ओमप्रकाश दीपक का लेखन कल्पना का हिन्दी लेखन जगत

आँसू और इंद्रधनुष (कहानी)

ज्ञानोदय, मई 1956

कल नुमाईश में नजमी मिली थी. करीब एक साल बाद. वहीं उस भीड़ में अचानक आ कर लिपट गयी. मैं भौचक. पीछे मोहसिन खड़ा मुस्कुरा रहा था.

मोहन पीछे हट गया. मैंने उसकी ओर देखा नहीं. मैं जानती थी उसके चेहरे पर अजीब सी मुस्कान होगी. फीकी सिर्फ होठों पर. और आँखों में कड़वाहट. उसे नजमी शुरु ही बहुत पसंद थी. लेकिन नजमी को कभी इसका ख्याल नहीं रहा. अजीब बात है. अपने दिल में बात न हो तो जो बात बहुत साफ़ हो वह भी नहीं दिखाई देती.

नजमी और मोहन पुराने दोस्त हैं. मुझे नजमी को उसके साथ छोड़ते कभी डर नहीं लगा. इसलिए कि मैं नजमा को जानती थी और मोहन पर मुझे विश्वास था. या शायद इसलिए कि दरअसल मैं चाहती थी कि नजमी और मोहन में कोई बात हो जाये. दिल भी अजीब है. आदमी खुद अपने दिल की बात नहीं समझ पाता.

"शीलो ! शीलो ! " नजमा खुल कर हँस पड़ी. मैं भी हँसी. पहिले धीरे से फिर खुल कर. नजमा ने पहले मोहन को देखा, फिर मुड़ कर मोहसिन को. दोनो मुस्कुरा रहे थे. दोनों मुस्कानों में उसे कुछ फर्क लगा शायद. वह रुक गयी.

हम दोनों चाय पीयेंगी," उसने मोहसिन से कहा. और उसी नजर में मोहन को भी शामिल करते हुए बोली, "आप दोनों उतनी देर नुमाईश घूमिये."

मोहसिन मुस्कुरा दिया, जैसे यह उसकी आदत हो.

"चल शीला," और नजमा ने मेरी बाँह पकड़ ली.

मुझ पर तो वह हमेशा ही हकूमत करती थी. और मैं कभी उसका विरोध नहीं कर पायी. क्योंकि वह इतने प्यार से हुक्म चलाती, और उसकी बड़ी बड़ी आँखें हँसने पर इस तरह चमकती जैसे खुशियाँ बरस रही हों और कोई चाहे तो बीन ले.

मुझे तो लगा था कि वह फिर कभी नहीं हँसेगी, फिर कभी उसकी आँखों में इंद्रधनुष नहीं चमकेगा. लेकिन आज वह फिर हँस रही थी. साल भर के बाद. मोहन को जरुर अच्छा लगा होगा. पर क्या सचमुच अच्छा लगा होगा ? नजमी की हँसी और मोहन की उम्मीदें, साथ गयीं थीं. नजमी की हँसी तो लौट आयी है. लेकिन मोहन की उम्मीदें कैसे लौटेंगी ? नहीं लौट सकती.

art -OmPrakash Deepak storyटी स्टाल नुमाईश के बीच में लगा था, पिछले साल की तरह. गोल खेमे के अंदर और बाहर कुर्सियाँ थीं और हवा में गर्म चाय की खुशबू. पिछले साल की ही तरह.

पिछले सालः

चाय पी कर हम लोग उठे थे तो आसिफ और उसके दोस्त बगल से गुज़रे थे. नजमा बोलते बोलते एक सेकेण्ड के लिए रुक गयी थी जैसे मन में ठिठक गयी हो. नजमा की अम्मी थीं, मैं थी और मोहन. आसिफ ने मोहन पर एक कड़ी नज़र डाली थी और आगे बढ़ गया था. मैंने सोचा था कि मुझे आसिफ से किसी दिन बातें करनी हैं. जल्दी ही. पर उसका मौका कहाँ आया.

आसिफ नजमी के अब्बू के दोस्त का लड़का था. बहुत खूबसूरत. अच्छा खिलाड़ी था, तबियत से कुछ आवारा. कितनी ही लड़कियाँ उसके पीछे पीछे भागती थीं. वह नजमा को सचमुच चाहता था या नहीं, मैं नहीं जानती. क्योंकि मैंने सुना है उसने लड़कियों के पीछे पड़ना छोड़ दिया है. यूँ पहले से भी ज्यादा लफ़ंगा हो गया है. लेकिन दो एक बार मुझे दिखायी दिया तो नज़र बचा कर निकल गया. बदनाम अब भी है लेकिन अब उसके कोई किस्से सुनने में नहीं आते. शायद नहीं चाहता था. क्योंकि अगर उसे नजमा से प्यार होता तो भला वह ऐसा क्यों करता.

नजमी को आसिफ पसंद था. तभी से जब वह आसिफ की आदतें नहीं जानती थी. जानने के बाद भी पसंद था. लड़कियों और लड़कों की पसंद अजीब होती है. नजमी को मोहन का ख्याल भी न था, फिर भी वह उसे पसंद थी. और आसिफ की आदतें जान कर भी नजमी उसे प्यार करती थी. लेकिन नजमा स्वाभिमानी है. बहुत अधिक. उसने कभी आसिफ पर अपने मन की बात जाहिर नहीं होने दी थी. एक ही वाक्य में वह आसिफ की तारीफ भी करती और बुराई भी. मैं तो बहुत पहले ही समझ गयी थी. लड़कियों से लड़कियों की ऐसी बातें नहीं छुपतीं. लेकिन वह कहती कि आसिफ उससे शरीफों की तरह बात क्यों नही करता. रास्ते में मिलने पर आवाजें कसता है, अकेले में मिल जाने पर छेड़ने की कोशिश करता है, मगर औरों के सामने ऐसा बन जानता है जैसे पहचानता ही न हो. और इसलिए कोई दूसरा देखता तो वही समझता कि नजमा को आसिफ से चिढ़ है.

दूसरा ही क्यों, आसिफ भी तो यही समझता था. नजमा को अपनी ओर खींचने की उसकी सारी कोशिशें बेकार हुईं. मुझे आशंका भी हुई. मैंने कई बार सोचा कि आसिफ से मिल कर उसे समझाऊँ कि नजमा क्या चाहती है. लेकिन अगर नजमा को पता चल जाता तो वह मुझे जीवित न छोड़ती. दूसरे किसी को भी पता चलता तो आसिफ जैसे लड़के से बातें करने पर न जाने क्या क्या बातें फैलती. मैं इसी दुविधा में पड़ी थी.

काश मैंने आसिफ से बातें कर ली होतीं. हालाँकि अब क्या होता है. शायद तब भी कोई फ़ायदा न होता, पर अफ़सोस न रहता. आसिफ के अहं को चोट लगी कि उसके पीछे कितनी लड़कियाँ दौड़ती हैं और नजमा जैसी मामूली लड़की उसका निरादर करे ! इसी में उसने ऐसी तरकीब निकाली जिससे शायद उसका ख्याल था कि नजमा उस से शादी करने को मजबूर हो जायेगी.

पिछले साल उस रात हम नुमाईश से निकले तो नजमी और उसकी अम्मी को ताँगे पर बिठा कर मैं मोहन के साथ घर लौट आयी.

दूसरे दिन सुबह अखबार में एक खबर पढ़ी कि सम्भ्रांत परिवार की लड़की को कुछ गुण्डे जबरदस्ती मोटर में बिठा कर उठा ले गये. पुलिस को इत्तला दी गयी और शहर के एक प्रमुख नागरिक के बँगले पर लड़की दो घंटे बाद मिल गयी. अभियुक्त फरार है. मैंने इस खबर पर कोई ध्यान नहीं दिया. कुछ डर जरुर लगा. सोचा भी कौन हो सकता है. लेकिन कोई खास चिंता नहीं हुई.

लेकिन उस दिन नजमा कालेज नहीं आयी. छोटी अख्तर से पूछा तो वह रो पड़ी. हिचकियों के बीच उसने बताया कि रात नुमाईश से लौटने पर जैसे ही उनका ताँगा बँगले के सामने रुका, आसिफ और उसके कुछ आवारा दोस्त मोटर पर आ गये और उन्होने नजमा को पकड़ कर जबरदस्ती मोटर में बिठा लिया. चची की चीखें सुन कर जब तक नौकर बाहर आयें, मोटर नजरों से ओझल हो चुकी थी. नजमा तो एक चीख मार कर बेहोश हो गयी थी. चची आसिफ को पहचानती थीं. अब्बू को उन्होंने बता दिया. पुलिस को टेलीफोन किया गया और दो घण्टे की तलाश के बाद नजमा आसिफ के एक दोस्त के बँगले पर मिल गयी. आसिफ और उसके दोस्त भाग गये थे.

मेरा सिर घूम गया. मैं पागल हो उठी. मेरी नजमा, स्वाभिमानी नजमा, इस चोट को कैसे सहेगी ?

बिना किसी से कुछ कहे मैं नजमा के घर चल पड़ी. अख्तर साथ थी. हमारी प्रिंसिपल मिसेज गाँधी को शायद पहले ही मालूम हो गया था. वह नजमा को बहुत मानती थीं. बँगले में घुसते ही अंदर से नजमा की आवाज सुनायी दी, "मुझे बचाईये मिसेज गाँधी, मुझे बचा लीजिये !". अंदर गयी तो नजमा मिसेज गाँधी के पैरों पर सिर धुन धुन कर रो रही थी. मिसेज गाँधी खुद भी रो रहीं थीं और उसके सिर पर हाथ फैरती हुई कह रहीं थीं, "चुप रहो बेटी, शान्त रहो. धीरज धरो. खुदा पर भरोसा करो."

"किस खुदा पर भरोसा करुँ माँ, किस खुदा पर भरोसा करुँ," नजमा ने अपना सिर पटक दिया.

"नजमी", मेरे मुँह से चीख निकली. मेरे जी का बाँध टूट गया था.

"शीलो !" नजमा की आवाज ऐसी थी जैसे हजार बिच्छू उसे एक साथ डंक मार रहे हों. उसने मुझसे लिपटने की कोशिश की और बेहोश हो गयी. मेंने घर खबर भिजवा दी और वहीं रह गयी.

बेहोशी और रोना, बेहोशी और रोना, फिर बेहोशी और फिर रोना. तीन दिनों तक यही हाल रहा.

अब्बू की हालत यह थी कि आसिफ दिख जाता तो उसकी बोटियाँ काट कर चीलों को डाल देते. लेकिन आसिफ के अब्बा ने आकर उनके पैरों में पर टोपी डाल दी. आँखों में आँसू भर कर बोले, "वह मेरा लड़का नहीं. आप उसकी खाल खिंचवा लीजिये. उसने आप की नहीं मेरी इज्जत पर डाका डाला है. मेरी लड़की की आबरु पर हमला किया है. आप जो चाहें वह करें."

अब्बू कुछ बोले नहीं, दूसरे कमरे में चले गये. लेकिन उनका गुस्सा कुछ ठण्डा पड़ा.

नजमा ने सुना तो फिर बेहोश हो गयी.

आसिफ के अब्बा फिर आये. उन्होने कहा कि आसिफ की सबसे बड़ी सजा यही दी जा सकती है कि नजमा से उसकी शादी कर दी जाये. अब्बू पहिले कुछ हिचके, फिर राजी हो गये. मैंने सुना तो काँप उठी. क्या लड़कियाँ इसी लिए होती हैं ?

लेकिन नजमा ने सुना तो वह रोई नहीं. बेहोश भी नहीं हुई. जलती हुई आँखों और पत्थर जैसी आवाज में बोली, "यह कभी नहीं होगा. इसके पहिले मैं जहर खा लूँगी."

चची ने बहुतेरा समझाया. अब्बू ने भी समझाया. बहुत नाराज भी हुए. लेकिन नजमा अटल रही. मैंने भी समझाना चाहा, क्योकि मैं जानती थी कि नजमा दिल में आसिफ को चाहती थी.

"नहीं शीला, यह नहीं हो सकता. तू लड़की हो कर भी यह बात नहीं समझती ? जो कुछ मेरा है, उसे पाने का हक उसी को है जिसे मैं यह हक दूँ. जो आदमी जानवरों से भी नीचे गिर कर जबरदस्ती उसे पाना चाहे उसे वह हक नहीं मिल सकता."

"लेकिन तू तो उसे प्यार करती थी न ?" मैंने कहा.

"इसी का तो गम है," नजमा रो पड़ी, "जिसे दिल दिया था उसी ने दुनिया लूट ली. लेकिन इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता". उसने अपने को संभालना चाहा, "मैं औरत हूँ. ऐसे आदमी के बच्चों की माँ बनना मैं कभी मन्जूर नहीं कर सकती." और देर तक रोती रही.

मैंने फिर कुछ नहीं कहा.

और तब एक दिन मोहसिन आया. वह नजमा की दूर की मौसी का लड़का है. पढ़ने लिखने बहुत तेज, खामोश तबियत, लेकिन कुछ अजीब सा शर्मीला सा. देखने में अच्छा था लेकिन लड़कियों में उसकी बहुत ज्यादा कदर नहीं थी. वह बहुत खुश्क समझा जाता था.

अब्बू के सामने जाकर वह खड़ा हो गया.

"जी, मुझे आप से कुछ बात करनी है", उसने ऐसे कहा जैसे उसे कोई बहुत बड़ा अपराध स्वीकार करना हो.

"कहो, क्या बात है ?" अब्बू ने बिना अखबार से सिर उठाये ही कहा.

"जी, में नजमी से शादी करना चाहता हूँ."

"क्या ?" अब्बू ने चौंक कर कहा. अखबार नीचे गिर गया.

मोहसिन चिहुँक उठा जैसे उसके चेहरे पर किसी ने चाबुक मार दिया हो. लेकिन जब वह बोला तो उसकी आवाज में अधिक दृढ़ता थी.

"मैं नजमी से शादी करना चाहता हूँ."

अब्बू एक क्षण उसकी ओर स्थिर देखते रहे फिर बोले, "पहिले नजमी से पूछ लो." फिर कुछ रुक कर कुछ कोमल स्वर में कहा, "मुझे कोई ऐतराज न होगा."

नजमा राजी हो गयी और अगले हफ्ते ही उनकी शादी हो गयी.

शादी के तीसरे दिन ही वे घूमने चले गये.

नजमा के अलावा अगर किसी का हाल सबसे बुरा था तो मोहन का. अच्छा था कि आसिफ और उसकी भेंट नहीं हुई. वर्ना शायद किसी की हत्या हो जाती.

वह मोहसिन की तरह नजमा से शादी का प्रस्ताव भी नहीं कर सका. एक तो वह मेरा भाई है. दूसरे उसे औरतों के प्रति बड़ी श्रद्धा है. नजमा पर एक मुसीबत पड़ी है, इसका फायदा उठा कर वह उससे शादी करना चाहे, यह वह सोच भी नहीं सकता था. वह उसे प्यार करता था तो क्या ! नजमा तो उसे नहीं चाहती थी !

प्रस्ताव करता भी तो शायद धर्म के कारण न माना जाता, लेकिन वह अलग बात थी. इतना हुआ कि मोहन देखते देखते बूढ़ा हो गया. साल भर में ही वह अपनी उम्र से दस साल पड़ा दिखने लगा है.

साल भर नजमा से मेरी भेंट नहीं हुई. उसे मैं चिट्ठी भी न लिख पायी, न उसने ही मुझे अपना समाचार भेजा.

और कल नुमाईश में मिल गयी.

वही नुमाइश, वही टी स्टाल और चाय की गर्म खुशबू.

मुझे कितना कुछ मीठा कड़वा सा लग रहा था. लेकिन नजमा जैसे सब कुछ भूल गयी थी. वह बहुत खुश थी, बहुत खुश. उसने बताया कि मोहसिन ऊपर से ही खुश्क लगता है.

होठों से मुस्कुराना तो उसकी आदत है", नजमा ने मुस्कुराते हुए कहा, "लेकिन कभी कभी वह आँखों से भी मुस्कुराता है और मेरे कान लाल हो जाते हैं." वह कुछ शर्मीली सी हँसी हँसी, जैसे मेरी जगह मोहसिन ही बैठा आँखों से मुस्कुरा रहा हो.

मोहसिन और उसकी खामोश मुस्कान, और नजमा और उसकी खुली हँसी ! क्या सचमुच ? और आसिफ का खूबसूरत हँसमुख चेहरा ? क्या सचमुच एक नजमी मर गयी ? यह जो बैठी है, यह वही है फिर भी कोई और है, जिसकी जिंदगी में आसिफ कभी आया ही नहीं ?

"अच्छा तू एक बात बता," नजमा ने कहा और रुक गयी, जैसे सोच रही हो कैसे कहे. फिर अचानक मेरी ओर झुक कर बोली, "तू बता लड़का होगा या लड़की ?"

"तो यह बात है ?" मैंने नजमी के गाल पर हल्की सी चपत लगाते हुए कहा. "और सिर्फ एक प्याला चाय पिला कर पूछना चाहती है कि लड़का होगा या लड़की ?"

"जो माँगेगी वो दूँगी. सच, बोल न !" नजमा ने कुछ बच्चों से हठ से कहा.

"लड़की."

"धत्" नजमा कह कर हँस पड़ी. "तू भी यही कहती है ? मोहसिन कहता है कि लड़की होगी. लेकिन मुझे लड़का चाहिये. खूबसूरत, शरारती, सुनहरे घुँघराले बाल, नीली आँखें !"

नजमा जैसे किसी सपने में खो गयीः खूबसूरत, शरारती, सुनहरे घुँघराले बाल, नीली आँखें !

लेकिन मैंने इस बात को दिमाग से निकाल दिया. खूब समोसे खाये और रसगुल्ले और खूब ही नजमा को गुदगुदाया. सब लोग घूर घूर कर हमें देखते रहे और नजमा चिरोध करती रही, लेकिन मैं बहुत खुश थी. नजमा ने मुझसे वादा करा लिया कि मैं उन दिनों, अगली गर्मियों में उसके पास लखनऊ जरुर आऊँगी.

चाय पीने में ही हमें एक घंटे से अधिक लग गया. हँसते हँसते थक गये थे हम जब मोहन और मोहसिन आ कर खड़े हो गये.

"क्या इरादे हें जनाब ?" मोहन ने हाथ की घड़ी आगे करते हुए कहा. "आप की चाय डेढ़ घंटे में भी नहीं खत्म हुई ?"

"नहीं", मैंने जवाब दिया. "और आप लोग भी बैठिये."

मोहसिन नजमा का चेहरा देख कर शायद समझ गया कि क्या बातें हो रहीं थीं. क्योंकि वह नजमा को देख कर मुस्कुरा रहा था और उसकी आँखें भी मुस्कुरा रहीं थीं.

मैंने देखा कि नजमा के कान सचमुच लाल हो गये हैं. वह खुद भी मुस्कुरा रही थी और उसकी आँखें चमक रहीं थीं.

नजमा अब लड़की नहीं थी. वह मां बन गयी थी.

मैं समझ गयी कि नजमा की आँखों में इंद्रधनुष क्यों वापस लौट आये हैं.

वे लोग जब आ गये थे तो चाय फिर चलनी ही थी. और समोसे और रसगुल्ले भी. हम लोग उठे तो काफी देर हो चुकी थी. और नुमाईश हमने अभी देखी भी नहीं थी. ठण्ड काफ़ी थी.

"अब लौट चलें, बहुत देर हो गयी है" नजमा ने कहा और अपने कन्धे धीरे से हिलाये जैसे वह थक गयी हो और सर्दी लग रही हो.

"चलो", मोहसिन फिर मुस्कुरा दिया.

मैंने सोचा क्या यह आदमी कभी बिना मुस्कुराये भी नजमा से बातें करता होगा ?

मिठास से भी एक हद के बाद आदमी ऊब जाता है. लेकिन नजमा की बातों से तो ऐसा नहीं लगता था.

हम थोड़ा ही आगे बढ़े थे कि कुछ दूर पर भीड़ में आसिफ दिखायी पड़ गया. शायद उसने भी हमें देख लिया क्योंकि वह एक क्षण ठिठका, एक नजर उसने मुझ पर डाली, एक नजर नजमा पर और उसका चेहरा सफेद पड़ गया जैसे सारा खून बह गया हो. दूसरे क्षण वह पीछे हट कर भीड़ में खो गया.

मैंने आशंकित हो कर नजमा को देखा, फिर मोहसिन और मोहन को.

मोहन ने आसिफ को देख लिया था. उसकी देह पहले की तरह ढ़ीली और स्वाभाविक मुद्रा में थी, लेकिन मुट्ठियाँ बँध गयी थीं और आँखों मे लपटें जल रहीं थीं.

मोहसिन ने शायद उसे नहीं देखा. देखा भी, तो उसके चेहरे पर कोई अंतर नहीं पड़ा. वह उसी तरह नजमा को देख कर मुस्कुरा रहा था.

मुझे यकीन है कि नजमा ने आसिफ को देख लिया था. वह हँस रही थी. उसने मोहसिन से कुछ कहा और फिर हँस पड़ी.

लेकिन मैंने देखा उसकी आँखों में इंद्रधनुष नहीं थे. उसकी नजरों में उलझन थी. शायद उसे ख्याल आ गया था कि उसका बच्चा खूबसूरत तो होगा, लेकिन उसके बाल सुनहरे नहीं होंगे, उसकी आँखें नीली नहीं होंगी. वह तो आसिफ है.

और उसकी बगल में जो चल रहा है, वह मोहसिन है. बच्चे के बाल भी काले होंगे और आँखें भी. बच्चे के चेहरे पर शरारत नहीं होगी, मोहसिन की खामोश सब कुछ सह जाने वाली मुस्कान होगी और आँखों में उसकी दार्शनिक चमक.

मेरे दिमाग में एक ही बात बार बार लोहार के हथौड़े की तरह चौट कर रही थी, "इन्सान इतना बेवकूफ क्यों होता है, इन्सान इतना बेवकूफ क्यों होता है ?"

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