अरुण चढ़्ढ़ा की डाक्यूमैंटरी फ़िल्में कल्पना के फ़िल्मों से जुड़े पन्ने

अरुण चढ़्ढ़ा भारत के जाने माने डाकूमैंटरी फ़िल्मों के निर्देशक हैं. अपनी दो फ़िल्मों के लिये उन्हें दो बार राष्ट्रिय पुरुस्कार भी मिल चुका है. अरुण चढ़्ढ़ा Arun Chadhaपहला स्वर्ण कमल पुरुस्कार पाया था 2001 में, अपनी फ़िल्म "यह शर्म मेरी नहीं" के लिये. यह फ़िल्म राजस्थान की एक युवती की अपने बलात्कार करने वालों से लड़ाई की घटना पर आधारित थी.

दूसरा स्वर्ण कमल मिला 2004 में फ़िल्म "स्वयं" के लिये. यह फिल्म थी तमिलनाडू मे महिला समुदायों के बारे मे. 2012 में अरुण की फिल्म "माईन्डस्केपस आफ लव एँड लोन्गिग" (Mindscapes of love and longing) को सबसे बढ़िया सामाजिक विषय की फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला.

अरुण की फ़िल्में कई राष्ट्रिय तथा अन्तराष्ट्रिय फ़िल्म समारोहों में भाग ले चुकी हैं. उन्होंने भारत दूरदर्शन के लिये सीरियल बनाये हैं जैसे "1857 के लोक गीत" तथा "ग्रासरुटस्". 50 से भी अधिक डाकूमैंटरी बना चुके हैं अरुण. उनकी एक और बहुचर्चित डाकूमैंटरी थी "गीताँजली" जो मुम्बई की कैंसर से मरने वाली एक किशोरी की कविताओं के बारे में थी.

सन 2009 में अरुण ने भारतीय दूरदर्शन के लिए हिंदी लेखिका मैत्रयी पुष्प के उपन्यास "कस्तूरी कुँडल बसे" पर टी वी सीरियल बनाया. सन 2010 में वह एक अन्य हिंदी लेखिका, मृदुला गर्ग के उपन्यास, "अपने हिस्से का आसमान" पर फ़िल्म बना रहे हैं.

अरुण अपनी पत्नी तथा दो बेटियों के साथ भारत की राजधानी दिल्ली में रहते हैं.

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