हरजिंदर सिंह लाल्टू कल्पना पर हिंदी लेखक
जैसे
जैसे हर क्षण अँधेरा बढ़ता
तुम शाम बन
बरामदे पर बालों को फैलाओ
खड़ी क्षितिज के बैगनी संतरी सी
उतरती मेरी हथेलियों तक
जैसे मैं कविताएँ ढोता
रास्ते के अंतिम छोर पर
अचानक कहीं तुम
बादल बन उठ बैठो
सुलगती अँगड़ाई बन
मेरी आँखों के अंदर कहीं।
-- 1987 (आदमी 1988; 'एक झील थी बर्फ की' में संकलित)
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