सुश्री डा. अश्विनी भिडे देशपाँडे से बातचीत (3) सुनील दीपक, बोलोनिया, इटली, 11 नवंबर 2008

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सुनीलः आप की माँ का आप की बेटी से कैसा सम्बंध है, क्या उन्होंने आप की बेटी, यानि अपनी नाती को भी संगीत सिखाया?

अश्विनीः नहीं, कभी कभी हो जाता है. मेरी बेटी भी संगीतमय है, उसे कुछ भी दोहराने के लिए कहिये तो वह दोहरा सकती है. इस तरह वह अपनी नानी के साथ बैठती है पर वह ठीक से शिक्षा लेने वाली बात नहीं.

सुनीलः शायद बच्चों के साथ यह दिक्कत होती है कि वह अपने माता पिता या घर वालों को रिश्ते की नजर से Ashwini Bhide Deshpandeyही देखते हैं, उन्हें व्यक्ति की दृष्टि से नहीं देख पाते?

अश्विनीः मेरी माँ और मेरे साथ इस तरह हुआ कि मुझे संगीत सिखाने लगीं तो उन्होंने अपने अंदर के शिक्षक को पहचाना. तब तक वह बस अपनी गुरु के शिष्य ही थीं, मुझे संगीत सिखाने लगीं तो उन्हें समझ में आया कि वह अच्छा सिखा सकती हैं. इस तरह उन्होंने अपने अंदर छिपे शिक्षक और गुरु को पहचाना. मेरे बाद उन्होंने बहुत से अन्य लोगों को अच्छा संगीत सिखाया.

सुनीलः आप ने संगीत को कैरियर के रूप में कब चुना?

अश्विनीः बहुत बाद में, जब मैं अपनी पीएचडी पूरी कर चुकी तब. उस समय मैं कंसर्ट देने लगी थी. पर जब तक मैंने पीएचडी पूरी नहीं की तब तक मैंने संगीत को जीवन में दूसरा स्थान दिया था. उस समय मेरा विवाह भी हो चुका था. मुझे याद है कि मैंने अपने पति (श्री राजेंद्र देशपाँडे) से कहा कि देखो मैंने जीवन में कभी संगीत को सबसे अधिक महत्व नहीं दिया लेकिन मैं पीएचडी पूरी होने के बाद एक साल तक संगीत को सबसे अधिक महत्व देने की कोशिश करना चाहती हूँ, क्या तुम इसे मानोगे, क्या तुम्हारे लिए यह ठीक है और उन्होंने कहा कि हाँ.

तो इस तरह मैंने संगीत के लिए, एक साल के लिए विज्ञान जो छोड़ा और उसके बाद वापस विज्ञान की ओर लौट कर नहीं गयी. मैं सोचती हूँ कि अपने आप में अपने रास्ते पर चलने की शक्ति होनी चाहिये, अगर मैं यह पाती कि मुझमें अपना रास्ता बनाने की शक्ति नहीं तो वापस विज्ञान की ओर लौट जाती. मुझे अपना रास्ता बनाने के लिए एक साल मिला था. यह 1990 की बात है. उस दिन को अठारह साल हो गये और तबसे मैं उसी रास्ते पर चल रही हूँ.

सुनीलः क्या आप अपने पति से उस दिन के अपने निर्णय के बारे में बात करती हैं? और अगर आप को दोबारा चुनने का मौका मिले तो क्या आप संगीत को ही चुनेंगी?

अश्विनीः नहीं दोबारा उस बारे में कभी बात करने का मौका नहीं मिला. जैसे मैंने कहा, मुझे लगता है कि मुझ पर देवकृपा है. मैं यह नहीं कह रही कि मेरे पास कंसर्ट या नाम या सफलता की देवकृपा है, पर मैं अपना रास्ता देख सकती हूँ, अपना रास्ता बना सकती हूँ, मैं देख सकती हूँ कि कहाँ जा रही हूँ और मुझे इसे करने में आनंद मिलता है.

सुनीलः अच्छा क्या आप को अपने संगीत में कोई आध्यात्मित अर्थ मिलता है?

अश्विनीः मैं आध्यित्मक नहीं हूँ, हालाँकि मुझे मालूम है कि लोग संगीत को आत्मिक रूप में देखते हैं. पर मुझे संगीत Ashwini Bhide Deshpandeyसे शाँति मिलती है, इससे ध्यान और मनन का मार्ग मिलता है और इससे मुझे आनंद मिलता है. मुझे धर्म कर्म की बातों में दिलचस्पी नहीं, न ही मेरे कोई आध्यात्मिक गुरु हैं, न ही मैं उस तरह की किताबें पढ़ती हूँ.

सुनीलः यह अवश्य है कि जब आप को गाते हुए देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि उससे आप को बहुत आनंद मिल रहा है. अच्छा क्या हम आप की किताब के बारे में बात कर सकते हैं?

अश्विनीः (अपनी पुस्तक "रागरचनाँजलि" दिखाते हुए - राजहँस प्रकाशन, दूसरा संस्करण 2005, पहला संस्करण 2004) यह तो नहीं कह सकते कि मैंने यह पुस्तक "लिखी" है, इसमें मेरी संगीत रचनाँए हैं. इस पुस्तक को पंडित रविशंकर जी ने आशिर्वाद दिया है और यह पुस्तक मेरी माँ को अर्पित है, इस पुस्तक में, जब इसके पहले संस्करण का विमोचन हुआ था, उसकी तस्वीरें भी हैं, यह विमोचन गणसरस्वती श्रीमति किशोरी आमोनकर जी ने किया था. इसमें एक सीडी भी है जिससे लोग उन रचनाओं को सुन भी सकते हैं.

सुनीलः अच्छा संगीत के अलावा अपनी रुचियों के बारे में बताईये. आप को कौन सी पुस्तकें अच्छी लगती हैं?

अश्विनीः मुझे पढ़ना अच्छा लगता है, जीवनियाँ पढ़ना अच्छा लगता है. मेरी अँग्रेजी की किताबों की पढ़ने की गति धीमी Ashwini Bhide Deshpandeyहै, पर मैं मराठी साहित्य बहुत रुचि से पढ़ती हूँ. मुझे लिखना भी अच्छा लगता है. मैंने एक वैज्ञानिक लेख लिखा है जो मैं साथ लायी हूँ, जिसमें मैंने संगीत और विज्ञान की बात की है, संगीत में छुपा विज्ञान और संगीत का विज्ञान. यह मराठी विज्ञान परिषद की पत्रिका में छपा है और मराठी में है तथा संगीत के विज्ञान के बारे में है.

इसमें मैंने श्रुतियों की बात की है, श्रुतियाँ ही हैं जिनसे भारतीय संगीत दुनियाँ के अन्य सभी संगीतों से भिन्न हो जाता है. श्रुति यानि सुरों के बीच स्तरों का सम्बंध. जैसे कि षड़ज पंचम संवाद, यानि कि सा से पा में 2 से 3 का रिश्ता है, यानि कि पा सा से 1.5 गुणा ऊपर है. तो अगर मैं षड़ज पंचम संवाद बना रही हूँ जो सबसे सामान्य संवाद है, तो राग में आप को इस अंतर का ध्यान रखना पड़ेगा. जैसे कि ऋषभ का प्राकृतिक संवाद धैवत है, क्योंकि इन दो सुरों के बीच में षड़ज पंचम संवाद है. अगर किसी राग में ऋषभ कोमल है तो धैवत को भी कोमल होना चाहिये ताकि षड़ज पंचम संवाद बना रहे. जैसे राग श्री की श्रुति में कोमल ऋषभ स्वर थोड़ा नीचे होता है तो कोमल धैवत भी श्रुति में नीचा होगा. इस संवाद को बना कर रखना भारतीय संगीत में बहुत आवश्यक है.

मैंने एक आलेख में तानपूरे संगीत के विज्ञान की बात भी की है और इसे समझने की कोशिश की है कि क्यों तानपूरा भारतीय शास्त्रीय संगीत का इतना महत्वपूर्ण और अभिन्न अंग है. तानपूरे के संगीत में सुरसागर है और मैंने उसके इस रूप के बारे में लिखा है.

सुनीलः तानपूरा तो मुझे भी बजाना आता है क्योंकि यह इतना आसान है.

अश्विनीः लेकिन क्या आप ने कभी तानपूरे को सुना है?

सुनीलः शायद नहीं, लगता है कि तानपूरे का अपना कोई महत्व नहीं.

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