सुश्री डा. अश्विनी भिडे देशपाँडे से बातचीत (2) सुनील दीपक, बोलोनिया, इटली, 11 नवंबर 2008

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सुनीलः आप की माँ श्रीमति माणिक भिडे के समय में संगीत के क्षेत्र में होना आज के संगीत जगत से भिन्न था. मैंनें Mrs. Manid Bhideउनकी एक रिकार्डिंग देखी है पर उस समय पर शास्त्रीय संगीत के गायकों पर जिस तरह के दबाव और तनाव होते थे, वह आज के वातावरण से कितने भिन्न थे? (म्यूज़िक इंडिया के जालपृष्ठ पर श्रीमति मणिक भिडे का गायन पृष्ठ)

अश्विनीः मेरी माँ का कार्यक्षेत्र जनता के सामने का कलाकार का नहीं, बल्कि गणसरस्वती श्रीमति किशोरी आमोनकर की शिष्या के रूप में था. सोलह साल तक मेरी माँ ने अपने गुरु का उनकी सभी संगीत गोष्ठियों में साथ दिया. जहाँ उनकी गुरु जाती थीं वहाँ मेरी माँ भी जाती थीं, 1963 से ले कर 1980 के बीच में.

सुनीलः पर किशोरी जी की तरह उन्होंने कभी संगीत गोष्ठियाँ क्यों नहीं की, केवल अपने गुरु का साथ ही क्यों दिया?

अश्विनीः मेरे विचार में, मैं यह नहीं कह सकती कि मेरी समझ ही सत्य है, पर मुझे लगा कि इतने महान गुरु का शिष्य होना ही मेरी माँ का इतना समय ले लेता था कि उन्हें अपना रास्ता बनाने का, अपना कैरियर बनाने का मौका नहीं मिला.

सुनीलः यह बात तो बहुत दिलचस्प लगती है कि महान गुरु का होना बड़े बरगद के वृक्ष के नीचे होने जैसी बात हो.

अश्विनीः मैं यह नहीं कह रही, न ही यह कहना चाहती हूँ, न ही किसी तरह का आरोप लगाना चाहती हूँ. ऐसा हुआ बस. जैसा आपने कहा, वह समय भिन्न था और मेरी मां महत्वाकांक्षी नहीं थी. उन्होंने कभी नहीं कहा कि मैं अपना कैरियर चाहती हूँ, मैं अपना रास्ता बनाना चाहती हूँ. मुझे संगीत शिक्षा देने के बाद उन्होंने कई अन्य गायकों को संगीत शिक्षा दी है. इसलिए वह कलाकार नहीं बनी बल्कि शिष्य बनी, गुरु बनी.

सुनीलः शिष्य के रूप में और गुरु के रूप में वह काम करने वाली पारिवारिक नारी थीं. आज जब अपने बारे में सोचती हैं, जितना आप का नाम है, प्रसिद्धी है, क्या आप सोचती हैं कि आज काम करने वाली नारी होना आप की माँ के मुकाबले में अधिक कठिन है?

अश्विनीः बिल्कुल नहीं, आज का समय बदल गया है और मुझे मेरे परिवार का सहयोग मिला है. मानसिक रूप में और दिमागी रूप से मैं अपनी माँ के मुकाबले में अधिक स्वतंत्र हूँ.

सुनीलः आप का नाम जाना पहचाना है, प्रसिद्ध है, यूट्यूब पर आप की कई वीडियो हैं, क्या आप को प्रसिद्धी का दबाव लगता है?

अश्विनीः मुझे लगता है कि मुझ पर देवकृपा है, सब लोग, मेरे पति, मेरी बेटी, सब लोग बहुत सहयोग देते हैं, वह मुझे समझते हैं, मुझे पूरा सहारा देते हैं.

सुनीलः क्या आप की बेटी भी संगीत से जुड़ी हैं?

अश्विनीः मेरी बेटी ने शास्त्रीय नृत्य सीखा है पर काम के रूप में नहीं. वह इन्जीनियर की पढ़ायी कर रही है.

सुनीलः मुझे लगता है कि जब विज्ञान, चिकित्सा, इन्जीनियरिंग जैसे विषय पढ़ने वाले लोग जब सृजनात्मक क्षेत्र में भी जुड़ते हैं तो उनका व्यक्तित्व पूर्ण हो जाता है, इससे जीवन की दोनो दिशाओं में सृजनात्मकता को विकसित होने का मौका मिलता है.

क्या आप ने नमिता देवीदयाल की "द म्यूजिक रूम" किताब पढ़ी है और उसमें वर्णित अनुभवों की, अपने संगीत अनुभव से किस तरह तुलना करती हैं?

अश्विनीः हाँ मैंने वह किताब पढ़ी है पर इसमें वर्णित अनुभव मेरे गुरुओं के अनुभवों से भिन्न हैं क्योंकि मेरी माँ ही मेरी गुरु बनी. इस बात की मुझे बहुत छूट मिली कि मेरी माँ ही मेरी गुरु थीं. गुरु की बेटी होने में दोनो ही बातें थीं, लाभ भी और नुकसान भी. लाभ यह था कि मेरी गुरु हर समय मेरे पास थीं और मैं जब चाहूँ उनसे पूछ, समझ और सीख सकती थी. एक अन्य फायदा था कि मुझे अपने गुरु से कुछ Book by Dr Ashwini Bhide dedicated to her motherभी पूछने की स्वतंत्रता थी, चाहे वह बेमतलब की बात क्यों न हो. अगर वह मेरी माँ न होती तो मैं उनसे इस तरह के प्रश्न पूछने से पहले सौ बार सोचती.

नुकसान यह था कि मैं उनकी बेटी थी और मुझे वह किसी भी समय छोड़ती नहीं थी. जैसा मैंने कहा कि वह कड़ा अनुशासन रखती थीं. जैसे कि वह कहतीं कि "कुछ नहीं, तुम्हें नींद आ रही है, जाओ मुँह धो कर आओ. मेरे सामने बैठ कर उबासियाँ नहीं लो." इस तरह की बातें वह अगर मैं उनकी बेटी न होती तो वह नहीं कह सकती थीं.

सुनीलः तो क्या आप भी किशोरावस्था में बगावत के दौर से गुजरी?

अश्विनीः हाँ.

सुनीलः अच्छा मैंने आप का एक साक्षात्कार पढ़ा था जिसमें आप ने आकाशवाणी की एक प्रतियोगिता की बात की थी, जिसने आप ने संगीत को देखने की दृष्टि को बदल दिया था.

अश्विनीः हाँ यह वही समय था जब मैंने अपनी माँ से संगीत सीखना प्रारम्भ किया था. यह तो एक संजोग सा था. वह तो हमेशा घर पर होती थीं और मैंने कभी उनका ध्यान नहीं किया था, और उन्होंने भी मेरी तरफ़ उस तरह का संगीत सिखाने वाला ध्यान नहीं दिया था. तब पंडित नारायण राव दातार जी थे जो हमें संगीत सिखाने आते थे, वह घर पर हम सब को संगीत सिखाते थे, मेरी दादी से ले कर घर के सब लोगों को.

जब यह बात हुई तो मैं बीमारी की वजह से अपने आप को संगीत प्रतियोगिता के लिए तैयार नहीं कर पायी थी. मुझे टाईफाईड हुआ था और Dr Ashwini Bhideएक बार हो कर वह दोबारा रिलेप्स हो गया, तो मैं बहुत कमज़ोर हो गयी थी. मैंने कहा कि मैं प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं लूँगी. तब माँ ने कहा कि क्यों, कौन सी कमी है, मैं देखूँगी कि कैसे तुम प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सकती? बस उन्होंने मेरी बागडोर संभाल ली, बोलीं कि मैं तुम्हें प्रतियोगिता के लिए तैयार करवाऊँगी, देखेंगे कि क्या होता है.

तो उन्होंने मुझे लड़ने की शक्ति भी दी और प्रतियोगिता के लिए तैयार करवाया. डेड़ माह तक मैंने उनसे सीखा, कड़ी शिक्षा थी और उन्होंने मेरी संगीत को देखने की दृष्टि को बदल दिया. तब तक मैं इम्तहान देने के लिए संगीत सीखती थी. तब मैं सगीत विषारद की डिग्री ले चुकी थी, मुझे कई राग आते थे, एक जैसे लगने वाले रागों में क्या अंतर होता है यह मैं जानती थी. मैं सोचती थी कि मुझे संगीत के बारे में बहुत ज्ञान है. जब उनसे संगीत सीखने लगी तो समझ में आया कि ज्ञान तो संगीत का केवल एक हिस्सा है.

उन्होंने मेरे सामने संगीत की गायकी कला की दुनिया की समझ को स्पष्ट कर दिया, जयपुर अतरौली घरानेदार गायकी की समझ को. यह समझ मुझे उनसे ही आयी, लगा मानो अलीबाबा की गुफ़ा खोल दी हो मेरे लिए. तब असली संगीत की शिक्षा शुरु हुई मेरी जो सारा जीवन चली और मैंने घरानेदार गायकी को आत्मसार किया. वह बहुत कड़ी और अनुशासन वाली शिक्षिका हैं.

पिछले दस सालों में मैंने पंडित रत्नाकर पाई से गुरुशिक्षा पायी है. वह जयपुर अतरौली घराने के पुराने और माने हुए कलकार हैं जो भूली हुई बंदिशों और रागों का खजाना हैं जो हमारे घराने के विशिष्ठ थे. जैसे कि वह अनवत या अच्छोप जैसे राग गाते हैं तो श्रोता सोचते रह जाते हैं.

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