डा. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल का लेखन कल्पना का हिंदी लेखन

साहित्य का मेला

पांच दिवसीय (21 से 25 जनवरी 2009) डी एस सी जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल सम्पन्न हो गया. अपने आयोजन के चौथे वर्ष में आ पहुंचा यह फेस्टिवल अब स्थापित हो चला है. राजस्थान की राजधानी -गुलाबी नगरी जयपुर- के बीचों बीच स्थित डिग्गी पैलेस में आयोजित इस फेस्टिवल में दुनिया भर के लगभग 200 लेखकों-प्रकाशकों, अनगिनत कलाकारों और बहुत बड़ी संख्या में साहित्यानुरागियों ने शिरकत की.

पहले ज़रा इस आयोजन में शामिल हुए लेखकों की सूची पर एक नज़र डालें. शशि थरूर, विक्रम सेठ, चेतन भगत, विलियम डालरिम्पल, उर्वशी बुटालिया, तरुण तेजपाल, पवन के. वर्मा, पंकज मिश्रा, विकास स्वरूप, लीला सेठ, नंदन नीलेकनी, तहमीना अनम, मोहम्मद हनीफ, आशीष नंदी, जिलियन राइट, गुरुचरन दास, दानियल मुइनुद्दीन, के सच्चिदानन्दन, यू आर अनंतमूर्ति, गुलज़ार, हरि कुंजुरु, पॉल ज़करिया, पिको अय्यर, निकिता लालवानी, निरुपमा दत्त, तुलसी बद्रीनाथ, अंतरा देव सेन, नबनीता देव सेन, अपूर्व नारायण, आलोक राय, अशोक वाजपेयी, अलका सरावगी, उदयन वाजपेयी, अशोक चक्रधर, नूर ज़हीर, शक्ति दान कविया, माली राम शर्मा, हरि राम मीणा, सत्यनारायण, गोविन्द माथुर आदि. यह पूरी सूची नहीं है, लेकिन इस सूची से यह साफ ज़ाहिर है कि देश-विदेश के, हिन्दी और हिन्दीतर भाषाओं के अनेक शीर्षस्थ लेखक इस फेस्टिवल में शामिल हुए. गीतकार प्रसून जोशी, फिल्म निर्देशक मुज़फ्फर अली, विधु विनोद चोपड़ा, कलाकार अमिताभ बच्चन, नंदिता दास, दीप्ति नवल, अनुपम खेर, गंभीर फिल्म विश्लेषक नसरीन मुन्नी कबीर ने भी अलग-अलग सत्रों में शिरकत की.

इस आयोजन ने न केवल लेखकों को आपस में मिलने-जुलने का और विभिन्न विषयों पर औपचारिक-अनौपचारिक विमर्श करने का अवसर उपलब्ध कराया, साहित्यानुरागियों को भी अपने प्रिय लेखकों से रू-ब-रू होने का अविस्मरणीय अनुभव प्रदान किया. पांच दिनों तक सुबह दस बजे से शाम छह बजे तक डिग्गी पैलेस में ही तीन स्थलों पर (और कभी-कभी चार जगहों पर भी) एक-एक घण्टे के सत्र एक के बाद एक चलते रहे. जिसका जहां मन हो, जाए. किसी भी सत्र में जाने का मन न हो तो लॉन में, मैदान में कहीं भी बैठ कर गपशप करे. खास बात यह कि तमाम बड़े और स्टार लेखक भी यही करते रहे. इसलिए यह बात बहुत आम रही कि जिस टेबल पर आप बैठें हैं उसके पास वाली टेबल पर चेतन भगत या विक्रम सेठ या तरुण तेजपाल या अशोक वाजपेयी बैठे हैं. कोई औपचारिकता नहीं, कोई रोक-पाबन्दी नहीं. आप का मन हो जिससे बात करें, उसके ऑटोग्राफ लें या उसके साथ फोटो खिंचवाएं. स्कूल कॉलेजों के विद्यार्थी दिन भर लेखकों को घेरे रहते और मुझ जैसे बूढे भी कभी यू आर अनंतमूर्ति तो कभी अशोक वाजपेयी तो कभी गुलज़ार के साथ फोटो खिंचवाते नज़र आते. कार्यक्रम शाम छह बजे बाद भी जारी रहते. एक दिन बाउल गायक थे तो एक दिन फ्यूज़न संगीत. एक शाम प्रसून जोशी और दीप्ति नवल ने अपनी कविताएं भी सुनाईं. इस तरह हर शाम कोई न कोई कार्यक्रम हुआ.

कुछ लोगों को लगा कि यह आयोजन अंग्रेज़ी की तरफ अधिक झुका हुआ था. हम लोगों का सम्बन्ध भारतीय भाषाओं से है इसलिए स्वाभाविक है कि हम ऐसे आयोजनों में उनकी अधिक सहभागिता की अपेक्षा करते हैं. अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रकृति की वजह से इस फेस्टिवल में अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय-अभारतीय भाषाओं की मौज़ूदगी थी, इसलिए मुझे तो स्वाभाविक ही लगा कि हिन्दी, बांगला, उर्दू, राजस्थानी वगैरह के हिस्से में एक दो तीन सत्र ही आ पाए. लेकिन अगर भारतीय भाषाओं की सहभागिता और बढाई जाए तो अच्छा ही रहेगा.

मेले में फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों की सहभागिता ने सभी का, विशेष रूप से मीडिया का काफी ध्यान खींचा. हमारे समाज की जैसी मानसिकता बन चुकी है, उसे देखते हुए यह अस्वाभाविक भी नहीं था. लेकिन यह बात विचारणीय अवश्य है कि एक साहित्यिक आयोजन में ‘स्टारों’ की क्या वाकई कोई प्रसंगिकता है. प्रसून जोशी गीतकार हैं, दीप्ति नवल कविता लिखती हैं, लेकिन अमिताभ बच्चन और विधु विनोद चोपड़ा के साथ ऐसी भी कोई बात नहीं जुड़ी हुई है. जो लोग कुछ लिखते हैं, उनका साहित्य जगत में वैसा मान नहीं है जैसा, मान लीजिए चेतन भगत या अशोक वाजपेयी का है. तो फिर इनको आयोजन में विशेष हैसियत क्यों दी गई? कहीं ऐसा तो नहीं कि उनकी उपस्थिति आयोजन के चरित्र में मूलभूत परिवर्तन कर देती है? यह ज़ाहिर है कि पूरा आयोजन एक खास व्यावसायिक नज़रिए से आयोजित किया जाता है, इसलिए आयोजक तो वह हर प्रयास करेंगे जिससे उन्हें प्रायोजक और प्रचार जुटाने में सहायता मिले. लेकिन क्या इसी वजह से यह आयोजन हम साहित्य प्रेमियों के लिए और साहित्यकारों के लिए उपेक्षणीय या त्याज्य हो जाना चाहिए? कई मित्रों का तो यही खयाल है, और वे अपनी तरह से इससे अलग भी रहे हैं. मेरा विचार थोड़ा भिन्न है. मैं मानता हूं कि बावज़ूद व्यावसायिकता के, इस तरह के आयोजन साहित्य को जनता के निकट लाने में कामयाब होते हैं, इसलिए इनका स्वागत किया जाना चाहिए. फिल्मी सितारे भी आयोजन की लोकप्रियता में वृद्धि कर अंतत: साहित्य का भी भला करते हैं. जो लोग फिल्मी सितारों का दीदार करने आते हैं, वे साहित्य के सम्पर्क में आए बगैर भी नहीं रहते. इस आयोजन में मैंने विद्यार्थियों का, आम लोगों का साहित्यकारों के प्रति जो अनुराग देखा, वह मुझे तो अच्छा ही लगा. इस तरह के आयोजन अगर बार-बार हों तो मुझे तो उम्मीद होती है कि साहित्य और जन के बीच की खाई पटेगी.

कुछ लोगों का यह खयाल है कि इस आयोजन में जो लोग थे वे तो लेखक थे ही नहीं. ऐसे लोग न विक्रम सेठ को लेखक मानते हैं, न चेतन भगत को, न निकिता ललवानी को, न पीको अय्यर को, न मुहम्मद हनीफ को न अशोक वाजपेयी को, न सत्यनारायण को. कभी विचारधारा बीच में आती है तो कभी लोकप्रियता तो कभी व्यक्तिअगत पसंद-नापसंद.

विचारधारा का महत्व है, लेकिन मुझे सदा यह लगता है कि जो हमसे भिन्न विचारधारा वाला है उसे भी बचे और बने रहने का हक़ है, और हमें उसकी बात भी सुननी तो चाहिए. रही बात लोकप्रियता की, तो मुझे यह बहुत अजीब लगता है कि एक तरफ तो हम पाठकों की कमी से व्यथित होते हैं और दूसरी तरफ अगर कोई लेखक ज़्यादा पढा जाता है तो इसे उसका दोष मानते हैं. चेतन भगत और गुलशन नन्दा में फर्क़ तो करना पड़ेगा. हम यह कह कर कि लोग अच्छे और बुरे साहित्य में अंतर नहीं कर पाते हैं, जनता का भी अपमान करते हैं. अगर किसी को खूब पढा जा रहा है, तो हमें भी यह देखना होगा कि उसे क्यों पढा जा रहा है, और हमें क्यों नहीं पढा जा रहा है. वैसे इस आयोजन में लोकप्रिय के साथ-साथ बेहद गम्भीर लेखक भी कम नहीं थे. इसलिए यह मुद्दा कोई वज़न नहीं रखता.

इधर हमारे साहित्यिक आयोजनों में जो अनेक विकृतियां आ गई हैं, उनमें से कई से मुझे यह आयोजन काफी हद तक मुक्त नज़र आया. समय की पाबन्दी यहां थी, और बावज़ूद अनेक सेलिब्रिटीज़ के थी, जो हमारे आयोजनों में प्राय: नहीं होती. हमारे आयोजन समय पर तो शायद ही कभी शुरू होते हों. इतना ही नहीं, वे बेवजह लम्बे भी खिंचते जाते हैं, लोग अनर्गल बोल कर सुनने वालों के धैर्य की परीक्षा लेते रहते हैं. यहां वैसा नहीं था. इसे अंग्रेज़ी की प्रकृति कह कर कृपया अपनी भाषाओं की गरिमा को कम न करें. आम और खास के बीच का भेद, जिससे हम चाह कर भी बच नहीं पाते हैं, यहां नहीं था. नाम लेने की ज़रूरत नहीं है, हम सभी जानते हैं कि हमारे बहुत सारे लेखक किसी कार्यक्रम में तभी जाते हैं जब आप उन्हें अध्यक्ष या मुख्य अतिथि बनायें. कोई सिर्फ निमंत्रण-पत्र के आधार पर आ जाए, यह तो कम ही होता है. निमंत्रण पत्र के अलावा आयोजक का फोन तो हरेक ही चाहता है. अखबार में सूचना पढ कर तो वही पहुंचता है जो अकिंचन होता है. उस बेचारे को कोई पूछता भी नहीं. लेकिन इस आयोजन में यह भी हुआ कि अनुपम खेर जो शहर में अपनी किसी फिल्म की शूटिंग कि सिलसिले में थे, बिना बुलाये ही पहुंच गए.

इतना ही नहीं, पूरे कार्यक्रम में कहीं भी खास और आम के बीच भेद नहीं था. जहां कुर्सी नज़र आए, बैठ जाएं. कुर्सी न हो तो ज़मीन पर बैठ जाएं. एक सत्र में तरुण तेजपाल देर से आए और बिना किसी संकोच के ज़मीन पर बैठ गए. उसी सत्र में तरुण विजय कहीं पीछे ज़मीन पर बैठे थे. न इन लेखकों ने इसे अपना अपमान समझा और न आयोजक इस बात को लेकर अतिरिक्त सजग नज़र आए. यही हाल खाने पीने के दौरान भी रहा. सारे लेखक, चाहे वो विक्रम सेठ हों, गुलज़ार हों, प्रसून जोशी हों, चेतन भगत हो, विलियम डालरिम्पल हों, अशोक वाजपेयी हों, दूसरे तमाम ज्ञात-अज्ञात लोगों के साथ समान भाव से खाते- पीते रहे. आयोजकों की तारीफ इस बात के लिए भी करना ज़रूरी है कि उन्होंने लेखकों के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं किया. राजस्थान के किसी छोटे-से कस्बे से आने वाले लेखक को भी उसी होटल (पंच सितारा) में ठहराया जहां विक्रम सेठ, चेतन भगत, गुलज़ार, या प्रसून जोशी को ठहराया. यह भी उल्लेखनीय है कि डिग्गी पैलेस के दरबार हॉल में जो भी सत्र हुए उनमें से करीब-करीब सारे हाउस फुल थे और लोगों की भारी भीड़ अन्दर जगह न मिलने की वजह से बाहर स्क्रीन पर अन्दर की कार्यवाही देखती रही. साहित्य को इतना लोकप्रिय मैंने तो कम ही देखा है. आयोजन के सत्रों में औपचारिकता न्यूनतम थी. माल्यार्पण वगैरह कुछ नहीं. कहना अनावश्यक है कि हमारे अनेक आयोजनों में तो माल्यार्पण ही 30-40 मिनिट खा जाता है. यहां तो एक दो वाक्यों में पैनल का परिचय और विमर्श शुरू. सत्र एकदम ठीक समय पर शुरू और ठीक वक़्त पर खतम. अगर ऐसी समय की पाबन्दी हमारी ज़िन्दगी में आ जाए, या कम से कम हमारे आयोजनों में ही आ जाए, तो कितना अच्छा हो. पैनल के विचार विमर्श के बाद श्रोताओं को खुली आज़ादी होती कि वे सवाल पूछें. इसके विपरीत, अक्सर हमारे आयोजनों में श्रोताओं को मुंह खोलने का कोई अवसर नहीं मिलता. इस आयोजन के बारे में आप चाहे जो राय रखें, इन बातों को तो आप नहीं नकार सकते. मुझे तो लगता है कि अगर मैं सारी असहमतियों को भी स्वीकार कर लूं तो भी इन कारणों से भी यह आयोजन बेहद महत्वपूर्ण था.

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