श्वास की मिठास सुनील दीपक, 23 अगस्त 2009

इस साल तो कोई भी अच्छी हिंदी फ़िल्म देखने को तरस गये. "न्यू योर्क" या "लव आज कल" जैसी नामी फ़िल्मों से भी उतना संतोष नहीं मिला. "संकट सिटी" और "कमीने" के बारे में अच्छा पढ़ा है पर देखने का मौका नहीं मिला. पर कुछ दिन पहले 2003 की बनी एक मराठी फ़िल्म देखी "श्वास" तब जा कर लगा कि हाँ कोई बढ़िया फ़िल्म देखी.

फ़िल्म को बनाया था संदीप सावंत ने और सीधी साधी सी कहानी है, कोई बड़े नामी अभिनेता या अभिनेत्री नहीं हैं, लेकिन फ़िल्म मन को छू गयी. कहानी है परशुराम (अश्विन छिताले) की, छोटा सा बच्चा जो अपनी उम्र के सभी बच्चों की तरह खेल कूद और शरारतों में मस्त रहता है, बस एक ही कठिनाई है कि बच्चे को कुछ दिनों से देखने में कुछ परेशानी हो रही है, जिससे न पढ़ लिख पाता है, न ठीक से खेल पाता है. परशु के पिता बस में कँडक्टर थे पर एक सड़क दुर्घटना से विकलाँग हो कर घर में रहते हैं, इसलिए परशु की चिंता उसके दादा जी केशवराम (अरुण नालावड़े) करते हैं. दादा जी ही परशु को ले कर पहले गाँव के डाक्टर के पास ले कर जाते हें जो उन्हें परशु को शहर के बड़े आँखों के डाक्टर के पास जाने की सलाह देता है.

दादा जी और परशु के मामा दिवाकर (गणेश मंजरेकर) बच्चे को ले कर पूना डा. साने (संदीप कुलकर्णी) के क्लीनिक में जाते हैं. साने जी अच्छे डाक्टर हैं पर बहुत व्यस्त हैं, उनके पास अपनी पत्नी, अपनी बेटी के लिए भी अधिक समय नहीं और गाँव से आये दादा जी, शहर के तेज भागते जीवन जिसमें लोगों के पास रुक कर प्यार से बोलने समझाने का समय नहीं, बेचारे परेशान से हो जाते हैं. डा साने उन्हें कहते हैं कि कुछ टेस्ट आदि करवाने होंगे और शहर में रुकना पड़ेगा. टेस्ट करवाने में भी खतरा हो सकता है यह जान कर दादा जी घबरा जाते हें तब उनकी मुलाकात सोशल वर्कर आशावरी (अम्रुता सुभाष) से होती है जो उन्हें धर्य से समझाती है और टेस्ट पूरे होते हैं.

टेस्ट से मालूम चलता है कि परशु की आँख में कैसर है. बीमारी अभी शुरु में ही है इसलिए अगर ओपरेशन किया जाये तो परशु बच सकता है पर उस ओपरेशन में वह अपनी दोनो आँखें खो देगा और अँधा हो जायेगा. दादा जी पहले रोते हैं, किसी अन्य डाक्टर की सलाह लेने की सोचते हैं, पर आशावरी की सलाह से मान जाते हैं कि ओपरेशन के अतिरिक्त कोई चारा नहीं. डा. साने का कहना है कि परशु को ओपरेशन से पहले बताना पड़ेगा कि वह ओपरेशन के बाद देख नहीं पायेगा, पर न दादा जी में हिम्मत है न आशावरी में कि इतनी बड़ी बात परशु को बता सकें. डा. साने भी हिचकिचाते हें कि कैसे यह बात बच्चे को कहे, पर परशु समझ गया है कि उसके दादा उसे देख कर क्यों रोते हैं, क्यो डाक्टर साहब उसे आँख बंद कर खेलने को कहते हैं.

परशु अस्पताल में भरती होता है पर अंतिम समय में किसी वजह से ओपरेशन नहीं हो पाता और उसके अगले दिन होने की बात होती है. वापस वार्ड में दादा जी परशु को ले कर अचानक गुम हो जाते हैं. वार्ड में सब परेशान हैं कि भरती हुआ मरीज कहाँ चला गया, किसकी लापरवाही से यह हुआ? आशावरी को चिंता है कि निराश दादा जी ने आत्महत्या न कर ली हो. अस्पताल में घूमने वाले पत्रकार टीवी चैनल इस बात को उछाल देते हैं कि अस्पताल लापरवाही से काम करता है और इसी लापरवाही से बच्चा और उसके दादा जी खो गये हैं. परेशान डा. साने पहले अस्पताल के अधिकारियों पर बिगड़ते हैं, फ़िर अपने सहयोगियों पर, पर पत्रकारों के प्रश्नों का उनके पास कोई उत्तर नहीं.

थके हारे डा. साने अस्पताल से बाहर निकलते हैं तो बाहर रंगबिरगी टोपी पहने दादा जी दिखते हैं, साथ में भोंपू बजाता खुश परशु. डाक्टर साहब बहुत बिगड़ते हैं, गुस्से से चिल्लाते हैं कि तुम जैसे जाहिल लोग कुछ अच्छा बुरा नहीं समझते, मैं तुम्हारे पोते का मुफ्त ओपरेशन कर रहा था और तुमने उसका यह जबाव दिया मुझे, जाओ ले जाओ अपने पोते को, मैं उसका ओपरेशन नहीं करुँगा.

दादा जी, डाँट खा कर पहले तो रुआँसे हो जाते हें फ़िर गुस्से से चिल्लाते हैं, आखिरी 24 घँटे थे मेरे परशु के पास इस रोशनी की दुनिया के, उन्हें क्या वार्ड के दुख भरे वातावरण में गुजारने देता? कौन सा संसार याद रहता परशु को, हमेशा के लिए अँधेरे में जाने के बाद?

फ़िल्म के सभी पात्रों का अभिनय बहुत बढ़िया है, विषेशकर दादा जी के भाग में केशव नालावड़े, परशु के भाग में अश्विन छिताले का और डाक्टर साने के भाग में संदीप कुलकर्णी का. हालाँकि फ़िल्म कम बजट में बनी है, पर गाँव वाले भाग का चित्रण बहुत सुंदर है. अस्पताल के दृश्य बिल्कुल असली लगते हैं.

आशावरी के भाग में अम्रुता सुभाष कुछ बनावटी लगती हैं पर मुझे अपने कार्य के सिलसिले में कई सोशल वर्कर को जानने का मौका मिला है, और मुझे लगता है पैशे से संवदेनापूर्ण होने की वजह से शायद उनके सुहानुभूती जताने के तरीके में, जाने अनजाने कुछ बनावटीपन सा आ जाता है, इसलिए वह भी बहुत असली लगीं.

हालाँकि फ़िल्म का विषय गम्भीर है पर उसमें न कोई अतिरंजना है, न बेकार की डायलागबाजी या रोना धोना. फ़िल्म के अंत में यही समझ आता है कि यह जीवन अँधा होने से रुक नहीं जाता, अँधा हो कर भी जीवन में कुछ बनने के, कुछ करने के, आत्मनिर्भर होने के रास्ते हैं. इस दृष्टी से फ़िल्म का वह छोटा सा हिस्सा जब दादा जी परशु को ले कर अँधे बच्चों के स्कूल जाते हैं, बहुत प्रभावशाली लगा.

अगर आप ने श्वास नहीं देखी और मौका मिले तो इसे अवश्य देखियेगा. फ़िल्म मराठी में है, पर चाहें तो इसकी डीवीडी में अंग्रेजी, हिंदी के अलावा भी कई भारतीय भाषाओं में सबटाईटल चुन सकते हैं. मुझे मराठी भाषा बहुत अच्छी लगती है पर पूरा नहीं समझ पाता, मैंने इसे हिंदी के सबटाईटल के साथ देखा. श्वास को 2003 की सबसे सर्वश्रैष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था और 2004 में यह भारत की ओर से ओस्कर पुरस्कार के लिए नामांकित की गयी थी.

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