अर्चना वर्मा अर्चना वर्मा का लेखन

पढ़ना प्रेमचंद को बार बार : पहली बार की तरह

हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी के लिये प्रेमचंद का पहला पाठ स्कूल की किसी कक्षा में हो चुकता है, उस कक्षा के मानसिक स्तर के अनुरूप। बचपन में 'दो बैलों की कथा' या 'एक कुत्ते की कहानी', थोड़ा बड़े होने के बाद 'बड़े भाई साहब', या 'नशा', और भी बाद में 'कफ़न'। ज़रूरी नहीँ कि इसी क्रम में। पढ़ने का क्रम कोई और भी हो सकता है, समझने का क्रम लेकिन कमोबेश यही होता है। उनके उपन्यासों के साथ रिश्ता अधिक समगति होता है। बचपन में उन्हें पढ़ना मुश्कि्ल है, वे हैं ही आकार मेँ इतने भारी भरकम और बचपन की अधीरता उन्हें पूरा करने नहीं देती। बाद में आप उनमें कुछ अधिक और अतिरिक्त भी पढ़ना संभव पाते हैँ। प्रेमचंद उम्र के हर मोड़ पर एक लम्बे वक्त तक आपके साथ रहते हैं। फिर अगर व्यवसाय की तरह आप हिन्दी साहित्य का अध्यापन करते हों तो प्रेमचंद से छुट्टी आपको नहीं मिलने वाली। लेकिन बहुत दिनों तक प्रेमचंद को इस भ्रम की तरह पढ़ा जाता रहता है कि आपने उन्हें पहली बार में ही पूरा पढ़ लिया है, कि अब आविष्कार के लिये कुछ भी बाकी नहीं। शायद इसी अतिशय प्रत्यक्षता की वजह से कई बार उनकी लिखन्त में आँखों के ठीक सामने मौजूद वे अर्थ और संकेत भी अनदेखे रह जाते हैँ जिनको पकड़ पाने के बाद कई बार उनको पहली बार पढ़ रहे होने का अनुभव फिर फिर होता है।

प्रेमचंद जैसे कथाकार के संदर्भ में शत प्रतिशत निश्चय के साथ यह कहा जा सकता है कि उनके रचनासंसार और उनके वास्तविक परिवेश और रचना के बीच का कलात्मक फ़ासला न्यूनतम है। कलात्मक फ़ासला यानी वह रास्ता या दूरी जो रचना के रूप में ढलने के लिये वास्तविक अनुभव को तय करना पड़ता है। प्रेमचंद का अपना समय उनकी रचना में समूचा मौजूद है। 'समूचा' यहा एक कामचलाऊ विशेषण की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। कहने का मतलब यह कि अगर हम घटनास्थल विषयवस्तु, चरित्र या शोधार्थियों के प्रिय चौखटे 'समस्या' के हिसाब से प्रेमचंद के लेखन को सूचीबद्ध करने बैठें तो विस्तार अनन्त न भी हो तो खासा लम्बा चौड़ा तो होगा ही और फिर भी कुछ न कुछ छूट गये होने की संभावना बनी रहेगी। गाँव-कस्बा हो या शहर, जाति-जाति का, हर वर्ग का, तरह तरह के मानसिक स्तर का, भाँति भाँति का पात्र यहाँ मौजूद मिलेगा और तात्कालिक संदर्भों में दर्ज करने योग्य हर समस्या व उसका सामना करता कोई न कोई पात्र भी किसी न किसी कहानी में दाखिल किया ही गया होगा। साहित्य के लिये तय भूमिकाओं मेँ से एक है अपने समय का दस्तावेज होना और कहने की ज़रूरत नहीं कि प्रेमचंद इस भूमिका के सर्वाधिक सजग और कुशल निर्वाहकों में से एक हैँ। यहाँ तक कि उस समय के समाचारपत्रों की सुर्खियों में भी प्रेमचंद की ढेरों कहानियों के विषय मौजूद मिलेंगे।

लेकिन आगे बढ़ने के पहले यहाँ तर्कशृंखला की कड़ियाँ दुरुस्त रखने के लिये मैँ एक स्वतःप्रत्यक्ष स्वयंप्रमाण बात को पुनः रेखांकित करना चाहूँगी। हर रचनाकार की तरह प्रेमचंद के रचनासंसार में भी समय केवल स्वयं समय नहीं है। हो भी नहीं सकता। वह प्रेमचंद द्वारा देखा और लिखा गया समय है। वह उनके परिप्रेक्ष्य और मूल्यचेतना के छन्ने से छन के निकला हुआ समय है।

अपने आप में देशकाल केवल एक संदर्भजगत होता है। असल में तो सन्दर्भ कहना भी ठीक नहीं। एक दूसरे से असम्बद्ध लोग, घटनाएँ, तारीखें, बस। अलग अलग तथ्य मात्र। इन्हें एक दूसरे से जोड़कर अर्थ निकालने और निष्कर्ष की ओर ले जाने का काम लेखकीय दृष्टि का होता है। इस प्रक्रिया से तथ्य सन्दर्भ में परिणत होते हैं।

वस्तुओं को उनके सन्दर्भ के साथ देखने की क्षमता का नाम परिप्रेक्ष्य है। वस्तुओं के पास सन्दर्भ होते हैँ लेकिन वे स्वयं अपने सन्दर्भों से अनजान होती हैं। परिप्रेक्ष्य केवल मानव के पास होता है। यही परिप्रेक्ष्य जगत को सन्दर्भजगत बनाता है और सन्दर्भजगत को रचनासंसार में बदलता है।

प्रेमचंद के लिये यह परिप्रेक्ष्य क्या है? अपने लिये इस सवाल का जवाब खोजते हुए पाठक की हैसियत से मैने कई बार प्रेमचंद को पहली बार पढ़ने का अनुभव पाया है। 1900 से 1936 तक के बीच निरन्तर विकसित होती हुई

स्वातंत्र्य-संघर्ष चेतना और उग्र होती हुई रणनीतियों के कारण जिस निरन्तर बदलते हुए भारतीय समय को प्रेमचंद ने अपने रचना-संसार की तरह पाया, उसके बीच अपने खड़े रहने के लिये वे कौन सी जगह चुनते हैं? क्या बदलते समय के साथ साथ उनकी वह जगह भी लगातार बदलती रहती है? या बदलती सी दिखकर भी अपने मूल स्वर को अपने भीतर सुरक्षित रखती है? दूसरे शब्दों में, क्या उनकी मूल्यचेतना भी उनके परिप्रेक्ष्य के साथ बदलती है? इस आलेख की प्रस्तावना में स्थापित इस आदिप्रश्न के उत्तर की तलाश में यहाँ उनके रचनाजीवन के आरंभिक दौर की कुछ 'अपरिपक्व' कहानियों और अन्तिम दौर की कुछ 'प्रौढ़ परिपक्व' कहानियों को आमने सामने रखने की कोशिश की जा रही है। इन कहानियों को साथ साथ रख कर पढ़ने से इस अहसास की शुरुआत सहसा हुई कि अभी प्रेमचंद में पढ़ने को बहुत कुछ बाकी है। कि अब भी कई बार उन्हें पहली बार पढने का अहसास होना संभव है।

पहले उनकी दो आरंभिक कहानियाँ।

पहली है 1921 में रचित कहानी 'प्रारब्ध'। सूत्र संक्षेप मेँ नायक जीवनदास मरणान्तक रोग से ग्रस्त हैँ और वे अपने जाने के बाद अपनी युवती पत्नी और शिशु पुत्र की दुर्दशा, कुलमर्यादा के अवश्यम्भावी विनाश आदि की कल्पना से इतने त्रस्त होते हैँ कि उनकी हत्या का निर्णय करके उन्हें विष दे देते हैँ। और फिर हत्याकर्म से भी अधिक दारुण हत्याप्रकाश(न) के भय से भाग खड़े होते हैँ। हरिद्वार को अपने मरने की जगह चुनते हैं लेकिन हरिद्वार पहुँच कर भी वे मरते नहीं स्वस्थ हो जाते हैं। झूठे साधुवेश की आड़ मेँ वे तीर्थयात्रियों को ठगते हैं और इस तरह ऐश्वनर्य और भोगविलासिता का जीवन बिताते हैँ। बरसों बाद उनकी मुलाकात एक समृद्ध-संपन्न युवा तीर्थयात्री से होती है जिसे ठगने का उनका इरादा पूरा है लेकिन वह उनको पहचानता और नाम पूछता है। पता चलता है कि वह उनका पुत्र है। उनके घर पर सुखसमृद्धि है और सफल अध्यवसायी जीवन है। उनके नाम से एक पाठशाला चलाई जा रही है।अनेक छात्रों को छात्रवृत्तियाँ दी जाती हैँ। अब वे ग्लानि और भय से ग्रस्त और इस आशंका से त्रस्त हो उठते हैँ कि उनकी "पापाग्नि के स्पर्श से यह हरा भरा उद्यान मटियामेट हो जाएगा," उनकी "अपकीर्ति कभी न कभी प्रकट होकर इस कुल के सम्मान और मर्यादा को नष्ट कर देगी।" अपने पापों से अपने परिवार को बचाने के लिये वे गोमती में डूब कर आत्महत्या कर लेते हैं।

इस कथासूत्र की सलवटों में प्रेमचंद ने अपने विचार तहाए हैँ और इस कहानी को भौतिकवाद के साथ बहस में भागीदारी का जरिया बनाया है।

प्रमुख पात्र के परिचय में वे कहते हैँ 'जीवनदास एक यथार्थवादी पुरुष थे।' यथार्थवादी होने का व्यावहारिक पक्ष यह है कि ' लोकचिन्ता ने परलोक चिन्ता के लिये स्थान ही न छोड़ा था।' स्वयं कर्त्ता और निर्णायक के भाव से उन्होंने परिवार की हत्या के विचार से पत्नी और पुत्र को विष दिया है। लेकिन उन्हें मालूम नहीं कि उस शीशी में विष नहीं टॉनिक है। हरिद्वार में साधुवेश धारण करने के बाद भी उनकी मानसिकता यही है

"वर्तमान भौतिक शिक्षा ने उन्हें पहले ही अनात्मवादी बना दिया था, अब उन्हें समस्त प्रकृति अनर्थ और अधर्म के रंग मेँ रँगी हुई मालूम होने लगी। यहाँ न्याय नहीं, दया नहीं, सत्य नहीं। असंभव है कि यह सृष्टि किसी कृपालु शक्ति के अधीन हो और उसके ज्ञान में नित्य ऐसे भीषण ऐसे वीभत्स अभिनय होते रहें।वह न दयालु है, न वत्सल है।वह सर्वज्ञानी और अन्तर्यामी भी नहीं। निस्संदेह वह एक विनाशिनी, वक्र और विकारमयी शक्ति है। सांसारिक प्राणियों ने उसकी अनिष्ट क्रीड़ा से भयभीत होकर उसे सत्य का सागर दया और धर्म का भंडार और ज्ञान का स्रोत बना दिया है।यह हमारा दीन विलाप है, अपनी दुर्बलता का करुण अश्रुपात। इसी शक्तिहीनता को, इसी निःसहायता को हम उपासना और आराधना कहते हैँ और उस पर गर्व करते हैं। दार्शनिकों का कथन है यह प्रकृति अटल नियमों के अधीन है, यह भी उनकी श्रद्धालुता है।नियम जड़ अचैतन्य होते हैँ, उनमेँ कपट का भाव कहाँ है? इन नियमों का संचालक इस इंद्रजाल का मदारी अवश्यध है, यह स्पष्ट है, किन्तु वह प्राणी देवता नहीं है, पिशाच है।"

जीवनदास की 'यथार्थवादी' मानसिकता उसे साधुवेश में छलप्रपंच और भोगविलास की ओर ले जाती है। स्पष्टतः इस कहानी के समय तक प्रेमचंद के लिये यथार्थवाद का मतलब 'अनात्मवाद' है और आत्मवाद के पक्ष से अनात्मवाद के साथ बहस करते हुए वे आत्मवाद को ही विजयी ठहराते हैं। जीवनदास की यह तेजस्वी तर्कणा और दंभ को छूता हुआ आत्मविश्वास प्रेमचंद के अनुसार 'यथार्थवादी' होने का दुर्भाग्यपूर्ण नतीजा है। कहानी के अन्त मेँ प्रेमचंद ने उसे ग्लानि, भय और आत्महत्या का दण्ड दिया है। वर्षों बाद बेटा उन्हें खोजकर घर तक ले आया है लेकिन दुनिया के सामने आने के पहले ही पश्चात्ताप से उनकी मनोदशा यह रूप धारण करती है "मुझे अहंकार ने कितना विवेकहीन बना दिया था। मैँ समझाता था मैँ ही सृष्टि का संचालक हूँ…जिन्हें मैने विष दिया था वे आज जीवित हैँ, सुखी हैँ सम्पत्तिशाली हैं…मैँ विराटजगत को किसी पैशाचिक शक्ति के अधीन समझता था जो दीन प्राणियों के साथ चूहे और बिल्ली का खेल खिलाती है। हा मूर्खता! हा अज्ञान!आज मुझ जैसा पापी मनुष्य इतना सुखी है। इसमें सन्देह नहीं कि इस जगत का स्वामी दया और कृपा का महासागर है। कदाचित भगवान ने मुझे लज्जित करने के लिये, मेरे गले में अनुताप की फाँसी डालने के लिये यह अद्भुमद लीला दिखाई है…इसी कुल मर्यादा के लिये भीषण हत्याएँ की थीं। क्या अब जीवित रह कर इसकी वह दुर्दशा कर दूँ जो मरकर भी न कर सका।"

कुछ अस्पष्ट अबूझ कारणों से जीवन दास की आत्महत्या प्रेमचंद ने अनात्मवादी जीवनपद्धति के लिये पश्चा त्ताप और प्रायश्चित्त के रूप में करवाई है।उनके लिये अनास्था का यही फल है। इस कहानी से अगर हमें प्रेमचंद के विचारकोश और भावसंसार मेँ अनात्मवादी होने का अर्थ मालूम होता है तो इसी कालखंड में कभी रचित 'नागपूजा' नामक एक तनिक विलक्षण कहानी से प्रेमचंद के लिये आत्मवादी होने का अर्थ अनुमानित किया जा सकता है।

कहानी की नायिका तिलोत्तमा को बचपन में एक दिन अपने घर के पास एक नाग दिखाई देता है। माँ नाग को देवता कहकर तिलोत्तमा को उसका यह परिचय देती है " ये लोग हवा पर रहते हैँ इसीसे इनकी आत्मा दिव्य हो जाती है। अपने पूर्वजन्म की बातें इन्हें याद रहती हैँ। आनेवाली बातों को भी ये जान जाते हैँ।कोई बड़ा योगी जब अहंकार करने लगता है तो उसे दंडस्वरूप इस योनि मेँ जन्म लेना पड़ता है। जब तक प्रायश्चिजत्त पूरा नहीं होता तब तक वह इस योनि मेँ रहता है। कोई कोई तो सौ सौ दो दो सौ वर्ष तक जीवित रहते हैँ।" इस परिचय के अलावा यह सूचना भी दी गयी है कि तिलोत्तमा के जन्म के बाद से वे घर के आस पास अक्सर दिखाई देने लगे हैं।

तिलोत्तमा बड़ी होती है। विवाह होता है लेकिन विवाह के दिन ही वैधव्य का मुँह देखना पड़ता है। वर को एक नाग ने काट लिया है। समय बीतता है माँ बाप का प्रेम तिलोत्तमा के वैधव्य को असहनीय पाकर उसके पुनर्विवाह की योजना बनाता है। तरह तरह की शंकाओँ, दुःस्वप्नों के बीच तिलोत्तमा मना करना चाहती है लेकिन उसकी शंकाओं को भ्रम समझ कर टाल दिया जाता है और समाजसुधार के उत्साह और पिता के नैतिक साहस की सराहनाओं के साथ दूसरा विवाह सम्पन्न होता है। सारी सावधानियों और तैयारियों के बावजूद विदा के समय फिर वही दुर्घटना और फिर वही कारण। नागदंश और वैधव्य। तिलोत्तमा के दूसरे विवाह और वर की पुनःमृत्यु के घटनाक्रम पर प्रेमचंद की अपनी टिप्पणी है "इस अद्भु द घटना का समाचार दूर दूर तक फैल गया।जड़वादी चकित थे यह माजरा क्या है।आत्मवाद के भक्त ज्ञातभाव से सिर हिलाते थे मानो त्रिकालदर्शी हैं।"

कहानी और आगे चलती है। तिलोत्तमा का तीसरा विवाह भी होता है। इस बार माता पिता के भी टालमटोल के बावजूद वर के विशेष आग्रह पर। इस बार के वर ढाका विश्वाविद्यालय के अध्यापक, पशुशास्त्र के ज्ञाता और साँपों के आचार-व्यवहार के विशेष अध्येता हैं। सभी प्रकार के सर्पविषों के प्रभाव और उनके उपचार के विशेषज्ञ हैँ और वैज्ञानिक अन्वेषण के उद्देश्य से इस विवाह के लिये हठ करते हैँ। विशेष सावधानियों के साथ ढाका शहर जाकर यह विवाह सकुशल संपन्न हो जाता है। कोई नाग नहीं आता लेकिन विवाह के बाद तिलोत्तमा के व्यवहार और चरित्र में एक परिवर्तन दिखाई देता है। शेष परिवार के लिये वह एक आदर्श वधू है लेकिन एकान्त में पति के निकट होते ही वह बदल जाती है, मानो स्त्रीवेश में साक्षात नागिन हो गयी हो। नाग ने मानो उसे आत्मसात कर लिया हो, याकि स्वयं तिलोत्तमा के भीतर आत्मस्थ हो गया हो। पति अपनी दुर्दशा और दुस्साहस पर पछताने की दशा को पहुँच जाते हैँ। एक दिन उन्हें सोई हुई तिलोत्तमा की शैय्या के पास बैठा नाग दिखाई देता है।वे उसे मारने का प्रबन्ध करके लौटते हैँ लेकिन तब तक नाग गायब हो चुका है और तिलोत्तमा साक्षात नागिन सी जाग चुकी है। फिर तिलोत्तमा से युद्ध शुरू होता है। जान बचाने के लिये वे गोली चलाते हैँ तिलोत्तमा पर, लेकिन "तब वह दृश्य देखने में आया जिसका उदाहरण कदाचित अलिफ़लैला और चंद्रकान्ता में भी न मिले। वहीं पलंग के पास, ज़मीन पर एक काला, दीर्घकाय सर्प पड़ा तड़प रहा था, उसकी छाती और मुँह से खून की धारा बह रही थी।" और तिलोत्तमा स्वस्थ हो चुकी थी।

इसे आरंभिक प्रेमचंद के रूढ़िप्रेमी अंधविश्वासी मन का प्रमाण मान कर मामला रफ़ा दफ़ा किया जा सकता है और उनकी यात्रा के आदिबिन्दु की तरह देखकर विस्मित भी हुआ जा सकता है कि अंतिम विकास तक पहुँचने के लिये कितना लम्बा रास्ता उन्होंने तय किया। लेकिन यहाँ इस कहानी में रेखांकित करने की बात कोई और है।

आज भाषा में निहित अर्थों की परतों को खोलने के लिये अनेक पाठविधियाँ और वृत्तान्तविज्ञान हमारे पास मौजूद हैँ जिनके सहारे वैकल्पिक अभिप्रायों की तलाश की जा सकती है। लेखक का अपना अभिप्राय वह सचमुच था या नहीं, यह कहना मुश्किल है लेकिन पाठक की भी अपनी पढ़न्त और अपना अभिप्राय होता है जिसे अगर वह लिखन्त के साक्ष्य से प्रमाणित कर सके तो उसे रचनाकार न सही, रचना के अपने अभिप्राय की तरह अवश्य स्थापित कर सकता है। शायद यहाँ कहानी के अन्त को इस तरह भी पढ़ा जा सकता है कि बड़े सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तनों के दौर से गुजरता हुआ सुदीर्घ परम्परा वाला पराधीन समाज अपनी विरोधी शक्तियों के समक्ष अपने संस्कारों और विश्वासों को बचाने के लिये पहले तो आक्रामक होता है, फिर उनको आत्मस्थ कर लेता है। फिर जब विरोधी शक्ति अपने बूते से बड़ी साबित होती है तो समायोजन द्वारा विरोध का प्रतिकार और शमन करता है। इस क्रम में उसका पिछला आकार शेष नहीं रहता। रुप बदल जाता है।

लेकिन इस जगह पर इस पढ़न्त का उद्देश्य अपनी पाठक्षमता का व्यायाम करना भी नहीं। वैसे भी, यहाँ बिना किसी यथोचित पृष्ठभूमि के, कहानी की ठठरी के सामने रखा गया यह विचार शायद कहानी के अर्थ के बाहर अतः अप्रत्याशित असंभव और आरोपित जान पड़े। अतः पृष्ठभूमि को थोड़ा आगे के लिये स्थगित करते हुए यहाँ उद्देश्यह को पूरा कर लिया जाए। इस आलेख के आदिप्रश्न के संदर्भ में इस कहानी के चुनाव का कारण प्रेमचंद की यह पूर्वोद्धृत टिप्पणी है – "जड़वादी चकित थे यह क्या माजरा है। आत्मवाद के भक्त ज्ञातभाव से सिर हिलाते थे, मानो वे त्रिकालदर्शी हैँ।"

आत्मवाद और जड़वाद के बीच यह विवाद प्रेमचंद के समय मेँ साहित्यिक लोकवृत्त के केन्द्रीय विवादों में से एक था और अनेक महत्त्वपूर्ण रचनाओं की विषयवस्तु भी बना। 'मैटीरियलिज़्म' के अनुवाद की तरह जड़वाद शब्द का प्रयोग मूलतः एक अवज्ञा और अवहेलना के भाव में से निकला है। उन दिनों इसी शब्द का प्रयोग विवाद में शामिल होने वाले अन्य रचनाकार मसलन निराला भी करते हैं। 'भौतिकवाद' काफ़ी बाद में ही प्रचलन में आया। इस कहानी की पूर्वोक्त टिप्पणी में यह विश्वास आभासित होता है कि आत्मवाद के भक्तों के पास किसी ऐसे रहस्य का ज्ञान है जिससे जड़वादी अपरिचित हैं।

आधुनिक हिन्दी आलोचना में बहुत आरंभिक दौर में ही एक प्राथमिक बहस के रूप में आदर्शवाद बनाम यथार्थवाद की बहस दर्ज हुई थी। 'आइडियल' का अनुवाद आदर्श और 'आइडियलिज़्म' का अनुवाद आदर्शवाद है। इस बात को हम सब जानते हैँ लेकिन इसके वैचारिक निहितार्थों को प्रायः अनदेखा कर देते हैं। अनुवाद द्वारा स्वीकृत और प्रचलित होकर कोई शब्द उस अर्थ के लिये रूढ़ हो जाता है लेकिन नयी भाषा में मूल अर्थ के साथ अपरिचय के कारण कभी कभी ऐसा भी होता है कि शब्द की वजह से प्रत्यय ही कुछ बदल सा जाता है। यथार्थ यानी जैसा होता है। आदर्श यानी जैसा होना चाहिये। और मान लिया गया हे कि दोनो एक दूसरे का विलोम हैं।

'आइडियलिज़्म' के भीतर 'आइडिया' उपस्थित है अर्थात एक विचार अथवा दृष्टिकोण से देखा गया यथार्थ। एक शब्द के तौर पर 'आदर्श' इस अर्थ को अपने भीतर धारण नहीं करता इसलिये हिन्दी में यह प्रत्यय ही धीरे धीरे बदल गया और यथार्थ का विरोधी मान लिया गया। इसीलिये प्रेमचंद के विकास का प्रमाण यह मान लिया जाता हे कि वे आदर्शवाद से यथार्थवाद की दिशा में अग्रसर हो रहे थे।

चेतन, आत्म और आदर्श परस्पर समान भार के प्रत्यय हैं। बीज-विवाद वस्तुतः 'आत्मवाद बनाम भौतिकवाद या वस्तुवाद' का है। आदर्शवाद बनाम यथार्थवाद के खाँचे में इसका यह बँटवारा बहस के आयामों को बहुत स्थूल सतही और सीमित कर देता है। आदर्श का विलोम आदर्शहीनता है, यथार्थ नहीं। यथार्थ का विलोम अयथार्थ है, आदर्श नहीं।

तब से प्रेमचंद के रचनात्मक विकास को आदर्शवाद से यथार्थवाद की ओर क्रमिक विकास के चरणों में बाँट कर पढ़ा पढ़ाया जाता रहा है। आदर्शवाद, आदर्शोन्मुख यथार्थवाद, और अन्ततः अन्तिम गन्तव्य यथार्थवाद; जबकि सच यह है कि तथाकथित आदर्शवादी दौर में भी वे यथार्थवादी रचनाएँ कर रहे थे और उनकी यथार्थवादी रचनाओं में भी कोई अन्तर्निहित आदर्शवादी स्वर गुँथा हुआ मिलता है। इसे प्रेमचंद के सन्दर्भ में आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की संज्ञा देकर एक सरलीकरण द्वारा सुलझा अवश्य लिया गया है लेकिन बुनियादी बहस अपनी जगह पर छूटी रह गयी है। इस विकास का दूसरा ढाँचा आत्मवाद से भौतिकवाद की ओर प्रस्थान के विभिन्न चरणों की तरह देखा जा सकता हैं। यथार्थ को देखने का परिप्रेक्ष्य आत्मवादी भी हो सकता है और अनात्मवादी भी। इस संदर्भ में अगला सवाल यह पूछा जाना चाहिये कि विकास के अन्तिम चरण में जो प्रतिष्ठित कहानियाँ प्रेमचंद ने लिखीं वे क्या उस अर्थ में यथार्थवादी थीं जिसे प्रेमचंद जड़वाद कह रहे थे? 'कफ़न', 'पूस की रात',या 'ईदगाह' जैसी कहानियों के दौर में क्या प्रेमचंद अनात्मवादी के अर्थ में यथार्थवादी हो गये थे? याकि उनकी सृजनात्मक प्रौढ़ता ने जीवन के अनुभव की, सामाजिक सन्दर्भों और परिप्रेक्ष्यों की गहराई में पहुँचकर आरंभिक प्रेमचंद की ही मूल्यदृष्टि को, अपने आत्मवाद को किसी और ही धरातल पर पहचान लिया था.

इस आलेख के आदिप्रश्न के उत्तर की तलाश करते हुए मैने उपरोक्त व अन्य भी अनेक कहानियों को फिर से मानो पहली बार पढ़ा। 'गोदान' में मेहता के चरित्र की फलश्रुति के रूप मेँ उनकी रचनादृष्टि मानो अपने आत्मवाद की सीमाओं को पहचानती और रेखांकित करती हैँ –"अज्ञान की भाँति ज्ञान भी सरल, निष्कपट एवं सुनहले स्वप्न देखने वाला होता है। मानवता मेँ उसका विश्वास इतना दृढ़, इतना सजीव होता है कि वह इसके विरुद्ध व्यवहार को अमानुषीय समझने लगता है…वह अपना एक आदर्श संसार बनाकर उसको आदर्श मानवता से आबाद करता है और उसी मेँ मग्न रहता है।यथार्थता कितनी अगम्य, कितनी दुर्बोध, कितनी अप्राकृतिक है, इसकी ओर विचार करना उसके लिये मुश्किल हो जाता है।" लेकिन उसे त्यागती नहीं, वह अपने आत्मवाद की परिभाषा के लिये 'अनात्म' को फिर से परिभाषित करती है और उसके बल से आत्मवाद को संशोधित और पुनःपरिभाषित करती है। इस बार वह 'अनात्मवाद' को सत्ता की निर्मम अमानवीय व्यवस्था के रूपाकार में पहचानती है। परिप्रेक्ष्य की गहराई उनको वह प्रेमचंद नहीं रहने देती जो अपने पात्रों को सज्जन-दुर्जन या नायक-खलनायक जैसी इकहरी कोटियों में विभाजित करके उनके माध्यम से अनुकरणीय और निन्दनीय कोटि के व्यवहारों के उदाहरण प्रस्तुत करते हों। आत्म, चेतन और आदर्श की तरह अनात्म, जड़ और यथार्थ भी उनके लिये परस्पर समान भार के प्रत्यय हैं। 'अनात्म' इस दौर की उनकी रचनाओं मेँ एक जटिल जाल के विस्तार और उलझाव की तरह आविष्कृत होता है।

पहले पहल मैने ऐसी पढ़न्त 'ईदगाह' से शुरू की । वह आलेख तद्भव में छपा था। ईद के मेले में गाँव से शहर तक की यात्रा के बाद ईदगाह में नमाज का दृश्‍य है जहाँ पूरी भीड़ एकता के एक भीतरी सूत्र से संचालित दैवी दृश्य सी दिखाई देती है लेकिन नमाज के बाहर मेले के बाज़ार में घुसते ही दृश्य बदल जाता है। बाज़ार 'ईदगाह' में अनात्म का वह आकार है जहाँ बच्चे तक अपना भोलापन खोकर ईर्ष्या और प्रतियोगिता के भावों से संचालित होते हैं। 'पूस की रात' मेँ यह अनात्म अर्थ-व्यवस्था के शिकंजे में किसान के मज़दूर बनने की कहानी है। 'कफ़न' तक आकर अनात्मवाद को उसका वह विकट आकार मिलता है जिसके समक्ष आत्म का प्रतिरोध खो जाने की संभावना खड़ी हो जाती है जबकि प्रेमचंद की प्राथमिक चिन्ता उसे बचाने की ही है। घीसू अपनी कामचोरी और आलस्य के कारण जिस व्यवस्था का शिकार बनने से बच कर 'विचारवान' कहा जाता है, अनात्म यहाँ उस सत्ता के रूपाकार में सर्जित होता है, "हम तो कहेंगे घीसू किसानों से कहीं ज़्यादा विचारवान था और किसानों के विचारशून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाजों की कुत्सित मंडली में जा मिला था,' यहाँ तक आकर विचारवान का अर्थ ही बदल जाता है। वह प्रेमचंद के व्यंग्य में कुत्सित मंडली में जा मिलने का पर्याय हो जाता है। अनात्म से अनात्म की ही उत्पत्ति होती है अतः घीसू और माधो का आचरण अनात्मता में ही नयी परिभाषाओं के अनुसार अपनी मानवीयता को प्राप्त करता है।

इस परिप्रेक्ष्य में अब 'नागपूजा नामक कहानी के प्रस्तावित पाठ की ओर लौटा जा सकता है। एक बार फिर से पहली बार पढ़ने के अनुभव का आनन्द आपके साथ बाँटने के लिये ही सही। इस कहानी को अगर जादुई यथार्थ के रूपकीय वृत्तान्त की तरह पढ़ें तो आत्मा की अमरता के विषय में आत्मवाद की धारणा के अनुसार नाग पूर्वजन्म की स्मृतियों का पीछा करती वर्तमान तक चली आई एक आत्मा है। प्रेमचंद इसी रूप में तिलोत्तमा की माँ से उसका परिचय भी दिलवाते है – "ये लोग हवा पर रहते है इसीसे इनकी आत्मा दिव्य हो जाती है। अपने पूर्वजन्म की बातें इन्हें याद रहती हैँ आनेवाली बातों को भी ये जान जाते हैं। कोई बड़ा योगी जब अहंकार करने लगता है तो उसे दंडस्वरूप इस योनि में जन्म लेना पड़ता है। जबतक प्रायश्चित्त पूरा नहीं होता तबतक वह इस योनि में रहता है।"

पूर्वजन्म और क्या है सामूहिक अवचेतन की सघनतम स्मृतियों के सिवाय जो संस्कार, आस्था और विश्वास के रूप में हमारे भीतर जीवित रहती है? सामान्य लोकबुद्धि में कोई तर्कसम्मत निदान न होने के कारण उसे जन्म जन्मान्तर का संचय कह कर समझ लिया जाता है। रूपकीय अर्थ मेँ तिलोत्तमा वह वर्तमान है जिसके पीछे पीछे नाग के वेश में पूर्वजन्म का संस्कार या अतीत लगा चला आया है। नाग यहाँ देवता की तरह पूजनीय है, छल बल का प्रतीक वह आस्तीनवासी नहीं जिसे मुहाविरों में लोग दूध पिलाते हैँ। विवाह के प्रथम दोनो अवसरों पर दोनो वरों की नागदंश से मृत्यु मानो वर्तमान पर काबिज़ होने की आकांक्षी शक्तियों के विरुद्ध उसकी आक्रामकता की अभिव्यक्ति है। तीसरे पति के ज्ञान विज्ञान की शक्ति के समक्ष प्राणभय के कारण वह आक्रामक नहीं हो सकता अतः तिलोत्तमा के अपने अस्तित्व मेँ, वर्तमान में उसकी अपनी पहचान (अस्मिता?) की तरह अन्तरस्थ हो जाता है। अंततः उसका बाहरी आकार तो विज्ञान के आघातों से नष्ट हो जाता है, लेकिन तिलोत्तमा के वक्ष में उसकी पीड़ा शेष रह जाती है। विज्ञान की शक्ति (वैज्ञानिक दृष्टिकोण?) के सामने ज्ञानगुरुता के अहंकारी अतीत का प्रायश्चित्त हो चुका है। तिलोत्तमा वक्ष में पीड़ा को समेटे पति के रूप में नये वर्तमान यानी वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ प्रेम के सम्बन्ध मेँ अनुकूलित हो जाती है। प्रेमचंद भी आत्मवाद और जड़वाद के पूरक समायोजन का संकेत सा देते हैँ।

'नागपूजा' में प्रेमचंद का यह अपना अभिप्राय था या नहीं, कहना असंभव है। जादुई यथार्थ की धारणा आज सहज और स्वीकृत है इसलिये यह अर्थ आज तो उतना दूरारूढ़ शायद नहीं लगता लेकिन प्रेमचंद के समय में यथार्थ और जादुई एक दूसरे के विलोम थे और जादुई के विरुद्ध ही यथार्थ का अभियान था। शायद वह लोकप्रचलित विश्वासों से गठित एक कथा मात्र सुना रहे थे। लेकिन स्वयं अपनी विकासयात्रा मेँ उन्होंने इस विकास को चरितार्थ अवश्यं किया। आरंभ मेँ आत्मवाद के प्रति उनका मोह और अहंकार अंत तक आते आते अंतरस्थ होकर एक गहरी मूल्यचिन्ता और अनात्म के प्रति चेतन आलोचनादृष्टि में बदल गया। इस स्तर पर यथार्थवाद आदि से अन्त तक उनके लिये शिल्प की एक विधि बना रहा। इसे उत्तरोत्तर परिष्कृत करते हुए वे 'पूस की रात' और 'कफ़न' जैसी कहानियों में सर्जनात्मक सौन्दर्य की उस कोटि को भी छू पाए जहाँ बिना अतिरिक्त मुखरता के वे एक निरन्तर जटिल होते हुए जगत में आत्मवाद के लिये अपनी पक्षधरता और अनात्म की आलोचना को अभिव्यक्त कर सकें। प्रेमचंद का आत्मवाद उनकी प्रगतिशीलता को और भी पुष्ट करता हे क्योंकि औपनिवेशिक सत्ता का वैचारिक प्रतिपक्ष बनता हे।

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