डा. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल का लेखन कल्पना का हिंदी लेखन

हिन्दी लघु पत्रिकाएं और रचनाशीलता

अपने व्यक्तिगत दुख दर्द, अंतर्द्वन्द्व या आंतरिक नाटक को देखना बहुत महत्वपूर्ण, सुखद और आश्वस्तिदायक तो मुझे भी लगता है, मगर जब घर में आग लगी हो तो सिर्फ अपने अंतर्जगत में बने रहना या उसी का प्रकाशन करना क्या खुद ही अप्रासंगिक, हास्यास्पद और किसी हद तक अश्लील नहीं लगने लगता?

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आज जब हमारी संसद में एक बडी बहस चल रही है, और देश वाकई आग में झुलस रहा है, लघु पत्रिकाओं की, साहित्य की बात करना भी कहीं ‘अप्रासंगिक, हास्यास्पद और किसी हद तक अश्लील’ तो नहीं है? आप टी वी खोलिए, रंगीन चमकदार पत्रिकाओं के पन्ने पलटिए, अखबारों को आगे-पीछे से देखिए, क्या आप पाते हैं कि आप सबकी ज़िन्दगी को जो-जो बातें प्रभावित करती हैं, उनकी कोई सरसराहट उनमें है? केवल आज नहीं, दस-बीस पन्द्रह दिन, साल-दो साल, पांच दस साल पहले की बातें भी याद कर लीजिए. जिसे हम मुख्यधारा की पत्रकारिता कहते हैं, उसका एक मात्र उद्देश्य है मुनाफा. वही सब कुछ छापो जिससे मुनाफा हो. यही कारण है कि कभी आरुषि हत्याकाण्ड देश की सबसे बडी समस्या बना दिया जाता है तो कभी क्रिकेट मैच.

ऐसे में यह साफ हो जाता है कि साहित्य तो इनमें से किसी की प्राथमिकता हो नहीं सकता. वह तो दुख दर्द की, आम आदमी की ज़िन्दगी की बात करता है.

ज़रा देखिए न कि आज किसी भी बडे माध्यम में साहित्य की हैसियत क्या है? चाहे वह मुद्रण हो या दृश्य, ‘दो गज़ ज़मीन भी न मिले कू-ए-यार में..’ यह हालत आज ही नहीं हुई है. लेकिन हालात बद से बदतर तो हुए हैं. मुझे साठ के दशक की सबसे पहले ठीक याद है, जब धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसे प्रकाशन थे, बाद में दूरदर्शन आया तो उस पर कभी राग दरबारी था, कभी निर्मला, कभी तमस तो कभी कब तक पुकारूं..

मैं हरिश्चन्द्र मैगज़ीन, जागरण, हंस, सरस्वती, विप्लव, चांद जैसी स्वाधीनतापूर्व की पत्रिकाओं की बात नहीं कर रहा.

स्वतंत्रता के बाद भी धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, ज्ञानोदय, कल्पना, माध्यम, सारिका, नई कहानी, माया जैसी पत्रिकाएं थी जो प्राय: व्यावसायिक घरानों या प्रतिष्ठानों से निकलती थी लेकिन साहित्य-कला-संस्कृति से दूरी नहीं रखती थीं. उसी ज़माने में दिनमान भी निकला था, जिसकी भूमिका को आज याद किया जाना ज़रूरी है. साठ के दशक तक धर्मयुग की भूमिका बहुत खास थी. इसने नई कहानी आन्दोलन को ज़बर्दस्त समर्थन दिया, एक कथा दशक योजना, समकालीन चिंतन पर शिवप्रसाद सिंह की लेखमाला, नई चित्रकला की बानगियां और न जाने क्या-क्या...

लेकिन इसी धर्मयुग ने कुछ अवांछित भी किया. साहित्य की राजनीति, साहित्य और बाज़ार का अनुचित मेल.. और इसने उस वक़्त के लेखकों के एक बडे वर्ग को नाराज़ किया. उन्होंने घोषित रूप से ऐसी बडी, व्यावसायिक और सेठाश्रित पत्रिकाओं का बहिष्कार करने का साहस किया.

उस काल में लघु पत्रिकाओं का उदय हुआ. ऐसी पत्रिकाएं, जो किन्हीं बडे प्रतिष्ठानों से नहीं, बल्कि लेखकों के व्यक्तिगत, निजी प्रयत्नों से छोटे पैमाने पर निकलीं. उस वक़्त ऐसी पत्रिकाओं की जैसे झडी ही लग गई: समझ, आवेग, सनीचर, अकविता, आकंठ, इबारत, जारी, ज़मीन, आइना, कंक, अब, आमुख, तेवर, धरातल.... कहां तक नाम गिनाएं.

राजस्थान से भी लहर, वातायन, बिन्दु, क्यों, तटस्थ और थोडा बाद में क्यों व सम्बोधन...

इन्होंने रचनाशीलता का एक अलग ही माहौल बनाया. इनमें से ज़्यादातर में दृष्टि थी, रचना-विवेक था और इन्हें लेखकों का अकुण्ठित सहयोग प्राप्त था. लोग पारिश्रमिक देने वाली और लेखक को स्टार बनाने वाली पत्रिकाओं में छपने की जगह इनमें छपना गौरव की बात समझते थे.

धीरे-धीरे पत्रिकाओं के इस कारवां में और भी पत्रिकाएं जुडीं. वक़्त बदला, बडी पत्रिकाओं की सूची से साहित्य दर बदर हुआ तो साहित्य की एकमात्र शरणगाह ये पत्रिकाएं ही रह गईं.

आज हिन्दी की महत्वपूर्ण पत्रिकाएं हैं : पहल, कथन, तद्भव, समयांतर, पल प्रतिपल, अकार, अलाव, समकालीन जनमत, उद्भावना, प्रगतिशील वसुधा, अन्यथा. हंस, कथादेश को भी नहीं भूल सकते हालांकि इन्हें लघु पत्रिका तो नहीं कह सकते, लेकिन ये सेठाश्रित भी नहीं हैं. राजस्थान से भी समय माज़रा(अब बन्द), अक्सर, शेष, कृति ओर, सम्बोधन, अभिव्यक्ति, सम्प्रेषण, बनास बहुत महत्वपूर्ण यह कि हिन्दी में जो भी महत्वपूर्ण लिखा गया है वह इन्हीं पत्रिकाओं में छपा है. ऐसे उदाहरण विरल ही होगे जब अपने समय की कोई महत्वपूर्ण कृति किसी व्यावसायिक पत्रिका में छपी हो.

सारी बडी बहसें इन्हें छोटी पत्रिकाओं में चली हैं. आज जो भी लिखा जा रहा है उसके प्रकाशन का मंच यही पत्रिकाएं हैं. प्रतिष्ठान से जुडी पत्रिकाओं की हालत अच्छी नहीं है. उदाहरण मधुमती है. कुछ अपवाद भी हैं जैसे समकालीन भारतीय साहित्य.

लेकिन इन लघु पत्रिकाओं की सीमा भी है:

-प्रसार बहुत कम. (वैसे, अगर संतोष करना चाहें तो यह तथ्य कि टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेण्ट और न्यूयॉर्क रिव्यू ऑफ बुक्स की बी 7-8 हज़ार प्रतियां ही छपती हैं.)

-सम्पादकीय दृष्टि का अभाव

-रचनाओं का अभाव

-सम्पादक की महत्वाकांक्षा

-व्यावसायिक/आर्थिक विवशताएं

इधर रचनाशीलता को एक नया मंच मिला है इण्टरनेट पत्रकारिता के रूप में. यह माध्यम कम खर्चीला और बडी पहुंच वाला है. इसका प्रसार तेज़ी से हो रहा है.

अनेक मुद्रित पत्रिकाएं तो नेट पर हैं ही, केवल नेट आधारित पत्रिकाएं भी कम नहीं हैं : अभिव्यक्ति-अनुभूति, हिन्दी नेस्ट, कृत्या, सृजन गाथा, वेब दुनिया, इन्द्रधनुष इण्डिया, साहित्य कुंज, गर्भनाल, रचनाकार, निरंतर. इससे भी अगला क़दम है ब्लॉग्स. हमारी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. हमं इन पत्रिकाओं को सहयोग देना चाहिए, ग्राहक बन कर, बना कर, अपने विद्यार्थियों को इनसे जोड कर और अगर रचनाकार हों तो इन्हें रचनात्मक सहयोग देकर.

दर असल, सारी बातों के बावज़ूद आज भी साहित्य की भूमिका खत्म नहीं हुई है. उसकी प्रासंगिकता और बढी है, और साहित्य के शिक्षक होने के नाते उसके प्रसार की काफी ज़िम्मेदारी हमारी ही है. मैंने प्रारम्भ में अपने जिस संशय की चर्चा की थी, उसी से बात खत्म करता हूं. जब व्यक्ति और समाज के सामने गम्भीरतम चुनौतियां दरपेश हों, तब केवल सास-बहू या भूत-प्रेत या पेज थ्री या सेलिब्रिटीज़ की दुनिया में सिमटे रहना ‘अप्रासंगिक, हास्यास्पद और किसी हद तक अश्लील’ है.

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