अशोक सेकसरिया को श्रद्धाँजलियाँ कल्पना पर हिंदी लेखक

जयशंकर गुप्त (जनता जनार्दन से)

Ashok Seksariaअशोक सेकसरिया जी के निधन के समाचार से मन बेहद व्यथित हुआ. सुबह ही मित्र और पड़ोसी ध्रुव नारायण जी ने आकर सूचना दी तो दिल पर गहरी चोट सी लगी. अशोक जी से हमारी मुलाकात पुरानी, समाजवादी आंदोलन और फिर लोहिया विचार मंच के दिनों से तो थी ही, अस्सी के दशक के शुरू में, संभवतः 1982 में कोलकाता में रविवार के सम्पादकीय विभाग के साथ जुड़ने के साथ उनके बगल में बैठने और बहुत कुछ करीब से जानने और सीखने का मौका मिला.

तब के संपादक स्व.सुरेन्द्र प्रताप सिंह के आग्रह या कहें दबाव पर अशोक जी रविवार के साथ अंशकालिक तौर पर जुड़े थे. रविवार के साथ उनका यह जुड़ाव सुरेन्द्र जी के रविवार से अलग होने के साथ ही टूट गया था. लेकिन हम लोगों का बाद के दिनों में भी उनके घर जाना आना लगा रहता था. हमारे बीच उम्र का लम्बा फासला हमारे मित्रवत संबंधों में कभी बाधक नहीं बनता था.

पत्रकरिता से लेकर राजनीति पर भी लम्बी चर्चाएं होती रहती थीं. हम दोनों समाजवादी थे और किशन पटनायक जी के करीबी भी लेकिन इसके साथ ही मधु (लिमये) जी और जार्ज (फर्नांडिस) साहेब के प्रति हमारी निष्ठा और लगाव कई बार चर्चा में कड़वाहट भी ला देती थी लेकिन रिश्तों में कतई नहीं.

अशोक जी बड़े बाप (अपने ज़माने के बड़े पूंजीपतियों में से एक गांधीवादी सीताराम जी सेकसरिया) के बेटे थे, लेकिन रहते थे इस देश के आम आदमी (सही मायने में) की तरह ही. वे लिखते कम ही थे और अपने नाम से तो और भी कम. दिल्ली प्रवास के दौरान उन्होंने बहुत सारी कहानियां भी लिखी थीं, अनाम या फिर छद्म नाम से. रविवार में भी उन्होंने लिखा.

खासतौर से क्रिकेट वर्ल्ड कप के समय रामफजल के नाम से उनके क्रिकेटी लेख अविश्मरणीय ही थे. रविवार में कभी- कभार उन्होंने अपने नाम से भी लिखा. कितनों की लिखी कापियां न सिर्फ दुरुस्त की बल्कि उन्हें पूरी तरह से पुनर्लिखित कर उनके ही नाम से छापने देकर उन्होंने बहुतों को लेखक और पत्रकार बना दिया. रविवार से जुड़ने से पहले यही काम वह सामयिक वार्ता और चौरंगी वार्ता के संपादन के दिनों में भी करते थे.

रविवार के दिनों में कहें उसके पहले से ही हम सिगरेट बहुत पीते थे. दिन में विल्स गोल्ड फ्लेक अथवा नेवी कट के करीब दो पैकेट तो धुंए में उड़ा ही देते थे. बगल में बैठे अशोक जी पनामा सिगरेट पीते थे और बेहिसाब पीते थे. एक बार उन्होंने मुझसे कहा, "बाबू, अगर तुम एक महीने तक सिगरेट न पियो तो मैं तुम्हें होटल ग्रैंड ओबेराय में लंच खिलाऊंगा." मैंने चुनौती मंजूर कर ली थी. 29 दिन तो बिना सिगरेट के गुजर गए लेकिन तीसवें दिन रहा नहीं गया और मैंने चोरी चुपके से एक 555 सिगरेट पी ली.

अशोक जी ने मुंह की गंध से चोरी पकड़ ली थी. बहुत डांट पिलाई लेकिन एक बात भी कही कि जब वह खुद सिगरेट नहीं छोड़ पा रहे तो हमसे किस अधिकार से यह उम्मीद कर सकते हैं. मैं बहुत शर्मिंदा हुआ और कसम भी खाई कि एक दिन सिगरेट छोड़ कर अशोक जी को जरूर बताउँगा. लेकिन वह शुभ घड़ी आने में कई साल लग गये.

29 फ़रवरी 1992 को हमने निर्णायक तौर पर सिगरेट से तौबा कर ली, ( उस समय हम 35 से 40 सिगरेट एक दिन में पी जाते थे) और आज तक उस पर कायम हूँ. बाद के दिनों में जब हमने कोलकाता यात्रा के दौरान अशोक जी के निवास पर जाकर बताया कि हमने सिगरेट छोड़ दी है, अशोक जी ने आश्चर्य से मुस्कुराते हुए पूछा था, क्या वाकई! जब हमने उन्हें बताया कि महीने नहीं साल हो गए, सिगरेट को हाथ भी नहीं लगाया, उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था, मुझे मिठाई खिलाई और हाँ, थोड़ी देर बाद उन्होंने एक पनामा भी सुलगा ली थी.

इधर कई सालों से कोलकाता जाना नहीं हुआ. वहां जाने और अशोक जी से मिलने, बच्चों को मिलवाने का कार्यक्रम बनाते ही रह गया. और आज जब उनके निधन के बारे में सूचना मिली तो हाथ मलते स्तब्ध रहने के अलावा हमारे पास कुछ भी नहीं था.

हाल के दिनों में भी अशोक जी के बारे में सूचना-समाचार बड़े भाई जुगनू शारदेय जी या फिर शिवानंद तिवारी जी से भी मिलती रहती थी. शिवानंद जी ने ही उनके एक्सीडेंट की सूचना दी थी और कहा था कि वे शीघ्र ही उनसे मिलने कोलकाता भी जानेवाले थे. पता नहीं निधन से पहले वह उनसे मिल भी सके थे कि नहीं.

अशोक जी के निधन से देश के समाजवादी आंदोलन, साहित्य और पत्रकारिता को अपूरणीय क्षति तो हुई ही है, हमारी निजी क्षति भी हुई है. हम समाजवादियों के लिए यह भी एक त्रासदी है कि इस तरह की लगातार क्षति के समाचारों का मिलना बंद होने का नाम ही नहीं ले रहा.

आगे कुछ लिखते नहीं बन रहा, अशोक जी आप हमारे बीच नहीं रहे लेकिन आपके विचार और आदर्श जिन्हें आपने व्यवहार में जिया था, सदा हमारे साथ प्रेरणा के तौर पर आपकी याद दिलाते रहेंगे. आपके साथ जुड़ी स्मृतियों को प्रणाम. विनम्र श्रद्धांजलि.

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फ़कीर के घर का दरवाजा है , हरदम खुला रहा .....हरदम खुला रहे ...

प्रो. रामदेव शुक्ल (कबाड़खाना ब्लाग से)

अशोक सेकसरिया जितने प्रखर प्रतिभा के रचनाकार थे, उससे कहीं बड़े फकीर थे. उनकी करुणा ने उन्हें निरंतर दूसरों के लिए सक्रिय रखा. 'अपने लिए ' - इस पद का उनके लिए कोई अर्थ कभी नही रहा. १९५५-५६ में ' हिन्दुस्तान ' के सहायक सम्पादक के रूप में रघुवीर सहाय के साथ दिल्ली में काम करना शुरू किया लेकिन किसी की चाकरी के लिए वे नहीं बनाए गए थे. कोलकाता के लार्ड सिन्हा रोड के पैतृक घर का दो कमरे का फ़्लैट, उन्हें पिता पदमभूषण सीताराम सेकसरिया से मिला था. मकान का पूरा निचला हिस्सा उनके अनुज प्रदीप के पास था. ऊपर का दूसरा फ़्लैट भी उन्ही के पास था. प्रदीप का विदेशों में उच्च गुणवत्ता के वस्त्र निर्यात का कारोबार था. कभी कभी वस्त्रों की बड़ी बड़ी गांठें रखीं रहतीं. जब कोई साधारण व्यक्ति पोर्टिको की ओर मुड़ता तो उसे चौकन्ने सुरक्षा गार्डों की निगाहों का सामना करना पड़ता. ज्यों ही वह ' अशोक जी ' कहता , गार्डों की आँखों में आदर के साथ आमंत्रण उभर आता. उपर जाने का इशारा कर वो एक ओर हट जाते. उनके पास आने जाने वालों की न कभी संख्या सीमित रही और न ही कभी काम का दबाव कम हुआ. कोई उनसे साहित्य, समाज, संस्कृति, कला, दर्शन या राजनीतिक आंदोलनों पर बहस के लिए जाता तो कोई सिर्फ पास बैठ कर शान्ति पाने के लिए. डा. लोहिया, जयप्रकाश, किशन पटनायक, दिनेश दासगुप्त, योगेन्द्र पाल सिंह, डा. रमेश चन्द्र सिंह, राम पलट भारती, उमराव आदि के साथ अशोक जी ने ' चौरंगी वार्ता ' का प्रकाशन शुरू किया. १९७४ में योगेन्द्र पाल ने मेरी कहानी 'ग्राम देवता ' उन्हें थमा दी. अशोक जी ने १९७५ के गणतंत्र दिवस अंक में उसे प्रकाशित किया. उसके बाद कोलकाता का उनका फ़्लैट मेरा भी घर बन गया, जैसा अगणित लोगों का.

उस घर में आने जाने वाले ऐसे भी थे जो जो सूर्योदय से पहले अपने डेरे से लोकल ट्रेन से अपने काम पर जाते और तीसरे पहर अशोक जी रहे या न रहे, वे उनके फ़्लैट में आकर नहाते, जो कुछ मिलता खाते और दूसरे काम पर चले जाते. 'भारतीय भाषा परिषद ' में मिथिलांचल के बालेश्वर राय को मकाम दिलाने के बाद अशोक जी ने अपना पूरा घर उन्ही को सौंप दिया. वे माँ बनकर अशोक जी को सहेजते सम्भालते रहे. एक बार नेशनल लाइब्रेरी से मैं लौटा तो अशोक जी कहीं गए हुए थे. बालेश्वर ने मुझसे कहा कि आज अशोक जी को एक विवाह समारोह में भोजन करना है. उसी समय वे आ गए. उन्होंने कार्ड दिखा कर मुझसे कहा इस समारोह में भोजन की एक प्लेट बारह सौ रूपये की है. वह समय १९८० के आस पास का था. न जाने कितने भूखे लोगों की पीड़ा अशोक जी की आँखों में झिलमिलाई. बोले , 'बारह सौ रूपये में कितने भूखों को पेट भर खाना मिल जाता ?" बालेश्वर से उन्होंने कहा – “खिचड़ी बनाइये.” हमने उस रात खिचड़ी खाई.

अपनी रचनाओं के अस्वीकार से उदास न जाने कितने लोगों की कृतियों पर रात दिन कठिन श्रम कर के अशोक जी ने उन्हें लेखक बना दिया. किशन पटनायक की एक एक रचना को तलाश कर “विकल्पहीन नही है दुनिया " जैसी अद्भुत किताब का अशोक जी ने सम्पादन किया. 'चौरंगी वार्ता' बाद में 'समकालीन वार्ता ' को अकेले दम पर निकालते रहे. दिल्ली-प्रवास में प्रकाशित अशोक जी की कुछ श्रेष्ठ कहानियों को बहुत बाद में प्रयाग शुक्ल और योगेन्द्र पाल ने मिलकर पुस्तक के रूप में प्रकाशित करा दिया. अशोक जी को पता चला तो दुःख से घिर गए. उन्हें दूसरों को लेखक, कवि रूप में स्थापित करा कर सुख -संतोष मिलता था. अपने को लेखक के रूप में स्वीकार ही नही करते थे. न जाने कितने अनाथ बालकों को उनके घर जाकर पढाने के बाद उन्हें छोटी-मोटी नौकरी दिलाने या रोज़गार से लगा देने जैसे काम में अशोक जी अपनी कृतार्थता मानते थे.

अशोक जी के घर का दरवाजा कभी बंद नहीं होता था. उनके अनुज अब नही रहे. उनके पुत्र हैं, जिनका नाम मुझे स्मरण नहीं. मैं जानता हूँ, अपने ताऊ अशोक जी का वे कितना ख्याल रखते थे. उनके पास सम्पत्ति की कमी नहीं. मेरा उनसे अनुरोध है कि उस फकीर के घर के दरवाजे में ताला कभी न लगे, इसकी व्यवस्था करे. कोलकाता में सांस्कृतिक चेतना के अगणित केंद्र हैं. अशोक जी का घर अपने ढंग का अप्रतिम केंद्र है. उसके दरवाजे खुले रहेंगे तो देश-विदेश से आकर उस फकीर की स्नेह छाया में जुडाने वाले लोग उनके न रहने पर भी उस शीतलता का स्पर्श पा सकेंगे.

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