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आधुनिक इतिहास और पारम्परिक समूहों का भविष्य, भाग 1

ओमप्रकाश दीपक (1971 के आसपास)

बीसवीं सदी के आरम्भ तक पश्चिम के, यानि गोरी दुनिया के विद्वान युरोप की वर्तमान औपनिवेशिक सभ्यता के बाहर की सभी पुरानी सभ्यताओं का अध्ययन करते नृतत्व शास्त्रीय संग्रहालयों की तरह करते थे, ये जानने की कोशिश में कि यूरोप की गोरी, ईसाई, और औद्योगिक सभ्यता में मनुष्य की चरम, श्रेष्ठतम उपलब्धियों के पहले मनुष्य लड़खड़ाते कदमों से सभ्यता की किन छोटी चोटी सीढ़ियों पर चढ़ा था. यूरोप की नयी सभ्यता के बाहर के समाजों का अध्ययन, मनुष्य के इतिहास से भिन्न "प्राकृतिक इतिहास" विषय के अन्तर्गत किया जाता था. उसमें धर्म का भी शायद कुछ हाथ था, क्योंकि मसीही विश्वास के अनुसार जिन लोगों की पापमुक्ति के लिए ईश्वर ने न कोई मसीहा या पैगम्बर भेजा था, न कोई "किताब" दी थी, वे निश्चय ही यूरोपीय ईसाईसियों से भिन्न कोटी के जीव थे. इसी के अनुसार उन्नीसवीं सदी तक युरोप के "उदार" कहलाने वाले विद्वान भी दुनिया के रंगीन चमड़ी वाले तमाम लोगों को तीन मुख्य हिस्सों में बाँटते थेः "आदिम" समाजों के लोग, जो "सभ्यता" से सर्वथा अपरिचित थे, और बौद्धिक दृष्टि से भी अविकसित थे. मिस्र और पश्चिमी एशिया तथा मध्य और दक्षिणी अमेरिका की पुरानी अनगढ़ सभ्यताएँ, जो बहुत पहले नष्ट हो चुकीं, और इन इलाकों के लोग इन्सान कहलाने के लायक हैं तो धर्म के प्रभाव के कारण - उत्तरी अफ्रीका और पश्चिमी एशिया में इस्लाम, और अमरीका में मसीही धर्म. तीसरे, चीन और हिन्दुस्तान जैसे देशों के "अर्ध सभ्य" लोग.

यूरोपीय देशों के औपनिवेशिक विस्तार के साथ ही इन गैर यूरोपीय क्षेत्रों को ले कर झगड़े भी शुरु हो गये थे, और अक्सर ऐतिहासिक अध्ययन इन झगड़ों को ले कर ही केंन्द्रित रहते थे - स्पेनियों द्वारा रक्त मिश्रिण, या अंग्रेज़ों-फ्राँसीसियों द्वारा सामूहिक हत्या, अमरीकी आदिवासी समाजों को खत़म करने का कौन सा तरीका ज़्यादा बुरा था? एशिया, अफ्रीका और अमरीका में विभिन्न यूरोपीय देशों के आचरण का तुलनात्मक अध्ययन दिलचस्प ही नहीं शिक्षाप्रद भी हो सकता है, लेकिन यहाँ मैं ध्यान इस ओर खींचना चाहता हूँ कि बाकी दुनिया के बारे में यूरोपीय देशों के बीच चाहे जो भी मतभेद रहे हों, एक बात पर सभी सहमत थे कि अगर कुछ गलतियाँ हुई भी थीं, तो ऐतिहासिक दृष्टि से उनका कोई विषेश महत्व नहीं था. औपनिवेशिक साम्राज्यों और विभिन्न क्षेत्रों में बसने या काम करने वाले गोरे व्यवसायियों और पादरियों के माध्यम से मसीही सभ्यता के कल्याणकारी प्रभाव के ज़रिये ही दुनिया के असभ्य और अर्ध सभ्य लोग अपनी बौद्धिक और आध्यात्मिक क्षमता की हद तक सभ्य बन सकते थे. स्वभावतः, उसका तो कोई सवाल नहीं उठता था कि वे कभी सभ्य गोरी जातियों के समकक्ष भी आ सकते थे.

जिसे यूरोप का "नवजागरण" काल कहा जाता है (वास्तव में उसे केवल "जागरण" काल कहना चाहिए) उसके प्रारम्भ होने तक, यानि तैहरवीं चौदहवीं सदी तक, यूरोप के लोगों का सम्पर्क अधिकांश अरब लोगों के साथ ही था, जो उस काल में (11वीं से 18वीं सदी तक) ज्ञान विज्ञान के सभी क्षेत्रों में युरोप के गुरु बन सकते थे. प्राचीन यूनान, खास तौर पर अरस्तु के दर्शन और विज्ञान से युरोपवासियों का वास्तविक परिचय भी स्पेन विजय करने वाले मुसलमान अरबों के माध्यम से हुआ था. उस समय युरोप को, जिसमें नयी स्फूर्ति और शक्ती का संचार हो रहा था, एक चीज़ की कमी बहुत अखर रही थी - इतिहास की. रोम का साम्राज्य, मसीही धर्म का विस्तार, इनमें ऐतिहासिक सामग्री काफ़ी थी, लेकिन मनुष्य की एकमात्र श्रेष्ठतम सभ्यता के लिए पर्याप्त ऐतिहासिक आधार नहीं था. सेन्ट थामस ऐक्वीनास ने अरस्तु के विज्ञान को रोमन कैथोलिक धर्मशास्त्र के साथ जोड़ कर इस कमी को पूरा किया. प्राचीन यूनान की बौद्धिकता, रोम साम्राज्य का संगठन, और मसीही धर्म, इन महान आधारों पर निर्मित होने और उनकी उत्तराधिकारी होने का दावा करने वाली युरोपीय सभ्यता मनुष्य की एकमात्र सभ्यता हो गयी, अन्य सभ्यताएँ तो केवल "अर्ध सभ्यताएँ" थीं, अक्षम समूहों का असफल प्रयत्न.

इस संदर्भ में क्या युरोप के सामूहिक अवचेतन की किसी हीन भावना के कारण ही युरोप की मूलतः औपनिवेशिक सभ्यता के विद्वानों का दिमाग बराबर इतिहास दर्शन पर, इतिहास की व्याख्या करने की चेष्टाओं पर केंद्रित रहा है? आधुनिक युरोपीय सभ्यता के मूल उत्स से इन चेष्टाओं का कोई सम्बंध हो, यह ज़रूरी नहीं. बल्कि कोई महत्वपूर्ण सम्बंध शायद नहीं ही है. लेकिन इतिहास की व्याख्याओं में आम तौर पर और जो भी विवाद रहे हों, एक बात पर व्यापक सहमति रही है कि सभ्यता का अर्थ है युरोप और वह हमेशा से विश्व का नेता और गुरु रहा है. (भारत को विश्व गुरु का दर्जा देने दिलाने के इच्छुक लोग ज़रा इस तरह की बातों पर सोचा करें तो अच्छा हो.) इतिहास दर्शन की यह परम्परा उन्नीसवीं सदी के अन्त तक चलती रही, और मार्क्स शायद इसके अंतिम प्रवक्ता थे. एक विश्व व्यवस्था के रूप में पूँजीवाद के विस्तार और समाजवादी क्रांती में यह अन्तर्निहित था कि इस क्रम में युरोपीय सभ्यता अन्य "असभ्य" समाजों में जागरण लाती हुई (पहले पूँजीवादी, फ़िर समाजवादी रूपों में) विश्व सभ्यता बन जायेगी.

बीसवीं सदी की पहली चौथाई में ही यूरोप उत्तरी अमरीका के कुछ संवेदनशील लोगों के दृष्टिकोण में कुछ परिवर्तन दिखाई देने लगा. इसकी अभिव्यक्ति अगर एक स्तर पर स्पेंगलर की "डिक्लाईन ओफ दी वेस्ट" में हुई तो दूसरे स्तर पर ही एस. इलियट की "वैस्टलैंड" में. 1939-45 के युद्ध के पहले हिन्दुस्तान, चीन और मेक्सिको की राजनीतिक घटनाओं का, और काफ़ी हद तक तुर्की, मिस्र तथा कुछ दक्षिण अमरीकी देशों में होने वाली हलचलों का भी प्रभाव पड़ा. पुरातत्व, नृतत्व शास्त्र, समाजशास्त्र और मनोविज्ञान में हुए अध्ययन और खोजकार्य से भी दृष्टिसुधार में सहायता मिली. बहरहाल दूसरे महायुद्ध के तत्काल बाद 1945 और 1950 के बीच के पाँच वर्षों में ऐसा प्रतीत हुआ जैसे युरोप उत्तरी अमरीका में कम से कम, चोटी के विद्वानों में, एक नये बौद्धिक वातावरण का निर्माण हुआ है जिसमें युरोपीय श्रेष्ठता की भावना का पूर्ण रूप से परित्याग कर दिया गया है. उसमें दार्शिनकों और इतिहासकारों दोनों ने ही प्रमुख योग दिया.

इस नये बौद्धिक वातावरण की एक ख़ास मिसाल (यूँ इसके बहुसंख्यक उदाहरण हैं) अमरीकी दार्शनिक नारथ्राप की "दी मीटिंग आफ़ ईस्ट ऐन्ड वेस्ट" में देखी जा सकती है जिसके पहले अध्याय के प्रारम्भिक वाक्यों में ही 1939-45 के युद्ध के बारे में कहा गया है कि "ठीक ठीक कहें तो यह पहला विश्व युद्ध है." (रेखांकन मूल पुस्तक में) अर्थात 1914-18 का युद्ध विश्व युद्ध नहीं था, केवल युरोपीय देशों का आपस में युद्ध था. यहां यह आपत्ती उठायी जा सकती है कि 1939-45 का युद्ध भी विश्व युद्ध नहीं था, मूलतः 1914-18 के युद्ध का ही भौगोलिक दृष्टि से अधिक विस्तृत रूप था. इस भौगोलिक विस्तार के कारण उसे विश्व युद्ध कहना उचित है या नहीं, इसकी बहस यहाँ अप्रसांगिक होगी. नारथ्राप की बात का असली महत्व इस स्पष्ट स्वीकृति में है कि यूरोप के लोग एक लम्बे अरसे से अपने अनुभवों को, अपनी संस्थाओं और अवधारणाओं को, जो यूरोपीय सभ्यता के बाहर वैध या सार्थक नहीं थीं, बिल्कुल नकली और गलत ढंग से सार्विकता का जामा पहना कर सारी दुनिया पर लागू करते चले आ रहे थे.

लेकिन यह बौद्धिक वातावरण कायम नहीं रहा. इसका मूल कारण यही है कि कुछ ख़ास व्यक्तियों और छोटे छोटे समूहों को छोड़ कर, जिनका अपने समाज पर कोई निर्णायक प्रभाव नहीं है, इस बौद्धिक वातावरण के पीछे मूल भावना भय की थी. दो बड़े युद्धों और उनके बीच होने वाली घटनाओं ने गोरी दुनिया के अंदर यह भय उत्पन्न कर दिया कि उनकी सभ्यता कहीं आत्महत्या की ओर तो नहीं बढ़ रही है. अपने आपसी झगड़ों का निपटारा न कर पाने के कारण यूरोप के देश दो बड़े युद्धों में फँसे, जिनमें यूरोप की अपार क्षति हुई. 1905 में रूस पर जापान की विजय आधुनिक युग में किसी यूरोपीय महाशक्ति पर किसी एशियाई देश की पहली विजय थी, और दोनो युद्धों के बीच जापान स्वयं एक औद्यौगिक और सामरिक महाशक्ति बन गया था. 1947 की क्रांती के बाद, कम से कम पहले दौर में साम्यवादी रूस यूरोपीय सभ्यता से अलग एक नये प्रकार के समाज का निर्माण करता प्रतीत हो रहा था. कई देशों में साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष काफ़ी तीव्र हो गया था, और दूसरे महायुद्ध में हालैन्ड, बेलजियम और फ्रांस की पराजय से उनके उपनिवेशों की स्वतंत्रता वैसे ही अनिवार्य प्रतीत होने लगी थी जैसे डेढ़ सौ साल पहले नेपोलियन के हाथों स्पेन की पराजय के बाद स्पेन के अमरीकी उपनिवेशों की स्वतंत्रता अनिवार्य हो गयी थी.

लेकिन 1950 के बाद यह भय दूर हो गया. मार्शल योजना के फलस्वरूप पश्चिमी यूरोप के देश शीघ्र ही दोबारा अपने पावों पर खड़े हो गये, बल्कि उनकी समृद्धि उत्तरोतर बढ़ने लगी. रूस अमरीका के शीत युद्ध और उसके फलस्वरूप यूरोप के विभाजन से चाहे जो भी तनाव पैदा हुए, इससे यह भी साबित हो गया कि सोवियत रूस का लक्ष्य यूरोपीय सभ्यता का शक्तिशाली अंग बनना ही था. पराजित जापान में यूरोपीय राजनीतिक संस्थाओं और समाजिक संगठन के प्रतिरोपण में कोई कठिनाई अमरीका को नहीं हुई.

1950 के बाद यह भी स्पष्ट हो गया कि दूसरे महायुद्ध के बाद स्वतंत्र होने वाले देशों से गोरी सभ्यता को कोई खतरा नहीं था. अमरीका में उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में स्वतंत्र होने वाले देशों को संयुक्त राज्य अमरीका ने तत्काल अपने संरक्षण में ले लिया था. मेक्सिको से ले कर चिली तक मध्य और दक्षिणी अमरीका के बीस देशों में से अधिकांश में नये शासक या तो स्पेन पुर्तगाल से आ कर बसे हुए लोग थे या मिश्रित रक्त के लोग. समूचे महाद्वीप के आदिवासियों का राजनीतिक सामाजिक संगठन बिखर गया था. मेक्सिको के जुआरेज़ को छोड़ कर सारे महाद्वीप में एक भी बड़ा आदिवासी नेता सामने नहीं आया. स्वतंत्र राज्यों में भी आदिवासी पहले की तरह शक्ति केन्द्रों से दूर, गरीबी और शोषण के शिकार रहे. मसीही धर्म नये राज्यों के साथ भी जुड़ा रहा. शायद केवल मेक्सिको में ही उसने एक विशिष्ठ रूप ग्रहण किया. लेकिन मेक्सिको में भी राज्यशक्ति अधिकांश गोरे अधगोरे लोगों के हाथ में ही केंद्रित रही. विदेशी सत्ता को समाप्त करने में आदिवासियों ने बहुधा प्रमुख योग दिया, लेकिन देश में शक्ति और सत्ता एक यूरोप अभिमुख अभिजात वर्ग में ही केंद्रित रही.

एशिया और अफ्रीका में जातीय स्थिति ऐसी नहीं थी. लेकिन बीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक, चार सौ साल दुनिया में राज करने के बाद गोरी सभ्यता ने सारी दुनिया की स्थिति को चार बुनियादी मामलों में बदल डाला था - जापान के अपवाद को छोड़ कर, तमाम रंगीन चमड़ी वाले लोगों की उत्पादन व्यवस्थाएँ नष्ट हो गयीं थीं. उनकी जगह ऐसी व्यवस्थाओं ने ले ली थी जिनका उद्देश्य यूरोप की ओद्योगिक व्यवस्था की ज़रूरतों को पूरा करना था. दूसरे गोरों की आबादी का अनुपात दुनिया की आबादी के दसवें हिस्से से बढ़ कर तीसरे हिस्से पर पहुँच गया था. (इसपर क़यामत है कि अच्छे भले लोग रंगीन चमड़ी के लोगों में जनसंख्या वृद्धि को विश्व युद्ध के खतरे के बाद दुनिया का सबसे बड़ा खतरा मनाते हैं!) तीसरे, साम्राज्यवाद के ज़रिये गोरी सभ्यता ने अपनी उत्पादन प्रणाली का ऐसा विकास कर लिया कि गोरे मज़दूर की औसत उत्पादकता एशिया अफ्रीका के मज़दूर से बीस गुनी तक अधिक हो गयी. चौथे, उपनिवेशवाद ने अपने अधीन सभी देशों में नौकरशाही, व्यापार और सेना में एक ऐसे छोटे से वर्ग का निर्माण किया जो बोली, रहन सहन, और सतही विचारों में (जीवन के बुनियादी मूल्य नहीं) गोरे लोगों की बन्दर नकल को ही जीवन की श्रेष्ठतम उपलब्धि मानने लगा. यह वर्ग पहले उपनिवेशवाद को कायम रखने का औज़ार था, फ़िर स्वतंत्र देशों में गोरी दुनिया के अप्रत्यक्ष साम्राज्यवाद को क़ायम रखने का औज़ार बन गया.

साम्यवादी चीन ने मूलतः वही मार्ग अपनाया है जो दूसरे महायुद्ध के पहले जापान ने अपनाया था - क्रूर सैनिक राजनीतिक तानाशाही के माध्यम से शक्ति और साधनों का केन्द्रीकरण, और इस केन्द्रित शक्ति के इस्तेमाल सामरिक शक्ति का विकास करके अपने को विश्व के राष्ट्रों के बीच एक महाशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करना. विस्तारवाद का परिचय तो साम्यवादी चीन ने 1950 में तिब्बत पर सैनिक अभियान के द्वारा कब्ज़ा करके ही दे दिया था. भारतीय भूमि पर अधिकार और 1962 में भारत पर आक्रमण उसी नीति की कणियाँ थीं. चीन को इतनी सफलता मिली है कि आम तौर पर उसे अब एक महाशक्ति के रूप में स्वीकार कर लिया गया है. अमरीका द्वारा चीन से सम्बंध सुधारने की कोशिश, सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता और संयुक्त राष्ट्र संघ से ताइवान का निष्कासन इस स्विकृति के औपचारिक परिणाम हैं. अब यह अपेक्षा की जा सकती है कि चीन धीरे धीरे सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव क्षेत्र स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील होगा.

इस सिलसिले का नतीज़ा बुनियादी तौर पर यह निकला है कि गोरी सभ्यता ही अब भी "असली" सभ्यता है, और सारी दुनिया को उसी के अनुरूप अपना विकास करना है. लेकिन आग्रह बदल गया है. अब यह सभ्यता उन्नीसवीं सदी की, या बीसवीं सदी कके पहले दशकों की "मसीही" सभ्यता नहीं है, वरन् "आधुनिक औद्योगिक" सभ्यता है. लेकिन इससे रंगीन चमड़ी वाले लोगों की दिक्कतें किसी तरह कम नहीं होतीं. अभी भी कुछ ऐसे लोग हैं जिनकी गिनती "आधुनिक" विचारकों में होती है, जो यह मानते हैं कि दुनिया के गोरे लोग अन्य लोगों से श्रेष्ठ हैं. कारण बदल गये हैं. गोरे लोग श्रेष्ठ ईसा मसीह की कृपा से नहीं हैं वरन् इस लिए हैं कि अपनी सभ्यता के माध्यम से वे दुनिया के अन्य सभी लोगों से श्रेष्ठ प्राणी के रूप में विकसित हुए हैं - प्राणीशास्त्रीय विकासवाद के अनुसार.

इसके समकक्ष, राजनीति में, अफ्रीकी महाद्वीप के दक्षिणी भाग में कालाहारी मरुस्थल के चारों ओर, इन श्रेष्ठ गोरों के द्वारा एक नये शक्तिकेंद्र का निर्माण किया जा रहा है. ब्रितानिया, हालैंड और पुर्तगाल से आ कर बसे लोग ज़िम्बाबवे (द. रोडेशिया), दक्षिणी अफ्रीका, नामिबिया (दक्षिणी पश्चिमी अफ्रीका), अंगोला और मोज़ाम्बीक में मिल कर गोरी सभ्यता के एक नये गढ़ का निर्माण कर रहे हैं. यह सभ्यता अपने इस गढ़ में "मसीही" भी है, "औद्योगिक" भी, "गोरी" भी. और यहाँ कैथोलिक-प्रोटेस्टेंट, लोकतंत्र-तानाशाही, लातिन-ऐग्लोसेक्सन, इन सब का कोई महत्व वास्तव में है नहीं, महत्व है सिर्फ यूरोपीय वंशज होने का.

बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो सिद्धांत रूप में अब गोरी दुनिया की श्रेष्ठता का दावा नहीं करते. लेकिन यह सब निहायत भले और सज्जन लोग, यह मान कर चलते हैं कि औद्योगिक विकास ही सभ्यता का आधार है. जाने अनजाने यह भूल कर कि जिसे "आधुनिक" औद्योगिक व्यवस्था कहा जाता है, वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष साम्राज्यवाद के माध्यम से ही निर्मित हुई है. यह भले लोग निहायत मासूमियत के साथ दुनिया के तमाम ग़रीब देशों की तरफ़ देख कर सवाल उठाते हैं - इनका औद्योगिक विकास क्यों नहीं हो रहा? अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, सामाजिक मनोविज्ञान, राजनीति, सभी दृष्टियों और पहलुओं से इस प्रश्न पर विचार करने के बाद यह सज्जन मूलतः इसी नतीजे पर पहुँचते हैं कि रंगीन चमड़ी वाले लोग अपना आधुनिकीकरण करें, तभी उनमें औद्योगिक विकास हो सकता है. "पाराम्परिक समाजों का आधुनिकीकरण" यह पश्चिमी चिंतन की एक केंद्रीयसमस्या बन गयी है. यह समस्या ही इसी लिए है कि तथाकथित "पाराम्परिक" समाजों की कुछ खासियतें ऐसी हैं, जो उनके आधुनिकीकरन में बाधक हैं. इस चिंतन के नतीजे अलग अलग निकलते हैं. कुछ शुभचिंतक कहते हैं कि जो अपना आधुनिकीकरण नहीं करेंगे, नुकसान उन्हीं का होगा. कुछ को तकलीफ़ होती है कि पश्चिमी सभ्यता सार्विकता के अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पा रही. कुछ की राय में पाराम्परिक समाजों में बस इतना ही परिवर्तन काफ़ी है कि उनमें औद्योगीकरण हो सके. लेकिन औद्योगीकरण की स्वतःस्फूर्त प्रक्रिया के लिए, कुछ लोगों की राय में आमूल और व्यापक परिवर्तन आवश्यक है, यानी आधुनिक मूल्यों की प्रतिष्ठा के बिना औद्योगीकरण भी नहीं हो सकता, गो ये "मूल्य" कौन से हैं इस पर सहमती केवल एक बात को ले कर है - तकनालाजी. यूरोप उत्तरी अमरीका की उत्पादन पद्धति आधुनिकता की बुनियादी शर्त है.

घूम फिर कर हम फिर उसी जगह वापस आ गये हैं. चार सौ साल तक बाक़ी दुनिया को जो अपनी ज़रूरत के मुताबिक गढ़ने की कोशिश, और इसमें बाधक सभी तत्वों कको नष्ट करने के बावज़ूद, बीसवीं सदी में इस दावे को जारी रखना संभव नहीं गया था कि गोरी सभ्यता ही एकमात्र "सभ्यता" है, और यूरोप हमेशा से दुनिया का नेता और गुरु रहा है, अब भी है. लेकिन सिद्धांत रूप में मनुष्य की समानता, और अतीत की अन्य सभ्यताओं की उपलब्धियों की स्वीकृति के बावज़ूद, गोरी सभ्यता अपनी आधुनिक "तकनालाजी" के कारण श्रेष्ठ है, और अगर व्यवहार में दुनिया के लोगों में समानता स्थापित करनी है, तो यह तभी हो सकता है जब सारी दुनिया इस तकनालाजी को अपना ले. अगर रंगीन चमड़ी वाले लोग ऐसा नहीं कर पाते तो ज़ाहिर है कि उनमें, उनके समाजों में, उनकी सभ्यता में कुछ बड़ी कमियाँ हैं. गोरी दुनिया को पहले ख़ुदा ने श्रेष्ठ बनाया, अब तकनालाजी ने श्रेष्ठ बना रखा रखा है.

कुछ थोड़े से गिने चुने लोग पश्चिम में ऐसे भी ज़रूर हैं, जो अगर पूरी तरह अपनी सभ्यता को अस्वीकार नहीं करते (गो पूर्ण अस्वीकृति वाले लोग भी हैं) तो कम से कम उसके वर्तमान रूप की सार्विकता से इन्कार करते हैं. इनमें बहुत तरह के लोग हैं, लेकिन मोटे तौर पर उनमें दो श्रेणियाँ हैं. एक प्रकार के लोग वे हैं जो अनुभव करते हैं कि यूरोप उत्तरी अमरीका के "समृद्ध", "उपभोत्ता" समाज ने न सिर्फ़ आदमी को मशीन का ग़ुलाम बना दिया है, बल्कि उसके मानसिक या आध्यात्मिक जीवन में शून्यता उत्पन्न कर दी है, जिसके फ़लस्वरूप पूरी सभ्यता ही खंडित व्यक्तित्व का शिकार हो गयी है. दूसरी ओर ऐसे लोग हैं जो अनुभव करते हैं कि उनकी पूरी सभ्यता जातीय विषमता और औपनिवेशिक शोषण की नींव पर ही खड़ी है. लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है जो इस बात को भी समझते हैं कि यह दोनो पहलू एक दूसरे से बहुत गहरे जुड़े हुए हैं. ऐसे लोगों ने स्वभावतः सभ्यता की समस्या को विश्व संदर्भ में देखा है, और कुछ ने इसे "संस्कृति का संकट" कहा है, इस अर्थ में कि मनुष्य की अब तक की कोई भी सभ्यता ऐसी नहीं रही है कि उसमें मनुष्य का बहुमुखी व्यक्तित्व उसमें पूरी तरह विकसित हो सकता. हर सभ्यता किसी एक दिशा में ही विकसित हुई. फलस्वरूप विश्व का भौगोलिक विभाजन उसका सांस्कृतिक विभाजन भी है.

ऐसी हालत में, किसी ऐसी विश्व सभ्यता का निर्माण क्या संभव है जिसमें दुनिया की अलग अलग संस्कृतियाँ एक दूसरे से सीख कर अपने अभावों की पूर्ती कर सकें? सिद्धांत रूप में अगर इसे मान भी लिया जाये, तो दुनिया की मौजूदा विषमता और भिन्नताओं को देखते हुए, इसे व्यवहार में कैसे लाया जा सकता है? इन प्रश्नों का उत्तर देना आसान नहीं है, और बहुत कम लोगों ने उसका जोख़िम उठाया है. उनकी विषेश चर्चा यहाँ अनावश्यक है. एक ऐतिहासिक अनीवार्यता की चर्चा भी इस संद्रभ में की गयी है - हथियारों की विध्वंसक शक्ति इतनी बढ़ गयी है या फ़िर इन हथियारों का इस्तमाल मौजूदा सभ्यता को ही ख़तम कर देगा. शायद एक विकल्प और भी है - एक शक्ति आधारित अंतर्राष्ट्रीय जाति प्रथा. पिछले पच्चीस वर्षों का इतिहास दिखाता है कि इस तरह की जाति प्रथा चलाई जा सकती है और शक्ति सम्बंधों में परिवर्तन के अनुसार उसमें थोड़ा बहुत हेर फ़ेर भी हो सकता है. मिसाल के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गयी क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्य संख्या दोगुनी से भी ज़्यादा हो गयी है. इसके साथ ही अमरीका की हैसियत कुछ घटी है. साम्यवादी चीन दुनिया के द्विज राष्ट्रों की कोटि में आ गया है. लेकिन क्या किसी ऐसी व्यवस्था को अनिश्चित काल के तक चलाया जा सकता है जिसमें स्वयं को अपने निकट अतीत की तुलना में तो लगभग सभी देशों की स्थिति सुधरेगी, लेकिन विभिन्न देशों के बीच विषमता बढ़ती ही चली जायेगी? मिसाल के लिए निकट भविष्य में ही, जापान और जर्मनी की हैसियत का सवाल इस व्यवस्था के लिए बड़ी झंझट पैदा कर सकता है.

बहरहाल ऐतिहासिक अनिवार्यताओं की बात छोड़ें, हर हालत में किसी विश्व सभ्यता का निर्माण और विकास उस समस्या के हल से जुड़ा हुआ है, जिसे "संस्कृति का संकट" कहा गया है, यानि राष्ट्र के अंदर ही नहीं, राष्ट्रों के बीच भी समता हो. सम्भावतः धर्म इस "संस्कृति के संकट" का एक महत्वपूर्ण पक्ष है, यद्यपि पश्चिमी विद्वान अक्सर इस पक्ष की उपेक्षा कर जाते हैं. इधर फ्राँसिसी नृतत्वशास्त्री क्लाउड लेवी स्ट्रास के अध्ययनों ने इस संकट के एक नये आयाम को उजागर किया है - जो समाज अभी तक लगभग सभी लोगों द्वारा असभ्य और जँगली समझे जाते रहे हैं (जो निरक्षर हैं, और जिन्हें लेवी स्ट्रास भी "पूर्व कालिक" कहते हैं) उनकी बौद्धिक प्रक्रियाएँ उतनी ही विकसित और पेचीदा हैं जितनी की "सभ्य" कहलाने वाले समूहों की. अर्थात ये "कबाइली" कहलाने वाला जीवन बिताने वाले लोग भी दरअसल उतने ही सभ्य हैं जितने कि प्राचीन सभ्यताओं के वारिस, या कि वर्तमान गोरी सभ्यता के लोग. लेकिन उनका भविष्य क्या है?

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