Monday, June 30, 2008

अश्लीलता के मापदँड

कल की मेरी पोस्ट "लज्जा से गर्व की यात्रा" पर मिली टिप्पणियों के बारे में सारा दिन सोचता रहा. मुझे मालूम है कि इस तरह की पोस्ट पर टिप्पणी लिखना भी साहस का काम है. अपने आप से की उन बातों के बारे में प्रस्तुत है यह मेरा काल्पनिक साक्षात्कार.

प्रश्नः डाक्टर साहब, आप के तो बाल सफेद होने लगे, क्या आप को इस तरह की तस्वीरें लगाते शर्म नहीं आई?
उत्तरः यह तो सफेद होते बालों के दम पर ही तो मैं सेक्स सम्बंधी विषयों पर लिख पाता हूँ. भारत में सामान्य समाज में बड़े होने का अर्थ है कि आप सेक्स से जुड़ी बातों को करने में लज्जाएँ और उन्हे छुपायें. लड़कों में आपस में बैठ कर सम्भोग की या सेक्स की बातें तो की जा सकती हैं पर उसमें भी अपनी लैंगिक पहचान की दुविधाओं की बात करना कठिन है. समलैंगिकता या अंतरलैंगिकता जैसे विषयों पर बात करना और भी कठिन है. "अगर लोग सोचें कि मैं भी वैसा ही हूँ तो क्या होगा?" जैसे डर मन में बैठे होते हैं.

आप सच कहिये, उस पोस्ट को खुल कर पढ़ पायेंगे, उन तस्वीरों को सबके सामने देख पायेंगे? इस तरह के विषयों को चुपचाप, छुप कर ही देखना पड़ता है कि घर वाला या मित्र या साथ काम करने वाला कोई देख न ले और समझे कि मैं भी वैसा ही हूँ? इस विषय पर टिप्पणी देना भी कठिन है क्योंकि उससे सब को मालूम चल जाता है कि मैंने भी वह पोस्ट पढ़ी है.

तो इस दुविधा वाले विषयों पर सफेद बालों वालों के लिए कहना, लिखना अधिक आसान है. शादी हुए सदी बीत गयी, बच्चे बड़े हो गये, अब अगर कोई कुछ सोचे भी तो क्या फर्क पड़ता है. विषय महत्वपूर्ण है, आवश्यक है. मालूम नहीं कि आप के जान पहचान वालों में से, आप के परिवार में से, आप के काम के साथियों मे से कोई समलैंगिक या अंतरलैंगिक है, पर मेरी जान पहचान में ऐसे कई लोग हैं. अधिकतर लोग इस बात को छुपा कर रखते हैं क्योंकि इस बात का ज़ाहिर होना अक्सर नौकरी, घर छोड़ने तक पहुँचा देता है, रिश्ते तोड़ देता है. इसीलिए सोचता हूँ कि विषय महत्वपूर्ण है और इस पर लिखना आवश्यक है.

प्रश्नः शरीर के नंगेपन की अश्लीलता दिखाना, क्या इसमें फूहड़पन और लिजलिजाहट नहीं?

उत्तरः "शरीर की भूख गंदी वासना है. सुंदरता है त्याग और निस्स्वार्थ प्रेम में, दूर दूर से विरह में जलना और परम प्रेम के लिए तड़पना और जीवन त्याग देना. सुंदरता है घुँघट के पीछे से झाँकतीं शर्मीली आँखों में, उड़ते बुर्के के दिखती क्षण भर की झलक में जो दिल में बस जाती है. उससे आगे बढ़ना, शरीर की भूख को स्वीकारना, वासना के सामने झुकना, गलत है और गंदा भी. सच्चा प्रेम तो वही है जो इस शरीर की भूख से ऊपर उठ सके." यह घुट्टी जन्म के साथ ही हमें मिलती है कि प्रेम के अच्छे और बुरे को किस मापदँड से मापा जाये.

बचपन में पढ़े यह पाठ जो अनजाने ही गीतों, कहानियों, फ़िल्मों, बातों से मन में गहरे बस जाते हैं, और दीवारें खड़ी कर देते हैं मन में जिनसे बाहर निकलना कठिन है. लक्ष्मण रेखाएँ खींचते हैं सही और गलत में, विषेशकर स्त्री शरीर के चारों ओर. स्कर्ट पहने वाली, बिना बाजू की पोशाक पहनने वाली, शरीर दिखाने वाली लड़की और युवती जान बूझ कर छेड़ने का निमंत्रण देती है, बलात्कार को स्वयं बुलाती है, यह कहता है यह पाठ. नारी शरीर है ही ऐसा, शैतान का घर, पुरुष मन और वासना को जगाने वाला. छुपा कर रखिये उसे पर्दों में, घृणित है वह अगर खुला हुआ है, उघड़ा है. छुपी हुई, चुपचाप, शाँत और सहनशील नारी ही सुंदर है. यह कहता है हमारा समाज.

पुरुष शरीर पर निर्षेध कम हैं पर समाज से वासना को छुपा कर ही रखना उसका भी कर्त्तव्य है. खुले शर्महीन नारी शरीर को छूना, छेड़ना जायज है पर खुलेआम प्यार में चुम्बन या शरीर की प्यास जताना वासना है, गन्दगी हैं, गलत हैं, वहशीपन है, जानवरों जैसा होना है. पुरुष अन्य पुरुषों को खोजें, इसमें कोई गलत बात नहीं पर सामाजिक परम्पराओं को नहीं छेड़ा जाना चाहिये, यानि उन्हें विवाह करना चाहिये, बच्चे होने चाहिये, और जो भी हो वह चलता रहे तो उसमें कोई बात नहीं. पर अगर पुरुष इन सामाजिक मर्यादाओं को भूल जाते हैं तो उन्हें भी देशनिकाला दिया जाना चाहिये, मृत्युदँड ही देना पड़ेगा. दो स्त्रियाँ आपस में प्रेम खोजें, उनको मार देना जायज हैं, शैतान बसा है उनके शरीरों में. क्या यह नहीं कहता है हमारा समाज?

ऐसी ही कितनी दीवारें खड़ीं हैं मेरे मन में भी. मानव अधिकारों की बात तो ठीक है पर इस तरह खुले आम सबके सामने चुम्मियाँ लेना, नँगे होना, इस सब की क्या आवश्यकता है? अपने घर की चार दीवारी में छुप कर यह नहीं कर सकते हैं क्या? ऐसी बातें फुसफुसाती हैं यह दीवारें मेरे कानों में भी.

मैं नहीं मानता. कोशिश करता हूँ इस फुसफुसाहट को न सुनूँ, कि मन में छुपे इन मापदँडों को चुनौती दे सकूँ, धीरे धीरे बदल सकूँ.

घूँघट के पीछे से झाँकती आँखों की रुमानियत को समझता हूँ, पर यह भी लगता है उसमें पृतसत्ता पर बने समाज के बँधन भी हैं. नँगे शरीरों और स्वच्छंद सेक्स आचरण के खोखलेपन की समझ भी है, पर उस खुलेपन में समस्याओं को ईमानदारी से देखने की शक्ती भी मिल सकती है और किसी को मुखौटों से बाहर निकल कर अपनी नजर से अपना जीवन निभाने का साहस भी मिलता है.

प्रश्नः यानि कि आप को इस तरह की तस्वीरें डालने में कोई गलती नहीं लगती?

उत्तरः गलती लगती है, उन तस्वीरों में छुपी हिँसा भी समझ आती है. जब किसी ने इस तरह की बातों पर कभी खुल कर स्पष्ता से बात न की हो, और उसके सामने इस तरह की तस्वीरें रख दी जायें. इसी लिए तो क्षमा माँग रहा था. पर साथ ही लगता है कि इस विषय पर खुल कर बात करने के लिए कोई दूसरा रास्ता नहीं.

मेरे विचार में आप को उन तस्वीरों को ध्यान से देखना चाहिये, खुद से पूछना चाहिये कि कौन सी तस्वीर में आप को सबसे अधिक परेशानी है और क्यों? अगर दो पुरुषों या दो स्त्रियों के बीच चुम्बन की जगह एक स्त्री पुरुष युगल का चुम्बन होता तो क्या आप उसमें सुंदरता देख पाते? क्या लेसबियन स्त्री के बच्चों की तस्वीर आप को परेशान करती है? क्या नँगे युवक के नितम्ब आप को अश्लील लगते हैं?

प्रकृति में देखो तो पेड़ पौधे, पशु पक्षी यह नहीं सोचते कि वह दुबले या मोटे हैं, उनमें नग्नता है, अश्लीलता है. मानव शरीर भी प्रकृति का ही रुप है. मुझे तो सबमें सुंदरता दिखती है. अब अन्य तस्वीरें नहीं लगा रहा इस साक्षात्कार के साथ. बोलोनिया की समलैंगिक और अंतरलैंगिक परेड की अन्य तस्वीरें, अगर आप देखना चाहते हैं तो कल्पना पर देख सकते हैं.

Sunday, June 29, 2008

लज्जा से गर्व की यात्रा

28 जून 1969 को न्यू योर्क के ग्रीनविच विलेज में स्थित स्टोनवाल इन्न पर पुलिस ने जब छापा मारा तो उसमें कोई नयी बात नहीं थी. सबको मालूम था कि वह क्लब समलैंगिक लोगों का अड्डा था. सबको यह भी मालूम था कि समलैंगिक लोग अपने बारे में लज्जित होते थे और सामने आने से घबराते थे. पर उस दिन जाने क्यों स्टोनवाल इन्न में एकत्रित लोग पुलिस के सामने भागे नहीं बल्कि उन्होंने लड़ा.

तब से वह दिन याद करने के लिए 28 जून को दुनिया के बहुत से देशों में समलैंगिक और अंतरलैंगिक लोग मोर्चे आयोजित करते हैं. अधिकतर पश्चिमी देशों में आज समलैंगिकता और अंतरलैंगिकता को कानूनी स्वीकृति और अधिकार मिले हैं पर फ़िर भी उनसे भेदभाव या बुरे बर्ताव की कहानियाँ अक्सर सुनने को मिलती हैं. इस मोर्चे का ध्येय यही है, अब तक जीते अधिकारों की खुशी मनाना और अपने विरुद्ध होते अन्यायों के प्रति अपनी आवाज उठाना.

इटली में हमारे शहर बोलोनिया ने सबसे समलैंगिक और अंतरलैंगिक लोगों की इस आवाज़ को सबसे पहले सुना और शहर की समलैंगिक एसोसियेशन को 1982 में आफिस खोलने की जगह दी. कल 28 जून था और समलैंगिक और अंतरलैंगिक गर्व परेड का राष्ट्रीय दिवस बोलोनिया में मनाया गया. इसमें भाग लेने के लिए पूरे देश से हजारों लोग यहाँ आये. इसी परेड की कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं.
































क्या आप को किसी तस्वीर से धक्का लगा? आशा है कि आप मुझे क्षमा करेंगे.

मैं मानता हूँ कि मानव के प्यार में कोई बुराई नहीं, बुराई है लड़ने झगड़ने, औरों को मारने में, औरों का शोषण करने में. इसीलिए मानव प्रेम के विभिन्न रुपों को दर्शाती इन तस्वीरों में मुझे कुछ गलत नहीं लगता, बल्कि यह सोचता हूँ कि भारतीय चेतना को झँझोड़ने की आवश्यकता है ताकि पुराने और पिछड़े कानूनों को बदला जा सके.

दुनिया के कई देशों में आज भी समलैंगिक या अंतरलैंगिक होने का अर्थ है मृत्यु दँड. भारत में मृत्यु दँड नहीं पर कानूनी अपराध माना जाता है. इसके विरुद्ध बात कीजिये तो कहते हैं कि यह तो सिर्फ कागज़ी कानून है इस पर अमल नहीं किया जाता. अगर यही बात है तो फ़िर उसे बदलने में कठिनाई क्या है? सच बात है कि पुलिस द्वारा इस कानून का सहारा ले कर लोंगो को डराया धमकाया, पीटा जाता है और यही संदेश दिया जाता है कि समलैंगिता या अंतरलैंगिकता अपराध हैं, निन्दनीय हैं, लज्जा से जुड़े हैं, गर्व से नहीं.

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