ओमप्रकाश दीपक का लेखन कल्पना का हिन्दी लेखन जगत

लेखक किसे संबोधित करे

ओमप्रकाश दीपक (माध्यम, वर्ष 4, अंक 3, जुलाई 1967)

हर लेखक के लिए इसका एक उत्तर नहीं हो सकता. किसी हद तक, हर कृति के लिए इसका उत्तर अलग अलग होगा. उस रुप में यह प्रश्न सभी कलाओं में उठता है कि कोई कृति, जिस हद तक वह मनुष्य मात्र को संबोधित नहीं करती, किसे संबोधित करती है. लेकिन साहित्य में इस प्रश्न का एक अधिक विशिष्ट रुप भी है. अन्य कलाओं के अपने व्यापक संस्कार होते हैं, क्यों कि उनके माध्यम केवल उनके ही माध्यम होते हैं, सामाजिक संप्रेषण के माध्यम नहीं. लेखक का माध्यम इसके विपरीत सामाजिक संप्रेषण का भी माध्यम होता है. नाटक जिस हद तक भाषा का उपयोग करता है, उस हद तक नाटक के भी लेखन और अभिनय, दोनो में ही यह प्रश्न उठता है.

इस प्रसंग में लोकप्रियता का लोभ और एकांतिकता की प्रवृति, दोनो ही लेखक को भटका सकते हैं.लोकप्रियता का लोभ का पहला परिणाम होता है भाषा और विचार के तात्कालीन सामाजिक दायरों की स्वीकृति, जब कि सर्जनात्मक कला का लक्ष्य होता है अपने माध्यम का ऐसा प्रयोग, जिससे वह तात्कालीन समाजिक दायरों को लाँघ सके और कलाकृति भावक के लिए केवल एक वस्तु ही न हो, वरन एक अद्वितीय अनुभव बन जाये.

दूसरी ओर अगर लेखक ही एकमात्र भावक रह जाता है, तो भी कुछ बात नहीं बनती. कभी कभी कोई लेखक ऐसा सोच सकता है कि गणित की भाँती कला में भी संपूर्ण के सभी अंगो का जोड़ संपूर्ण के बराबर होता है. लेकिन संपूर्ण जीवन के सभी खंडों का ऐसा जोड़ संभव नहीं है, कम से कम मनुष्य के लिए संभव नहीं है. और जेम्स जायस के "फिनेगांस वेक" में एक साथ छह भाषाओं का प्रयोग कृति को सार्विक नहीं, केवल अबोधगम्य बनाता है. भविष्य में चाहे जो भी हो, अभी तो भाषा नहीं है, भाषाएं हैं. कोई लेखक अनुभव की जटिलता को भी इसी प्रकार विभिन्न तत्वों को जोड़ के द्वारा प्रस्तुत करने की चेष्टा कर सकता है.इस तरह का एक प्रयास लक्ष्मीकांत वर्मा ने "खाली कुर्सी की आत्मा" में किया था. मैं समझता हूँ कि हिंदी में इसे "नया उपन्यास कहा जा सकता है, उसे प्रस्तुत करने का अब तक वह शायद एकमात्र, असफल, किंतु कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण प्रयास है. लेकिन इस तरह का जोड़ अनुभव की जटिलता को व्यक्त करने के बजाय केवल भीड़ इक्ट्ठी करता है. इस तरह का प्रयास कला की प्रकृति के संबध में एक बुनियादी गलती करता है. घटनाएं या अनुभव अपने आप में कला की सामग्री नहीं होते, कला की वस्तु उनके प्रभाव में होती है. कोई अति सामान्य अनुभव अपने प्रभाव में किसी बड़ी ही जटिल स्थिति को व्यक्त कर सकता है. और किसी बड़े ही विविधतापूर्ण अनुभव का प्रभाव बिल्कुल सरल और सामान्य हो सकता है.

दूसरी ओर, ऐसा भी हो सकता है कि अनुभूति की अद्वितीयता का आग्रह लेखक को ऐसी जगह ले जाये, जहां भाषा ही न रहे, प्रेषणीयता का गुण ही नष्ट हो जाये. भाषा केवल ध्वनि ही नहीं है, उसी तरह जैसे कविता केवल संगीत ही नहीं है. जब लेखक भाषा को अपने माध्यम के रुप में चुनता है, तो उसकी शक्ति और उसकी सीमाएं, दोनो ही उसे स्वीकार करनी पड़ती हैं. इसके साथ ही, सृजनात्मक लेखन के माध्यम के रुप में भाषा का प्रयोग करने वाला उसकी शक्ति में वृद्धि करने की और उसकी सीमाओं को विस्तार देने की भी अनिवार्य चेष्टा करता है. इस चेष्टा का भी दोहरा रुप होता है. एक ओर तो लेखक की चेष्टा होती है कि जो कुछ अभी तक भाषा के माध्यम से व्यक्त नहीं किया जा सका, उसे अभिव्यक्ति दे. दूसरी ओर भाषा का अपना चरित्र भी इस बात की माँग करता है कि इस अभिव्यक्ति में अधिकतम प्रेषणीयता हो. प्रेषणीयता पर अत्याधिक आग्रह का नतीजा यह होगा कि लेखक बासी भोजन को ले कर जुगाली करता रहे. लेकिन प्रेषणीयता की उपेक्षा का यह परिणाम हो सकता है कि भाषा ही न रहे.

आधुनिक सभ्यता ने लेखक के लिए एक और कठिनाई उत्पन्न कर दी है. आधुनिक सभ्यता का एक अभिशाप यह भी है कि श्रम विभाजन के विशिष्ट रुप ने जिंदगी को इस तरह खंडित कर दिया है कि आदमी अपना मनोरंजन भी खुद नहीं कर सकता, पेशेवर लोग हैं जो हमारा मनोरंजन करते हैं, वे भी अपना मनोरंजन खुद नहीं करते. इस पेशेवर मनोरंजन से भी कभी कभी लेखक को प्रतियोगिता करनी पड़ती है.मिसाल के लिए, आज के हिंदुस्तान में लेखक अगर ऐसा नहीं करता तो उसे जीविका के दूसरे साधन खोजने पड़ते हैं, जो उसके लेखन को अनिवार्यतः प्रभावित करता है. दूसरी ओर, अगर वह इस प्रतियोगिता में पड़ता है, तो अपने लेखन के प्रति ईमानदार रहना उसके लिए कठिन हो जाता है, क्योंकि "पेशेवर" मनोरंजन तो रुचि का निम्नतम स्तर खोजता है, जिससे वह अधिक से अधिक लोगों को आकर्षित कर सके.

भाव बोध की जटिलता और भाषा की सीमाओं के साथ जब यह द्विविधा भी मिल जाती है, तो लेखक की स्थिति सचमुच ही बड़ी कठिन हो जाती है.

क्या आज यह संभव है कि लेखक विभिन्न स्तरीय पाठकों तक अपनी बात पहुँचा सके ? क्या यह संभव है कि लेखक अपने भाव बोध और प्रेषणीयता, दोनो के प्रति अपनी निष्ठा बनाये रख सके ?

ऐसा संभव है, मैं यह मान कर चलूँगा,क्योंकि लेखक या कोई भी कलाकार किसी अन्य लक्ष्य को अपना कर नहीं चल सकता. प्रेषणीयता कला की शक्ति की कसौटी है. सशक्त कला हर हालत में प्रभावित करेगी ही. अलबत्ता, जब कभी किसी कला के संस्कार बदलते हैं, तो उसके जन्म और रस ग्रहण के बीच एक कालांतर हो, यह संभव है. किसी कलाकृति का समुचित मूल्यांकन बाद की पीढ़ियों द्वारा किया गया हो, इसके असंख्य उदाहरण हैं.

लेकिन इसके आगे जा कर इस संभावना के लिए कोई सूत्र निरुपित करना संभव नहीं, आवश्यक या वांछनीय भी नहीं. यह रास्ता हर लेखक को स्वयं ही तय करना पड़ता है.हम अधिक से अधिक कुछ खतरों की ओर संकेत कर के चेतावनी दे सकते हैं.

कुछ खतरों की ओर मैं ऊपर संकेत कर चुका हूँ. यहाँ इतना और कह दूँ कि कला और मनोरंजन की द्विविधा झूठी है.कला का उद्देश्य मनोरंजन करना नहीं है. भावक को प्रभावित करने का गुण दोनो में ही होता है, लेकिन मनोरंजन की प्रभाव शक्ति जहाँ खतम होती है, कला की प्रभाव शक्ति वहाँ से आरंभ होती है.कला केवल रुचिकर नहीं होती, भावक के संस्कारों से संबद्ध होते हुए भी, उसे एक नया संस्कार देती है.

यह सच है कि हम सब जीवन की असुरक्षाओं से बचना चाहते हैं, भागना चाहते हैं, कभी हम चाहते हें कि अपने उत्तरदायित्व को किसी अज्ञात शक्ति को सौंप कर मुक्त हो जायें, कभी चाहते हैं कि जीवन को तात्कालिक अनुभवों तक सीमित कर के इन असुरक्षाओं की ओर से आँखें मूँद लें, कभी चाहते हैं कि शराब के सहारे या अन्य किसी भाँती अति काल्पनिक जगतों का निर्माण कर के अपनी नसों के तनाव को ढ़ीला कर दें, कभी चाहते हैं कि यौन आवागों के ज्वार में पूर्ती का ऐसा स्तर प्राप्त करें कि उसमे पूरी असुरक्षाएं डूब जायें.

लेकिन लेखक के लिए, लेखक रुप में यह सब दरबाजे बंद हैं, क्योंकि वह अपने प्रति और कला के प्रति झूठा नहीं बन सकता. जीवन की असुरक्षाओं को भी उसी रुप में स्वीकार करना उसकी मजबूरी है, क्योंकि यह जानते हुए भी कि वह अपूर्ण है, अपर्याप्त है, उसे हमेशा पूर्णता के लिये प्रयास करते रहना होगा. उसके लिए जरुरी है कि वह अपनी वैयक्तिक अनुभूति और अपने युग बोध को ले कर सार्विकता की उपलब्धि के प्रयास में अपने माध्यम से जूझे. यह जूझना जहाँ अपने नये भाव बोध को अभिव्यक्ति प्रदान करने के लिए होगा, वहाँ माध्यम की प्रेषणीयता को बढ़ाने और विकसित करने के लिए भी होगा. माध्यम की सीमाओं को और भी संकुचित रुप में स्वीकार करना, अपनी स्थिति के संदर्भ में, कभी कभी उसकी सीमाओं की मजबूरी हो सकती है. लेकिन स्वीकृति हमेशा किसी न किसी हद तक लेखक की हार होती है, इसे किसी भी सूरत में लक्ष्य या उपलब्धि नहीं माना जा सकता.

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