Thursday, February 21, 2008

खोयी यादें (भारत यात्रा डायरी, अंतिम)

इस बार दिल्ली में मेट्रो से द्वारका मोड़ तक की यात्रा की.

कितनी यादें जुड़ीं थी उस रास्ते से. पहली बार कब गया था उस तरफ़, यह याद नहीं. वह यात्रा मौसियों के साथ होती थी. "ज़मीन पर जाना है", सोच कर ही दिनों पहले तैयारी शुरु हो जाती थी. पाकिस्तान में छूटी ज़मीन जयदाद के बदले में नाना को मुवाअजे में वे खेत मिले थे जिन्हें हम "ज़मीन" के नाम से जानते थे. नाना ने उन्हें दीवनपुर का नाम दिया था. फिल्मिस्तान के पास शीदीपुरा से तिलक नगर आने में ही दो बसे बदलनीं पड़ती थीं. फ़िर तिलकनगर से 14 नम्बर की नजफ़गढ़ जाने वाली बस से ककरौला मोड़ उतरते थे.

नानी की रसोई में गोबर के उपले जलते थे. उपले बनाने के लिए सिर पर तसली ले कर गोबर उठाने जाना मुझे बहुत अच्छा लगता था. गरम, मुलायम गोबर जीता जागता जंतु सा लगता था. नानी की बनायी हर चिज़ में उसी की गंध होती थी, उबले दूध में भी. रसोई के पीछे छोटा कूँआ था जहाँ बरतन धोते और पीने का पानी लेते. कुछ दूर, पेड़ों के झुँड के बीच में एक और बड़ा कूँआ था जहाँ छोटा सा टैंक भी था. मोटर चलाने से पानी की मोटी धारा जब टैंक में आती तो गरम दोपहर में उसके नीचे नहाने में बहुत मज़ा आता. कूँए के पास मोटे और मीठे बेरों के पेड़ थे. पड़ोस वाले सुरजीत के खेत में टैंक और भी बड़ा और गहरा था जहाँ पर तैर भी सकते थे. रात को चारपाईयों पर लेट कर तारे देखते और अँताक्षरी खेलते.

करीब का गाँव था नवादा जहाँ तक जाने में 15 या 20 मिनट का रास्ता था. नवादा में अम्मा बापू का घर था. नवादे के प्राथमिक विद्यालय में माँ ने पढ़ाना शुरु किया था और तब वह एक निस्संतान दम्पति के साथ रहती थी जिन्हें वह अम्मा बापू बुलाती थी. वही अम्मा बापू हमारे दूसरे नाना नानी थे. बापू डीटीएस की बस चलाता था (जो बाद में डीटीसी बन गयी). अम्मा के घर में मोर थे और वहाँ जाने का सबसे बड़ा लालच, मक्खन वाली रोटी खाना और मोर के पँख लेना होता था. वहाँ गाँव में डँडे मारने वाले और कीचड़ से पोतने वाली हरयाणवी होली का सारा साल इंतज़ार रहता.

जब द्वारका मोड़ पर उतरा तो कुछ समझ में नहीं आया कि कहाँ हूँ. नाना की उस जमीन का एक टुकड़ा बचा है जहाँ मँझले मामा ने स्कूल बनाया है. मकानों के जँगल में यह सोचना कि नानी का घर कहाँ था असम्भव था. मामा मुझे स्कूल की छत पर ले गये. "वो सीढ़ियाँ हैं जहाँ मेट्रो स्टेशन की, उसकी पार्किंग की जगह वहाँ बीजी की रसोई थी, वहीं सीढ़ियों के साथ छोटा कूँआ था. जहाँ वह खेत थे, वहाँ पार्किंग बनी है. वह गुलाबी तीन मंजिला घर दिख रहा है न, वहाँ घर के कमरे थे. वह घरों के बीच में पेड़ दिख रहा है? बस पहले के पेड़ों में से एक वही पेड़ बचा है. उसी के साथ बड़ा कूँआ था जहाँ बेरों के पेड़ थे और पानी का टैंक था", मामा ने समझाया.

दूर नाले के साथ खड़े पेड़ लगता है कि नहीं बदले. उस तरफ़ नाना मुर्गाबियों और बतखों का शिकार करने जाते थे. पर नाले के साथ साथ नाँगलोई तक घर बन गये हैं. उस तरफ़ खेतों में एक पुराना खँडहर होता था. हम कहते कि वहाँ रात को चुड़ैलें जमा होती थीं पर दिन में डर नहीं लगता. गर्मियों की दोपहर को जब लू चलती तो उसी खँडहर में ही बैठ कर खेत से ले कर ठण्डे तरबूज या खरबूजे खाते थे. घरों के बीच वह खँडहर कहाँ खो गया था यह तो मामा को भी याद नहीं था.

मामा के स्कूल के मंदिर में नाना नानी की तस्वीर लगी है. बाकी की सब यादें उस गाँव के साथ ही खो गयीं हैं जिनकी कोई तस्वीर नहीं है मेरे पास.
















Tags: changing city, Delhi, memories

Comments:
बढ़ती आबादी खेतो और जंगलो को लील लेगी.
 
इस महानगर में तो अब ऐसे लोग भी कम ही बचे हैं जिनकी याद तक में दिल्‍ली के खेत बच पाए हों।

डीटीएस मुझे तो ध्‍यान पड़ता है कि डीटीसी पहले डीटीयू थी... या शायद आप उससे भी पहले की बात कर रहे हों।
 
बहुत अच्छा संस्मरण।

’जमीन पर जाना है’ बहुत अच्छा लगा। हम सभी विभाजन की त्रासदियों से गुज़र चुके है। अलबत्ता हम कभी भी ’जमीन’ या ’अपना गाँव’ का सुख नही भोग सके। अपना गाँव सक्खर तो पीछे पाकिस्ताने कंही छूट गया। भारत आकर, दादाजी ने मुआवजे मे दी गयी जमीन लेने से यह कहकर मना कर दिया था, कहाँ वो सैकड़ो बीघे जमीन और कहाँ ये चादर सी जमीन का एक टुकड़ा, नही चाहिए.....| उस समय उनकी इस बात का प्रतिवाद किसी ने नही किया, उस जमाने मे बुजुर्गो के निर्णय के खिलाफ़ जाना बेअदबी जो मानी जाती थी। खैर...हम अपने ईंट के भट्ठो (बहराइच) पर जाकर ही गाँव का मजा ले लिया करते थे।
 
आपने 'नॉस्टेल्जिक' कर दिया . अब क्या लिखूं !
 

Post a Comment

यह चिट्ठा अब http://jonakehsake.blogspot.com/ पर चला गया है. यहाँ पर अब नयी टिप्पणियाँ स्वीकार नहीं की जायेंगी. धन्यवाद.

Note: only a member of this blog may post a comment.



Links to this post:

Create a Link



<< Home

Subscribe to Posts [Atom]