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लोहिया, एक असमाप्त जीवनी

ओमप्रकाश दीपक

Book cover, Lohia ek asamapat jeevani, first editation1975 में जब ओम प्रकाश दीपक की मृत्यु हुई तब वह डा. लोहिया की जीवनी लिख रहे थे, जो उनकी असमय मृत्यु से अधूरी ही रह गयी.

यह अधूरी पुस्तक, श्री जय प्रकाश नारायण की प्रेरणा से, दीपक जी की मृत्यु के तीन वर्ष बाद, समता अध्ययन न्यास के मुकुंद जोगलेकर द्वारा प्रकाशित की गयी. यहां इसी पुस्तक के कुछ अंश इस पृष्ठ पर नीचे प्रस्तुत किये जा रहे हैं.

2005 में यह पुस्तक श्री अरविंद मोहन जी ने पूरी की और यह वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर, द्वारा पुनः प्रकाशित की गयी है.

प्रथम संस्करण: अक्टूबर 1978, प्रकाशकः मुकुंद जोगलेकर, समता अध्ययन न्यास प्रकाशन विभाग, 1 आकृति कोआपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी, 5वां रास्ता, जयप्रकाश नगर, गोरेगांव पूर्व, बम्बई 400063, मुद्रकः आदर्श प्रेस, आर्यकुमार रोड, पटना 800004, आवरण परिकल्पना अरुणा पुरोहित, अंकनः सत्यनारायण

द्वितीय संस्करणः लोहिया एक जीवनी, ओमप्रकाश दीपक - अरविन्द मोहन, 2006, वाग्देवी प्रकाशन, विनायक शिखर, पोलिटेक्निक कोलिज के पास, बीकानेर 334003, मुद्रक सांखला प्रिण्टर्स, शिवबाड़ी रोड, बीकानेर 334003, कीमत 175 रु. मात्र (इसे पूरी जीवनी का पहला संस्करण भी कह सकते हैं.)

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दो शब्द

स्वर्गीय ओमप्रकाश दीपकजी का स्मरण मैं एक प्रमुख लेखक चिंतक और पत्रकार तथा बिहार आन्दोलन के एक प्रमुख सहयोगी के रुप में करता हूँ. उनकी लिखी हुई राममनोहर लोहिया की जीवनी प्रकाशित हो रही है, यह हर्ष की बात है. यह किताब अधूरी रह गयी, क्योंकि राममनोहर के समान दीपकजी का भी असामयिक निधन हो गया. दीपकजी का शुरु से ही समाजवादी आन्दोलन से गहरा सम्बंध रहा था. वे पुरानी सोशलिस्ट पार्टी के मुखपत्र "संघर्ष" के सम्पादक थे. उन्होंने प्रमुख समाजवादी नेताओं के व्यक्तित्वों और विचारों का अध्ययन गहराई से किया था. उनकी इस किताब से न केवल लोहिया के अनूठे व्यक्तित्व की, बल्कि उनके समय की ऐतिहासिक घटनाओं की भी झांकी मिलेगी.

signature, Lok Nayak Jai Prakash Narain

जय प्रकाश नारायण

पटना, 8 अगस्त 1978

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"एक असमाप्त जीवनी" का प्रथम अध्याय

रामनोहर लोहिया को मैंने जब पहली बार देखा तो वे एक राष्ट्रीय नेता के रुप में प्रतिष्ठा पा चुके थे. सन 1942 के खुले विद्रोह के बाद काँग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का अधिवेशन फरवरी मार्च 1947 में कानपुर में हो रहा था. लोहिया उस सम्मेलन के अध्यक्ष थे. और मैं, बीस साल का, शायद सम्मेलन का सबसे कम उम्र का प्रतिनिधि था, पंजाब से. पार्टी में उस समय मार्क्सवाद, सर्वहारा की तानाशाही और कांग्रेस के साथ सम्बन्धों को ले कर तीव्र सैद्धान्तिक बहस चल रही थी. देश में एक ओर जबरदस्त साम्प्रदायिक तनाव का वातावरण था, दूसरी तरफ अंग्रेजी राज के Book cover, Lohia ek asamapat jeevani, first editationखिलाफ जनरोष चरम सीमा पर था. साम्प्रदायिक दंगों की आग कलकत्ता से नोआखली होकर बिहार तक फैल चुकी थी. सम्मेलन समाप्त होने के दूसरे दिन ही पंजाब भी आग लगने वाली थी. वापसी के समय दिल्ली में ही हमें खबर मिली थी कि लाहौर में दंगा हुआ है और कर्फ्यू लग गया है. देश के अन्य भागों में भी खासकर शहरों में छिटपुट दंगे हो जाते थे. गांधीजी कभी कलकत्ता जाते, कभी नोआखली, कभी बिहार कभी दिल्ली. कलकत्ता और नोआखली में लोहिया गांधीजी के साथ रहे थे.

सम्मेलन के साढ़े पांच महीने के बाद ही देश का बटवारा होने वाला था. लेकिन सम्मेलन में किसी को भी इसका अहसास नहीं था. मेरा खयाल है लोहिया को भी नहीं था. उनको गांधीजी पर भरोसा था. अन्य लोगों को शायद कांग्रेस के अन्य नेताओं पर भी भरोसा था कि देश का बटवारा नहीं मंजूर करेंगे. जो भी हो, सम्मेलन में एक सैद्धान्तिक बहस प्रमुख थी और एक व्यावहारिक. सैद्धान्तिक बहस थी कि पूंजीवाद और समाजवाद के बीच संक्रमण की व्यवस्था कैसी हो. व्यावहारिक बहस थी कि दल का कांग्रेस के साथ क्या सम्बन्ध हो. सम्मेलन में इस सवाल पर काफी गर्मी पैदा हुई. कांग्रेस से पूर्ण सम्बन्ध विच्छेद के समर्थकों में से प्रमुख थे मध्यप्रदेश के श्री दांडेकर और राष्ट्रीय कार्यकारिणी की ओर से आचार्य नरेन्द्र देव ने प्रस्ताव रखा था कि भविष्य में दल के सदस्य कांग्रेस के सदस्य बने या न बनें, यह उनकी इच्छा पर निर्भर होगा. साथ ही प्रस्ताव था कि दल के नाम से "कांग्रेस" शब्द हटा दिया जाये.

उस सम्मेलन के साथ जुड़ी हुई लोहिया की तीन तस्वीरें मेरे दिमाग में हैं. सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए बैठे बैठे मुस्कराना ! और बड़ी खुली मुस्कान होने पर भी लगता था कि उसके पीछे कहीं कोई व्यंग्य छिपा है. सिर्फ एक बार ही उनके स्वर में हल्का सा रोष आया था जब उन्होंने श्री दांडेकर को दोबारा बोलना का मौका दिया - कहीं से आवाज आयी थी कि बहस दबायी जा रही है. तीसरी तस्वीर उस वक्त की है जब वे खुले अधिवेशन की विशाल सभा में बोल रहे थे - आजाद हिन्दुस्तान में हर आदमी राजा होगा, मर्द भी औरतें भी. औरतें भी अपने हक से राजा होंगी, राजा की पत्नी होने के नाते रानी नहीं.

लोकतंत्र और नर - नारी की समता के सिद्धांत को उनका इस तरह मामूली आदमी की जबान में रखने का तरीका दिमान में अटक गया. लेकिन उस वक्त मेरी उनसे कोई बातचीत नहीं हुई. कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की पंजाब शाखा सबसे अधिक मार्क्सवादी समझी जाती थी - मैं खुद भी उन दिनों कट्टर मार्क्सवादी था. लोहिया मार्क्सवादी नहीं थे. दल में उनका बहुत सम्मान था, लेकिन पंजाब की शाखा उन्हें अपना नेता नहीं मानती थी. पंजाब के नेता थे मुंशी अहमद्दीन और मुंशी जी के नेता थे जय प्रकाश नारायण. मुंशीजी ने मेरी मुलाकात जयप्रकाशजी से करवायी, नरेन्द्रदेव जी से करवायी, रामनन्दन मिश्र से भी करवायी, लेकिन लोहिया से मिलने वे खुद भी नहीं जाते होंगे, मुझे क्या मिलवाते.

एक और घटना हुई थी. जब मैंने लोहिया को ज्यादा नजदीक से देखा तो मुझे थोड़ा पछतावा हुआ. किसी प्रस्ताव या मसविदे के लिए मैंने एक संशोधन लिखा था, जिसका आशय था कि दल के पदाधिकारी किसी अन्य संगठन के पदाधिकारी नहीं हो सकेंगे. लेकिन संशोधन की परची सीधे अध्यक्ष लोहिया को देने के बजाय मैंने मंच पर बैठे हूए मुंशी अहमद्दीन को दे दी कि वे पढ़ कर अष्यक्ष को दे दें. थोड़ी देर के बाद सम्मेलन खाने के लिए स्थगित हुआ तो चाय पीते हुए मुंशीजी ने बताया कि मेरी परची उन्होंने फाड़ दी थी, "मोहनलाल गौतम जैसे लोगों को पार्टी में नहीं रहने दोगे क्या?" गौतम उन दिनों उत्तरप्रदेश शाखा के मंत्री थे, राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य थे और उत्तरप्रदेश कांग्रेस कमेटी के महामंत्री थे. मामला उनसे अधिक शायद आचार्य नरेन्द्रदेव की राजनीति का था. और लोहिया व नरेन्द्रदेवजी में गहरी दोस्ती थी. फिर भी, जब मैंने लोहिया को ज्यादा अच्छी तरह से जाना तो मुझे वह घटना याद आयी, और लगा कि अगर वह परची लोहिया तक पहुँच जाती तो वे उस पर बहस का मौका जरुर देते और प्रतिनिधि उस समय जिस तरह से सोच रहे थे, उसमें इसकी पूरी सम्भावना थी कि संशोधन मंजूर हो जाता और समाजवादी आंदोलन बाद मे उठने वाली कई झंझटों से बच जाता. लेकिन बीती बातों पर पछतावा करना लोहिया के स्वभाव में नहीं था, सिवाय इस हद तक कि पुरानी गलतियों को समझ कर भविष्य में आदमी उनसे बचे.

अगली बार जब मैं उनसे मिला तो उनकी, हमारी और देश की जिन्दगी का एक दौर खत्म हो चुका था. देश बंट कर आजाद हुआ था और गांधीजी की हत्या हो चुकी थी.

फरवरी - मार्च 1947, जब मैंने लोहिया को पहले - पहल देखा, और 12 अक्टूबर 1967 के बीच, जब मैं उनके शव के पास खड़े हुए, और शवयात्रा में चलते हुए भी मैं यकीन नहीं कर पा रहा था कि उनका जीवन्त व्यक्त्तिव अब सदा के लिए मौन हो गया है. लोहिया के व्यक्त्तिव में ऊपरी परिवर्तन बहुतेरे हुए थे. उनकी आदतें बदल गयीं थी. उनका बात करने का, व्यवहार का ढ़ंग बहुत बदल गया था. लेकिन ये सब ऊपरी चीजें थीं. जब मैंने लोहिया को देखा, उसके पहले लोहिया का व्यक्त्तिव परिपक्व हो चुका था.

लोहिया के बचपन की घटनाओं का इंदुमति केलकर और ओंकार शरद ने अपनी पुस्तकों ("राममनोहर लोहियाः सिद्धांत और कर्म" तथा "लोहिया") में जिक्र किया है. फिर भी लोहिया के बचपन, किशोरावस्था और युवावस्था के बारे में जानकारी कम है. वस्तुतः राष्ट्रीय आंदोलन, विशेषतः 1942 के खुले विद्रोह में लोहिया के विशिष्ट योग के बारे में बहुतेरी बातें अभी भी अज्ञात हैं, क्योकि वे स्वयं अपने अतीत के बारे में बात करना पसंद नहीं करते थे, जब तक कोई खास प्रसंग न हो, और ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें जानकारी है, उसे बताने से इनकार करते रहे हैं, क्योंकि लोहिया का रास्ता आगे चल कर उनसे अलग हो गया था. इन्दुमति केलकर को अपनी पुस्तक के लिए सामग्री एकत्र करते हुए बार बार इसका अनुभव हुआ था कि लोहिया के पुराने साथी उनसे सम्बन्धित जानकारी और सामग्री छिपाते थे, क्योंकि उन्हें लोहिया की तत्कालीन राजनीति पसंद नहीं थी. मैं समझता हूँ कि अब लोहिया के निधन के बाद यह बाधा नहीं रहेगी, और लोहिया का कोई मेहनती प्रशंसक या अधंयेता उनसे संम्बन्धित उस सारी सामग्री को भी खोज निकालेगा जो अभी तक अज्ञात है.

लेकिन यहां मुझे विस्तार की घटनाओं से मतलब नहीं. फिर भी, लोहिया ने स्वयं कई बार आपसी बातचीत में कहा कि उनके व्यक्त्तिव के निर्माण में उनके बचपन का बहुत हाथ था. विशेषतः घर के राष्ट्रवादी वातावरण का, और संस्कृत की शिक्षा का. राममनोहर लोहिया के व्यक्त्तिव के निर्माण के सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्यों में एक यह भी था कि मां की मृत्यु तभी हो गयी थी जब वे बच्चे ही थे. लेकिन स्नेह उन्हें मिला, दादी का, परिवार की अन्य स्त्रियों का, और स्वयं पिता का. पिता हीरालालजी गांधीजी के भारतीय राजनीति में प्रवेश करने पर उनसे सबसे पहले प्रभावित होने वाले व्यक्त्तियों में से थे. राममनोहर का जन्म 23 मार्च 1890 को हुआ था, और 1999 में जब वे नौ साल के थे, तभी हीरालाल जी उन्हें पहली बार गांधीजी के पास ले गये थे. गांधीजी को तब दक्षिण अफ्रीका से आये तब केवल पांच चर्ष ही हुए थे.

मां थी नहीं, पिता गांधी के चेलों में से शामिल होकर असहयोगी बन गये थे, अतः लोहिया किशोरावस्था में सर्वथा स्वतंत्र रहे, छात्रावासों में रह कर पढ़ाई करते रहे. जन्मस्थान अकबरपुर (फैजाबाद, उत्तरप्रदेश) में प्राथमिक शिक्षा के बाद लोहिया ने बंबई, बनारस और कलकत्ता में पढ़ाई की. इस बीच पिता के साथ वे दो बार कांग्रेस के अधिवेशनों में भी हो आये थे.

कलकत्ते में बी.ए. की पढ़ाई के लिए जो युवक गया, वह असाधारण प्रतिभाशाली, लेकिन स्वतंत्रबुद्धि का था, जो केवल आंतरिक अनुशासन को स्वीकार करता था, बाह्य अनुशासन को नहीं. लोहिया में आजीवन यह विषेशता रही. उसे फिर अपने जाने कभी नहीं तोड़ा. लेकिन जिस नियम को उनके विवेक ने स्वीकार नहीं किया, दुनिया की कोई शक्त्ति फिर उनसे उस नियम का पालन नहीं करा सकी. तब रात देर तक पढ़ने की आदत भी पड़ गयी थी, लेकिन यह पढ़ना परीक्षा के लिए नहीं, अपनी जानकारी बढ़ाने के लिए होता था. 1954 में रक्त्तचाप की बीमारी बढ़ जाने के बाद रात को देर तक जगना तो बंद हो गया, लेकिन पढ़ने की आदत बनी रही. साहित्य हो या समाजशास्त्र, शायद ही कोई महत्तवपूर्ण पुस्तक ऐसी होती थी जो लोहिया ने न पढ़ी हो. अन्तिम दिनों में, अस्पताल में दाखिल होने के बाद भी, नश्तर के पहले वे बीसवीं सदी के यूरोपीय तानाशाहों के बारे में एक पुस्तक पढ़ रहे थे, जो वे पूरी नहीं कर सके.

बी.ए. करने तक राष्ट्रवाद का प्रभाव उन पर इतना पड़ चुका था कि जब विदेश में शिक्षा ग्रहण करने का सवाल उठा, तो लंदन में रहने को उनका मन तैयार नहीं हुआ - वहां वे एक पल भी भूल नहीं पाते कि वे एक गुलाम देश के निवासी हैं. इसलिए उन्होंने बर्लिन के हुम्बोल्ट विश्वविद्यालय में दाखिला लिया, नमक सत्याग्रह को अपना शोध-प्रबंध का विषय चुना - उनके शोध-प्रबंध का शीर्षक था "धरती का नमक" - और उनके निर्देशक थे उस काल के प्रख्यात अर्थशास्त्री बर्नर जोम्बार्ट. प्रो. जोम्बार्ट टूटी-फूटी अंगरेजी ही जानते थे, इस तथ्य ने जहां राममनोहर लोहिया को तत्काल जर्मन सीखने को प्रेरित किया, वहीं हमेशा के लिए एक और सबक भी उन्होंने सीख लिया ज्ञान के लिए किसी खास भाषा पर अधिकार जरुरी नहीं, और अपनी मातृभाषा ही ज्ञान और अभिव्यक्ति का सबसे अच्छा माध्यम हो सकती है.

बर्लिन में दाखिला लेने के फैसले के पीछे शायद एक और भी कारण था. संस्कृत साहित्य का स्वेच्छा से अध्ययन करने के फलस्वरुप लोहिया ने न केवल देश की सांस्कृतिक विरासत से परिचय प्राप्त किया, वरन् एक सभ्यता के रुप में हिन्दुस्तान के इतिहास को नजदीक से देखा. भारतीय सभ्यता का मुख्य आधार दर्शन रहा है. और जर्मनी आधुनिक यूरोप का दार्शनिक है. भारतीय दर्शन और संस्कृति के प्रति जर्मन विद्वानों के आकर्षण से भी भारतीय लोग परिचित हो चुके थे. अतः यूरोपीय देशों में लोहिया ने स्वाभावतः जर्मनी को पसंद किया. जीवन के प्रति एक और बुनियादी दृष्टिकोण उनका इस समय तक बन चुका था - कांचन मुक्ती. नचिकेता को यम ने कंचन और कामिनी से मुक्त होने की सलाह दी थी. इस सलाह के दूसरे हिस्से को लोहिया के विवेक ने कभी स्वीकार नहीं किया. कामिनी से मुक्ति की सलाह तो एकतरफा, पुरुष दृष्टि की उपज थी. दोतरफा चीज, जो नर नारी दोनो के लिए हो, केवल स्वीकृत हो सकती थी, परित्याग नहीं. लोहिया को इस कारण अर्द्धनारीश्वर की कल्पना बहुत भायी. लेकिन कांचन मुक्ति को उन्होंने खुले मन से स्वीकारा. कपड़े और बिस्तर के अलावा उन्होंने संपत्ति के नाम पर कुछ भी अपने पास नहीं रखा. कभी बैंक में खाता भी नहीं खोला. किताबें उनके पास बहुत थीं, लेकिन किताबों का संग्रह भी उन्होंने नहीं किया. पढ़ने के बाद या तो किताबें दोस्तों के पास रह जातीं या पार्टी दफ्तरों में, या उन पत्रिकाओं के दफ्तरों में जिनसे लोहिया समय समय पर संबंधित रहे. खुद अपनी ही सारी किताबों की एक - एक प्रति भी उनके पास नहीं थीं. 1963 में लोकसभा का सदस्य चुने जाने पर उन्हें सरकारी मकान रहने के लिए किराये पर मिला. इसके पहले उनका अपना कोई पता भी न था. पार्टी के दफ्तर या दोस्तों के घर, यही उनके पते थे. और यह दृष्टिकोण किशोरावस्था में ही बन गया था.

लोहिया का अपना खयाल था कि उनका कुल संस्कार संपत्ति से हट कर भाषा में आ गया था. उनके लेखन में आम तौर पर कसाव बहुत ज्यादा मिलता है, जो खास तौर पर उनके अंगरेजी लेखन को औसत भारतीय पाठक के लिए दुरुह भी बनाता है. एक बार बात चीत में मैंने इसका जिक्र किया, तो लोहिया धीरे से मुस्कराये, "अरे, यह तो वही वणिक वृति है. जहाँ एक से काम चले, वहाँ डेढ़ मत लगाओ". गांधी जी की भाषा में भी यही वृति थी.

व्यक्त्तित्व के इन पहलुओं के साथ ही, लोहिया का मूलभूत बौद्धिक दृष्टिकोण भी उनके विदेश जाने के समय तक निश्चित हो गया था. इस दृष्टि के तीन मुख्य पक्ष थे - मानवीयता, तर्कबुद्धि और संकल्प. लेकिन अगर इन तीनों को नजदीक से देखें तो ये घुल - मिल कर एक हो जाते हैं - मनुष्य की आंतरिक शक्ति. वही शक्ति दूसरे मनुष्यों के संदर्भ में मानवीय करूणा और ममता बन जाती है, और बाह्य परिस्थितियों के साथ अपने संबंधों के संदर्भ में विचार के स्तर पर तर्क बुद्धि और कार्य के स्तर पर संकल्प. लोहिया के बौद्धिक व्यक्त्तित्व के केंद्र में मनुष्य है - सारी दुनिया में साढ़े तीन अरब मनुष्य, अपनी जिन्दगी से जूझता हुआ कोई भी अकेला, कमजोर आदमी, जाति, धर्म, वर्ग, राष्ट्र, कबीलों और सभ्यताओं में बंटा हुआ, उनसे शक्ति पाता और उनके बोझ ढ़ोता हुआ आदमी. लेकिन मैं कुछ आगे बढ़ा जा रहा हूँ.

जर्मनी में खोज - कार्य करते हुए लोहिया ने अपनी आँखों के सामने नाजीवाद का उदय देखा. उसके हाथों साम्यवाद और समाजवाद को पराजित होते देखा. और वह इस नतीजे पर पहुँचे कि नाजीवाद और साम्यवाद बुरे सिद्धांत हैं लेकिन उनमें संकल्प शक्ति है. समाजवाद अच्छा सिद्धांत है, लेकिन उसमें संकल्प शक्ति नहीं है. संकल्प शक्ति वाला समाजवाद, यह उनका वैचारिक लक्ष्य बना.

लोहिया के विदेश जाने के पहले ही भारत में साम्यवादी दल की स्थापना हो चुकी थी. भारतीय बुद्धिजीवियों पर, और क्रांतिकारियों पर भी रूसी क्रांती का काफी गहरा असर पड़ रहा था. लेकिन तब तक भारतीय साम्यवादी राष्ट्रीय अंदोलन से कटे हुए स्वयं अपने ही नेतृत्व में क्रांती करने के सपने देख रहे थे. गांधी जी के प्रभाव के कारण, और राष्ट्रवादी आंदोलन से साम्यवादियों के कटे रहने के कारण, लोहिया को साम्यवाद ने आकर्शित नहीं किया. लेकिन उस समय तक भारतीय राजनीति में गांधी जी के बाद की पीढ़ी के कई नेता उभर कर सामने आ रहे थे. बंगाल में सुभाष बोस, बिहार में राजेंद्र बाबू, उत्तरप्रदेश में जवाहरलाल नेहरु, सीमान्त प्रदेश में अब्दुल गफ्फार खां, दक्षिण में राजा जी और प्रकाशम, गुजरात में वल्लभभाई पटेल.

लोहिया गांधी जी के भक्त थे, लेकिन गांधीवादियों के प्रशंसक नहीं. बाद में उन्होंने नेताओं की इस पीढ़ी के लगभग सभी लोगों के बारे में अपनी राय दोहरायी, लेकिन उस समय देश के अधिकांश शिक्षित नवयुवकों के समान अट्ठारह - बीस साल के राममनोहर लोहिया को भी जवाहरलाल नेहरु के चुम्बकीय व्यक्त्तिव ने मुग्ध कर दिया था. उन दिनों का एक किस्सा लोहिया ने एक बार सुनाया - जवाहरलाल नेहरु ने एक सभा में भाषण करते हुए कहा कि "दी किंगडम आफ हेवेन इज फार दी पुअर (स्वर्ग का साम्राज्य गरीबों का है);" "उस वक्त तो सब श्रोताओं के साथ मैं भी चमत्कृत हो गया", फिर एक खट्टी सी मुस्कान, "यह तो मुझे बाद में मालूम हुआ कि यह वाक्य उन्होंने कहां से चुराया था." वाक्य इंजील का है.

सुभाष बोस के व्यक्त्तिव में भी उग्रता थी, आकर्षण था. लेकिन इसके अलावा कि उनकी गांधी के साथ कभी नहीं बनी, लोहिया को उन्होंने शायद इसलिए भी अधिक आकर्षित नहीं किया कि उनमें सभ्यता और इतिहास संबंधी वह व्यापक दृष्टि नहीं थी जो नेहरु में थी. विश्व क्रांती और विश्व बन्धुत्व का जो सपना उन दिनों देखा जा रहा था, और भारतीय नेताओं में जिसका स्वर जवाहरलाल नेहरु में सबसे अधिक मुखर था, उसमें लोहिया जैसे नौजवानों के लिए एक सहज आकर्षण था.

जवाहरलाल नेहरु के व्यक्त्तिव में और भी ऐसा बहुत कुछ था उन दिनों, जो लोहिया जैसे प्रखर और स्वतंत्र बुद्धि के नवयुवक को आकर्षित करता. नेहरु ने पूर्ण स्वतंत्रा की बात उठायी थी और लोहिया के जर्मनी जाने के पहले १९२९ में नेहरु की अध्यक्षता में ही कांग्रेस ने पूर्ण स्वतंत्रा को अपना लक्ष्य भी घोषित कर दिया था. नेहरु कुछ ही वर्ष पहले इंग्लिस्तान के समाजवादी विचारकों से प्रभावित हो कर लौटे थे और इंग्लिस्तान की फेबियन सोसायटी उन दिनों प्रतिभाशाली विचारकों का अड्डा थी, जिसमे प्रमुख थे प्रखर बुद्धि वाले और बला के हाजिर जवाब बर्नार्ड शा. इसके अलावा, कुछ और भी चीजें थीं, जिनका सम्बंध सीधे राष्ट्रीयता की राजनीति से तो नहीं था लेकिन सामाजिक परिवर्तन से था.

नवयुवक लोहिया को विश्वास था कि मनुष्य जाति अब शीघ्र ही अपनी नियती को प्राप्त करेगी. मनुष्य जाति की मूलभूत एकता में, मनुष्य की तर्कबुद्धि में और उसकी संकल्पशक्ति में उन्हें बहुत अधिक विश्वास था. शायद नवयुवक लोहिया सोचते थे कि समाजवाद सहित पश्चिमी विज्ञान की तर्कशक्ति और गांधी जी की संकल्पशक्ति के मेल से विश्व में एक ऐसी ताकत उभरेगी, शायद हिंदुस्तान में से ही, कि दुनिया को बदलते देर नहीं लगेगी. और कम से कम शुरु में, लोहिया को जवाहरलाल नेहरु में तर्क और संकल्प का मेल दिखायी दिया, और साथ ही असाधारण संवेदनशीलता.

जवाहरलाल नेहरु की संवेदनशीलता की तारीफ लोहिया ने हमेशा की, उन दिनों भी जब राजनीति में वे नेहरु के सर्वप्रमुख विरोधी बन चुके थे, यद्यपि उस समय उनके मन में शंका उठने लगी थी कि नेहरु की संवेदनशीलता वास्तविक थी या केवल संस्कार और शिक्षा की आचरण में अभिव्यक्ति.

विश्व बन्धुत्व के सपने का एक और रुप भी लोहिया के मन में था, मनुष्य जाति के शारीरिक सामिप्य का. उनका खयाल था कि वह दिन दूर नहीं जब नर नारी सम्बंधों में जाति, धर्म, नस्ल, रंग आदि के भेद खत्म हो जायेंगे और सारे ही मनुष्य मिश्रित रक्तवाले हो जायेंगे. अनुभव ने शीघ्र ही उन्हें सिखा दिया कि यह सपना इतनी जल्दी सच होने वाला नहीं है, लेकिन इस सपने के पीछे दो और धारणाएं थी, जो आजीवन बनी रहीं. एक यह कि नारी पर लगे हुए बन्धन समाज के बहुतेरे अन्यायों की जड़ में है, और पुरुष भी तब तक स्वतंत्र नहीं हो सकता जब तक नारी उतनी ही स्वतंत्र न हो. दूसरा था, स्त्री मात्र के प्रति एक विशेष प्रकार के आदर और स्नेह का भाव, जिसके मूल में एक तरफ यह धारणा थी कि स्त्री सौंन्दर्य की प्रतीक है, हर स्त्री सुन्दर होती है, और दूसरी तरफ यह कि सौन्दर्य का चमड़ी के रंग से कोई सम्बंध नहीं.

लोहिया आजीवन जिन व्यक्तियों के प्रशंसक रहे, उनमें लोहिया की युवावस्था की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री ग्रेटा गार्बो भी थी. ग्रेटा गार्बो के प्रशंसक लोहिया इसलिए भी थे कि गार्बो अनुपम सुन्दरी और सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री थी और इसलिए भी कि गार्बो सर्वथा स्वतंत्र व्यक्तित्व की स्त्री थी. भारतीय इतिहास की कुछ नगरवधुओं के प्रति भी लोहिया के मन में कुछ वैसा ही आदर था, विशेषतः बुद्ध की शिष्या अम्बपाली के प्रति. गार्बो के बारे में जान कर उन्होंने सोचा कि प्राचीन नगरवधुएं भी शायद ऐसी ही रहीं होंगी, या कि गार्बो में उन्होंने नगरवधुओं का आधुनिक प्रतिरुप देखा, यह नहीं मालूम. लेकिन प्राचीन भारतीय राज्य और समाज की आंतरिक शक्ति का वे नगरवधुओं को भी एक उदाहरण मानते थे, जो न केवल अनिंद्य सुन्दरियां होती थी, श्रेष्ठ गायिकाएं, नर्तकियां और अभिनेत्रियां होती थीं, बल्कि जिन्हें राज्य से विशेष अधिकार प्राप्त थे, और राजनीति में जिनका प्रमुख हाथ रहता था. ग्रेटा गार्बो केवल सुन्दरी और अभिनेत्री थी. निश्चय ही लोहिया के मन में उसकी जगह अम्बपाली से बहुत नीचे रही होगी. "इतिहास चक्र" की भूमिका में लोहिया ने पूछा था, "कौन जानता है कि जब अम्बपाली ने संघ में प्रवेश की अनुमति चाही, तो बुद्ध के मन में कोई हल्का सा भी कंपन हुआ कि नहीं. लेकिन इसे बुद्ध के अलावा और किसी ने भी नहीं जाना होगा, बल्कि शायद बुद्ध ने भी नहीं जाना होगा."

लेकिन अम्बपाली केवल इतिहास की पुस्तकों में थी, और ग्रेटा गार्बो लोहिया की युवावस्था में अपने सौन्दर्य और अपनी कला के शिखर पर थी. 1951 में जब लोहिया ने अमरीका की यात्रा की, तो उन्होंने विशेष रुप से ग्रेटा गार्बो से भी मिलने की कोशिश की, और इसका उन्हें अफसोस रह गया कि गार्बो से उनकी भेंट नहीं हो सकी. इस अमरीका यात्रा में उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि जब वह बर्लिन में छात्र थे, तो नीग्रो नयिका जोसेफीन बेकर ने यूरोप का दौरा किया था, पेरिस पर वह आंधी की तरह छा गयी थी, और "उस आंधी मैं भी बह गया था." जोसेफीन बेकर तो दूसरे महायुद्ध के बाद फ्रांस में ही बस गयी थी, लेकिन महान आइंस्टीन से एक बार फिर मिलने की अपनी इच्छा लोहिया अमरीका में पूरी कर सके थे.

इसके पहले लोहिया ने आंइस्टिन को जर्मनी में ही देखा था. हुम्बोल्ट विश्वविद्यालय में ही आंइस्टीन भौतिक विज्ञान पढ़ाते थे. लोहिया तो अर्थ शास्त्र के शोध छात्र थे, लेकिन आंइस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत ने उन दिनों विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व क्रांति कर दी थी. परमाणु शक्ति के रहस्य का उस समय तक पूरा पता नहीं चला था, लेकिन सारी दुनिया के वैज्ञानिक आंइस्टीन सूत्र के सहारे उस दिशा में खोज कर रहे थे, और इसका आभास मिल चुका था कि मनुष्य जाति एक नयी चमत्कारी खोज के कगार पर है. लोहिया कौतुहलवश एक दिन आंइस्टीन की कक्षा में गये थे. छात्र छात्राएं विश्व के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक को घेर कर बैठे थे. कोई प्रश्न पूछता. फिर दूसरे छात्र उसका उत्तर देने की चेष्टा करते. आंइस्टीन के चेहरे पर एक धैर्य और स्नेहभरी मुस्कान थी. बीच बीच में कोई संकेत सूत्र दे कर वे छात्रों की सहायता करते, या उनकी किसी त्रुटी की ओर उनका ध्यान खींचते. बस. छात्र स्वयं अपनी बुद्धि से अज्ञान से ज्ञान की ओर टटोलते हुए बढ़ते और वैज्ञानिक अध्यापक स्नेह से देखता हुआ उन्हें बढ़ावा देता, जरुरत पड़ने पर थोड़ा सहारा भी. उस कक्षा को देख कर लोहिया को लगा कि प्राचीन भारतीय ऋषियों के आश्रम में भी शायद ऐसी ही कक्षाएं लगती रही होंगी.

गांधी, शा, आंइस्टीन, बुद्ध, अम्बपाली, ग्रेटा गार्बो, लोहिया को इन सभी ने प्रभावित किया था. आगे चल कर भी, जो लोग लोहिया के समग्र व्यक्तित्व से परिचित नहीं थे, ऐसे मित्र और अनुयायी भी गांधी और गार्बो को अगल बगल देख कर उलझन में पड़ जाते थे. लेकिन लोहिया में यह सर्वथा स्वभाविक था. इसके अलावा कुछ और हो भी नहीं सकता था. लेकिन मैं फिर काफी आगे चला आया हूं.

लोहिया जर्मनी में ही थे तो गांधीजी का प्रसिद्ध डंडी मार्च हुआ, फिर धरसाना का ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह, जिसमें बेहोश हो जाने तक बिना पीछे कदम हटाये मार खाने वालों में लोहिया के पिता हीरालालजी भी थे. सारे देश में असंतोष की लहरें उठ रहीं थीं. उन्हीं दिनों जेनेवा में राष्ट्रसंघ लीग आफ नेशंस की बैठक हुई तो लोहिया भी वहाँ पहुँचे, और जब भारतीय प्रतिनिधि के रुप में बीकानेर के महाराजा गंगासिंह बोलने को खड़े हुए तो लोहिया ने दर्शक दीर्घा से जोर की सीटी बजायी और व्यंगभरी आवाजें कसी. कुछ देर भवन में हलचल हुई, फिर पहरेदारों ने लोहिया को वहां से हटा दिया. लेकिन उस घटना के बहाने हिन्दुस्तान की आजादी का सवाल एक बार फिर यूरोप के अखबारों में उठा.

जर्मनी में प्रवासी भारतीय राष्ट्रवादियों के संगठन में भी लोहिया ने सक्रिय भाग लिया था, और इस सिलसिले में साम्यवादियों से उनका टकराव भी हुआ था, क्योंकि साम्यवादी चाहते थे प्रवासी भारतीयों का संगठन सीधे उनके प्रभाव में रहे और गांधीजी व राष्ट्रवादियों का विरोध करे. लोहिया ने ऐसा नहीं होने दिया. लेकिन गांधीजी से मतभेद रखने वाले भारतीय क्राँतिकारियों के प्रति भी लोहिया के मन में बड़ा आदर था. उन्हीं दिनों सरदार भगत सिंह को फांसी हुई थी, और संयोग देखिये कि फांसी हुई भी 23 मार्च को, लोहिया के जन्म दिन पर. उसके बाद फिर कभी लोहिया ने अपने जन्म दिन पर कोई खुशी नहीं मनायी, कोई समारोह नहीं किया. अगर उनके मित्र कभी कोई आयोजन करना भी चाहते तो वह एक दो दिन बाद ही किया जाता, 23 मार्च को नहीं.

अपने शोध कार्य में लोहिया का मुख्य विषय था अर्थशास्त्र, गौण विषय थे दर्शन और इतिहास. अर्थशास्त्र के अध्ययन में उन्हें लगा कि यूरोपीय क्लासिकी अर्थशास्त्र, चाहे एडम स्मिथ का था या मार्क्स का, अधूरा था. वह केवल यूरोप का अर्थशास्त्र था. कीन्स के विदेश व्यापार संबंधी इस सिद्धांत को भी उन्होंने अधूरा पाया कि दुनिया में पूर्ण रोजगार जरुरी है. इसमें उन्होंने उत्पादकता की समानता का सिद्धांत जोड़ा, सारी दुनियो में पूर्ण रोजगार ही नहीं, श्रम की लगभग समान उत्पादकता भी जरुरी है.

दर्शन में उनकी दृष्टी में केंद्र में था आध्यात्मिकता का यह सिद्धांत कि मनुष्य को मनुष्य की हत्या नहीं करनी चाहिये. गांधीजी ने इस सिद्धांत को व्यावहारिक राजनीति में उतारा, इसी चीज ने लोहिया को आजीवन गांधीजी से जोड़े रखा. हिंसा अहिंसा के सवाल को लोहिया ने एक और कसौटी पर देखा, हिंसा की प्रकृति है कि वह हमेशा अपने से दुर्बल शत्रु खोजती है, अपने बराबर के या अपने से बलवान शत्रु से वह बचती है. इसलिए लोहिया ने हिंसा को समाजिक परिवर्तन का उपयुक्त उपकरण कभी नहीं माना. लेकिन उन्होंने क्रांतिकारी परिवर्तन के किसी प्रयत्न की कभी इसलिए निंदा नहीं की कि वह हिंसात्मक था, न भगत सिंह की, न चंद्रशेखर आजाद की, न आजाद हिंद फौज की. खुली, साहसपूर्ण हिंसक क्राँतिकारिता के वे समर्थक नहीं थे, लेकिन वे स्वीकार करते थे कि मनुष्य को अन्याय का विरोध और प्रतिकार करने का अधिकार है, चाहे वह जिस उपाय से हो.

वे कट्टर आलोचक थे क़त्ल की राजनीति के, कायरतापूर्ण हिंसा के, भीड़ द्वारा या राज्य द्वारा इक्का दुक्का या निहत्थे लोगों की हत्या के. और ऐसी हिंसा से वे आजीवन लड़ते रहे. वे मानते थे कि शक्ति चाहे हिंसा की हो या अहिंसा की, उसका मर्म है संकल्प. पहले संकल्प, फिर धन या हथियार. उन्होंने अहिंसा को स्वीकार किया, इसका एक कारण यह भी था कि अहिंसा मे केवल संकल्प की शक्ति ही काफी थी, धन और हथियार अनावश्यक थे.

इतिहास को उन्होंने सभ्यता के उत्थान पतन, शक्ति के स्थानान्तरण और समाज की सापेक्षिक जड़ता या गतिशीलता के संदर्भ में देखा. और उनकी दृष्टि स्वयं अपने ही देश के इतिहास पर रुकी. भारतीय समाज दुनिया के किसी और हिस्से से ज्यादा लंबे अरसे तक जड़ और जकड़ा हूआ क्यों रहा है ? ऐसा क्यों है दुनिया का कोई देश परदेसियों द्वारा इतनी अधिक बार जीता नहीं गया, इतना ज्यादा कुचला नहीं गया, जितना हिन्दुस्तान ? ऐसा क्यों हुआ कि हिन्दुस्तान जब उठा तो उसने सारी दुनिया को कुछ दिया ही दिया, उससे लिया कुछ नहीं, और जब गिरा तो सारी दुनिया की जूठन बटोरता रहा, उसके पास किसी को देने के लिए कुछ नहीं रहा.

जर्मनी में पढ़ते हुए राममनोहर लोहिया ने ये सवाल मार्क्सवादियों से भी पूछे, हीगेलवादियों से भी. और किसी से भी उनको इसका संतोषजनक उत्तर न मिला. वैज्ञानिक आविष्कार, पूंजी का संचय, आखिर यह यूरोप में ही क्यों हुआ, एशिया में क्यों नहीं ?

और तब लोहिया ने इतिहास, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, नीतिशास्त्र, सब में ऐसे विचार सूत्रों की तलाश की जिससे एक ऐसी विचार व्यवस्था बनती हो जिसमें आंतरिक संगति हो, और जो इन सब सवालों के जवाब दे सके.

भारतीय इतिहास, भारतीय सभ्यता और संस्कृति, "भारत" के व्यक्तित्व का अध्ययन लोहिया आजीवन करते रहे. अपने देश की मिट्टी से जैसा प्रत्यक्ष और गहरा परिचय लोहिया ने प्राप्त किया, वैसा इस युग में किसी और ने नहीं. देश का शायद ही कोई कोना होगा जहाँ लोहिया के पांव न पड़े हों. देश की भूमि, नदियां, लोग, भाषा, भोजन, समाज, अर्थ व्यवस्था, इतिहास, पुराकथाएँ, दर्शन, किंवदंतियां, कलाएँ, संक्षेप में भारत के पूरे व्यक्तित्व से जैसा साक्षात्कार लोहिया ने किया, वैसा निश्चय ही इस युग के किसी अन्य व्यक्ति ने नहीं. इस व्यक्तित्व की विकृतियों और कुत्साओं ने लोहिया को पीड़ित किया, उसकी सूक्ष्म सौंदर्य दृष्टि और उसकी उड़ान ने लोहिया को मुग्ध और विभोर किया. लेकिन इन सबको देखते समझते हुए लोहिया की दृष्टि एक ही प्रश्न पर केंद्रित थी, देश की जड़ता के कारण क्या हैं, और उसके पुनर्जागरण का मार्ग कैसे उम्मुक्त हो.

लेकिन गांधी युग में सभी भारतीयों की तरह युवक लोहिया को भी इसमें संदेह नहीं था कि भारत पुनर्जागरण के द्वार पर खड़ा है. पुनर्जागरण का युग आरंम्भ हो गया है, बड़ी बाधा केवल देश की गुलामी है.

किन्तु यूरोप में एक नया संकट उत्पन्न हो रहा था, नाजीवाद का उदय. इटली में मुसोलिनी सत्तारुढ़ हो गया था, और जर्मनी में हिटलर की "नेशनल सोशलिस्ट पार्टी (नात्सी या नाजी) की शक्ति बड़ी तेजी से बढ़ रही थी. लोहिया अक्सर मौका मिलने पर बहस मुबाहिसा करते, और एकाध बार मार पीट की नौबत भी आते आते बची. बीच में एक बार लोहिया के एक मित्र, काला कांकर के श्री ब्रजेश सिंह, जो उन दिनों साम्यवादी थे (बाद में स्टालिन की पुत्री स्वेतलाना से उन्होंने विवाह किया, और उनकी मृत्यु के बाद स्वेतलाना के रुस छोड़ देने पर सारी दुनिया ने उनका नाम जाना), बिना पासपोर्ट के ही बर्लिन आ गये. उनको ठहराना काफी जोखिम का काम था, और अधिकारियों को पता चल जाता तो लोहिया को शायद जर्मनी छोड़ना पड़ता, मुमकिन है कुछ दिन जेल में भी बिताने पड़ते. लेकिन जोखिम उठाना तो लोहिया के स्वभाव में था. खैर बात छिपी रह गयी और ब्रजेश कुछ दिनों बाद इंग्लिस्तान चले गये.

फिर भी जब हिटलर 1933 में सत्तारुढ़ हुआ, तो लोहिया के मित्रों ने, और अध्यापकों ने भी, जिनमें प्रमुख समाजवादी शुमाखर भी थे, लोहिया को सलाह दी कि अब उनका जर्मनी में रहना खतरनाक होगा. शोध प्रबंध का काम करीब करीब पूरा हो चुका था. बाकी औपचारिक कार्यवाही जल्दी ही पूरी हो गयी. अलबत्ता, इतिहास की मौखिक परीक्षा बड़ी दिलचस्प रही. प्रसिद्ध इतिहासकार ओन्केन लोहिया के निर्देशक और परीक्षक थे. लोहिया ने अपने निबंध में प्रतिपादित किया था कि उन्नीसवीं सदी में इग्लिस्तानी विदेश नीति का सर्वप्रमुख उद्देश्य था, भारतीय साम्राज्य की रक्षा. परीक्षक और परीक्षार्थी में काफी देर सवाल जवाब चलता रहा, और अंत में ओन्केन ने लोहिया को सलाह दी कि वे 1857 के विद्रोह पर विदेशी प्रभाव का विशेष अध्ययन करें. लोहिया का शोध निंबध स्वीकृत हो गया, "पी. एच. डी." की उपाधि ले कर लोहिया "डाक्टर राममनोहर लोहिया" बनकर भारत लौटे.

यह "डाक्टर" शब्द फिर उनके नाम के साथ अभिन्न रुप से जुड़ गया. आजीवन वे "डाक्टर लोहिया" ही कहलाये. उनके शिष्य उन्हें "डाक्टर साहब" कहते, और मित्र खाली डाक्टर. लोहिया को इससे कभी कभी खीज भी होती, क्योंकि अक्सर लोग उन्हें चिकित्सक समझ बैठते, और किसी गांव की सभा में अगर लोहिया को कानाफूसी सुनाई देती कि वे "एलोपैथ हैं या होमियोपैथ", तो मन ही मन लोहिया झल्ला जाते. लेकिन लोग उनके नाम के साथ "डाक्टर" न लगायें, उनकी यह कोशिश कभी कामयाब नहीं हुई.

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