ओमप्रकाश दीपक का लेखन कल्पना का हिन्दी लेखन जगत

बरसात की याद (एक अधूरी कहानी)

ओमप्रकाश दीपक, 1973

(टिप्पणीः यह एक अधूरी कहानी है, जिसका कोई शीर्षक नहीं लिखा गया था. इसकी पाँडूलिपि 1973 के कागजों के बीच में मिली थी.)

बस चली तो उसने आँखें बंद कर लीं. डीलक्स बसों में बस इतना ही है कि आदमी कुछ आराम से पैर फैला कर, सिर पीठ टेक कर बैठ सकता है. बसों के मैदान और पहाड़ पर चलने में भी फर्क होता है. पहाड़ी रास्तों पर बस का इंजन भी हाँफता है. थोड़ी देर में कुछ बादल हुए थे, कुछ उमस भी हुई थी, फिर पानी की एक बूंद खिड़की से अंदर आ कर मेरी बाँह पर पड़ी थी. मेरी आँख खुल गयी. फिर टप टप टप टप पानी बरसने लगा. तेज़ नहीं. फिर भी, धरती पहले नम हुई, फिर गीली हुई, फिर ढ़लुँआ खेतों के किनारे पानी की एक पतली सी धार बह निकली.

एक बल खा कर सड़क ऊपर चढ़ी, फिर कुछ ढ़लुआँ हो गयी. ऊपर से दिख रहा था, पानी के बहने के लिए बीसियों रास्ते पत्थर में काटे थे, और सब नीचे एक जगह मिल गये थे. वहाँ कुछ पानी जमा होने लगा था. मेरे जी में आया बस से निकल कर भीगूँ, नहाऊँ.

कितने बरस पहले की बात होगी? तीस, इकत्तीस, बत्तीस. हाँ, तब मैं कुल अठारह साल का था. जुलाई अगस्त के दिन थे. युनिवर्सिती में नया नया दाखिल हुआ था, और नयी नयी साइकिल थी. इतने दिनों में यह फर्क भी पड़ गया है कि अब विश्वविद्यालय कहना कुछ अटपटा नहीं लगता, लेकिन तब युनिवर्सिटी ही थी, चाहे "उनवरसीटी" ही हो. घर जाने के लिए साइकिल उठायी थी, मेरा ख्याल है दो तीन बजे के बीच का वक्त रहा होगा, तो बादल थे. म्योर कालेज तक आते आते बूँदाबाँदी होने लगी थी, और बाहर सड़क पर निकला तो खासी बारिश होने लगी. म्योर कालेज से मेरे कुछ आगे साइकिल पर ही एक लड़की निकली थी. चाकलेट रंग की सलवार कमीज़ में, उस वक्त वह लड़की मुझे बहुत भली लगी थी, और मैंने चुपचाप साइकिल उसकी साइकिल के पीछे लगा दी थी, और उसके घर तक उसका पीछा करता गया था. कम से कम मेरा ख्याल है वह उसका घर ही था. यूँ अगर मेरी शकल से उसे कुछ बदगुमानी हुई हो, और वह एक फाटक से अंदर जा कर दूसरी तरफ से बाहर निकल गयी हो, तो कह नहीं सकता.

हुआ सिर्फ इतना था कि मैं भीगता हुआ घर चला गया. फिर दो साल के अरसे में वह लड़की मुझे नहीं दिखाई दी. उसके घर के चक्कर मैंने लगाये नहीं. म्योर कालेज मेरे लिए सिर्फ गुजरने का रास्ता था.

लेकिन अब जिंदगी में बहुत कुछ भुगतने के बाद मैं सोचता हूँ कि मुमकिन है वह लड़की मुझे फिर दिखाई दी हो, अपना पीछा करने वाले लड़के को उसने पहचान भी लिया हो, लड़कियाँ आम तौर पर याद रखती हैं, लेकिन मैंने उसे न पहचाना हो, मुमकिन है सिर्फ इस लिए कि उसने साड़ी पहनी हो.

बस चली तो मैंने आँखें बंद करके पैर फैला लिए. बड़ी गर्मी थी, और थकान का जो अहसास मुझे एकदम हुआ था, वह बढ़ता ही चला जा रहा था. मैं जानता था कि यह नामुमकिन है, क्यों कि खुद मेरे मन के किसी कोने में एक तरह का प्रतिरोध था, लेकिन मैंने कोशिश की कि अपने आप को बिल्कुल ढ़ीला छोड़ दूँ. लम्बे सफर में धीरे धीरे थकान बढ़ते जाने की मजबूरी का एहसास बढ़ रहा था. कहीं मन में एक यह बात भी कचोट रही थी कि अजंता और एल्लूरु वहीं देवगिरी की पहाड़ियों में ही कहीं थे. वहीं चाँद बीबी का किला था, महाराष्ट्र में एक ही "नगर" है, अहमदनगर. वहीं दौलताबाद का किला था, दिल्ली जिस खूबसूरत तवायफ का नाम है, उसके जहरीले अंगपाश से...

पानी की एक बूंद खिड़की से अंदर आ कर मेरी बाँह पर पड़ी, तो मैं आँख खोल कर सीधा बैठ गया. इतनी देर में कुछ बादल घिर आये थे, कुछ उमस भी हो गयी थी. फिर टप टप टप, पानी बरसने लगा. तेज नहीं पर इतना कि प्यासी, जाने कब से सूखी जमीन भी नम हुई, फिर सड़क के किनारे ढ़लुँआ खेत से पानी की एक पतली सी धार बहती दिखाई दी. नम हवा का चेहरे को छूना अच्छा लगा.

कितनी देर पानी बरसा ? तीन मिनट ? पाँच मिनट ? शायद इतना नहीं. और कितनी दूर तक ? वह भी ज्यादा नहीं. दूसरे दिन अखबार में उसका कोई जिक्र नहीं था. उससे जाहिर है पानी कम ही बरसा होगा. बहुत कम. लेकिन उस वक्त जब नम हवा मेरे चेहरे को छू रही थी, और पानी की पतली सी धार बहती दिखाई दी थी, तो मन को जाने कैसी राहत हुई थी. उम्मीद, बस उम्मीद ही तो आदमी को जिन्दा रखती है. कुछ तो राहत मिलेगी. कोई तालाब, कोई कूँआ तो होगा जहाँ यह पानी पहुँचेगा, और उसे सूखने से बचायेगा.

सड़क अचानक बल खा कर ऊपर चढ़ी, और बस जैसे हाँफने लगी. ऊपर से नीचे जाने कितने बरसों में बहते हुए पानी ने धीरे धीरे काट कर बीसियों रास्ते बना लिए थे. थोड़ा थोड़ा पानी अभी था, मैंने उत्सुकता से झाँक कर नीचे देखा, जहाँ पानी के तमाम रास्तों ने मिल कर एक खड्ड सा बना दिया था, वहाँ क्या कुछ पानी जमा हुआ था ? एक क्षण को हलकी सी चमक दिखाई दी थी, शायद थोड़ा, बहुत थोड़ा सा पानी, लेकिन इतने में सड़क के साथ बस मोड़ ले चुकी थी, शायद वह चमक भी मेरी आँखों का भ्रम था, जो मेरे मन की उम्मीद ने पैदा किया था.

अब दोनों ओर चिकनी सतह वाली गोलाइयाँ थीं, ललछौंही भूरी सतह. क्षितिज को उन गोलाइयों में ही छिपा रखा था. आप ने कभी इन पठारों की यात्रा की होगी, तो आप जानते होंगे, देख कर लगता है कि आखिरी गोलाई के पार भी धरती वैसी ही होगी, लेकिन आखिर तो धरती भी औरत है न, जाने कितने रहस्य छिपा रखे हैं इसने अपनी आकृति में ही. जो दिखता है उसके आगे क्या है, यह अगर आपने पहले नहीं देखा है, तो आप का अनुमान अक्सर गलत ही निकलेगा. और अगर देखा भी है, तो फिर देखिए, हर बार रुप नया मिलेगा. अभी तो धरती झुलसी हुई है और चिकनी चट्टानों पर से दोपहर के बाद सूरज की रोशनी जब छिटकती है तो लगता है जैसे लपटें निकल रहीं हों. लेकिन मैंने इसके कई और रुप देखे हैं, जाने कितने रुप हैं जो नहीं देखे, सब तो भला कौन देख सकता है. और मुझे अक्सर किसी युवती की देह की मांसलता का सा एहसास हुआ है. मैंने मन को झटका दे कर सोचा है कि ये दुनियां की सबसे पुरानी चट्टाने हैं, करोड़ों शायद अरबों बरस से यहाँ की यह धरती यूँ ही है. फिर भी जब मैं देखता हूँ तो मुझे यही लगता है जैसे कोई मांसल नारी देह को देख रहा हो.

उस दिन शुरु में ऐसा हल्का हल्का पानी ही तो था. नयी नयी साइकिल थी, नयी नयी पतलूने थीं, नया नया युनिवर्सिटी में दाखिल हुआ था. अभी भी याद है कैसे एकदम जैसे दुनिया के कायदे कानून बदल गये थे. जाओ, न जाओ, पढ़ो, न पढ़ो, नोट लिखो, न लिखो, सब अपनी मर्जी पर, सब अपनी जिम्मेदारी. पता नहीं, शायद नयी अलमस्ती का भी असर रहा हो. युनिवर्सिटी से चला तो म्योर कालेज आते आते बूँदे पड़ने लगी थीं. आसमान की तरफ देख कर सोच रहा था, पानी रुकेगा या बरसेगा ? ठहर जाऊँ, कि चलूँ. तभी बगल के गलियारे से एक लड़की साइकल पर निकली थी, और मैं उसके पीछे हो लिया था. चाकलेटी रंग की (तीस बत्तीस बरस के बाद लिख रहा रहा हूँ, लेकिन मुझे चाकलेटी रंग ही याद है) सलवार कमीज में वह लड़की, बहुत सुंदर लगी थी, बहुत भली, और मैं उसके पीछे चला गया था. सड़क पर आते आते पानी तेज हो गया था, लेकिन न वह रुकी, न मैं. दोनो साइकलों के बीच पाँच सात गज का फासला रहा होगा, और उसके घर तक वही फासला बना रहा ( कम से कम मेरा ख्याल है उसका घर ही था).

दो मील तक साइकिलों पर भीगते हुए जाना. बस. उसके बाद मैं घर चला गया. फिर वह लड़की अगले डेढ़ सालों में मुझे नहीं मिली. मैंने उसके घर के चक्कर भी नहीं लगाये. म्योर कालेज मेरे लिए सिर्फ आने जाने का रास्ता था, गुजरता रहा. लेकिन वह फिर दिखाई नहीं दी. या मुमकिन है, दिखी हो, और उसने अपना पीछा करने वाले को पहचान भी लिया हो (लड़कियाँ आम तौर पर याद रखती हैं), मैंने ही न पहचाना हो, सिर्फ इसलिए कि उसने साड़ी पहन रखी हो, या उस बीच दुबली या मोटी हो गयी थी.

लेकिन वाक़यों की भीड़ में यही एक वाक़या मुझे क्यों इतना याद आता है? पता नहीं, खाली वह उम्र ही ऐसी थी, या वह वक्त भी ऐसा था, अक्सर तो हफ्तों में इतना कुछ गुजर जाता था जितना अब बरसों में भी नहीं गुजरता. इस वाक़ये में ऐसा क्या था कि मुझे अब तक याद आता रहता है ? क्या यही कि यह एक खूबसूरत वाक़या था, और अपने आप में पूरा था. कोई पेंच नहीं कोई उलझाव नहीं.

लेकिन मैं जानता हूँ कि मेरे मन में कहीं यह वाक़या रीना के साथ जुड़ा है. जग्गी ने इस बार भी जब पहली बार उसका नाम लिया था तो ऐसा लगा था जैसे तेईस चौबीस सालों में वक्त ने जो परदा डाला था, नज़र को अपने अंदर मोड़ कर वह उसे चीरता चला गया था, जैसे वह कोई नाम नहीं था, न किसी औरत का, न फ़ूल का, न रंग का. जैसे कोई खुशबू थी, रंगो का इंद्रधनुष था, झोंकों में बहती नम हवा थी, नसों में हलके हलके गरमाया हुआ खून था जो सब इन दो अक्षरों में कैद थे, और जग्गी के उस तरह "रीना" कहते ही अचानक मुक्त हो कर उस छोटे से, धूल भरे, बेतरतीब कमरे में हमारे आस पास फैल गये थे.

मैं जानता था जग्गी रीना के बारे में अवश्य पूछेगा. कुछ मेरे मन में भी ख्याल था कि मुमकिन है उसे ज़यादा जानकारी हो. आदमी जब कुछ जानना चाहता है, खास तौर से जब किसी के बारे में जानना चाहता है तो किसी न किसी तरह से जान ही लेता है. यूँ मैंने उसके बारे में बीच बीच में कई लोगों से सुना था कि उसके दो ही काम रह गये थे, पीना और पढ़ना. दोनो में कैसे उसने मेल बिठाया था मुझे नहीं मालूम. चौबीस घंटे जो मैं उसके पास ठहरा था, उसमे तो बातें ही नहीं खतम हुई थीं. लेकिन मैंने देखा था कि उसके क्वाटर के साथ जो कोठरी थी, उसमें कुछ कोयला और लकड़ी थी, मिट्टी के तेल का टीन था और बाकी तमाम कोठरी खाली बोतलों से पटी पड़ी थी. बाकी सारे क्वाटर में किताबें फ़ैली थीं, और पत्रिकाएँ. सफाई की कोशिश तो नज़र आती थी, लेकिन हर बार पुस्तकों पत्रिकाओं के बेतरतीब अम्बार में शायद घर जाती थी.

वक्त भी कैसे कैसे व्यंग करता है. जवानी में किस क़दर बहिर्मुखी था जग्गी. उसके लिए पढ़ने का मतलब अखबार से आगे शायद ही कभी जाता था. तब उसको लत थी चाय पीने की और बातें करने की. इश्क उसको छठे छमाहे हो जाया करता था. उस उम्र में अक्सर लोगों को हो जाया करता है, इसलिए ऐसी कोई खास बात भी नहीं थी. लेकिन एक बार खास बात होगयी, उसे रीना से इश्क हो गया, रीना चौधरी.

रीना चौधरी का नाम मुमकिन है आप ने भी सुना हो, और मुझे मालूम नहीं कि अगर सुना है तो आप उसके बारे में क्या सोचते हैं. लेकिन उन दिनों जब मैंने उसे देखा और जाना था, तो मुझे लगा था यह असली दिल्ली की बेटी है. दिल्ली को सब जानते हैं, लेकिन पता नहीं आप को कभी ख्याल आया कि नहीं, दुनिया के तमाम शहरों में एक खूबसूरत तवायफ है जिसका नाम दिल्ली है. पुराने मालिक के खून से नहा कर नये मालिक का आलिंगन करना इसका चलन रहा है. इसके जहरीले बहुपाश से मुक्त होने की कोशिश मुहम्मद तुगलक ने की थी तो उसे इतिहास ने (या दिल्ली के नये मालिकों के इतिहासकारों ने ?) पागल करार दे दिया.

एक बार दिल्ली की बाहों में आने के बाद आम तौर पर कोई उससे निकल नहीं पाता और जग्गी भी दरअसल निकला नहीं था, उसे निकलना पड़ा था. और उसे जगह दी थी देवगिरि की पहाड़ियों की छाया में बसे एक कस्बे ने, जहाँ चीनी का एक कारखाना है. उसके पहले वह बरसों भटकता फिरा था, कलकत्ता, नागपुर, बम्बई, अहमदाबाद, और न जाने कहाँ कहाँ. फिर वह कारखाना खुला था, और बम्बई में जो नये परिचय हुए थे उनमें से किसी की मदद से वहाँ पहुँच गया था.

"अरे ! यह पैसे वाले मुनाफ़ा छोड़ के अपने बाप के नहीं होते. मुझे तो इन्होंने कब का निकाल दिया होता. लेकिन मेरे बिना इनका काम एक दिन भी नहीं चल सकता. यहाँ तेलेगू भी हैं मराठे भी. हिंदू भी हैं, मुसलमान भी. मैं मराठी भी बोलता हूँ, तेलेगू भी. हिंदी अंग्रेजी तो बोल ही लेता हूँ. हिंदी से मुसलमानों के बीच उर्दू का भी काम चल जाता है. मैं न रहूँ तो यहाँ रोज़ झगड़े हों, सर फूटें. फिर मजदूर संगठन वाले पापड़ यहाँ आने के पहले काफ़ी बेले थे. सारे गुर जरुरत पड़ने पर इस्तमाल कर लेता हूँ. लंच के वक्त कैंटीन में अवश्य जाता हूँ. कभी एक मेज़ पर लोगों के साथ खाता हूँ, कभी दूसरी मेज़ पर. छुट्टी के पहले एक बार सारे कारखाने का चक्कर लगा लेता हूँ. इस तरह बहुत से झगड़े बढ़ने के पहले ही नज़र में आ जाते हैं, सलटा देता हूँ. कभी कोई मामला ऊपर आ भी जाता है, तो मेरा कहना सभी लोग कुछ न कुछ मानते हैं. इतने साल हो गये, मज़दूरों के काम को ले कर कभी कोई गम्भीर मसला नहीं उठा. इसलिए मैं कुछ काम नहीं करता, तो भी कम्पनी का काम मेरे बिना नहीं चल सकता."

उस दिन वह कारखाने नहीं गया था. "तुम्हारी चिट्ठी मिल गयी थी कि तुम आज आओगे, तो पहले ही छुट्टी ले ली थी. वैसे छुट्टी ही छुट्टी रहती है, लेकिन थोड़ी देर को शक्ल दिखाने तो जाना ही पड़ता है. आज मैंने सोचा उससे भी अपनी मुलाकात..

(अधूरी)

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