर उकड़ु बैठे थे.
बायीं तरफ़ एक छोटा सा मंदिर दिख रहा था, पूजा करने वालों की एक लम्बी कतार उस ओर जा रही थी. समुद्र तट पर एक ऊँट वाला और एक घोड़े वाला पर्टकों के आने के इंतज़ार में थे.
पास ही गाँव की वृद्ध और प्रौढ़ औरतों का एक झुँड छोटा सा घेरा बना कर रेत पर बैठा था. घेरे के बीच में रेत में ही छोटा सा खड्डा बना कर उसके भीतर एक दिया जलाया था. धीमे स्वर में वह अपनी प्रार्थनाएँ बुदबुदा रहीं थीं. कभी हाथ में थाली उठातीं, कभी दिये जलाती, कभी कंदमूल का अर्पण करतीं. मंदिर से आते हुए एक पंडित जी उनके पास प्रसाद देने के लिए एक क्षण रुके.
छोटे बच्चे सागर के किनारे भाग रहे थे, कोई कोई साहसवान ही ठँड की परवाह न कर समुद्र में नहा रहा था. ऊँचीं उठती लहरों पर नावें रास्ता खोजने के लिए संघर्ष में जुटीं थीं.
तट पर बैठे लोगों की आँखों में इंतज़ार था, एकटक देख रहे थे बादलों के पीछे से सूर्य देवता को देखने की आशा में.
लगा कि सदियों से यही दृष्य इसी तरह जाने कितनी बार दोहराया गया होगा, वही शाश्वत सागर तट, वही नमन की सीधी सादी श्रद्धा लिये सामान्य गरीब नर नारी, वही सूर्य.
अचानक पास बैठा झुँड खड़ा हो गया, चेहरों पर मुस्कान बिखर गयी थी, बूढ़ी उँगलियाँ बादलों के पीछे से झाँकते सूरज की छोटी सी फ़ीकी सी फाँक की ओर इशारा कर रहीं थीं. उनके हाथ पूजा के लिए जुड़ गये. थोड़ी सी ईर्श्या हुई उनके इस सादे विश्वास को देख कर.
उसी सुबह की कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं.







Tags: Sun God, Prayers, Konark
कौन हैं वे लोग? मैंने डा. पति से पूछा तो उन्होंने बताया कि माघ के महीने में उगते सूर्य की पूजा करने वहाँ के आसपास के लोग हर सुबह वहाँ आते हैं और सूरज के निकलने की प्रतीक्षा कर रहे थे. सर्द सुबह में ठिठुरते हुए लोग रेत पर उकड़ु बैठे थे.
बायीं तरफ़ एक छोटा सा मंदिर दिख रहा था, पूजा करने वालों की एक लम्बी कतार उस ओर जा रही थी. समुद्र तट पर एक ऊँट वाला और एक घोड़े वाला पर्टकों के आने के इंतज़ार में थे.
पास ही गाँव की वृद्ध और प्रौढ़ औरतों का एक झुँड छोटा सा घेरा बना कर रेत पर बैठा था. घेरे के बीच में रेत में ही छोटा सा खड्डा बना कर उसके भीतर एक दिया जलाया था. धीमे स्वर में वह अपनी प्रार्थनाएँ बुदबुदा रहीं थीं. कभी हाथ में थाली उठातीं, कभी दिये जलाती, कभी कंदमूल का अर्पण करतीं. मंदिर से आते हुए एक पंडित जी उनके पास प्रसाद देने के लिए एक क्षण रुके.
छोटे बच्चे सागर के किनारे भाग रहे थे, कोई कोई साहसवान ही ठँड की परवाह न कर समुद्र में नहा रहा था. ऊँचीं उठती लहरों पर नावें रास्ता खोजने के लिए संघर्ष में जुटीं थीं.
तट पर बैठे लोगों की आँखों में इंतज़ार था, एकटक देख रहे थे बादलों के पीछे से सूर्य देवता को देखने की आशा में.
लगा कि सदियों से यही दृष्य इसी तरह जाने कितनी बार दोहराया गया होगा, वही शाश्वत सागर तट, वही नमन की सीधी सादी श्रद्धा लिये सामान्य गरीब नर नारी, वही सूर्य.
अचानक पास बैठा झुँड खड़ा हो गया, चेहरों पर मुस्कान बिखर गयी थी, बूढ़ी उँगलियाँ बादलों के पीछे से झाँकते सूरज की छोटी सी फ़ीकी सी फाँक की ओर इशारा कर रहीं थीं. उनके हाथ पूजा के लिए जुड़ गये. थोड़ी सी ईर्श्या हुई उनके इस सादे विश्वास को देख कर.
उसी सुबह की कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं.







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बहुत खूबसूरत तस्वीरें हैं। वैसे बहुत पहले पुरी और कोणार्क जाने का अवसर प्राप्त हुआ है। मंदिर के भी एकाध फोटो डालने चाहिए थे।
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