किताबें पढ़ने वाली औरतें सुनील दीपक, 8 अक्टूबर 2008

आशा पूर्णा देवी के उपन्यास सुवर्णलता की नायका सुवर्ण अच्छी औरत नहीं. सब गलत मलत काम करती है. जब सबके सामने नहीं कर सकती तो छुप कर करती है. समाज में रहना नहीं जानती, उसके नियम नहीं समझती, जब कुछ नहीं मानना चाहती तो उसे चुप रहना नहीं आता. बार बार मार खा कर फ़िर अपनी इच्छा बताने नहीं घबराती. खुला आसमान, बारामदा, खिड़की, सीढ़ियाँ, समुद्र, किताबें, घर से बाहर दुनिया में क्या हो रहा है इसके बारे में जानना सोचना, सब उसकी इच्छाएँ हैं जिनको नहीं स्वीकारा जा सकता, क्योंकि यह सब बातें अच्छे घर की औरतों को शोभा नहीं देती. (सुवर्णलता, आशापूर्णा देवी, अनुवादक हंसकुमार तिवारी, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, 2001):

"यह नाटक, उपन्यास पढ़ना बंद कराना ज़रुरी है. उसी से सारा अनर्थ घर में आता है."

इसलिए प्रबोध ने स्त्री को काली माई की, अपनी कसम दी है. रात की निश्चिंत्ता में समझाया था कि उपन्यास पढ़ने में क्या क्या बुराईयाँ हैं.

किन्तु बेहया सुवर्ण उस भयंकर घड़ी में भी एक अदभुत बात बोल बैठी थी. कहा था, "ठीक है, तो तुम भी एक कसम खाओ."

"मैं? मैं किस लिए कसम खाऊँ? मैं क्या चोरी में पकड़ा गया हूँ?"

"नहीं तुम क्यों पकड़े जाओगे, चोरी में तो स्त्रियाँ ही पकड़ी गयी हैं? क्यों, बता सकते हो क्यों?"

"क्यों? यह क्या बात हुई?" इसके अलावा प्रबोध को उत्तर नहीं जुटा.

सुवर्ण नें झट प्रबोध का हाथ सोये हुए भानू के सिर से छुआ कर कहा, "तो तुम भी कसम खाओ कि अब ताश नहीं खेलोगे?"

"ताश नहीं खेलूँगा? मतलब?"

"मतलब कुछ नहीं, मेरा नशा है किताब पढ़ना, तुम्हारा नशा है ताश खेलना. यदि मुझे छोड़ना पड़े, तो तुम भी देखो, नशा छोड़ना क्या होता है? बोलो, अब कभी ताश नहीं खेलोगे?"

प्रबोध के सामने आसन्न रात.

और बहुतेरी लांछनाओं से जर्जर स्त्री के बारे में काँपते कलेजे का आतंक.

कौन कह सकता है, फ़िर कौन सा घिनौना कर बैठे.

फ़िर भी साहस बटोर कर बोल उठा, "खूब, मूढ़ी-मिसरी का एक ही भाव!"

सुवर्णलता तीखे स्वर में बोल उठी थी, "कौन मूढ़ी है कौन मिसरी, इसका हिसाब किसने किया था, उसकी दर ही किस विधाता ने तय की थी, यह बता सकते हो?"

गजब है, इतनी लानत मलामत से भी औरत दबती नहीं. उलटे कहती है, "बल्कि यह सोचो कि शर्म आनी चाहिये तुम लोगों को."

लाचार प्रबोध ने कह दिया था, "ठीक है बाबा, ठीक है. खाता हूँ कसम."

"अब कभी नहीं खेलोगे न?"

"नहीं खेलूँगा. हो गया? खैर मेरा तो हुआ, अब तुम्हारी प्रतिज्ञा?"

"कह तो दिया, तुम अगर ताश न खेलो तो मैं भी किताब नहीं पढ़ूँगी"

एक पश्चिमी चित्रकला की किताब देखी जिसका विषय था, "किताबें पढ़ने वाली लड़कियाँ" तो सुवर्णलता की याद आ गयी. इस किताब में विभिन्न पश्चिमी चित्रकारों के इस विषय पर बनी तस्वीरें थीं और उनके संदर्भ का विश्लेषण था.

पश्चिमी समाज में भी पहले यही सोचा जाता था कि पढ़ना लिखना औरतों को बिगाड़ देता है और यह तस्वीरें इस बात को समझने में सहायता करती हैं कि क्यों पृतसत्तीय समाज को इससे क्या खतरा था और क्यों पृतसत्तीय समाज आज भी स्त्री को घर में रखने, बाहर न निकलने, परदा करने, कहानी उपन्यास न पढ़ने की बात करते हैं. किताबों की होली जलाने वाले अफगानी तलिबान इसका हिंसक और कट्टर रूप दिखते हैं. पाराम्परिक भारतीय समाज में भी यह धारणा थी कि पढ़ी लिखी लड़की, घर से बाहर निकल जाती है, उसका चरित्र ठीक नहीं रहता, वह पराये मर्दों से बात और सम्बंध रखने लगती है, वह घर की रीति मर्यादा को भूल जाती है. आज इस तरह की सोच में छोटे बड़े शहरों में कुछ बदलाव आया है पर फ़िर भी इसे आर्थिक मजबूरी के रूप में अधिक देखा जाता है, वाँछनीय विकास के रूप में कम.

किताब पढ़ने वाली स्त्रियों के विषय पर कुछ प्रसिद्ध चित्रकारों की कृतियाँ प्रस्तुत हैं -

पहली कृति है जगप्रसिद्ध इतालवी चित्रकार और शिल्पकार माईकल एँजेलो की जो रोम में वेटीकेन में सिस्टीन चेपल में बनी है. माईकल एँजेलो की कृति मोनालिजा को सब पहचानते हैं. सिस्टीन चेपल के बारे में सोचिये तो भगवान की ओर बढ़ती मानव उँगली के दृश्य को अधिकतर लोग जानते हैं पर इसी कृति का एक अन्य भाग है जिसमें बनी है सिबिल्ला की कहानी. भविष्य देखने वाली सिबिल्ला को भगवान से एक हजार वर्ष तक जीने का वरदान मिला था पर यह वरदान माँगते समय वह चिरयौवन की बात कहना भूल गयी इसलिए उसकी कहानी वृद्धावस्था के दुखों की कहानी है. इस चित्र में सिबिल्ला को बूढ़ी लेकिन हट्टा कट्टा दिखाया गया है जबकि उसकी भविष्य देखने वाली किताब के पन्नों पर कुछ नहीं लिखा.

यह चित्र 1510 में बनाया गया था जब किताबें आसानी से नहीं मिलती थीं और चित्रों में अधिकतर बाईबल की किताब ही दिखती थी.

Women, books and art

दूसरी कृति है हालैंड के चित्रकार जेकब ओख्टरवेल्ट की जो उन्होंने 1670 में बनायी थी. उस समय हालैंड दुनिया के सबसे साक्षर देशों में से था, स्त्री और पुरुष दोनो ने ही पढ़ना लिखना सीखा था. किताबे पढ़ने के अतिरिक्त चिट्ठी लिखने का चलन हो रहा है. इस चित्र में उस समय के संचार के तीन माध्यमों को दिखाया गया - बात चीत, पुस्तक और पत्र. नवयुवक युवती को अपने प्रेम का निवेदन कर रहा है और नवयुवती किताब पढ़ने का नाटक कर रही है. यही प्रेम संदेश मेज पर रखे पत्र में भी है.

आप का क्या विचार है कि क्या वह नवयुवती इस प्रेम निवेदन को स्वीकार करेगी? यही चित्रकार की दक्षता है कि वह चेहरे के भावों को इतनी बारीकी से पकड़ता है कि बिना कुछ कहे ही हम बात समझ जाते हैं.

Women, books and art

तीसरी कृति भी हालैंड से ही है, चित्रकार पीटर जानसेन एलिंगा की जो कि 1670 के आसपास की है. इस कृति की नायिका घर में काम करने वाली नौकरानी है. शायद वह मालकिन के कमरे में सफाई करने आयी थी. मालकिन के जूते एक तरफ़ बिखरे पड़े हैं. फ़ल की प्लेट को जल्दबाजी में कुर्सी पर रखा गया है. खिड़की से आती रोशनी के पास कुर्सी खींच कर पाठिका प्रेमकथा पढ़ने में मग्न है.

Women, books and art

इस कृति से समझ में आने लगता है कि क्यों पृतसत्तीय समाज को स्त्रियों का किताबें पढ़ना ठीक नहीं लगा था. किताबों की दुनिया स्त्रियों को बाहर निकलने का रास्ता दिखाती थीं, उन्हें अपना कल्पना का संसार बनाने का मौका मिल जाता था जो समाज के बँधनों से मुक्त था, उनमें अपना सोचने समझने की बात आने लगती थी.

इसी मुक्त व्यक्तिगत संसार की सृष्टि वाली बात को चौथी और अंतिम चित्र दिखाता है. कृति है हालैंड के जगप्रसिद्ध चित्रकार विन्सेंट वान गोग की जो 1888 में बनायी गयी. इसमें किताब पढ़ने वाली स्त्री की दृष्टि किताब पर नहीं, बल्कि सोच में डूबी है, शायद उसने कुछ ऐसा पढ़ा जिसने उसे सोचने को मजबूर किया?

Women, books and art

भारत में लड़कियों, स्त्रियों की दशा तो दुनिया में सबके सामने है. एक तरफ़ नेता, अभिनेता, लेखक, वैज्ञानिक, अधिकारों के लिए लड़ने वाली आधुनिक युग की चुनौतियों को स्वीकारती. दूसरी ओर अनपढ़, कमजोर, जो जन्म से पहले ही मार दी जाती है, जिसे बोझ समझा जाता है, जिसका विवाह करना ही सबसे बड़ा धर्म है, जो दहेज के लिए जला दी जाती है. स्त्री साक्षरता को बढ़ाना इसके लिए बहुत आवश्यक है. मेरे विचार में आज विकास के रास्ते पर चले भारत की यही सबसे बड़ी आवश्यकता है. आर्थिक विकास के बावजूद पिछले वर्षों में भारत के सम्पन्न राज्यों में पैदा होने वाले बच्चों में लड़कियों का अनुपात बढ़ने के बजाय और घटा है. इन आकणों को देखा जाये तो अनुमान लगा सकते हैं कि हर वर्ष भारत में करीब दस से पंद्रह लाख बच्चियों को गर्भपात के जरिये से जन्म लेने से पहले मार दिया जाता है.

दुनिया के देशों में अगर देखा जाये कि सरकारें स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए देश की आय का कितना प्रतिशत लगाती है तो भारत सबसे पीछे दिखता है, बहुत सारे अफ्रीकी देशों से भी पीछे. जब तक यह नहीं बदलेगा, भारत सच में विकसित देश नहीं बन पायेगा.

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