डा. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल का लेखन कल्पना का हिंदी लेखन

एक पुस्तकालय के भीतर

भारत में अकादमिक मंचों पर प्रायः यह चिंता और चर्चा की जाती है कि नई तकनीक पुस्तकालयों को एकदम अप्रासंगिक कर देगी. वैसे तो पुस्तकों पर मण्डराने वाले खतरों की चर्चा इलेक्ट्रोनिक संचार माध्यमों के आगमन के साथ ही शुरू हो गई थी, क्योंकि इन माध्यमों ने पुस्तकों के अस्तित्व को कई तरह से चुनौती दी थी. पाठक के समय पर कब्ज़ा चुनौती का एक पहलू था, नए-नए आए छोटे पर्दे का आकर्षण दूसरा, चीज़ों की सजीव प्रस्तुति तीसरा..... . बारीक स्तर पर इन माध्यमों ने भोक्ता के सोच व ग्रहण में जो बदलाव किये उससे बहुत सारा लिखित व मुद्रित फीका लगने लगा. लेखक ने अपनी तरह से भी इस चुनौती से टकराने की चेष्टाएं कीं. उसने अपने लेखन का तरीका भी थोडा बदला. लेखन और पुस्तक इस चुनौती से जूझ ही रहे थे कि तकनीक का एक और बड़ा करिश्मा उससे भी बड़ी चुनौती के रूप में आ खड़ा हुआ. दुनिया का बहुत सारा ज्ञान इण्टरनेट पर आ गया. इसने तो भारी भरकम किताब और उसके विशाल संग्रहों यानि पुस्तकालयों को बेमानी सिद्ध करने में कोई कसर ही नहीं छोड़ी. कोई क्यों अपने घर में 24 ज़िल्दों वाला एनसाइक्लोपीडिया रखे? उसे देखने के लिये पुस्तकालय भी क्यों जाये? डिक्शनरी भी क्यों घर में रखे? माउस क्लिक करे और इच्छित जानकारी कम्प्यूटर के स्क्रीन पर पढ़ ले. अगर ज़रूरत हो, उसका प्रिण्टआउट भी निकाल ले. किताब और किताबघर की ज़रूरत ही खत्म!

लेकिन हर क़िताब केवल सूचना ही तो नहीं होती. और अगर कुछ के लिये हो भी तो क़िताब को हाथ में लेने का सुख, किसी शब्द, वाक्य या पंक्ति को पढ़ते हुए रुक कर सोचने का सुख, कागज़ की सतह को छूने का सुख, कागज़ और स्याही की गंध में खो जाने का सुख -- इन सबका विकल्प और कुछ हो ही कैसे सकता है? छोड़िये ये सब. भावुकता की बातें हैं. आज की ज़मीनी हक़ीक़त के सामने इनकी कोई अर्थवत्ता नहीं है.

इस तरह की ऊहापोह चलती रहती है. व्यावहारिक लोग कहते हैं, किताब और लाइब्रेरी खत्म भी हो जाए तो क्या हर्ज़ है! और पुस्तक प्रेमी इस कल्पना पर ही मुंह लटका लेते हैं. अतीत का मोह कम प्रबल नहीं होता.

अभी पिछले दिनों आकाशवाणी की एक परिचर्चा में हम इसी मुद्दे पर बहस कर रहे थे कि क्या इण्टरनेट और इसी तरह की अन्य तकनीकें पुस्तकालय को पूरी तरह खत्म कर देंगी? भारत में पुस्तकालयों की दशा वैसे भी ज़्यादा अच्छी नहीं है. दशा तो पुस्तकों की भी कहां अच्छी है? छोटे शहरों की तो छोड़िये, बड़े शहरों में भी आपको ऐसी दुकान नहीं मिलेगी जहां आप मनपसन्द किताब ढूंढ सकें. दरअसल किताब की या किसी भी अन्य वस्तु की दुकान आपको खरीदने का ही नहीं, देखने का भी सुख देती है. आप सब्ज़ी बाज़ार जाएं और खरीदें भले ही ज़्यादा न, पर हरी-भरी, ताज़ी, रंग-बिरंगी सब्ज़ियों के रंग-रूप-गंध का साहचर्य आपको एक खास तरह का सुख प्रदान करता है. किताब की दुकान में भी ऐसा ही होता है. खरीदें आप भले एक ही क़िताब (या एक भी नहीं) पर सैंकड़ों-हज़ारों किताबों के बीच होने का, उन्हें देखने-छूने का सुख अवर्णनीय होता है. बशर्ते ऐसी दुकान हो! दुकान न सही, पुस्तकालय ही सही. बल्कि वहां तो यह अपराध बोध भी नहीं होता कि इतनी देर में कुछ भी नहीं खरीदा. लोकलाज में खरीदने की विवशता भी नहीं होती. पर भारत में आर्थिक कटौती की गाज़ सबसे पहले पुस्तकालय पर ही गिरा करती है. बार-बार पुस्तकालयों के बजट में कटौती कर हमने उन्हें लगभग निष्प्राण ही बना डाला है. जन चेतना के अभाव की वजह से इसका कोई प्रतिरोध भी नहीं हुआ है. सार्वजनिक पुस्तकालय ही नहीं, शिक्षण संस्थाओं के पुस्तकालय भी इस नासमझी भरी कटौती के शिकार हुए हैं. राजस्थान के महाविद्यालयों में, जहां मैंने अपनी लगभग पूरी ज़िन्दगी बिताई, आज पुस्तकालयों की जो दशा है, उसे देख सिर्फ सर ही धुना जा सकता है. बिना पुस्तकालय किसी उच्च शिक्षण संस्थान की कल्पना भी नहीं की जा सकती, पर मेरे राज्य में यह अजूबा भी चल रहा है.

बहरहाल.

जब अमरीका आया तो मन में यह भी था कि देखूं यहां पुस्तकालयों का क्या हाल है?

इस देश में तो इण्टरनेट का खासा प्रचलन है. अगर इण्टरनेट ही कारण हो तो यहां पुस्तकालय मर ही चुका होगा. कम्प्यूटर आम है, इण्टरनेट की स्पीड बहुत उम्दा है, लोगों के पास फुरसत नहीं है, भाग-दौड़ की और चमक-दमक भरी और थोड़ी विलासितापूर्ण ज़िन्दगी है. ये सब बातें पुस्तकालय को खत्म कर देने के लिये काफी हैं.

कुछ ऐसे ही खयालात मन में थे, जब मैं अमरीका में एक पुस्तकालय में गया.

रेडमण्ड रीजनल लाइब्रेरी नामक यह पुस्तकालय किंग काउण्टी लाइब्रेरी सिस्टम (KCLS) की 43 शाखाओं में से एक है. ये शाखाएं पूरे इलाके में फैली हैं तथा सूचना तकनीक के माध्यम से आपस में जुड़ी हैं. इस केसीएलएस के पास 40 लाख आइटम्स (किताबें,पत्रिकाएं, समाचार पत्र, पैम्फलेट्स,ऑडियो-वीडियो टेप्स, सीडी, वीसीडी, डीवीडी, एलपी आदि-आदि) का वृहत संग्रह है. संग्रह की सम्पूर्ण सूची इण्टरनेट पर उपलब्ध है और स्वभावतः कई तरह से वर्गीकृत है.

मैं बात रेडमण्ड रीजनल लाइब्रेरी की कर रहा था. एक भव्य, सुरुचिपूर्ण और सुविधाजनक इमारत में स्थित यह पुस्तकालय मानों आपको अपनी तरफ खींचता है. हरियाली, खुलापन और टॉनी एंजेल का प्रतीकात्मक मूर्ति-शिल्प-'विज़डम सीकर्स' (जिज्ञासु!) आपका स्वागत करते हैं. इस मूर्ति-शिल्प में एक विशालकाय ग्रेनाइट शिला पर चार कौए विराजमान हैं. पाश्चात्य मिथक में कौए को जिज्ञासु और बुद्धिमान पक्षी माना जाता है. इस प्रस्तर शिल्प में तीन कौए एक धरातल पर हैं - अलग-अलग दिशाओं में देखते हुए, और चौथा कौआ उनसे नीचे है, उन्हें देखता हुआ. तीन कौए कहीं से भी ज्ञान प्राप्त करने को तत्पर हैं और चौथा कौआ इस बात का सूचक कि हमें ज्ञानियों से ज्ञान प्राप्त करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिये.

कोई भी नागरिक अपनी पहचान का प्रमाण देकर पुस्तकालय की सदस्यता ले सकता है. सदस्य बन जाने पर उसे एक कार्ड मिल जाता है जो क्रेडिट कार्ड जैसा होता है. इस कार्ड पर अनगिनत सामग्री प्राप्त की जा सकती है. पुस्तकें 28 दिन के लिये, पत्रिकाएं 7 दिन के लिये. शेष सामग्री की भी अलग-अलग समय सीमा है. यहीं यह बता दूं कि पुस्तकालय से सीडी,वीसीडी,टेप-कुछ भी ले जाया जा सकता है. विलम्ब होने पर जुर्माना अदा करना होता है. जुर्माना राशि आपके खाते में लिख दी जाती है, आप सुविधानुसार कभी भी जमा करा सकते हैं, यानि तुरंत जमा कराना ज़रूरी नहीं है. पुस्तकालय में लगभग 50 कम्प्यूटर हैं जिन पर अपनी पसन्द की किताब/पत्रिका/अन्य सामग्री की तलाश की जा सकती है. यह काम इण्टरनेट के ज़रिये अपने घर से भी किया जा सकता है. घर से ही आप किसी भी किताब या सामग्री को (और ज़रूरी नहीं कि वह सामग्री इसी रेडमण्ड पुस्तकालय की हो, वह केसीएलएस की 43 शाखाओं में से किसी की भी हो सकती है) आरक्षित (Hold) करा सकते हैं. जब वह सामग्री रेडमण्ड पुस्तकालय में आ जाती है तो आपको ई-मेल या फोन से सूचित कर दिया जाता है तथा पुस्तकालय में वह सामग्री आपके नाम की पर्ची के साथ अलग रख दी जाती है. इसी तरह की सुविधा केसीएलएस की तमाम शाखाओं में सुलभ है. पुस्तकालय में बैठ कर तो पढ़ा ही जा सकता है. अत्यधिक सुविधाजनक टेबल कुर्सियां तथा समुचित प्रकाश व्यवस्था है. अगर ज़्यादा किताबें वगैरह ले जानी हों तो वहीं उपलब्ध हाथ-ठेले(Cart) का इस्तेमाल किया जा सकता है. सामग्री घर ले जाने के लिये पॉलीथिन की थैलियां नि:शुल्क सुलभ रहती हैं.

सारी सामग्री आप खुद ही इश्यू करते हैं. पहले ऑप्टीकल रीडर के सामने अपने सदस्यता कार्ड को लायें, इससे आपका खाता खुल जाता है. फिर एक-एक कर इश्यू करने वाली सामग्री के बार कोड को इस ऑप्टीकल रीडर के सामने लाते जाएं. बस! कोई चौकीदार नहीं, कोई गिनती नहीं. अमरीकी समाज में वैसे भी आपकी ईमानदारी पर पूरा विश्वास किया जाता है. सामग्री का लौटाना तो और भी आसान है. पुस्तकालय के बाहर लैटर बॉक्स नुमा बक्से बने हैं. उनमें आप सामग्री डाल दें और हो गया काम.

मैंने पहले भी कहा, यहां से पुस्तकें, पत्रिकाएं, कैसेट्स, सीडी, वीसीडी, डीवीडी कुछ भी घर ले जाया जा सकता है. मैंने महज़ जिज्ञासा से देखा तो पाया कि कोई 200 हिन्दी फिल्मों की डीवीडी यहां मौज़ूद हैं. कई ऐसी हिन्दी फिल्में मैं यहां देख पाया जिनके लिये भारत में तरसता ही रहा था, जैसे श्याम बेनेगल की ‘अंतर्नाद’ या सत्यजित रे की अनेक फिल्में. पण्डित रविशंकर वगैरह का संगीत भी यहां भरपूर मात्रा में है. अपने पण्डित विश्वमोहन भट्ट की ग्रैमी पुरस्कृत रचना 'मीटिंग बाई द रिवर' भी यहीं सुनने को मिली. मुझे तो यहां अपने राजस्थान का लोक संगीत तक मिल गया : लंगा और मांगणियार. पाश्चात्य फिल्मों और संगीत वगैरह का तो मानों खज़ाना ही भरा पडा है. भारतवंशी ज़ुबीन मेहता की संगीत रचना भी मैं यहां से लेकर सुन पाया. बीथोवन वगैरह का भी बहुत सारा कृतित्व यहां सुनने को मिला.

पुस्तकालय आपको अपनी ई-मेल चैक करने की सुविधा भी देता है. यह कतई ज़रूरी नहीं है कि आप पुस्तकालय के सदस्य हों तभी इस सुविधा का उपयोग कर सकते हैं. गैर सदस्य, मसलन प्रवासी/यात्री भी पूरे अधिकार के साथ इस सुविधा का लाभ उठा सकते हैं. यहां पुस्तकालय को एक सामाजिक सेवा प्रदाता के रूप में भी चलाया जाता है. यह भी सोच है कि इस तरह की सेवा से और अधिक लोग पुस्तकालय की ओर आकृष्ट होंगे.

पुस्तकालय में रिप्रोग्राफी की पर्याप्त और समुचित सुविधा है. जो भी सामग्री आपको चाहिये, उसकी फोटोकॉपी करलें. कम्प्यूटर पर कोई सामग्री आपके काम की है तो उसका प्रिण्टआउट निकाल लें.

इस लाइब्रेरी को देख कर लगा कि कम्प्यूटर और इंटरनेट पुस्तकालय के शत्रु नहीं, सहायक हैं. इन्होंने तो पुस्तकालय सेवा का विस्तार ही किया है. इनके माध्यम से तो ज्ञान के विशाल भण्डार में से अपने काम की चीज़ ढूंढना बेहद आसान हो गया है. इण्टरनेट ने पुस्तकालयों की आपसी और आपसे उनकी दूरी भी समाप्त कर दी है. तकनीक ने यह भी सम्भव बनाया है कि यदि आप पुस्तकालय तक न जा सकें तो अपने घर बैठे ही पुस्तकालय की सेवाओं का लाभ उठालें. समय की भी बन्दिश खत्म. आपको रात के बारह बज़े फुरसत मिली है तो उस वक़्त भी आप पुस्तकालय से जुड़ सकते हैं. अब आप ही बतायें, अगर ऐसी लाइब्रेरी हो तो भला कौन उसका बार-बार उपयोग न करना चाहेगा?

इतना ही नहीं, लाइब्रेरी के एक कोने में एक वेण्डिंग मशीन भी लगी है जिसमें सिक्के डाल कर कॉफी या शीतल पेय वगैरह खरीदे जा सकते हैं, और उसकी चुस्की लेते-लेते पढा जा सकता है. कॉफी या कोक पीते हुए पढ़ना अमरीकी जीवन पद्धति का अंग है. उसकी सुविधा पुस्तकालय जुटाता है.

पुस्तकालय में घुसते ही आपका सामना नई आई पुस्तकों के रैक से होता है. इस रैक की किताबों को हर दूसरे-तीसरे दिन बदला जाता है. इण्टरनेट पर भी नई आई किताबों की सूचना अलग से उपलब्ध होती है. पुस्तकालय में नई फिल्में और नया संगीत भी लगातार आता है और यहां के न्यूज़ लैटर में तथा इण्टरनेट पर बाकायदा उसकी सूचना दी जाती है.

पुस्तकालय का काम इतना ही नहीं है. यहां रचना पाठ, लेखक से मिलिये, पुस्तक चर्चा, पुस्तक/चित्र/कलाकृति प्रदर्शनी आदि के कार्यक्रम लगातार चलते रहते हैं. ये कार्यक्रम इतने ज़्यादा और इतनी नियमितता से होते हैं कि इनकी सूचना के लिये एक मासिक न्यूज़ लैटर प्रकाशित किया जाता है. पुस्तकालय एक उम्दा कार्यक्रम और चलाता है. इसका नाम है 'रीडिंग रिवार्डस’ (Reading Rewards) यानि पढने का पुरस्कार. 18 वर्ष से अधिक की वय का कोई भी पाठक एक छोटा-सा फॉर्म भरकर और अपनी ताज़ा पढी किताब पर अपनी छोटी-सी टिप्पणी लिखकर इस कार्यक्रम का सदस्य बन सकता है. फिर पूरे एक साल में उसे 50 किताबें पढकर उनपर अपनी टिप्पणियां देनी होती हैं. इतना कर देने पर उस पाठक को पुरस्कृत किया जाता है. उसकी लिखी टिप्पणियों को मुद्रण तथा इण्टरनेट के माध्यम से प्रकाशित भी किया जाता है. पुस्तकालय एक और उम्दा सेवा करता है. कोई भी पाठक या नागरिक अपनी पढ़ी हुई पुस्तक या पुस्तकें पुस्तकालय को भेंट कर सकता है. पुस्तकालय उन्हें रियायती दामों पर बेचकर अपनी आय में वृद्धि कर लेता है. इस प्रयास में आय से ज़्यादा महत्व इस बात का है कि आप पुस्तकालय से संलग्नता महसूस करते हैं, साथ ही जो पढ़ने के शौकीन हैं उन्हें कम दाम पर पुस्तक मिल जाती है. अगर यह सुविधा न होती तो पुस्तक वैसे भी कचरे के मोल ही जाती. इस तरह की सेवाएं देकर पुस्तकालय अपने को नागरिकों के निकट लाता है.

मुझे यह देखकर बहुत सुखद आश्चर्य हुआ कि यह पुस्तकालय दिन के हर वक़्त पाठक-पाठिकाओं से लगभग भरा रहता है. और भी ज़्यादा खुशी इस बात से हुई कि इन पाठक-पाठिकाओं में भारतीय भी खूब होते थे.

क्या हमारे देश में ऐसे पुस्तकालय नहीं हो सकते?

***

कल्पना पर लेखन विषय पर पन्नों की पूरी सूची - डा. दुर्गा प्रसाद अग्रवाल के लेखन की सूची