अशोक सेकसरिया को श्रद्धाँजलियाँ कल्पना पर हिंदी लेखक

अर्चना वर्मा

Ashok Seksariaअशोक सेक्सरिया का न रहना। पहली बार ऐसा लग रहा है कि मेरे पास कोई शब्द ही नहीं हैं जिससे न होने के इस अहसास को बता सकूँ। नहीं, यह शोक नहीं है, शॉक भी नहीं है, इस उम्र मेँ, पिछले एकाध साल में जैसे मन के भीतर एक स्वीकार सा बन चला है कि ऐसी खबरे अब मिलनी ही हैँ, मिलती रहनी हैँ, खुद भी एक दिन ऐसी एक खबर बन जाने का वक्त अब आता होगा। लेकिन फिर भी। अशोक दा का जाना एक संसार के जाते होने का अहसास है, अपने आस पास की उस दुनिया के बदलने, लुप्त होते जाने का अहसास है जिसमें साँस लेते, जिसके मूल्यों को सीखने की कोशिश करते हम बड़े हुए थे, और अशोक दा जैसा दूसरा कोई आदमी मैने नहीं देखा जो उस दुनिया से मेरी दुनिया तक चला आया हो, फिर भी उसी दुनिया में बसता हुआ, उसे वर्तमान बनाता हुआ, निस्पृह,विनम्र, स्नेही, सदाशय, गहन, अपार प्रतिभा लेकिन निस्पृह। अब उनके जैसा दूसरा कोई नहीं। अशोक दा से मेरा अपना मिलना जुलना ज़्यादा नहीं रहा, बल्कि लगभग नहीं। लेकिन वे मेरे मामा ओमप्रकाश दीपक के लिये बहुत अपने छोटे भाई जैसे, मेरे छोटे भाई राकेश कुमार सिन्हा के लिये उतने ही अपने बड़े भाई जैसे। मेरी मामी कमला दीपक को वे भाभी कहते और मामा के जाने के बाद उनकी बराबर उनकी खोज खबर और चिन्ता में रहते थे। मैँ उनके बारे में और वे मेरे बारे में जानते तो थे, शायद कभी मिले भी रहे हों। पिछली शताब्दी के समापन और नयी सदी के स्वागत में प्रभाकर श्रोत्रिय के आयोजन में राष्ट्रीय भाषा परिषद के समारोह मेँ कोलकाता जाना हुआ था। सुबह सुबह सूचना मिली, नीचे कोई मिलने अाया हुआ है। पता चला किशन पटनायक के साथ अशोक दा थे। उन्होंने अपना परिचय दिया और बताया कि सभागार के बाहर फॉयर में लगाई गयी तस्वीरों में मेरी तस्वीर देख कर उन्होंने पहचान लिया कि मैँ हूँ क्योंकि "ये आँखें तो उसी परिवार की हैं" और मिलने चले आये। हाँ, थे वे मेरे अशोक दा और सचमुच। उनके जैसे किसी दूसरे को मैँ नहीं जानती, बस इतना जानती हूँ, जा रहा है वह संसार जिसमें साँस लेते हम बड़े हुए थे।

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रमेश द्विवेदी, कोलकाता (प्रभात खबर से)

जब भी देशभर में लोहिया के समाजवाद की विचारधारा और गांधीवाद पर चर्चा होगी, तो कोलकाता से एक ऐसे मौन समाजवादी साधक की बात जरूर उठेगी, जो जीवनभर अविवाहित रह कर एक असाधारण विरासत का वाहक बना और अपने ही अंदाज में जीता रहा. पर असल में वह समाजवादी नहीं, बल्कि नितांत गांधीवादी थे.

बात हो रही है शनिवार रात दिवंगत हुए अशोक सेकसरिया की. समाजवादी योगेंद्र पाल सिंह व वरिष्ठ साहित्यकार डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र समेत अनेक साहित्यकारों और समाजसेवियों ने सेकसरिया के अचानक अवसान से दुखी हैं. समर्थ होते हुए भी रोजमर्रा की जरूरत के अत्यंत सीमित साधनों के साथ जीवन जीनेवाले अशोक सेकसरिया हमारे बीच नहीं रहे. सही मायने में समाजवादी धारा के ऐसे विरले चिंतक, लेखक व कार्यकर्ता का यूं हम सबसे बिछड़ना ऐसी विकराल शून्यता छोड़ गया है, जिसे आनेवाले समय में भर पाना बेहद कठिन होगा.

Ashok Seksariaअपने निजी अनुभवों के आधार पर डॉ योगेंद्र पॉल सिंह कहते हैं कि दरअसल अशोक सेकसरिया पर 60 के दशक में समाजवादी पार्टी पत्रिका जन के तत्कालीन संपादक ओम प्रकाश दीपक, विजय देव नारायण शाही जैसों का काफी असर था. लोहिया से अशोक सेकसरिया प्रभावित जरूर थे, पर उन्हें अपना आदर्श नहीं मानते थे. बहुत कम लोग जानते हैं कि कोलकाता से निकलने वाले रविवार के लिए अशोक सेकसरिया छद्म नाम से भी लिखा करते थे. समझा जाता है कि कोलकाता की विख्यात उपन्यासकार अलका सरावगी ने अपने ‘कलिकथा वाया बाइपास’ शीर्षक उपन्यास में जिस केंद्रीय किरदार ‘किशोरबाबू’को रखा है, वह और कोई नहीं, बल्कि अशोक सेकसरिया जी ही हैं. हालांकि इसे लेकर विद्वानों में मतभेद हो सकता है. दिवंगत सेकसरिया पश्चिम बंगाल में जबरन भूमि-अधिग्रहण का विरोध करनेवाले चुनिंदा हिंदी लेखकों में भी शुमार रहे हैं. किशन पटनायक व सुनील के बाद अशोक सेकसरिया के देहावसान को समाजवाद की वैकल्पिक राजनीति के लिए बहुत बड़ा नुकसान माना जा रहा है. वर्ष 1982 में एशियाई खेलों पर अशोक सेकसरिया का लेख और 1984 में उनके लिखे ‘हिंदू होने की पीड़ा’ शीर्षक अग्रलेख को पढ़ कर इस देश का किशोर-युवा वर्ग उद्वेलित हो गया था. मूल रूप से राजस्थान के मारवाड़ के मारवाड़ से संबद्ध सेकसरिया जी दैनिक हिंदुस्तान, समाजवादी पार्टी पत्रिका जन, साप्ताहिक समाचार पत्र दिनमान व मासिक पत्रिका वार्ता आदि से जुड़े रहे. एक जमाने में अपनी उम्दा लघुकथाओं के लिए वह चर्चित रहे. आगे चल कर प्रयाग शुक्ल के प्रयास से उनका एक लघुकथा संग्रह ‘लेखकी’ बीकानेर के वाग्देवी पब्लिकेशन से प्रकाशित हुआ था. इनका कुछ दूसरी भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है.

वयोवृद्ध साहित्यकार, समाजवादी चिंतक व पत्रकार अशोक सेकसरिया तीन दिनों पहले कोलकाता के अपने 16 लॉर्ड सिन्हा रोड स्थित आवास पर फिसल कर गिर गये थे, जिससे उनकी कमर की हड्डी टूटी और रीढ़ की डिस्क खिसक गयी थी. फिर उन्हें मध्य कोलकाता के तालतला इलाके के एक नर्सिग होम में भरती कराया गया, जहां पर उनका ऑपरेशन हुआ. वह स्वस्थ भी होने लगे थे कि सहसा शनिवार रात करीब 10.45 बजे खबर आयी कि दिल का दौरा पड़ने से उनके प्राण-पखेरू उड़ गये.

पंचतत्व में विलीन हुए सेकसरिया

रविवार को कोलकाता व आस-पास से सैकड़ों की संख्या में साहित्यकार, समाजवादी, शिक्षाविद व पत्रकार उनके घर में अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए पहुंचे. इनमें से ज्यादातर लोग पूर्वाह्न 10.30 बजे से केवड़ातला स्थित श्मशान घाट के लिए चली उनकी शवयात्र में भी शरीक हुए. दिवंगत अशोक सेकसरिया के पार्थिक शरीर को उनके भतीजे सौरभ व गौरव ने मिल कर मुखाग्नि दी. अनेक नम आंखें तब तक वहां मौजूद रहीं, जब तक कि विद्युत शवदाह-गृह से उनकी अस्थियां नहीं निकल आयीं. अंत्येष्टि में पहुंचनेवालों में कोलकाता के मूर्धन्य साहित्यकार डॉ कृष्णबिहारी मिश्र, प्रखर समाजवादी योगेंद्र पॉल सिंह, बालेश्वर राय, डॉ अमरनाथ, कवि नवल, प्रभाकर चतुर्वेदी, लक्ष्मण केड़िया, अगम शर्मा, विनोद सिंह, कपिल आर्य, आमोद व ब्रजकिशोर झा, आदित्य गिरि, रामविलास व आनंद लाल दास, संजय भारती, महेश चौधरी, ब्रजमोहन सिंह, सेराज खान बातिश, सुरेश शॉ, जितेंद्र सिंह, राज्यवर्धन और पत्रकार कृपाशंकर चौबे, निर्भय देव्यांश, गंगा प्रसाद, जय नारायण प्रसाद आदि शामिल रहे. इसके पहले सेकसरिया जी के आवास पर महिला साहित्यकारों व शिक्षाविदों ने भी पार्थिव शरीर पर पुष्पांजलि अर्पित की. इनमें अल्का सरावगी, कुसुम खेमानी, शर्मिला बोहरा, जमुना केशवानी व रेखा शॉ आदि प्रमुख हैं. कोलकाता व नयी दिल्ली समेत देशभर में हिंदी और हिंदीतर जगत के साहित्यकारों, पत्रकारों व समाज-संस्कृतिकर्मियों से उनके निजी संबंध थे और वह सबकी फिक्र करते थे.

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जनसत्ता, कोलकाता से

Ashok Seksariaप्रखर समाजवादी चिंतक, पत्रकार और लेखक अशोक सेकसरिया का रविवार दोपहर दक्षिण कोलकाता के कालीघाट स्थित केवड़ातला श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार कर दिया गया। मुखाग्नि उनके भतीजे सौरभ सेकसरिया ने दी। राजस्थान के मारवाड़ी परिवार में जन्मे 82 साल के अशोक सेकसरिया का निधन शनिवार की रात मध्य कोलकाता के एक निजी अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने से हो गया था। हफ्ते भर पहले घर में फिसलकर गिर जाने से उनके कमर के पास की रीढ़ की हड्डी टूट गई थी, जिसका आपरेशन होने के बाद शनिवार को अचानक दिल का दौरा पड़ा और वे चल बसे। वे अविवाहित थे। अशोक सेकसरिया गांधीवादी चिंतक व कार्यकर्ता पद्मविभूषण सीताराम सेकसरिया के बड़े पुत्र व भगीरथ कानोड़िया के भतीजे थे। सीताराम सेकसरिया व भगीरथ कानोड़िया ने ही भारतीय भाषा परिषद् की स्थापना की थी। अंत्येष्टि पर कोलकाता के साहित्य प्रेमी, लेखक, पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता बड़ी संख्या में मौजूद थे। अशोक जी की स्मृति में ‘बैठकी’ एक दिसंबर को दोपहर दो बजे से शाम पांच बजे तक उनके निवास 16 नंबर, लार्ड सिन्हा रोड में आयोजित की गई है। शहर के एक निजी अस्पताल से रविवार सुबह अशोक जी का पार्थिव शरीर कोलकाता के उनके आवास पर लाया गया। वहां अलका सरावगी, कुसुम खेमानी, विद्यासागर गुप्त, संजय भारती, काजल चक्रवर्ती, यमुना केशवानी, सुरेश शॉ, रेखा शॉ, अवनेश शाह, जवाहर गोयल तो थे ही, उनके दोनों भतीजे सौरभ सेकसरिया व गौरव सेकसरिया के अलावा भांजे गौतम पोद्दार व प्रकाश पोद्दार, ममेरे भाई श्याम सुंदर सुरेका, सत्यनारायण सुरेका, उनके प्रिय व करीबी बालेश्वर राय, उनकी पत्नी सुशीला राय व दोनों पुत्र अवणींद्र व रवींद्र समेत अनेक लोग मौजूद थे। बालेश्वर राय को अशोक जी पुत्र तुल्य स्नेह व सम्मान देते थे।

अशोक सेकसरिया के मित्र व चाहने वालों में कृष्णा सोबती, अशोक वाजपेयी, प्रयाग शुक्ल, रमेशचंद्र शाह, सच्चिदानंद सिन्हा, ओम थानवी, योगेंद्र यादव, हरिवंश, प्रबोध कुमार प्रमुख हैं। हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार दिवंगत प्रभाष जोशी, भीष्म साहनी, निर्मल वर्मा, मनोहर श्याम जोशी, किशन पटनायक, लेखिका ज्योत्सना मिलन व सुनील जब भी कोलकाता आते थे अशोक जी से मिले बगैर नहीं रह पाते थे। समाजवादी विचारधारा को विस्तार देने व नई कहानी की यथार्थोन्मुखता को नया आयाम देने में अशोक सेकसरिया की महत्वपूर्ण भूमिका थी। एक जमाने में काफी लोकप्रिय उनका कहानी संग्रह ‘लेखकी’ वाग्देवी प्रकाशन से 2000 में प्रकाशित हुआ, जिसका पता अशोकजी को पुस्तक आने के बाद हुआ। इस प्रकाशन में वाग्देवी पब्लिकेशंस के मालिक साखलाजी व मित्रों में प्रयाग शुक्ल, गिरिधर राठी मुख्य थे। वे भगीरथ कानोड़िया के आदर्शों पर चलने वाले व्यक्ति थे जो यश की कामना से दूर रहते थे। वे कोलकाता की साहित्यिक संस्था भारतीय भाषा परिषद के अस्तित्व की लड़ाई व यहां के साधारण कर्मचारियों के पक्ष में सतत सक्रिय रहे।

एक जमाने में अशोक जी के घर पर राममनोहर लोहिया के अनुगामी जार्ज फर्नांडीस, मधु लिमये, कर्पूरी ठाकुर, किशन पटनायक आया करते थे। अशोक जी ने ‘दैनिक हिंदुस्तान’, सोशलिस्ट पार्टी की पत्रिका ‘जन’, ‘दिनमान’ व ‘सामयिक वार्ता’ में लगातार लिखा। उनकी रचनाओं का संकलन आना और मूल्यांकन होना बाकी है। अशोक जी ने ‘गुणेंद्र सिंह कंपानी’ और ‘रामफजल’ जैसे छद्म नामों से भी रचनाएं की हैं। साहित्य व सिनेमा के अलावा चित्रकला व खेलकूद की भी उन्हें गहरी समझ थी। वे नई पीढ़ी के पत्रकारों का हमेशा मार्गदर्शन करते थे। लेखिका अलका सरावगी के उपन्यास ‘कलि-कथा वाया बाईपास’ के मुख्य चरित्र अशोक सेकसरिया ही थे। अशोक सेकसरिया के निधन पर प्रगतिशील लेखक संघ, पश्चिम बंगाल के सचिव ब्रजमोहन सिंह ने कहा कि अशोक जी हमेशा नए विकल्प की चिंताओं से युक्त साधारण जन के पक्षधर रहे।

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प्रियंकर पालीवाल (भड़ास मीडिया से)

अशोक सेकसरिया नहीं रहे. दैनिक हिंदुस्तान, जन (समाजवादी पार्टी की पत्रिका), दिनमान तथा वार्ता से जुड़े रहे अशोक जी विरल प्रजाति के पत्रकार-लेखक थे. अब वैसे लोग नहीं दिखते. उन्होंने जन-पक्षधर पत्रकारिता की. अपना नाम छिपाकर गुणेन्द्र सिह कम्पनी के नाम से कहानियां लिखीं. युवा लेखकों के तो वे अघोषित संरक्षक थे. लॉर्ड सिन्हा रोड का उनका घर एक्टिविस्टों और लेखकों की शरणस्थली रहा करता था.

अपने और अपने रहन-सहन के बारे में अशोक जी इतने बेपरवाह थे कि किसी को यह आभास ही नहीं होता था कि वे पद्मभूषण से सम्मानित स्वतंत्रता-सेनानी सेठ सीताराम जी सेकसरिया जैसे जगत्प्रसिद्ध आदमी के बेटे हैं जिनके समाजसुधार और स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में गए कार्यों के गांधी जी भी प्रशंसक थे. कलकत्ता की शायद ही कोई तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक-शैक्षिक संस्था हो जिसकी स्थापना में उनका योगदान न हो. श्री शिक्षायतन कॉलेज, भारतीय भाषा परिषद, विश्वभारती का हिंदी भवन .... कितनी ही संस्थाएं. नवलगढ़ अशोक जी के मन का कमजोर कोना था. नवलगढ से संबंध रखने के कारण अशोक जी का मुझ पर विशेष स्नेह था. जब मिलते थे तो नवलगढ़ के बारे में बात ज़रूर करते थे. शेखावाटी का यह कस्बा उनका पैतृक स्थान था. मेरे लिए भी कलकत्ता में एक छोटा-सा कोना था नवलगढ का जो अब नहीं रहा. अशोक जी को विनम्र श्रद्धांजलि!

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आशुतोष कुमार (भड़ास मीडिया से)

एक युग अपने पंख समेट रहा है। दस-बारह की उम्र रही होगी जब हिन्दुस्तान में अशोक जी का एक लेख पढ़ा था। आपातकाल के सन्दर्भ में उस लेख में आज़ादी के तीन दशकों की समीक्षा की गई थी। वह लेख की याद आज भी ताज़ा है। चिंतन की वह गहराई और स्पस्टता हैरान कर देने वाली थी। अनंतर सेकसरिया जी का लिखा और उन पर लिखा यत्किंचित पढ़ने को मिलता रहा लेकिन अधिकतर पर्दे के पीछे से ही उनकी मौजूदगी अपने होने का अहसास दिलाती रही। न कभी मुलाक़ात हुई न पत्राचार। ईमानदारी और साहस के बिना समझ की स्पस्टता हासिल नहीं हो सकती -ये हमने सेकसरिया जी से सीखा। गुरु मान कर उन्हें अंतिम प्रणाम कहता हूँ।

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पलाश बिस्वास (साप्ताहिक पत्रिका रविवार से)

प्रख्यात समाजवादी चिंतक और लेखक अशोक सेकसरिया नहीं रहे. तीन दिन पहले अचानक घर में पैर फिसल जाने से उनकी कमर की हड्डी टूट गयी थी और रीढ़ की डिस्क भी खिसक गयी थी. उनका आपरेशन कोलकाता के एक निजी अस्पताल में परसो हुआ. वे ठीक भी हो रहे थे कि अचानक आज देर रात हृदयाघात से उनका देहावसान हो गया.

इसके साथ ही कोलकाता के साहित्यिक सांस्कृतिक जगत को अपूरणीय क्षति हो गयी और उनके जानने वालों के आंसू थम ही नहीं रहे हैं.

अशोक जी का जनसत्ता परिवार से बेहद अंतरंग संबंध थे और वे प्रभाष जोशी जी के निजी मित्र थे. स्वयं जोशी जी ने कोलकाता में जनसत्ता शुरु होने पर उनसे संपादकीय के सभी साथियों से मिलाया था. हमसे तब जो मुलाकात हुई तो अंतरंगता तो उतनी नहीं हुई लेकिन वे बीच बीच में फोन करते रहते थे. हालचाल जानते रहते थे और सबके साथ उनका यही बर्ताव था.

हमारी सामाजिक सक्रियता से वे चिंतित भी रहते थे कि कहीं हमें कोई नुकसान न हो जाये. नंदीग्राम सिंगुर प्रकरण में जब हमने अनशन कर रही ममता बनर्जी का उनके अनशन मंच से समर्थन किया तो वे अरसे तक परेशान करते रहे और हमें जोखिम उठाने से मना करते रहे. हालांकि वे भी उस दौरान हमारे साथ जबरन भूमि अधिग्रहण का विरोध करने वाले कोलकाता के चुनिंदा लेखकों में थे.

जनसत्ता में गंगा प्रसाद,कृष्णकुमार शाह,साधना शाह,अरविंद चतुर्वेद और जयनारायण के अलावा शैलेंद्र जी से उनके निजी संबंध थे. कोलकाता और नई दिल्ली के अलावा देशभर में हिंदी अहिंदी जगत के साहित्यकारों पत्रकारों और समाजसंस्कृतिकर्मियों से उनके निजी ताल्लुकात थे और वे सबकी परवाह करते थे. वे बेहतरीन लेखक थे.

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