सुश्री डा. अश्विनी भिडे देशपाँडे से बातचीत (4) सुनील दीपक, बोलोनिया, इटली, 11 नवंबर 2008

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अश्विनीः इसीलिए मैंने इस बारे में लिखा है. मुझे ऐसी किताबें पढ़ना भी अच्छा लगता है जिनसे प्रेरणा मिले, जैसे मुझे जीवनियाँ पढ़ना अच्छा लगता है.

सुनीलः और कौन सी जीवनियाँ आप को सबसे अधिक अच्छी लगीं?

अश्विनीः सबसे अधिक मुझे मेडम मेरी क्यूरी की जीवनी लगी जो उनकी बेटी ने लिखी थी. उनकी एक बेटी वैज्ञानिक थी जिसे भी नोबल पुरस्कार मिला, यह जीवनी उनकी दूसरी पुत्री ईव क्यूरी ने लिखी. इसका मूल रूप अँग्रेजी में नहीं था लेकिन मैंने इस किताब का अँग्रेजी अनुवाद पढ़ा जो मुझे बहुत अच्छा लगा. मुझे चार्ली चेपलिन की जीवनी भी बहुत अच्छी लगी.

मुझे पुराने ज़माने के संत कवियों को पढ़ना भी बहुत अच्छा लगता है, जैसे कबीर, सूरदास, मीराबाई. यह किताबें मैं अपने पास रखती हूँ और बार बार पढ़ती हूँ. मैं कविताओं को भी गद्य की तरह पढ़ती हूँ और कई बार पढ़ते पढ़ते मेरे मन में एक धुन आ जाती है. जितनी बार इन कवियों को पढ़ती हूँ, उतनी बार उनके नये अर्थ मिलते हैं, नयी दिशाँए मिलती हैं.

पहली बार जब मैंने सूरदास पढ़ा जब मुझे उनकी सूरसागर नाम की किताब मिली जिसमें नौ सौ से अधिक कविताँए हैं. मैंने यह किताब एक बार पढ़नी शुरु की तो पूरी पढ़ कर रुकी, तीन दिनों में नौ सौ कविताँए पढ़ी. मैं उसमें खो सी गयी, लगा किसी अन्य दुनिया में हूँ, जैसी किसी और दुनिया में उड़ गयी हूँ. उसके बाद उन कविताओं को मैंने धीमे धीमे पढ़ना शुरु किया और दो साल तक सूरदास को बार बार पढ़ती रही. मैंने उनके कुछ भजनों की धुन बनायी है जिनकी एल्बम बनेगी पर यह काम अभी पूरा नहीं हुआ.

तो मैं सूरदास पढ़ती रहती हूँ, मुझे कबीर और मीरा पढ़ना अच्छा लगता है, तुकाराम और ज्ञानेश्वर पढ़ना अच्छा लगता है. कविताओं से केवल कवि की सोच ही नहीं बल्कि उसके समय के सामान्य जीवन के बारे में जानकारी मिलती है, कि कैसा जीवन बिताया होगा. इससे मुझे बहुत प्रेरणा मिलती है. आजकल मैं रामायण भी पढ़ रही हूं.

सुनीलः धन्यवाद अश्विनी जी कि आप ने इतना समय इस साक्षात्कार को दिया.

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