डा. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल का लेखन कल्पना का हिंदी लेखन

नई पीढ़ी के लाड़ले गांधी

चीज़ों को देखने का हरेक का अपना नज़रिया होता है. कभी-कभी यह इतना अलग और विशिष्ट होता है कि आश्चर्य होता है. नई पीढ़ी गांधी को जिस दृष्टि से देख रही है, उससे सुखद आश्चर्य ही होता है. एक पीढ़ी ने गांधी को न केवल देखा, उसके साथ जीवन जिया, दूसरी पीढ़ी ने उसे मूर्ति बनाकर चौराहों पर खड़ा कर दिया, साल में एक दिन, 2 अक्टोबर को, उसे धोया, पोंछा, माला पहनाई और 364 दिन उससे कोई वास्ता न रखा. लेकिन, तीसरी पीढ़ी ने अपनी तरह से उसे पहचाना, और आश्चर्यों का आश्चर्य यह कि उसे अपनाया भी. उत्तर प्रदेश के इंजीनियर सन्दीप पाण्डे ने गांधी को पढ़ा और जैसे उनका जीवन ही बदल गया. उन्हें लगा कि नौकरी छोड़कर समाज के वंचित वर्ग के लिए कुछ करना चाहिये. आई आई टी के इस प्रोफेसर ने अपनी नौकरी को अलविदा कहा और पत्नी के साथ हरदोई में आश्रम स्थापित कर डाला.अब ये दोनों सार्वजनिक वितरण प्रणाली, सूचना के अधिकार और ग्रामीण रोज़गार योजना की बेहतर क्रियान्विति के लिए गांधीजी के अहिंसक तरीकों को औज़ार बना रहे हैं.

वाकई आज की पीढ़ी खोखले आदर्शों से बहुत दूर जा चुकी है. पुराने और कुछ-कुछ शुष्क-नीरस गांधीवादी उन्हें प्रभावित नहीं करते. उनके द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली गांधी की छवि भी उन्हें आकृष्ट नहीं करती. लेकिन जब वे यह पढ़ते हैं कि गांधी महज़ एक खद्दर की धोती पहनने वाला और चरखे से चिपके रहने वाला बूढ़ा ही नहीं था बल्कि बेहद अमीर (उनकी आय 5000 पाउण्ड प्रति वर्ष थी. आप यह भी याद रखें कि उस ज़माने में एक पाउण्ड से सात ग्राम सोना खरीदा जा सकता था) विलायत पलट बैरिस्टर भी था तो यकायक यह गांधी उन्हें आकृष्ट करने लगता है. केवल भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में ऐसा हो रहा है. 'पोस्ट मॉडर्न गांधी'  पुस्तक के लेखक, शिकागो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर लॉयड रुडोल्फ ने कुछ बरस पहले गांधी विषयक एक ऐच्छिक पाठ्यक्रम शुरू किया तो उनका खयाल था कि 12 विद्यार्थी तो जुट ही जाएंगे. लेकिन आ गए पूरे 75. इससे भी बड़ा आश्चर्य यह कि इनमें से अधिकतर विज्ञान और तकनोलॉजी के छात्र थे, नास्तिक थे और धर्म सम्प्रदाय वगैरह से दूर थे. "इन्हें ऐसे पाठ्यक्रम की तलाश थी जो इनके जीवन को नया अर्थ दे और दे ऐसे शाश्वत प्रश्नों के उत्तर कि मेरे जीवन का क्या अर्थ है?"  स्वभावत: इन्हें लगा कि गांधी इसके लिए सक्षम है. ठीक ऐसा ही अनुभव हुआ 12 साल पहले बनाये गए एक गांधीवादी युवा संगठन "राष्ट्रीय युवा संगठन' के राष्ट्रीय सचिव संतोषकुमार द्विवेदी को भी. उन्होंने पिछले साल सेवाग्राम में जो ग्रीष्म शिविर आयोजित किया उसमें 550 कॉलेज विद्यार्थी आ गए. द्विवेदी बताते हैं, “असल चुनौती यह नहीं है कि युवाओं को गांधी की तरफ कैसे लाया जाए! बड़ी चुनौती यह है कि उनके मन में गांधी के बारे में जो मिथ्या धारणाएं हैं उन्हें कैसे मिटाया जाए!” द्विवेदी हर साल कई शहरों में नियमितता से होने वाए अपने शिविरों में यही करते हैं : खुली, एकदम मुक्त चर्चा. परिणाम यह कि वे 12 वर्षों में ही गांधी से उतने युवाओं को जोड़ सके हैं जितने हमारे गांधीवादी 60 वर्षों में भी नहीं जोड़ पाए. द्विवेदी का स्पष्ट मत है कि अगर हमें अहिंसक समाज बनाना है तो हमारे पास गांधी का कोई विकल्प नहीं है.

सामाजिक कार्यकर्त्री अरुणा रॉय का मानना है कि एक बार कोई गांधी को पढ़ ले, फिर तो उनसे जुड़े बगैर रह ही नहीं सकता. अरुणा जी तीन क्षेत्रों में गांधी को सर्वाधिक प्रासंगिक मानती हैं : सार्वजनिक जीवन में नैतिक शुचिता, आर्थिक विमर्श की नैतिक दृष्टि और सर्वधर्म समभाव के माध्यम से सम्प्रदायवाद का प्रतिरोध.

पिछले महीने हिन्दु-सीएनएन-आईबीएन के एक सर्वे के परिणाम खासे चौंकाने वाले किंतु उल्लसित करने वाले रहे. इस सर्वे में देश के 19 राज्यों के 30 साल से कम के युवाओं में से लगभग तीन चौथाई ने गांधी को अपना सबसे बड़ा रोल मॉडल बताया. देश के अलग-अलग भागों में युवा अपनी-अपनी तरह से गांधी के दर्शन को अपने जीवन में उतार भी रहे हैं. दिल्ली की छात्रा आमना मिर्ज़ा शाकाहारी हो गई हैं और अपने कॉलेज में एक पर्यावरण क्लब चलाने लगी हैं. चेन्नई के डिजाइनर एम. नित्यानन्दन ने हाल ही में गांधी पर एक 20 मिनिट की एनिमेशन फिल्म बनाई है और अब वे समग्र गांधी जीवन को अपनी अगली एनिमेशन फिल्म का विषय बनाना चाहते हैं. मुम्बई की वित्त विश्लेषक प्रेरणा देसाई महसूस करती हैं कि गांधी बहुत व्यावहारिक थे. प्रेरणा ने डिस्को जाना और मदिरापान करना छोड़ दिया है. दिल्ली के मेनेजमेण्ट के विद्यार्थी अक्षत जैन को उनके साथी कंजूस बताते हैं क्योंकि वे स्कूटी की सवारी करने की बजाय पैदल चलते हैं. लेकिन अक्षत को इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता . वे तो नौकरी भी ऐसी तलाश कर रहे हैं जिससे समाज का भला हो.

ऐसा भी नहीं है कि गांधी से नई पीढ़ी ही जुड़ रही है. सुपरिचित इतिहासकार मुशिरुल हसन जहां यह शिकायत करते हैं कि "गांधीजी के साथ हरेक ने, जिनमें खुद गांधीवादी भी शामिल हैं, बुरा सुलूक ही किया है" वहीं लीलाधर मानिक गाड़ा जैसे लोग भी हैं जो अपनी 68 साल की उम्र के बावज़ूद खुद को नए युग का गांधीवादी कहते हैं. पुराने गांधीवादियों से उनकी शिकायत भी उचित है : “वे चाहते हैं कि युवा लोग आंखें बन्द करके गांधी का अनुसरण करें. वे अपनी खोलों से बाहर निकल कर दुनिया को नहीं देखते और आज की समस्याओं को समझना नहीं चाहते. वे तो बस यह चाहते हैं कि जैसे उन्होंने गांधी का अनुसरण किया वैसे ही युवा भी करते रहें." लीलाधर आजकल गुजरात के कच्छ इलाके में युवाओं को सामाजिक बदलाव के लिए प्रेरित कर रहे हैं. इनका कहना है, “समाज के लिए कुछ कर गुजरने का जज़्बा रखने वाले युवा कम नहीं हैं. इनमें से कई तो ग्राम्य अध्ययन के बेरोज़गार स्नातक तक हैं. ये बहुमूल्य सेवा कर रहे हैं. हम तो उन्हें उनके काम के ऐवज़ में ठीक वेतन तक नहीं दे पाते. लेकिन अगर आप इनसे कहें कि ये खादी पहनें और तकनोलॉजी को छोड़ दें तो ये कुछ नहीं करने वाले. इससे फर्क़ भी क्या पड़ता है कि एक युवा पैण्ट शर्ट पहनता है और मोटर साइकिल पर चलता है. आखिर वह काम तो हमारा ही कर रहा है." इस नए, उदारवादी रवैये से गांधी का विचार खूब फैल रहा है. नया गांधीवादी आन्दोलन कम से कम दस राज्यों में फल-फूल रहा है. इसके युवा स्वयं सेवक साम्प्रदायिक सद्भाव के प्रसार और बेदखल जन-जातियों को भू अधिकार दिलवाने के काम में पूरे उत्साह से जुटे हैं.

गांधी की लोकप्रियता दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है.दिल्ली की गांधी स्मृति में अब हर रोज़ लगभग 2000 दर्शक आने लगे हैं. देश के करीब एक लाख विद्यार्थी गांधी जीवन विषयक परीक्षा में शामिल होते हैं. गांधीजी की आत्मकथा 'सत्य के साथ मेरे प्रयोग' का अनेक प्रादेशिक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और इसकी लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं. सारी दुनिया में हर साल एक से दो हज़ार के बीच गांधी विषयक नई पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं. इसलिए जब लोकप्रिय फिल्म 'रंग दे बसंती'  के निर्देशक राकेश मेहरा कहते हैं कि गांधी भारत का सबसे बड़ा निर्यात है तो वे कोई अतिशयोक्ति नहीं करते. उनके कथन की पुष्टि इस बात से भी होती है कि दूरस्थ ब्राज़ील देश की सरकार अपनी पुलिस को गांधीवादी नैतिकता की दीक्षा देती है. हाल ही में जब ‘रंग दे बसंती’ के हिंसात्मक प्रतिरोध को अपना समर्थन देने वाली युवा पीढ़ी ने और भी अधिक गर्मजोशी से ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ के अहिंसक सत्याग्रह को अपना समर्थन दिया तो एक बार फिर यह बात रेखांकित हुई कि गांधी की प्रासंगिकता अभी भी बरक़रार है.

और यह भी गांधी की ही शक्ति है कि उनके सत्याग्रह के इस 100 वें वर्ष में नई पीढ़ी उन्हें फिर से अपना रही है. इस बात से क्या फर्क़ पड़ता है कि 11 सितम्बर 1906 को जोहानिसबर्ग में एम्पायर थियेटर बिल्डिंग में एकत्रित हुए 3000 भारतीयों को जिस युवा बैरिस्टर मोहनदास करमचन्द गांधी ने उपनिवेशवादी दमन के खिलाफ एकजुट होने और सत्याग्रह करने की शपथ दिलाई थी, उसी गांधी के सत्याग्रह को आज की पीढ़ी अपनी नई शब्दावली में 9/11 कहकर याद कर रही है. सरकारी प्रयत्नों (जिनका हश्र बताने की ज़रूरत नहीं) से हटकर युवा लोग सत्याग्रह की इस शताब्दी को अपनी तरह से मनाने में जुटे हैं. वे समकालीन समस्याओं का हल गांधी के विचार में तलाश रहे हैं. उनकी योजना है कि शांति यात्राएं आयोजित हों, साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए साइकिल रैलियां निकलें, बेहतर भारत-पाक सम्बंधों के लिए मोटर साइकिल रैलियां आयोजित हों, कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध जनमत तैयार किया जाए, बस्तियों और गांवों में भित्ति समाचार पत्रों तथा रेडियो कार्यक्रमों के माध्यम से तथा प्रोफेशनल कॉलेजों में गांधी पर फिल्मों और बहसों के माध्यम से अपनी बात पहुंचाई जाए. और यह ठीक भी तो है. नई पीढी गांधी के सत्याग्रह को 9/11 कहे या उनके दर्शन को गांधीगिरी, क्या फर्क़ पड़ता है. शेक्सपियर ने भी तो यही कहा था : नाम में क्या रखा है. असल बात तो है गांधी का विचार. वह फल फूल रहा है.

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