बच्चन जी की कमसिन सखियाँ सुनील दीपक, 30 मई 2007

आखिरकार मुझे करण जौहर की फ़िल्म कभी अलविदा न कहना देखने का मौका मिल ही गया. अक्सर ऐसा होता है कि जिस फ़िल्म की बहुत बुराईयाँ सुनी हों, वह उतनी बुरी नहीं लगती, कुछ वैसा ही लगा यह फ़िल्म देख कर.

फ़िल्म के बारे में पढ़ा था कि समझ में नहीं आता कि अच्छे भले प्यार करने वाले पति अभिशेख को छोड़ कर रानी मुखर्जी द्वारा अभिनेत्रित पात्र को इतने सड़ियल हीरो से किस तरह प्यार हो सकता है? मेरे विचार में इस फ़िल्म यह फ़िल्म भारत में प्रचलित परम्परागत विवाह होने वाली मानसिकता को छोड़ कर विवाह के बारे प्रचलित पश्चिमी मानसिकता से पात्रों को देखती है.

यह तो भारत में होता है कि अधिकतर युवक और युवतियाँ, अनजाने से जीवन साथी से विवाह करके उसी के प्रति प्रेम महसूस करते हैं. इसके पीछे बचपन से मन में पले हमारे संस्कार होते हैं जो हमें इस बात को स्वीकार करना सिखाते हैं. इन संस्कारों के बावजूद कभी कभी, नवविवाहित जोड़े के बीच में दरारें पड़ जाती है. मेरे एक मित्र ने विवाह में अपनी पत्नी को देखा तो उसे बहुत धक्का लगा, पर उस समय मना न कर पाया, लेकिन शादी के बाद कई महीनों तक उससे बात नहीं करता था. एक अन्य मित्र जो दिल्ली में रहता था, उसकी शादी बिहार में तय हुई, पर उसने जब अपनी नवविवाहित पत्नी को पहली बार देखा तो उसे अस्वीकार कर दिया. ऐसी कहानियाँ कभी कभी सुनने को मिल जाती हैं पर अधिकतर लोग परिवार दावारा चुने हुए जीवनसाथी के साथ ही निभाते हैं. अस्वीकृति या दिक्कत अधिकतर पुरुष की ओर से ही होती है, स्त्री की तरफ़ से जैसा भी हो, पति को स्वीकार किया जाता है.

पश्चिमी सोच विवाह से पहले अपने होने वाले जीवनसाथी के लिए प्रेम का होना आवश्यक समझती है. भारत में भी, कम से कम शहरों में, इस तरह की सोच का बढ़ाव हुआ है, कि विवाह हो तो प्रेमविवाह हो वरना कुवाँरा रहना ही भला है. पर इस तरह सोचने वाले नवजवान शायद अभी अल्पमत में हैं. फ़िल्म इसी दृष्टिकोण पर आधारित है. सवाल यह नहीं कि अभिशेख बच्चन जी कितने अच्छे हैं, बल्कि सवाल यह है कि रानी मुखर्जी को उनसे प्यार नहीं है.

फ़िल्म में शाहरुख खान द्वारा अभिनीत भाग बहुत अच्छा लगा. कम ही भारतीय सिनेमा में पुरुष को इतना हीन भावना से ग्रस्त और अपने आप में इतना असुरक्षित दिखाया है. इस तरह का पुरुष फ़िल्म का हीरो हो, यह तो मैंने कभी नहीं देखा. उसका हर किसी से गुस्सा करना, बात बात पर व्यँग करना, ताने मारना, छोटे बच्चे के साथ बुरी तरह से पेश आना, हीरो कम और खलनायक अधिक लगता है. यह तो फ़िल्म लेखक और निर्देशक की कुशलता है कि इसके बावजूद आप उससे नफरत नहीं करते पर उसके लिए मन में थोड़ी सी सुहानुभूति ही होती है. शाहरुख जैसे अभिनेता के लिए इस तरह का भाग स्वीकार करना साहस की बात है.

पर जिस पात्र से मुझे परेशानी हुई वह है अमिताभ बच्चन द्वारा निभाया अभिशेख के पिता का भाग. पैसे से खरीदी हुई, बेटी जैसी उम्र की युवतियों के साथ रात बिताने वाला यह पुरुष साथ ही बेटे और बहु के दर्द को समझने वाला समझदार पिता भी है, अच्छा दोस्त भी, मृत पत्नी को याद करने वाला भावुक पति भी. मैं यह नहीं कहता कि उम्र के साथ साथ बूढ़े होते व्यक्ति को सेक्स की चाह होना गलत है और कोई अन्य रास्ता न होने पर, उसका वेश्याओं के पास जाना भी समझ में आता है, पर समझ नहीं आता उसका पैसा दे कर पाई जवान लड़कियों को सबके सामने खुले आम जताना कि मैं अभी भी जवाँमर्द हूँ! क्या अगर यही बात स्त्री के रुप में दिखाई जाती तो क्या हम स्वीकार कर पाते? यानि अगर यह पात्र अभिशेख के विधुर पिता का नहीं विधवा माँ का होता, जो पैसे से हर रात नवयुवक खरीदती है, पर साथ ही अच्छी माँ, मृत पति को याद करने वाली स्त्री भी है, तो क्या स्वीकार कर पाते?

शायद फ़िल्म निर्देशक का सोचना है कि पुरुष तो हमेशा यूँ ही करते आयें हैं और फ़िल्म का काम सही गलत की बात करना नहीं, जैसा समाज है, वैसा दिखाना है?

***

कल्पना के सिनेमा विषय पर आलेखों की पूरी सूची