सुश्री डा. अश्विनी भिडे देशपाँडे से बातचीत सुनील दीपक, बोलोनिया, इटली, 11 नवंबर 2008

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अश्विनी भिडे देशपाँडे जयपुर अतरौली के गायकी घराने के भारतीय शास्त्रीय संगीत की सुप्रसिद्ध कलाकार हैं. नामी गायिका होने के अतिरिक्त, अश्विनी जी ने माक्रोबायलोजी में मास्टर डिग्री और बायोकेमिस्ट्री विषय में पीएचडी भी हैं.

अश्विनी जी बोलोनिया विश्वविद्यालय के निमंत्रण तथा भारतीय सांस्कृतिक संवाद परिषद के सहयोग से गत नवंबर में बोलोनिया (इटली) Ashwini Bhide Deshpandey, well known classical singerआयीं थीं और यहाँ उन्होंने दो संगीत कार्यक्रम प्रस्तुत किये. इस यात्रा में उनके साथ थे तबले पर श्री विश्वनाथ शिरोधकर, हारमोनियम पर श्रीमति सीमा शिरोधकर और गायन में साथ थीं सुश्री साइला औक.

बोलोनिया में मुझे उनसे बात करने का मौका मिला उसी बातचीत के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत है.

सुनीलः अश्विनी जी, आप भारतीय शास्त्रीय संगीत की कलाकार हैं और साथ साथ आप ने विश्वविद्यालय में उच्च स्तर तक माईक्रोबायलोजी की शिक्षा ली और बायोकेमिस्ट्री में आप ने पीचडी किया है. इस तरह से विज्ञान और कला के दो दूर दूर दिखने वाले क्षेत्रों को आप ने मिलाया. क्या आप को इस बात में कोई विरोधाभास दिखता है जैसे कि कला और विज्ञान की भिन्न सोच को एक साथ जोड़ना?

अश्विनीः मेरे लिए यह दोनो जगत, संगीत और विज्ञान के जगत, एक साथ ही मेरे जीवन का हिस्सा हैं और मुझे यह दो भिन्न संसार कभी नहीं लगे. बल्कि मेरे लिए यह दोनो संसार हमेशा ही एक दूसरे के पूरक थे.

जिस घर में मैं पैदा हुई और पली बढ़ी, वहाँ मेरे घर वाले, मेरे माता पिता, मेरे दादा दादी, सभी लोग संगीत में दिलचस्पी रखते थे. मेरा संगीत ज्ञान बचपन में प्रारम्भ हुआ, यह सोच कर नहीं कि आगे चल कर इसे काम बनाना है. मुझे यही सिखाया गया था कि यह अच्छा है, यह हमारी परम्परा का हिस्सा है, तो तुम्हे इसे सीखना है, जब बड़ी हो जाओगी तब देखेंगे कि इसे अपना सकती हो या नहीं. तो मैंने संगीत को संगीत प्रेम की वजह से सीखा, इसमें छुपी संदरता के लिए और ज्ञान के लिए सीखा.

जहाँ तक मेरी पढ़ाई की बात है, मैं विद्यालय और उच्च शिक्षा स्तर पर अच्छी विद्यार्थी रही हूँ. यह सब बहुत प्राकृतिक तरीके से हुआ कि मैं विद्यालय की पढ़ाई पूरी करके कोलिज पढ़ने गयी. उस समय मेरा विचार था कि मैं अपने पिता (श्री गोविंद केशव भिडे) की तरह जो कि भौतिकी के वैज्ञानिक है, शुद्ध वैज्ञानिक शौध के क्षेत्र में काम करुँगी. चूँकि मैं भौतिकी के ज्ञान में उतनी पक्की नहीं थी इसलिए मैंने बायलोजी, माइक्रोबायलोजी और बायकेमेस्ट्री के विषयों में पढ़ाई की. पर इस शिक्षा के दौरान, मैं साथ साथ संगीत भी सीखती रही और इस तरह यह दोनो पहलू मेरे जीवन में सुंदरता से मिलते जुड़ते गये, जैसे कि मेरे माता पिता के जीवन में थे.

जैसे बच्चा स्कूल से घर आ कर स्कूल से मिला होम वर्क करता है, मैं भी अपना प्रतिदिन का रियाज़ करती थी, जो कि सारे छात्र जीवन में मेरे साथ रहा और जब मैंने पीएचडी की शिक्षा पूरी की तो मैंने सोचा कि संगीत को भी एक मौका देना चाहिये. मैं स्वयं देखना चाहती थी कि क्या मैं इस तरह से संतुष्ट हो सकती थी और यह संगीत का सिलसिला एक बार शुरु हुआ तो अब तक रुका नहीं हैं.

सुनीलः इस तरह से आप वैज्ञानिक भी हैं और संगीतकार भी, क्या आप को लगता है कि विज्ञान और संगीत की सोच भिन्न तरह की होती हैं और किस बात में भिन्न होती हैं?

अश्विनीः पहले तो मैं यह कहना चाहूँगी कि मैं अब वैज्ञानिक नहीं, केवल संगीतकार हूँ. पीएचडी पूरी करने के बाद मैंने विज्ञान को छोड़ दिया, उस पर पूर्ण विराम लगा दिया और तब से मैं दोबारा विज्ञान की दिशा में नहीं गयी. हाँ यह अवश्य है कि विज्ञान ने मुझे हर बात का विश्लेषण करके समझना सिखाया है जिसकी वजह से संगीत की ओर भी मैं तरीके से समझने का प्रयास करती हूँ.

सुनीलः एक अन्य साक्षात्कार में आप ने संगीत की परम्परा की सीमा में न बँधने की, और आसपास के पर्यावरण के प्रभाव से बदलने की बात की थी. आज के भूमण्डलीकरण के ज़माने में जिस तरह से संस्कृतियाँ बदल रही हैं, आप क्या सोचती हैं कि भारतीय संगीत पर बाहर के प्रभाव अच्छा हो रहा है या उसका बुरा असर हो रहा है?

अश्विनीः यह हम नहीं कह सकते कि असर अच्छा है या बुरा, यह तो समय ही बता सकता है कि वह अच्छा था या नहीं. लेकिन मेरा विश्वास है कि अपना भारतीय शास्त्रीय संगीत शक्तिशाली है. और मैं सोचती हूँ कि जब हम बदल रहे हैं, पिछले कुछ सालों में इतना कुछ बदल गया है, तो यह तो स्वभाविक ही है कि संगीत भी बदलेगा.

यह भी नहीं कह सकते कि आप का दिमाग खुला होना चाहिये ताकि बाहर का असर पड़े और आप कहें कि "मैंने खुले दिमाग से बाहर का Ashwini Bhide Deshpandey, well known classical singerअसर लिया". अगर आप खुले विचारों के नहीं हैं तो भी आप का संगीत बदलेगा, क्योंकि हम इस तरह का जीवन जी रहे हैं जिसमें चुनौतियाँ हैं. तो हम चाहें या न चाहें, बदलाव तो आयेगा ही, और अगर संगीत बदलेगा नहीं तो ठहर जायेगा, खुल कर नहीं बहेगा.

सुनीलः आप के परिवार में भी विज्ञान और संगीत के दोनो संसार हैं जो आपस में भिन्न हैं, तो आप के माता पिता ने किस तरह इन दोनो संसारों का समन्वय किया?

अश्विनीः मेरे पिता वैज्ञानिक हैं पर साथ साथ उन्हें संगीत में भी दिलचस्पी है, वह भी संगीत के विद्यार्थी रहे हैं.

मेरी माँ ने कभी विज्ञान नहीं पढ़ा, पर वह बहुत सख्त हैं और अनुशासन रखती हैं और उन्होंने ही मुझे संगीत को आत्मसात करने की प्रेरणा दी. वह मेरी गुरु हैं, शिक्षक हैं, मार्गदर्शक हैं और आज भी वह मुझे संगीत का मार्ग दिखाती हैं. मुझे उनके सौंदर्यबोध पर गहरा विश्वास है. सुंदरता क्या होती है इस पर मैं उनके विचारों को मानती हूँ, अगर वह मुझे कहें कि यह चीज़ या यह बात अच्छी है, सुंदर है, तो बिना किसी शक के मैं उसे मान लूँगी.

दूसरों में विश्वास करना भी मुझे मेरे माता पिता से मिला है.

वे दोनों, मेरी माँ और मेरे पिता, एक दूसरे को पूर्ण करते हैं. मेरे पिता ने मेरी संगीत शिक्षा में कभी कुछ नहीं कहा. जब मैं माँ से संगीत की शिक्षा लेती थी, तो उन्होंने अपने विचार मुझ पर कभी थापने की कोशिश नहीं की, हालाँकि उन्होंने भी संगीत पढ़ा है और संगीत की व्याकरण को समझते हैं. उन्होंने कभी मेरे संगीत में हस्ताक्षेप नहीं किया.

सुनीलः कितने भाई बहन हैं आप और क्या घर में अन्य लोगों ने भी संगीत को चुना?

अश्विनीः मेरे एक भाई हैं जो डाक्टर हैं और लंदन में रहते हैं. उनकी भी संगीत में रुची है, हमने बचपन में साथ ही संगीत की शिक्षा पायी है. उन्होंने सरोद बजाना सीखा, थोड़ा तबला और थोड़ा गायन भी जानते हैं. यह तो स्वाभाविक ही था क्योंकि घर में माँ और बहन दोनो ही संगीत से जुड़ी थीं, इस लिए वह संगीत को अच्छी तरह समझते हैं. वह बहुत संगीतप्रेमी हैं, मुझसे से भी अधिक संगीतमय हैं. अगर वह संगीत के क्षेत्र में रहते तो वह अभिनव संगीतकार होते, लेकिन उन्होंने संगीत नहीं चिकित्सा के क्षेत्र को चुना. वह साथ ही चिकित्सा शौध में रत हैं, वह एक व्यस्त और सफल डाक्टर हैं.

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