Wednesday, December 16, 2009
यौन स्वयंसेवक
इस पोस्ट में यौन विषयों पर बात है, अगर आप को इस विषय पर पढ़ना ठीक नहीं लगता तो कृपया इसे न पढ़ें.
ब्राज़ील के सन पाओलो फ़िल्म फैस्टिवल में कोरिया के क्योंग दुक छो (Kyong-duk Cho) की फ़िल्म "सेक्स वोलोन्टियर" (यौन स्वयंसेवक - Sex Volunteer) को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार मिला है. इस फ़िल्म की बात से मुझे "विकलाँगता और यौनता" विषय पर करीब दस साल पहले की गयी, अपने शौध की बात याद आ गयी.

छो कि फ़िल्म का विषय है गर्दन से नीचे पंगु हुए एक टेट्राप्लेजिक छुँकिल नाम के युवक की यौन इच्छा. छुँकिल कवि बनना चाहता है, लेकिन अपनी भावनाओं को काव्य रूप में व्यक्त नहीं कर पाता. जीवन से निराश, छुँकिल सोचता है कि उसकी मृत्यु का समय आ रहा है और एक पादरी को बताता है कि मरने से पहले उसकी एक ही इच्छा है, यौन सम्बंधों के आनंद का एक बार अनुभव करना.
येरी, एक युवती तो सिनेमा की विद्यार्थी है, "यौन स्वयंसेवक" विषय पर फ़िल्म बनाना चाहती है और इसके लिए व्यक्तिगत अनुभव की तलाश में है, छुँकिल के जीवन में आती है.
यह विषय मेरी शौध में भी निकला था जब बात उठी थी कि वह शरीर जिसमें छूओ तो पता नहीं चलता, यौन अंगों और यौन सम्बंधों को सामान्य जिस तरह हम समझते हैं उस तरह उनका महत्व नहीं हो सकता, तो ऐसे में यौनता का क्या अर्थ है?

एक कार दुर्घटना में कमर से नीचे पंगु हुई एक युवती ने इस प्रश्न के उत्तर में अपना एक अनुभव बताया था, जब उन्हें छुँकिल जैसे युवक से प्यार हुआ था. यौन सम्बंधों की प्यास, शरीर की इच्छा के साथ साथ आत्मीयता की भी प्यास है, उसका कहना था, यानि अंग काम करते हैं या नहीं, इसके उपाय खोजे जा सकते हैं, पर पहले यह मानना होगा कि हर मानव को आत्मीयता खोजने का अधिकार है.
इन चर्चाओं में कुछ इस तरह की बातें भी निकली थीं जिन पर शौध में भाग लेने वाले सभी विकलाँग लोग एकमत नहीं थे, जैसे कि विकलाँगों के लिए बने विषेश सेक्स उपकरण.
यौनता से जुड़ी बातों को खुल कर करना कठिन है. विकलाँगता से जुड़ी बातें भी अक्सर दबी छुपी रह जाती हैं. विकलाँग लोगों की यौन इच्छाएँ जैसे विषयों पर दुगने तिगने पर्दे पड़े हैं, उन्हें केवल बीमारियों की दृष्टि से देखा जाता है. छो की फ़िल्म से और उसे मिले पुरस्कार से, अगर इस विषय पर कुछ भी खुल कर बात हो सकती है तो उसका स्वागत है.
ब्राज़ील के सन पाओलो फ़िल्म फैस्टिवल में कोरिया के क्योंग दुक छो (Kyong-duk Cho) की फ़िल्म "सेक्स वोलोन्टियर" (यौन स्वयंसेवक - Sex Volunteer) को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार मिला है. इस फ़िल्म की बात से मुझे "विकलाँगता और यौनता" विषय पर करीब दस साल पहले की गयी, अपने शौध की बात याद आ गयी.

छो कि फ़िल्म का विषय है गर्दन से नीचे पंगु हुए एक टेट्राप्लेजिक छुँकिल नाम के युवक की यौन इच्छा. छुँकिल कवि बनना चाहता है, लेकिन अपनी भावनाओं को काव्य रूप में व्यक्त नहीं कर पाता. जीवन से निराश, छुँकिल सोचता है कि उसकी मृत्यु का समय आ रहा है और एक पादरी को बताता है कि मरने से पहले उसकी एक ही इच्छा है, यौन सम्बंधों के आनंद का एक बार अनुभव करना.
येरी, एक युवती तो सिनेमा की विद्यार्थी है, "यौन स्वयंसेवक" विषय पर फ़िल्म बनाना चाहती है और इसके लिए व्यक्तिगत अनुभव की तलाश में है, छुँकिल के जीवन में आती है.
यह विषय मेरी शौध में भी निकला था जब बात उठी थी कि वह शरीर जिसमें छूओ तो पता नहीं चलता, यौन अंगों और यौन सम्बंधों को सामान्य जिस तरह हम समझते हैं उस तरह उनका महत्व नहीं हो सकता, तो ऐसे में यौनता का क्या अर्थ है?

एक कार दुर्घटना में कमर से नीचे पंगु हुई एक युवती ने इस प्रश्न के उत्तर में अपना एक अनुभव बताया था, जब उन्हें छुँकिल जैसे युवक से प्यार हुआ था. यौन सम्बंधों की प्यास, शरीर की इच्छा के साथ साथ आत्मीयता की भी प्यास है, उसका कहना था, यानि अंग काम करते हैं या नहीं, इसके उपाय खोजे जा सकते हैं, पर पहले यह मानना होगा कि हर मानव को आत्मीयता खोजने का अधिकार है.
इन चर्चाओं में कुछ इस तरह की बातें भी निकली थीं जिन पर शौध में भाग लेने वाले सभी विकलाँग लोग एकमत नहीं थे, जैसे कि विकलाँगों के लिए बने विषेश सेक्स उपकरण.
यौनता से जुड़ी बातों को खुल कर करना कठिन है. विकलाँगता से जुड़ी बातें भी अक्सर दबी छुपी रह जाती हैं. विकलाँग लोगों की यौन इच्छाएँ जैसे विषयों पर दुगने तिगने पर्दे पड़े हैं, उन्हें केवल बीमारियों की दृष्टि से देखा जाता है. छो की फ़िल्म से और उसे मिले पुरस्कार से, अगर इस विषय पर कुछ भी खुल कर बात हो सकती है तो उसका स्वागत है.
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आप खुल कर लिखते यह अच्छी बात है. संयोग है कि मैने भी आज वैश्यावृति को कानूनन करने पर लिखा है.
यौन और आत्मियता का सम्बन्ध है. कमर से नीचे पंगु हुआ व्यक्ति कैसे अनुभव करेगा यह जानना मुश्किल जान पड़ता है.
फिल्म का अंत भी लिखना था. कुछ जानकारी ही मिलती.
अच्छी पोस्ट.
यौन और आत्मियता का सम्बन्ध है. कमर से नीचे पंगु हुआ व्यक्ति कैसे अनुभव करेगा यह जानना मुश्किल जान पड़ता है.
फिल्म का अंत भी लिखना था. कुछ जानकारी ही मिलती.
अच्छी पोस्ट.
सँजय, मैंने फ़िल्म नहीं देखी, केवल इसके बारे में अपनी एक ब्राज़ील की मित्र से सुना. उसने कहा था कि फ़िल्म जटिल है और भावनात्मक है. अगले कुछ महीनों में अवश्य इसे देखने का मौका मिलेगा, तब उस पर खुल कर लिखूँगा.
अच्छा ध्यानाकर्षण ! दरअसल यौनानुभूति तो मष्तिष्क के कुछ स्थल नियंत्रित करते हैं -हायिपोथाल्मस और आमायिग्देला आदि तो शरीर की विकलांगता कैसे यौनानुभूति को उन्मूलित कर सकती है ?
यौन विषय पर हम बहुत छुपाते हैं। जब कि इस पर सत्साहित्य की बहुत आवश्यकता है। बुरे साहित्य से तो दुकानें भरी पड़ी हैं।
जीवन सृजन के मूल तत्व से नज़रें चुराना और उसे बुरा कहना महँ मूर्खता है...हमें उसकी विकृतियों की बात करनी चाहिए...ये फिल्म जिसका जिक्र आपने किया है बहुत ही अछूते विषय को ले कर बनी गयी है लेकिन क्या इसे देखना भारत में संभव होगा?
नीरज
नीरज
आप सब को टिप्पणियों के लिए धन्यवाद. इतनी टिप्पणियाँ देख कर थोड़ा अचरज हुआ. लगता है कि पिछले एक दो वर्षों में हिंदी चिट्ठाजगत में इस तरह के विषयों पर लिखने पढ़ने वाले बढ़े हैं. :-)
कुछ साल पहले तक, इस तरह के यौन सम्बंधी विषयों पर अगर इक्का दुक्का टिप्पणी भी मिल जाती तो लगता था कि चलो किसी ने तो लिखने का साहस किया.
कुछ साल पहले तक, इस तरह के यौन सम्बंधी विषयों पर अगर इक्का दुक्का टिप्पणी भी मिल जाती तो लगता था कि चलो किसी ने तो लिखने का साहस किया.
हम्म..आपने जिस प्रकार जिक्र किया है फिल्म देखने की इच्छा हो आई है ....वैसे आप सच कह रहे हैं ब्लॉग जगत अब बदल गया है ..और यह बदलाव सबके सम्मिलित प्रयासों से ही संभव हुआ है.
हम्म..आपने जिस प्रकार जिक्र किया है फिल्म देखने की इच्छा हो आई है ....वैसे आप सच कह रहे हैं ब्लॉग जगत अब बदल गया है ..और यह बदलाव सबके सम्मिलित प्रयासों से ही संभव हुआ है.
हम्म..आपने जिस प्रकार जिक्र किया है फिल्म देखने की इच्छा हो आई है ....वैसे आप सच कह रहे हैं ब्लॉग जगत अब बदल गया है ..और यह बदलाव सबके सम्मिलित प्रयासों से ही संभव हुआ है.
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