ओमप्रकाश दीपक का लेखन कल्पना का हिन्दी लेखन जगत

आईने (कहानी)

दुबला पतला जिस्म, बार पर खड़ा होता तो सिर्फ कँधे और सिर ही ऊपर आते और सिर में भी चश्में के पीछे पारे सी तरल, दहकती आँखें ही आँखे, "एक पैग सोलन". दो, तीन, चार, पाँच, छः, सात, आठ, नौ बिना कुछ खाये, खाली पेट में नौ पैग व्हिस्की. वह भी "नीट", बिना सोडा मिलाये. बार के मालिक ने उसका चेहरा देखा और दसवां पैग उड़ेने से इन्कार कर दिया. "नहीं साहब, अब और नहीं दे सकता."

"अपने पैसे काट लो. शहर में और भी बहुत से बार हैं", उसने चिढ़ कर कहा और पैसे के कर सधे हुए कदमों से बाहर निकल गया. लेकिन बाहर निकल कर जैसे बहुत थक गया हो, उसने एक रिक्शा बुलाया और घर चला गया.

हरि ने काफ़ी नमक मिर्च लगा कर मेरे शायर दोस्त का किस्सा मुझे सुनाया. "साब बोले कि देखो वहां जाते हैं. लेकिन साब रिक्शेवाले को चार कमान चलने को बोले, तो मैं बोला कि घर ही गये होंगे."

सुन कर मैं मुस्कुरा दिया. मुस्कान कितनी कड़वी हो सकती है, कितनी कड़वी. मुझे हरि की बात पर अचरज नहीं हुआ. यूँ आम तौर पर शाहिद पर शराब कब क्या असर करेगी, कोई कुछ नहीं कह सकता. उस दिन तीसरे पैग पर ही नज़र बहकने लगी थी. "निर्मल भाई, लोग शराबियों को बुरा कहते हैं, लेकिन कोई यह नहीं सोचता कि जब सारी दुनियां अपने दर्द को छुपा कर सो जाती है, कोई थक कर, कोई ऊब कर, कोई औरत के आगोश में, तो आधी रात गये, नशे में चूर लड़खड़ाते हुए शराबी के डगमगाते कदमों में ही उन सब का दर्द ज़िन्दा होता है." मैंने कोई जवाब नहीं दिया. बहकती हुई नज़रों को रोक कर उसने गट गट तीन चार घूँट मारे, फ़िर गिलास रख कर बोला, "आज एक नज़्म पढ़ी भाई, गज़ल के मिसरे हैं कुछ -

आईना तोड़ूं तो हो जिस्म अपना ही फिगार,

और न तोड़ूं तो नींद आए न आँखों को करार."

बोल कर वह रुका, निढ़ाल हो कर छत को देखता रहा और धीरे धीरे गुनगुनाता रहा, "आईना तोड़ूं तो हो जिस्म अपना ही फिगार". लेकिन शाहिद भोपाल चला गया है और उसके बिना पुरानी जगहों में जाने को जी नहीं करता. वहीं, बड़ी सड़क से हट कर एक आलीशान इमारत है, शायद पहले किसी नवाब का महल रहा हो. अब होटल है और बगीचे में छोटे छोटे कुँज हैं. रोशनी सिर्फ इतनी कि पहचाने हुए चेहरे पहचाने जा सकें. कुर्सी पर निढ़ाल बैठा आँखें मूँदे ही सिगरेट पीता रहा. और बैरा आया तो वैसे ही बोला, "मीनू लाओ."

"मीनू बाबा तो नहीं है साहब. टिन्नी बाबा है. कहिए तो बुलाऊँ".

"क्या?" मैं चौंक कर सीधा हो गया.

"मीनू बाबा तो नहीं है साहब. टिन्नी बाबा हैं." बैरे ने दोहराया.

"अरे मैं वह कार्ड माँग रहा हूँ जिस पर लिखा रहता है कि तुम्हारे यहाँ मिलता क्या है?"

"ओह", बैरे के स्वर में निराशा आ गयी, "वह तो नहीं है साहब."

मेरे जी में आया एक बार की "टिन्नी बाबा" को बुलाऊँ. लेकिन मालूम नहीं था कि कितने पैसे खर्च हो जायेंगे. उतने में शायद एक हफ्ते व्हिस्की का खर्च निकल आये. शायद ज्यादा ही. फ़िर सोचा कि टिन्नी बाबा को बुला कर मैं करूँगा भी क्या.

व्हिस्की पीता रहा और बहुत तेज मिर्च वाला भुना हुआ गोश्त खाता रहा. मिर्चों से मेरे सिर के बाल पसीने से भीग गये. जबान की तलखी थोड़ा सोडा मिली व्हिस्की से कम हो जाती, लेकिन मन की तलखी?

मुझे लगता है जैसे वक्त सीधा नहीं चलता, गोलाईयों में चलता है. धीरे धीरे, सधी, नपी हुई गति से वक्त का अजगर अपनी कुडँली की गिरफ़्त को कसता जाता है और हड्डियाँ एक एक करके चटखती हैं. मैं न उस रफ़्तार को कम कर सकता हूँ, न तेज कर सकता हूँ. सिर्फ वक्त की गिरफ्त में कसा टूट सकता हूँ.

हुसैन सागर की लहरों में सुनहली, रुपहली मछलियाँ तैरती हैं. बाँध पर खामोशी को रह रह कर कोई बस या मोटर या स्कूटर की आवाज़ चीर जाती है. भीड़ नहीं है. कुछ लोग बैंचों पर बैठे हैं. बाँध के किनारे पानी तक उतरने के लिए पत्थर की सीढ़ियाँ हैं. दरारों में घास फूस उगी है. कोई उन पर जाता नहीं. अँधेरा है और पता नहीं सांप बिच्छू भी हों. ऊपर नीली रोशनियाँ हैं जिन में खूबसूरत चेहरे और भी खूबसूरत नज़र आते हैं. लेकिन मुझे इन सीढ़ियों पर बैठना अच्छा लगता है. नीचे की सीढ़ी पर बैठ कर पैर हिलाता हूँ तो लहरों में रुपहली सुनहली मछलियाँ और तेजी से कांपने लगती हैं.

झील के चारों और रोशनियाँ हैं, कतारों में, ऊपर नीचे, आढ़ी तिरछी. पानी की स्याह चादर पर तैरती हुई रुपहली सुनहली मछलियाँ और उसके पार जुगनुओं की तरह चमकती हुई रोशनियां. यह सब मुझे अच्छा लगता है. रात का अँढ़ेरा जैसे इनसे संवर जाता है. लेकिन मैं गलत जगह बैठ गया. सामने एक तेल कम्पनी का लाल नियोन विज्ञापन है जिसकी छाया पानी में ऐसी लगती है जैसे किसी दैत्याकार जानवर में मुंह में लिपटा हुआ खून. सिर घुमाया तो एक दम हथौड़े बज उठे, धरती घूम गयी. सिर में बड़े बड़े पत्थर भरे थे. कुछ देर सिर पकड़े बैठा रहा, फ़िर धीरे सिर उठा कर सिगरेट जला ली. ऊपर एक स्कूटर की आवाज गुज़री और हवा का पर्दा एक बार तेज़ी से काँप कर फ़िर अपनी धीमी रफ्तार से हिलने लगा.

बाँध के पत्थरों से लहरों के टकराने की आवाज उस खामोशी का ही एक हिस्सा है, जैसे झिलमिलाती हुई रोशनियाँ उस अँधेरे का. वहां बैठना अच्छा लगता है, क्योंकि उस खामोश अँधेरे में मैं अकेला नहीं होता. ज़िन्दगी जैसे अपने आदिम लेकिन कोमल रूप में मुझे छूती है, धीमे धीमे स्वरों मे बोलती है, गाती है, मुस्कुराती है, अपने खामोश दर्द में आँसू भर लाती है. लेकिन अकेलापन फ़िर लौट लौट आता है. लोगों के बीच में अकेलापन खाने लगता है. लगता है जैसे वक्त के अजगर ने सिर्फ मुझी को अपनी गिरफ्त में कस रखा है. कहीं कोई तो नहीं है जो मेरी हड्डियों को चटखते हुए सुन सके. और इस खामोश अँधेरे में थोड़ी देर बाद जी चाहता है कि किसी को छू सकूँ, किसी से बोल सकूँ.

बहुत पी गया था. इतनी देर बाद भी सिर में बड़े बड़े पत्थर भरे थे. ज़रा सा भी सिर हिलने पर जोर से बज उठते. शराब से भी चिढ़ होने लगी है. नहीं पीता तो टूटा रहता हूँ. लड़के, जिनकी जिज्ञासा कुछ मां बाप ने मार दी, कुछ किताबों मास्टरों ने, साथ के अध्यापक जिनमें सिर्फ वेतन और भत्ते, प्रिंसिपल के व्यवहार और अन्य अध्यापकों की नालायकी और नीचता की चर्चा होती है या कभी कभी किसी अभिनेत्री की. खबरों के बजाय भाषणों से भरे हुए अखबार और घटिया पत्रिकाएँ जिनमें किसी का व्यक्तित्व नहीं होता, सिर्फ मुखौटे और विज्ञापन, कभी बौद्धिक, कभी रोमानी, कभी सियासी. और जब शराब पी कर चाहता हूँ कि थोड़ी देर के लिए ही सही, अपने को इनसे मुक्त कर लूँ, तो खुद बंट कर दो हो जाता हूँ. एक जो चाहता है कि नशा चढ़े, इतना चढ़े की सभ्यता की दीवारें टूट जायें और वह खुद जैसा है बाहर निकल आये और दीवारों में बन्द लोगों पर और उनकी ज़िन्दगी पर हँसे और रोये. और दूसरा जो नशे से से लड़ता रहता है, किसी भी कीमत पर होश में रहना चाहता है, क्योंकि वह हँसने से भी डरता है, रोने से भी. कितना भी पी लूँ यह कशमकश बन्द नहीं होती.

और उस अनजान "मीनू" के चेहरे बार बार आते जाते हैं. वह जो नशे से लड़ता है, देखता एक कम उम्र में ही सख्त हुआ चेहरा, निर्जीव बुझी आँखें, जिस्म और चेहरे में छिपा हुआ तनाव और नपे हुए फासले में घटती बढ़ती मुस्कान. शराब चढ़ती तो आँखों में चमक आती. लेकिन तरलता नहीं. नज़रें जैसे नोच लेंगी. चेहरे और जिस्म का तनाव टूटता और कसाव भी. जैसे बैठे बैठे ही उसकी उम्र सालों बढ़ रही हो और उसके अंदर कुछ छटपटा रहा हो कि कैसे इस वक्त को जीते.

वह दूसरा जो नशे में डूबता है, उसके सामने एक ही चेहरा बार बार आ जाता है, जिसे पहली बार देख कर मैंने सोचा था कि यह मेरी ख्वाहिश नहीं, मेरा ख्वाब है. चेहरा मेरे सीने पर टिक जाता है. भीगी हुई आँखें पलकें उठा कर देखती हैं, हवा का परदा धीरे धीरे हिलता है और उन आँखों में रुपहली सुनहली मछलियाँ तैरती हैं. जिन्दगी अपने आदिम लेकिन कोमल रूप में बोलती है - मैं अकेली हूँ, बिल्कुल अकेली. जी चाहता है किसी को छू सकूँ, किसी से बोल सकूँ. लेकिन सिर में बड़े बड़े पत्थर भरे हैं. सिर हिलता है तो धरती घूमती है.

आईना तोड़ूं तो हो जिस्म अपना ही फिगार,

और न तोड़ूं तो नींद आए न आँखों को करार."

शहर की आलीशान कोठियों में से एक, लेकिन तीन लाख में रेहन है. सुना है नवाब साहब पर और भी बहुत कर्ज है. बैठक की छत से अब भी फानूस लटकाते हैं, लेकिन छत का पलस्तर जगह जगह से उखड़ गया है. चूता नहीं लेकिन छत बदरंग हो गयी है. शहर में ऐसी बीसियों कोठियां हैं जिनमें बरसों से पुताई नहीं हुई, छतें चूती हैं, खिड़कियां दरवाज़े गिर रहे हैं, दीवारें चखट गयीं हैं, पलस्तर उखड़ गया है, और उन्हीं में से एक उसका कैदखाना है. नवाब साहब बेटी नाती को कभी कोई अच्छा मुशायरा हुआ तो ले जाते हैं, लेकिन यकीन से यह भी नहीं कह सकता. मैंने तो सिर्फ एक बार देखा है.

मुशायरे के बाद शाहिद की बांह में बांह डाल कर निकल रहा था तो नवाब साहब ने देखा, रुक गये. "कहो मियां, कैसे हो? बड़ी अच्छी गज़ल पढ़ी तुमने. आज के मुशायरे में सबसे अच्छी." शाहिद ने बांह छुड़ा ली. थोड़ा झुक कर हथेली को तीन बार छाती के पास ला कर शुक्रिया अदा किया. नज़रें नवाब साहब के पीछे जा कर रुक गयीं. आँखों में एक हलकी सी लहर उठी और ऐंठ गयी. जैसे आईने के सामने खड़ा हो और सवाल उठे, तोड़ूं कि न तोड़ूं?

मैंने भी देखा, बेटे का हाथ पकड़े, मक्खनी साड़ी में लिपटा जिस्म. रुका हुआ, फ़िर भी चलता चलता सा. जैसे सबसे अलग, दूर कटा हुआ. और मैंने सोचा था, यह मेरी ख्वाहिश नहीं, मेरा ख्वाब है. शाहिद की आँखों में उठती हुई लहर को अपने आप में ऐंठ कर तड़पता हुआ भी मैंने देखा. वे लोग फौरन ही चले गये थे. मेरे जी में एक बार आया कि शाहिद की बांह में फ़िर से बांह डाल लूं. लेकिन लगा कि अब वह मौजूं नहीं होगा. उन लमहों के बाद हम बिल्कुल अकेले अकेले रह गये थे.

नवाब साहब के दामाद को भी मैंने कई बार देखा है. सुना है कि नवाब साहब ने बेटी की पसंद से उसकी शादी की थी और दामाद उनके साथ ही रहता था. मैंने कई बार कोशिश की है कि आठ दस साल पहले वह कैसा लगता रहा होगा, इसकी कल्पना करूं, लेकिन कुछ सोच नहीं पाता. उसका चेहरा बिल्कुल सपाट है और आँखें बिल्कुल भावहीन, न चमक, न बुझन, न ज़िन्दगी, न उदासीनता, कुछ भी नहीं. पत्थर की आँख में भी कम से कम बाहर की रोशनी या अँधेरे का असर तो पड़ता होगा, लेकिन उसकी आँख में मैंने कोई फर्क नहीं देखा. काफ़ी शराब पी लेने के बाद उसके चेहरे पर एक अजीब सी भूख आ जाती है जिसका मेज़ पर रखी मुर्ग की प्लेट से कोई ताल्लुक नहीं होता. मुर्ग के टुकड़े हाथ से तोड़ तोड़ कर वह चबाता जाता है और उसके चेहरे पर वह भूख तेज़ होती जाती है. तब बह बड़े बेहूदा ढंग से उन औरतों के बारे में बात करता है जिनके साथ वह सोया था, जैसे इतने सारे मुर्गे थे जो उसने खाये थे. उसके तेजी से हिलते हुए जबड़े और कनपटी की फड़कती हुई नसों के बीच उसकी भावहीन आँखें देख कर ऐसा लगता जैसे वह आदमी नहीं, कोई अजीब, अज्ञात किस्म का जंतु है.

और वह उस औरत का पति है जिसे देख कर मैंने सोचा था कि यह मेरी ख्वाहिश नहीं, मेरा ख्वाब है. शाहिद की आँखों में एक लहर उठी थी और अपने ही दर्द में ऐंठ गयी थी. और वह दूसरा, जो नशे में डूबता है. जब भी "मीनू" का चेहरा देखना चाहता है तो उसके सामने वही चेहरा आ जाता है जिसे मेंने अच्छी तरह देखा भी नहीं, फ़िर भी जिससे ज़्यादा पहचाना हुआ चेहरा मेरे लिए कोई और नहीं और मैं जानता हूँ, जैसे सचमुच मैंने उन आँखों में झांक कर देखा हो, कि उनका रंग वैसे ही काला नीला है जैसे संवरे हुए अँधेरे में झील या पानी.

इसे दुखद संयोग ही कहें कि उस दिन युनिवर्सिटी के साहित्य समारोह में नवाब साहब भी आये थे और लौटते हुए आखिरी बस के इन्तज़ार में हमें खड़े देख कर उन्होंने मोटर रोक दी थी. "चलो, बैठ जाओ. मैं तुम्हें बाज़ार छोड़ दूँगा." लेकिन उनकी कोठी पहले आती थी और शाहिद ने इसरार किया था कि हमारी वजह से तकलीफ़ न उठायें, अपनी कोठी के पहले ही छोड़ दें. नबाव साहब ने सड़क पर मोटर रोकने के बजाय मोटर कोठी के अन्दर मोड़ ली, लेकिन अचानक ही ब्रेक लगाया और चूं चूं करके गाड़ी रुक गयी. मोटर खड़ी होते ही नवाब साहब ने बत्ती बुझा दी लेकिन उसके पहले ही बत्ती की रोशनी में चमकती हुई वहाँ खड़ी एक मोटर दिख गयी थी. शहर के मशहूर करोड़पति के बड़े बेटे की इस मोटर को शहर में शायद ही कोई होगा जो न पहचानता हो. नौबत यहाँ तक पहुँची थी कि बाप ने पुलिस की मदद ले कर बेटे से कोठी खाली करायी थी. उस वक्त कोठी से कितनी औरतें निकली थीं. उसके बारे में लोगों के अलग अलग सूचनाएँ थीं. कुछ का कहना था दस पंद्रह, लेकिन कुछ लोग यह संख्या चालीस पचास तक ले जाते थे.

बत्ती बन्द करने पर बिल्कुल अँधेरा हो गया. लेकिन अँधेरे में भी नज़र आ रहा था कि नवाब साहब उद्विग्न हो उठे हैं. मेंने शाहिद को देखा, उसका चेहरा स्याह पड़ गया था. शाहिद ने मेरे चेहरे पर भी शायद वही देखा, हम दोनों एक क्षण तक बिल्कुल निर्जीव बैठे रहे. नवाब साहब दरवाज़ा खोल कर बाहर निकले तो हम दोनों एक साथ ही चौंक पड़े. शाहिद मुझसे पहले कुछ होश में आया, दरवाज़ा खोल कर बाहर निकल गया. उसके पीछे मैं भी निकल आया. "तुम लोग बैठो", नवाब साहब बोले, "मैं ड्राईवर को भेजता हूँ, वह तुम्हें छोड़ आयेगा." "नहीं नहीं, यहाँ से रिक्शा मिल जायेंगे, आप तकलीफ़ न करें", शाहिद बोला. नवाब साहब कोशिश करके भी अपनी परेशानी को छिपा नहीं पा रहे थे. जल्दी जल्दी सलाम करके हम लोग बाहर की तरफ़ मुड़ गये. लेकिन मुड़ते ही मुझे लगा जैसे शरीर में बिल्कुल शक्ति नहीं है. हम दोनों सिर झुकाए, बिना कुछ बोले कोठी से बाहर निकल आये. इस बार मुझे पहले होश आया. खाली जाते हुए एक रिक्शे को मैंने आवाज़ दी तो शाहिद ने सिर उठाया, थकी, बुझी हुई आवाज़ में बोला, "घर जाओगे?" "हाँ." "अच्छा."

दूसरे दिन शाम को बार ने हरि ने बताया कि शाहिद रात को खड़े खड़े वि्हस्की के नौ पैग पी गया.

"आईना तोड़ूं तो हो जिस्म अपना ही फिगार." मेरा ख्वाब और ख्वाहिश करोड़पति के बेटे की. मेरा सिर ऐसे धमक रहा था जैसे अभी चूर हो जायेगा. सिगरेट जलायी तो मतली होने लगी. दो कश ले कर ही फ़ेंक दी. दूर से जाती हुई बस की घर घर तेज होती गयी और उसके साथ ही मेरे सिर की धमक भी. कानों में उंगलियां दे कर मैंने सर घुटनों पर रख लिया. बस गुजर गयी और उसकी आवाज़ धीमी पड़ती हुई ओझल हो गयी. तो भी मैं कुछ देर वैसे ही पड़ा रहा. फ़िर किसी तरह उठ कर ऊपर आया. जो पहला खाली रिक्शा दिखा उसी पर बैठ गया.

सिर अब भी बुरी तरह धमक रहा था और सिगरेट जलाने पर जो मतली शुरु हुई थी वह बंद नहीं हुई. इसलिए रिक्शे वाले ने जब बोलना शुरु किया तो मैंने ध्यान नहीं दिया. वह जमाने का दुखड़ा रोता रहा - मँहगाई और पुलिस की ज़्यादती, ग्राहकों की कंजूसी और बस की वजह से सवारियों की कमी और सरकारी दफ्तरों की घूसखोरी. फ़िर न जाने कब जमाने की बातों से अपने परिवार पर आ गया. कुछ धुंधला सा ही याद है - अपने पांच बच्चे, छोटा भाई कमाने लगा तो अलग हो गया, उसकी शादी का कर्ज अभी अदा नहीं हुआ. दो बहनें हैं, एक की शादी करदी, एक जवान बैठी है. मां को गठिया है, बहुत इलाज किया, आराम नहीं आया. बड़ा बेटा नाज़ मंडी में बोझ ढोने लगा है. दूसरा बड़ा ज़हीन है, लेकिन पढ़ाई छुड़वानी पड़ी. एक ईरानी होटल में काम करता है, सुबह छः बजे से रात बारह बजे तक.

ऊंची नीची सड़क पर धक्के लगते तो सिर और ज़ोर से धमकता, इसलिए घुटनों में सिर दिये मैं चुपचाप आँखें मूंदे बैठा था. लेकिन रिक्शेवाला मेरी खामोशी की परवाह किये बिना ही बोलता रहा. उसे अपना मन हल्का करने के लिए बात कहनी थी, मैं सुनूं या न सुनूं. घर के सामने मैंने रिक्शा रुकवाया तभी उसका बोलना बन्द हुआ. उतर कर पैसे निकाल कर गिनने लगा तो सड़के के उस पार ईरानी होटल के बन्द दरवाजे से लगी एक छाया बाहर रोशनी में आ गयी.

गोरा ने मुझे देखा तो मुस्करा कर सलाम किया. सड़के के लेम्प की रोशनी में उसके दांत चमके, उनींदी आंखों की पलकें उसने उठायीं - झील के पानी में सुनहली रुपहली मछलियां तैर रहीं थीं. पैसे रिक्शेवाले के हाथ में दे कर मेरा हाथ एक क्षण को हवा में ही रुका रह गया. गोरा ने रिक्शे पर चढ़ते हुए रिक्शेवाले को सम्बोधित किया, "अब्बा", लेकिन आगे उसने क्या कहा मैं सुन नहीं पाया. रिक्शेवाले ने मुड़ कर मुझे देखा, सलाम किया, फ़िर रिक्शा ले कर आगे बढ़ गया.

मां को रात गये जगाना न पड़े इसलिए मैं अपने कमरे में बाहर से ताला लगा कर जाता हूं. कुछ देर रिक्शे को जाते हुए देखता रहा, फ़िर आ कर ताला खोला. अन्दर घुसते ही बड़ी गर्मी लगी. पंखा चला कर बिस्तर पर लेट गया, पैर हिला कर चप्पलें नीचे गिरा दीं और तकिये में सिर गड़ा दिया. गोरा का मुस्कराता हुआ चेहरा बार बार आंखों के सामने आता रहा. होगा दस बारह साल का, एक बार चाय ले कर आया था और उसकी शर्मीली मुस्कान मां को भा गयी थी, मुझे भी. उसके बाद वह अक्सर ही चाय लाता. कभी मुझे भी चाय मंगानी होती तो उसी को आवाज़ देता. उसका चेहरा हमेशा थका हुआ, मुर्झाया हुआ रहता, लेकिन उसके चेहरे पर एक शर्मीली मुस्कान अक्सर आ जाती है, और उसकी आंखें चमकती हैं.

एकदम मुझे याद आया, गोरा की आंखों में सोने चांदी की मछलियां तैर रही थीं, वही जो मेरे ख्वाब की आंखों में थीं और झील के काले पीले पानी में. अंधेरे में अपने आप ही, बावजूद इसके कि मेरा सिर फटा जा रहा था और मतली भी बंद नहीं हुई थी, मैं मुस्करा दिया. ये मछलियां वक्त की गिरफ्त के बाहर हैं? ये रहेंगी, ऐसी ही रहेंगी? कहीं न कहीं जरूर रहेंगी.

क्या मेरी आंखों में भी ये मछलियां तैरती हैं? एक बार जी में आया कि बत्ती जला कर आईना देखूं. लेकिन आईने में अपना चेहरा अक्सर देखा है. शराब पिये रहता हूं तो आंखें लाल और बीमार नजर आती हैं, नहीं पिये रहता हूं तो भी लाल और बीमार. शायद बचपन में कभी ये मछलियां मेरी आंखों में भी रही हों. आईना तोड़ूं तो हो जिस्म अपना ही फिगार, और न तोड़ूं तो नींद आए न आँखों को करार.

न जाने कब सोया. उठा तो सिर में दर्द वैसा ही था. मतली बंद हो गयी थी लेकिन सारा शरीर दर्द से टूत रहा था. दरवाजा खोला तो जैसे शहर की भीड़ और गर्द और बेमतलब शोर ने कमरे में घुस कर उसे भी अपने में समेट लिया. सड़क के पार गोरा होटल के सामने की फर्श पर झाड़ू दे रहा था. धूप काफ़ी चढ़ आयी थी और सूरज की रोशनी में उसका चेहरा बहुत ही थका, उनींदा और मुरझाया लग रहा था. झाड़ू देने के लिए झुके हुए दुबले पतले शरीर में अजीब मर्दानगी सी लग रही थी जैसे उसका शरीर स्चेच्छा से हरकत न कर रहा हो बल्कि कोई बाहरी शक्ति उसे चला रही हो.

दरवाजे का पल्ला पकड़ कर मैं खड़ा रहा. झील के पानी में इस वक्त सोने चांदी की मछलियां नहीं होंगी, कोई और सिवार तैर रही होगी. और वह निकलने को व्याकुल पानी, बांध के पत्थरों पर पछाड़ें खा रहा होगा. नज़र आ रही होंगी सीढ़ियों की दरारों में ऊगी घास फूंस और झील के चारों तरफ़ फ़ैलती हुई गन्दगी, कंटीली झाड़ियां और पत्थर, और टकसाल की चिमनी से निकलता हुआ काला धुंआ और कहीं कहीं पड़ी हुई फूंस और गारे की झोपड़ियां और इसी वक्त शायद वह बड़ी सी, काई के हरे रंग की किसी विशालकाय जलजन्तु सी मोटर उस कोठी से बाहर निकल रही हो.

मुझे लगा मेरा मुंह सूख गया है, जबान मोटी हो गयी है. मैंने चाय लाने के लिए गोरा को आवाज दी तो लगा कि मुंह से अजीब फटी हुई सी ध्वनि निकली है, इतनी दबी हुई कि गोरा उसे सुन नहीं पायेगा. लेकिन गोरा ने सुन लिया था. झाड़ू देते हुए उसका हाथ रुका, झाड़ू पकड़े हुए ही सलाम के लिए उठा और उसकी पतली महीन आवाज आयी, "अभी आया साब."

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टिप्पणीं - पांडुलिपी टाईप की हुई है, यह स्पष्ट नहीं कि यह कहानी कहीं छपी थी या नहीं. कहानी में हैदराबाद का ज़िक्र है जहाँ ओमप्रकाश दीपक 1958 से 1960 में बीच में रहे थे, इसलिए हो सकता है कि यह कहानी उसी दौरान लिखी गयी हो या उसके कुछ समय बाद.

शायद यह कहानी का पहला स्वरूप है और उसे बदला या सुधारा जा सकता था? लेखक अपने और अपने मित्र शाहिद के प्यार की बात करता है, एक दीवालिया नवाब की विवाहित बेटी के लिए. लेखक और शाहिद जी विचलित हो जाते हैं जब रात को नवाब साहब की कोठी के बाहर एक जाने पहचाने रईसजादे की कार देखते हैं. तात्पर्य यह लगता है कि वह रईसजादा नवाब साहब की बेटी के साथ रात गुज़ारने आया था, पर यह उन्होंने किस बात से समझा, यह कहानी में स्पष्ट नहीं किया गया.

कहानी के प्रारम्भ में मीनू बाबा, टिन्नी बाबा वाली बात का क्या अर्थ है यह भी मुझे स्पष्ट नहीं लगा. क्या यह सेक्स के लिए उपयोग होने वाले बच्चों की बात थी? और रिक्शेवाले के बेटे गोरा जो ईरानी होटल में काम करता है, वह भी स्पष्ट नहीं लगा. सुनील दीपक, मई 2008

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