ओमप्रकाश दीपक का लेखन कल्पना का हिन्दी लेखन जगत

अपना अपना जहन्नुम

ओम प्रकाश दीपक (1956)

हवा में कड़वाहट थी जैसे धूँआ जम गया हो. रिकार्ड के संगीत की हल्की हल्की ध्वनि भी अच्छी नहीं लग रही थी. गज़दर में हम लोग घुसे तो कमरा खाली था - "एक काफ़ी, एक स्काच और सोडा!"

हमने सिगरेट जला ली. दिमाग खाली था बिल्कुल. सिर में दर्द न था लेकिन फटा जा रहा था. मैंने मेज़ के नीचे पैर फैला लिये. बैरा काफ़ी रख गया. लेकिन मैंने उठाने की कोई चेष्टा नहीं की. सोडे के खोलने की आवाज़ कमरे में पिस्तौल छूटने की तरह गूँज उठी, दिमाग को एक झटका लगा. मैं सीधा हो कर बैठ गया. राजन की नज़र गिलास में उठते हुए बुलबुलों पर जमी थी. मेरे मन में एक विचित्र कड़वाहट आ गयी. आँखें झुका कर काफ़ी उड़ेलने लगा.

राजन ने गिलास होठों से लगाया, एक घूँट ली. सिगरेट का कश लेकर मुँह से धूँआ फैंकता हुआ बोला, "रानी को सिगरेट का धूँआ पसन्द नहीं." फिर कुछ रुक कर, "मगर बड़ा सूखा शहर है तुम्हारा!"

मैं चुप रहा. भाभी को सिगरेट का धूँआ पसन्द नहीं, शराब तो बिल्कुल पसन्द नहीं. और इलाहाबाद भी सूखा ही शहर है. लेकिन इससे मतलब क्या? बातों का मतलब निकालना मैंने छोड़ दिया है. ज़िन्दगी के पहिये में जाने और कितने पहिये हैं, और उन्हें बाँचने वाले न जाने कितने तार! और आदमी तो ज़िन्दगी को टुकड़ों में ही देख पाता है. बेमतलब निरर्थक बातें जो अन्य बेतलब निरर्थक बातों से मिल जाती हैं और जिन्दगी बन जाती है. लेकिन उन्हें समझे कौन ?

राजन की नजर गिलास पर थी, लेकिन ध्यान कहीं और था. मैंने प्याला उठाया, फिर रुक गया. प्याला साफ़ नहीं था. किनारे पर एक हल्का सा लाल दाग़ था. मेरे पहले किसी लिपस्टिक लगे होठों ने उसे छूआ था. एक क्षण मैं उसे देखता रहा, एक हल्का सा ख्याल आया कि बैरे को बुला कर प्याला बदलने को कहूँ. फिर उसे होठों से लगा लिया, ठीक वहीं से जहाँ वह लाल दाग़ था!

आदमी कैसा गधा होता है. लेकिन करें क्या, आदमी की एक ही जाति होती है.

"भाभी मुझे पसन्द है, बहुत. पहली नज़र जब उन्हें देखा तो कुछ भय हुआ! उनके होठों पर लिपस्टिक बहुत तेज थी. लेकिन जैसे जैसे दिन बीते, लिपस्टिक हल्की होती गयी. तब मैंने देखा कि भाभी बहुत अच्छी है, बहुत ही अच्छी." राजन की शादी के कुछ ही दिनों बाद मैंने उसे पत्र में लिखा था - तेज़ लिपस्टिक से मुझे सचमुच भय लगता है, जैसे बीच में कोई परदा आ जाता हो.

और अपनी बेवकूफी की वह शाम भी मुझे याद है जब हम तीनों लखनऊँ में, रंजना में बैठे थे और न जाने क्या सोच कर मैंने कह दिया था, "राजन ने पिछली बार एक बात कही थी जिससे मुझे इतनी खुशी हुई जितनी ज़िन्दगी में कम ही मौकों पर हुई है." और तब उन दोनों ने मुझ पर बहुत जोर दिया था कि मैं वह बात बता दूँ. आधी बात कह कर बाकी न कहने से कोई लाभ नहीं था, इसलिए मैंने बता दिया. राजन ने कहा था, "असली खूबसूरती तो दिल की होती है." इस पर दोनों चुप हो गये थे, जैसे जादू टूट गया था. तीनों ही सोच रहे थे कि यह बात न हुई होती तो अच्छा था. लेकिन मुँह से निकल जाने के बाद तो फिर वापस लेने का कोई तरीका होता नहीं.

ऐसा नहीं कि भाभी खूबसूरत न हों. जिंदगी में मैंने जो तीन चार सचमुच सुंदर लड़कियाँ देखी हैं, उनमें ही मैं भाभी को भी गिनता हूँ. कुछ लड़कियाँ माँ बनने के बाद असुंदर हो जाती हैं. लेकिन अमला और अक्का को जन्म देने के बाद भाभी में कोई फर्क आया तो यही कि उनका सौंदर्य पहिले से भी आकर्षक हो गया है. लेकिन खूबसूरती भी तो हर आदमी की अलग अलग होती है. राजन स्वयं किसी समय बहुत सुंदर था. अब नहीं है. कद लम्बा है इसलिए बुरा नहीं लगता लेकिन पेट निकल सा आया है, गाल फूल गये हैं, चमड़ी लटकने लगी है और रंग में एक अजीब पीलापन भर चला है. और मुझसे सिर्फ एक साल बड़ा है वह.

"मैं बहुत खुशकिस्मत हूँ."

मैंने सिर उठा कर देखा, राजन की नज़र अब भी गिलास पर जमी थी. गिलास आधा हो गया था.

"रानी बहुत अच्छी है", राजन ने सिर उठाया, आँखों में एक बेतकल्लुफ़ सी लाचारी थी, "लेकिन मैं अपने को रोक नहीं पाता."

मुझे हँसी आई, बहुत कड़वी. उसका मतलब शराब से नहीं था, बिल्कुल नहीं. राजन में यही तो गुण था. बहुत दिन पहले भी जब हम नई दिल्ली की सड़कों पर घूमा करते थे, राजन बताया करता था कि पिछले इतवार को उसने कितनी शराब पी और पिछले सप्ताह वह किन किन लड़कियों के साथ रहा. और चलते चलते वह रुक कर पूछता, "तुम क्या समझते हो कि मैं बुरा हूँ?" और मुझमें यह साहस न होता कि हाँ कह दूँ. इतनी सफाई से सारी बातें स्वीकार करने वाले आदमी की गलती हो सकती है, पाप नहीं. पाप नहीं! मुझे सचमुच हँसी आई, बहुत कड़वी, लेकिन मैं निश्चल बैठा रहा.

"पहले तो मैंने समझा कि इनके दिल ही नहीं है", पहली बार जब भाभी से मेरी खुल कर बातें हुईं तो उन्होने कहा था, "शादी के बाद हम लोग नैनीताल गये तो शाम को टहलते हुए ये अपने ही ध्यान में आगे बढ़ जाते और मैं बड़ी मुश्किल से साथ चल पाती. झील के किनारे मुझे बेंच पर बिठा देते और खुद चुपचाप खड़े पानी की ओर देखा करते. मुझे सरदी लगने लगती तो मजबूरन घर चलने को कहना पड़ता. लेकिन बाद में मैंने देखा कि इनका दिल बहुत कोमल है. ऊपर से इतने सख्त इसलिए हैं कि कहीं दिल को चोट न लग जाये." बात भाभी ने ठीक कही थी, लेकिन उन्हे यह नहीं मालूम था कि जो लोग अपने दिल पर चोट खाने से डरते हैं, उनके दिल कोमल नहीं दुर्बल हुआ करते हैं और दूसरों को चोट पहुँचाने में उन्हें बहुत मज़ा मिलता है.

राजन कुछ देर मेरे चेहरे को देखता रहा कि मुझ पर क्या प्रक्रिया होती है. मुझे निश्चल देख कर उसने नज़र फ़िर गिलास पर गड़ा दी.

इस बार भाभी को देखा था तो उनकी सुंदर आँखों में थकान सी थी. मुझे देख कर मुस्कुरा दीं, लेकिन कितना भी कहा मैंने, उन्होंने गाना नहीं सुनाया. दिलरुबा, उन्होंने बताया, बरसों से नहीं छुआ है. और फ़िर आँखें मींच कर सोफ़े पर निढ़ाल सी बैठ गयीं, जैसे बहुत थक गयीं हों. मैंने अक्सर सोचा है कि अगर भाभी को शराब का नशा पसंद होता, सिगरेट की महक पसंद होती तो? लेकिन मन ही मन मैं जानता हूँ कि ये सब तो ऊपरी बाते हैं. सच में, तब और भी बुरा होता. आज भाभी जहर पी कर नीलकण्ठ बन गयीं हैं, तब जहर फ़ैलताः अमला और अक्का के मन पर भी.

इसलिए तो राजन खुशकिस्मत है.

"सिनेमा चलोगे ?" राजन ने अचानक पूछा.

"नहीं, तुम जाओ. मेरा मूड ठीक नहीं." बात सच थी. दूसरे अगर मैं चलता तो उसे सचमुच सिनेमा चलना पड़ता. और इससे कोई फायदा नहीं होता, बिल्कुल नहीं.

फ़िर शनिवार को भाभी को आना था. और उसी दिन शाम की गाड़ी से राँची जाने का प्रोग्राम था, राजन के साथ. भाभी अब कहीं रुकती नहीं. सिर्फ लखनऊ राजन के पास या राँची में मायके. अच्छा ही करती हैं. भाभी को अच्छा न लगता अगर उनके रहते कोई बात होती. और राजन में भी इतना तो है ही कि उसकी मनमानी करने में रुकावट न आये तो दूसरे यही समझते रहेंगे कि इनके जैसे सुखी दम्पत्ति कम ही मिलेंगे. रुपया पैसा है, घर है, दोनो स्वस्थ और सुंदर हैं, बच्चे हैं, और क्या चाहिये ?

रात राजन किस समय लौटा मुझे पता नहीं. सुबह मैं बैठा अखबार पढ़ रहा था जब, "बाबूजी थोड़ा पानी लेना है", का परिचित स्वर सुनाई पड़ा. फ़िर रामू की आवाज़, "जा ले ले." रामू को मैकी बहुत पसंद थी. लेकिन जैसा मालिक वैसा नौकर. इतनी हिम्मत उसमें न थी कि मैकी तो क्या उसके बाप से भी कुछ कहे. मैकी जब पानी भर कर चली जाती तो वह फर्श पर पड़े उसके पैरों के गीले दागों को ही देखता रहता, जैसे उन्हीं में मैकी के व्यक्तित्व का कुछ रस रह गया हो.

एक दिन धोबी के लड़के पन्ना ने मैकी को छेड़ दिया. "मुआ, नासपीटा, तुमको महारानी ले जाये!", मैकी ने गालियों की झड़ी लगा दी थी. उस दिन रामू ने जान बूझ कर पन्ना से लड़ाई की और बुरी तरह पीट कर आया. लेकिन कई दिन तक बहुत खुश रहा जैसे कोई हीरो हो.

राजन कब उठ कर गुसलखाने की ओर गया, मुझे मालूम नहीं हुआ. अखबार पढ़ते हुए दिमाग के किसी कोने में यह बात पहुँची कि बाल्टी भर गयी और पानी बहने लगा. फ़िर किसी ने धीरे से पानी बहा दिया. बाल्टी खाली हो कर फ़िर भरने लगी. और चूड़ियाँ ज़ोर से खनकीं. राजन तौलिये से मुँह पौंछते हुए गुसलखाने से निकला और कुछ गुनगुनाते हुए कमरे में चला गया जहाँ उसका बिस्तर था. मन पर कोई बाह्य प्रक्रिया नहीं हुई. मैं क्रोध से जड़ हो गया था. नल बंद हो गया और मैकी बाल्टी उठा कर धीरे धीरे बाहर चली गयी.

शाम को दफ्तर से लौटा तो रामू ने बताया कि राजन साहब दिन भर घर पर ही थे. अभी कहीं कपड़े बदल कर गये हैं. कह गये हैं मेरा इंतज़ार न करें.

उस रात भी राजन किस समय लौटा मुझे पता नहीं. लेकिन सुबह देर तक सोता रहा. मैकी आई तो रामू साथ के कमरे में था. मैकी ने पुकारा नहीं चुपचाप गुसलखाने चली गयी. नल खुला, बाल्टी भरने लगी. भर गयी और पानी बहता रहा. मैकी ने धीरे से पानी बहा दिया. बाल्टी खाली हो कर फिर भरने लगी. फ़िर भर गयी. मैकी ने नल बंद कर दिया और गुनगुनाने लगी, "जिया बेकरार है ...", फ़िर बाल्टी उठा कर निकली, एक बार अंदर की ओर देखा, और मुझे देख कर सिर झुका लिया. धीरे धीरे बाहर चली गयी.

मैंने एक लम्बी साँस ली. उठ कर खड़ा हो गया. राजन अभी सो रहा था. लेकिन अभी तो दिन भर पड़ा था और मुझे दफ्तर जाना था.

शनिवार को आधे दिन की छुट्टी थी, दो बजे घर पहुँचा तो भाभी आ गयीं थीं. राजन भी घर पर ही था. शाम को सात बजे मेल से जाना तय करके आयीं थीं. मैंने रोकने की चेष्टा नहीं की. जानता था कि व्यर्थ होगा.

शाम को बच्चों को साफ़ करने और खिलाने पिलाने में ही लगीं रहीं. चाय के वक्त ही रामू को बिस्तर बाँधने कह कर बैंठीं.

"तुम अब भी बिना चीनी की चाय पीते हो ?" प्याले में चाय उँड़ेलते हुए उन्होने कहा.

हाँ, मैंने मुस्कुरा कर उत्तर दिया. भाभी की राय थी कि इस तरह की आदतों ने मुझे ऐसा सूखा सूखा बना रखा है.

भाभी ने एक बार मेरी ओर देखा, जैसे कुछ कहेंगी, फ़िर रुक गयीं. प्यालों में दूध डालने लगीं.

"मैंने तो इसके सुधरने की उम्मीद ही छोड़ दी है", राजन बोला. फ़िर खामोशी छा गयी.

"बस, और नहीं", एक प्याला पी कर राजन उठ खड़ा हुआ, "मैं तब तक कपड़े बदलता हूँ."

"तुम तो लोगे ही ?" भाभी ने मुस्कुरा कर कहा. भाभी के हाथ की चाय मैं एक बार में आठ प्याले तक पी गया हूँ.

"अवश्य", मैंने प्याला मेज़ पर रखते हुए कहा.भाभी की आँखें चाय उँड़ेलते हुए मेज़ पर झुक गयीं और वैसे ही सिर झुकाए हुए बोलीं, "तुम शादी क्यों नहीं कर लेते ?"

मैंने हँसने की चेष्टा की फ़िर एकबारगी ही कह गया, "अपने जैसी कोई लड़की दिला दीजिये, कर लूँगा."

भाभी ने सिर उठाया. होठों पर एक धीमी सी मुस्कान आ गयी और चेहरे को बहुत ही थका हुआ छोड़ कर चली गयी - "उसके लिए तुम्हें राजन जैसा बनना पड़ेगा."

मैं कुछ बोल न सका. मन को किसी ने जैसे चाबुक मार दिया हो.

फ़िर कोई बात नहीं हुई. मैं और चाय भी नहीं पी सका.

सामान मोटर पर रख दिया गया. अमला और अक्का को ले कर भाभी पीछे बैठीं और राजन मेरी बगल में. गाड़ी सटार्ट करते हुए मैंने देखा कि राजन ने एक नज़र मुड़ कर बाईं तरफ़ देखा फिर सिगरेट निकाल कर जला ली. मैंने आँख उठायी, वहाँ मैकी खड़ी थी. बाहर सड़क पर गाड़ी निकाल कर मैंने फिर देखा, मैकी अब भी खड़ी थी.

स्टेशन से लौटा तो देर तक नींद नहीं आयी. सिगरटें पीता रहा, यहाँ तक कि ज़बान जल गयी. लेकिन उससे न जाने कितनी ज्यादा कड़वाहट मन में थी. लगता था, तार कुछ ऐसे बँधे हैं कि ज़िंदगी जहन्नुम हो गयी है. लेकिन जहन्नुम भी तो हर आदमी का अलग अलग होता है.

सुबह रामू ने चाय ला कर मेज़ पर रखी तो स्वयं भी वहीं खड़ा हो गया. मैंने पूछा तो बोला कि घर से खत आया है, बाप बीमार है. खेती बाड़ी को देखने वाला कोई नहीं. इसलिए अब वह नहीं रह सकता. उसके मामा का लड़का है एक. बहुत अच्छा है. उसे वह अपनी जगह रख जायेगा.

दिन में मैंने सुना कि मैकी रात को ही पन्ना के साथ कहीं भाग गयी.

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ओमप्रकाश दीपक, ज्ञानोदय, अक्टूबर 1956

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