Sunday, June 29, 2008
लज्जा से गर्व की यात्रा
28 जून 1969 को न्यू योर्क के ग्रीनविच विलेज में स्थित स्टोनवाल इन्न पर पुलिस ने जब छापा मारा तो उसमें कोई नयी बात नहीं थी. सबको मालूम था कि वह क्लब समलैंगिक लोगों का अड्डा था. सबको यह भी मालूम था कि समलैंगिक लोग अपने बारे में लज्जित होते थे और सामने आने से घबराते थे. पर उस दिन जाने क्यों स्टोनवाल इन्न में एकत्रित लोग पुलिस के सामने भागे नहीं बल्कि उन्होंने लड़ा.
तब से वह दिन याद करने के लिए 28 जून को दुनिया के बहुत से देशों में समलैंगिक और अंतरलैंगिक लोग मोर्चे आयोजित करते हैं. अधिकतर पश्चिमी देशों में आज समलैंगिकता और अंतरलैंगिकता को कानूनी स्वीकृति और अधिकार मिले हैं पर फ़िर भी उनसे भेदभाव या बुरे बर्ताव की कहानियाँ अक्सर सुनने को मिलती हैं. इस मोर्चे का ध्येय यही है, अब तक जीते अधिकारों की खुशी मनाना और अपने विरुद्ध होते अन्यायों के प्रति अपनी आवाज उठाना.
इटली में हमारे शहर बोलोनिया ने सबसे समलैंगिक और अंतरलैंगिक लोगों की इस आवाज़ को सबसे पहले सुना और शहर की समलैंगिक एसोसियेशन को 1982 में आफिस खोलने की जगह दी. कल 28 जून था और समलैंगिक और अंतरलैंगिक गर्व परेड का राष्ट्रीय दिवस बोलोनिया में मनाया गया. इसमें भाग लेने के लिए पूरे देश से हजारों लोग यहाँ आये. इसी परेड की कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं.















तब से वह दिन याद करने के लिए 28 जून को दुनिया के बहुत से देशों में समलैंगिक और अंतरलैंगिक लोग मोर्चे आयोजित करते हैं. अधिकतर पश्चिमी देशों में आज समलैंगिकता और अंतरलैंगिकता को कानूनी स्वीकृति और अधिकार मिले हैं पर फ़िर भी उनसे भेदभाव या बुरे बर्ताव की कहानियाँ अक्सर सुनने को मिलती हैं. इस मोर्चे का ध्येय यही है, अब तक जीते अधिकारों की खुशी मनाना और अपने विरुद्ध होते अन्यायों के प्रति अपनी आवाज उठाना.
इटली में हमारे शहर बोलोनिया ने सबसे समलैंगिक और अंतरलैंगिक लोगों की इस आवाज़ को सबसे पहले सुना और शहर की समलैंगिक एसोसियेशन को 1982 में आफिस खोलने की जगह दी. कल 28 जून था और समलैंगिक और अंतरलैंगिक गर्व परेड का राष्ट्रीय दिवस बोलोनिया में मनाया गया. इसमें भाग लेने के लिए पूरे देश से हजारों लोग यहाँ आये. इसी परेड की कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं.















क्या आप को किसी तस्वीर से धक्का लगा? आशा है कि आप मुझे क्षमा करेंगे.
मैं मानता हूँ कि मानव के प्यार में कोई बुराई नहीं, बुराई है लड़ने झगड़ने, औरों को मारने में, औरों का शोषण करने में. इसीलिए मानव प्रेम के विभिन्न रुपों को दर्शाती इन तस्वीरों में मुझे कुछ गलत नहीं लगता, बल्कि यह सोचता हूँ कि भारतीय चेतना को झँझोड़ने की आवश्यकता है ताकि पुराने और पिछड़े कानूनों को बदला जा सके.
दुनिया के कई देशों में आज भी समलैंगिक या अंतरलैंगिक होने का अर्थ है मृत्यु दँड. भारत में मृत्यु दँड नहीं पर कानूनी अपराध माना जाता है. इसके विरुद्ध बात कीजिये तो कहते हैं कि यह तो सिर्फ कागज़ी कानून है इस पर अमल नहीं किया जाता. अगर यही बात है तो फ़िर उसे बदलने में कठिनाई क्या है? सच बात है कि पुलिस द्वारा इस कानून का सहारा ले कर लोंगो को डराया धमकाया, पीटा जाता है और यही संदेश दिया जाता है कि समलैंगिता या अंतरलैंगिकता अपराध हैं, निन्दनीय हैं, लज्जा से जुड़े हैं, गर्व से नहीं.
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छि:
छिः, इसलिये कि मुझे इन तस्वीरों में प्यार की नैसर्गिक
मानवीय कोमलता तो कहीं नज़र नहीं आ रही, बल्कि
लिजलिजा, घृणा उत्पन्न करने वाला भोंड़ापन ही दिख रहा है ।
चलिये, क्षमा किया । आप भी मेरे दृष्टिदोष को क्षमा करना, जी !
छिः, इसलिये कि मुझे इन तस्वीरों में प्यार की नैसर्गिक
मानवीय कोमलता तो कहीं नज़र नहीं आ रही, बल्कि
लिजलिजा, घृणा उत्पन्न करने वाला भोंड़ापन ही दिख रहा है ।
चलिये, क्षमा किया । आप भी मेरे दृष्टिदोष को क्षमा करना, जी !
लिजलिजाहट की अनुभूति से इंकार करना पाखंड होगा...पर इतना विवेक भी अब है कि सोच सकूं कि लिजलिजाहट मेरे अपने दिमाग की अधिक है। नैसर्गिकता, कोमलता वगैरह की बात नहीं है।
एक समाज के रूप में इस लिजलिजाहट से आजाद होने में शायद पीढि़यॉं लगें। पर सेक्सुअल प्रेफरेंस को आधार बनाकर भेदभाव निश्चित तौर पर अन्यायपूर्ण है।
कृपया झिंझोड़ते रहा करें
एक समाज के रूप में इस लिजलिजाहट से आजाद होने में शायद पीढि़यॉं लगें। पर सेक्सुअल प्रेफरेंस को आधार बनाकर भेदभाव निश्चित तौर पर अन्यायपूर्ण है।
कृपया झिंझोड़ते रहा करें
हम कौन होते हैं दूसरों पर उँगली उठाने वाले। सबको अपनी तरह से जीवन जीने का अधिकार है, तब तक जब तक वह किसी अन्य के अधिकार का हनन ना करे।
घुघूती बासूती
घुघूती बासूती
सेक्स अब अननेचुरल होता जा रहा है. लोगों के अन्दर एक दूसरे और समाज के प्रति जो घुटन और चिढ़ है, वह सेक्स में भी झलक रही है. यह मानव समाज के लिए ठीक नहीं है.
समलैंगिक संबंध मानसिक विकारों की उपज होते हैं मगर सम्लैंगिकों को रोकने की कोशिश अपने कर्तव्यों से बचना मात्र है। कानून उनके हक़ में होना चाहिये क्योंकि उन्हे भी अपने तरीके से जीने का मौका मिलना चाहिये। यदि सुधार के लिये कुछ किया जाना ज़रूरी है तो वह है उनका मानसिक उपचार। यदि हम उनके सुधार में योगदान नहीं दे सकते तो बेहतर होगा कि अपना मुंह बंद रखें।
और लिज़लिज़ापन हमें होना स्वाभाविक है क्योंकि हम समलैंगिक नहीं हैं संभव है हमारे संबंधों पर उनको भी लिज़लिज़ेपन का अहसास होता हो।
शुभम।
और लिज़लिज़ापन हमें होना स्वाभाविक है क्योंकि हम समलैंगिक नहीं हैं संभव है हमारे संबंधों पर उनको भी लिज़लिज़ेपन का अहसास होता हो।
शुभम।
पुरूष को पुरूष द्वारा चुमा जाते देख अजीब सी अनुभुती हो रही है. मन के किसी कोने को यह स्वीकार नहीं हो रहा, मगर यह मेरा निजी मामला है, उनका अपना. हम कौन होते है उनके मामलो में टाँग डालने वाले?
समलैंगिक होना या न होना यह तो व्यक्तिगत प्रेफेरेंस है .उसकी सामाजिक स्वीकृति के लिए मोर्चा और परेड निकालना भी सही है.(ऐसी ही एक परेड दिल्ली में भी हुई ) .आख़िर समाज में रहते हुए उसका हिस्सा बनकर रहना सब लोग चाहते हैं. परन्तु मोर्चा या परेड में इस तरह का देह प्रदर्शन या प्रेम प्रदर्शन कुछ अच्छा नहीं लगा.अगर यही चीज़ मर्यादा की सीमाओं में कही जाए तो शायद उसकी स्वीकृति ज्यादा आसानी से मिल सकती हो.
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