अर्चना वर्मा अर्चना वर्मा की कविताएँ

दर्शक दीर्घा में नया साल

1 जनवरी 2014

चक्कर मेँ चलती है धरती

शुरू को आखिर में

आखिर को शुरू में लपेटती

सपने मेँ किसी ने देखा था साँप

अपनी पूँछ को निगलता हुआ

और यूँ शून्य का जन्म हुआ

या शायद ग़लत मुझे याद है कहानी

थी तो किसी सृजन की

पर शून्य के जन्म की नहीं

कोई और था सवाल

उसके समाधान मेँ शून्य की ज़रूरत थी

सपना जिसने देखा, समाधान ढूँढा था

दर्ज है कहीं उस वैज्ञानिक का नाम भी

मुझको मालूम नहीं

माफ़ है मुझे,

मैं विज्ञान की छात्रा नहीं।

बात तो यह थी कि

चक्कर में चलती है धरती

चक्कर की नाप का निशान

जहाँ भी लगा लो वही से शुरू

आज भी शुरू का निशान वही

नया वर्ष

यह केवल दो हजार चौदहवाँ चक्कर

नहीं पृथ्वी का शुरू जो आज

नाप के निशान के जन्म का दिन है।

तो अगले चक्कर पर चलो निकलें

सरगर्मी चालू भविष्य अन्तरिक्ष में

पृथ्वी प्रतीक्षा मेँ आकुल भविष्य को

लोक कर वर्तमान गढ़ने को।

अगला चक्कर है,

साल नया अपना अपना

सबको गढ़ना है, काल की माटी ले हाथों में

अगले भविष्य मेँ बढ़ना है।

नये सृजन का नया साल सबको शुभ हो।

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