ओमप्रकाश दीपक का लेखन कल्पना का हिन्दी लेखन जगत

स्मरण : ओम प्रकाश दीपक

सूर्यनारायण, सामायिक वार्ता, मार्च 1979

इस 25 मार्च को ओम प्रकाश दीपक की मृत्यु को चार साल हो जायेंगे.

उन दिनों भी जब "जन" के प्रधान सम्पादक डा. राम मनोहर लोहिया हुआ करते थे, जन परिवार के जिस व्यक्ति को मैं, बगैर मिले और खतोकिताबत हुए, सबसे ज़्यादा जानता था, वह थे ओमप्रकाश दीपक. मेरे जानने का आधार वही था जो पाठक और सम्पादक के बीच हुआ करता है. डा. लोहिया की मृत्यु के बाद दीपकजी ने "जन" का जिस ढंग से सम्पादन किया और नीतिगत प्रश्नों पर बहस खड़ी की, उससे पत्रिका की लोकप्रियता में कमी नहीं आयी. "जन" के माध्यम से युवा पाठक समाजवादी विचारधारा और संसोपा की ओर मुखातिब होने लगे. मुझे यह कहने में हिचक नहीं है कि "जन" में दीपक जी के सम्पादकीय उन दिनों मेरी मुख्य खुराक थे.

सम्पादकीयों को पाठकों ने तो पसंद किया पर संसोपा के नेताओं को उनसे खतरा महसूस होने लगा. नेता चाहते थे कि लोहिया की उनकी राजनीति के अनुरूप व्याख्या की जाये, दीपकजी को यह मंज़ूर नहीं हो सकता था. "जन" के खिलाफ़ नेताओं का प्रचार अभियान शुरु हुआ और दीपक जी ने "जन" से इस्तीफ़ा दे दिया. उनके कारण ही लोहिया के न रहने पर "जन" चल सका और जब वह उससे अलग हो गये तो वह मर गया. लेकिन "जन" के सम्पादक ओमप्रकाश दीपक के बहुत से पाठक बन गये थे और उन्होंने उन्हें ढूंढ़ ढूंढ़ कर पढ़ना शुरु किया, कभी "दिनमान" में, कभी "साप्ताहिक हिंदुस्तान" में, कभी "धर्मयुग" में और "चौरंगी वार्ता" में. गो कि "चौरंगी वार्ता" छोड़ कर कोई भी ऐसा पत्र नहीं था जिसमें वह अपनी पूरी पूरी बात कह सकें. "चौरंगी वार्ता" मुख्यतः बिहार आंदोलन का पत्र था और पाठक संख्या सीमित थी. उसमें दीपक जी के कई महत्वपूर्ण लेख छपे हैं जिनका बहुतों को पता नहीं है.

"जन" का सम्पादन करते हुए दीपक जी ने लोहिया से प्रभावित बुद्धिजीवियों का एक सम्मेलन बुलाने की रूपरेखा बनायी. इस सम्मेलन के सम्बंध में पहली बार उनसे पत्राचार हुआ जो आगे चल कर व्यक्तिगत मैत्री का आधार बना. बुद्धिजीवी सम्मेलन में जब दीपकजी आये तो उनसे मिल कर लगा ही नहीं कि पहली बार मिल रहे हैं. शायद दीपक जी ऐसे लोगों में थे जिनसे पहली मुलाकात के वक्त मिलने वालों को लगता था कि "हम पहले भी मिल चुके हैं". उनका तीखा नाक नक्श वाला चेहरा भी कुछ ऐसा था कि वह बहुत पहचाना हुआ लगता था - उन्हें बंगाली बंगाली समझता था; बिहारी, बिहारी; पंजाबी, पंजाबी; दक्षिण भारतीय, दक्षिण भारतीय. अगर मुझे प्रतिनिधि हिंदुस्तानी चेहरा चुनना हो तो मैं दीपकजी का चेहरा चुनूंगा. तो हमारी पहली मुलाकात में कोई औपचारिकता नहीं थी. बुद्धिजीवी सम्मेलन के पहले दिन की कार्यवाही के बाद एक कारधारी मित्र उन्हें किसी बड़े होटल में चाय पिलाने को ले जाना चाह रहे थे. लेकिन इससे पहले मैं उन्हें "कहीं" चल कर चाय पीने को कह चुका था. इस "कहीं" का अर्थ वह जानते थे. पटना से बहुत अधिक परिचित नहीं होने बावजूद वह मुझे एक झोपड़ीनुमा चाय की दुकान में ले गये जहां काफ़ी रात बीते हम लोग बातचीत करते रहे.

दूसरे दिन सम्मेलन में अजीब नजारा हुआ. सम्मेलन दो दलों में बंट गया और रघुवीर सहाय के भाषा सम्बंधी परचे के अंतिम पैराग्राफ को ले कर तुमुल मचा. रघुवीर सहाय के परचे के अंतिम पैराग्राफ में कहा गया था "इस भ्रष्ट विचार पर कुछ टिप्पणी करना आवश्यक नहीं है कि देश की एकता को अंगरेज़ी बनाये रख सकती है. देश को अंगरेज़ी सचमुच कभी एक न होने देगी और यह भी कह दूँ कि अंगरेज़ी की जगह ठीक उसी तरह से इस्तेमाल के लिए कोई भारतीय भाषा रखी गयी तो वह भी देश को एक नहीं होने देगी." सहाय जी की अनुपस्थिति में "चौरंगी वार्ता" के सम्पादक रमेशचंद्र सिंह ने परचा पढ़ा. कृष्णनाथ ने परचे के समर्थन में लम्बा भाषण दिया. केसरी कुमार और कर्पूरी ठाकुर ने परचे के अंतिम पैराग्राफ के अंतिम वाक्य को संशोधित किये जाने की मांग की. उनका तर्क था कि इससे हिंदी पर वृथा आक्षेप होता है. अगर यह संशोधन स्वीकार किया जाता तो अंगरेज़ी समर्थकों को हिन्दी साम्राज्यवाद का एक और "प्रमाण" मिल जाता. लगता था कि "अंतिम वाक्य" को ले कर सम्मेलन टूट जायेगा. अंत में दीपकजी उठे और उन्होंने अंतिम वाक्य की इस तरह व्याख्या की कि श्रोताओं को वाक्य का मर्म समझ में आ गया. जब तक वह बोलते रहे सन्नाटा छाया रहा. ऐसा अद्भुत भाषण मैंने अपने जीवन में कम सुना है. लोगों ने उनके तर्कों को स्वीकार किया और सम्मेलन सफलतापूर्ण समाप्त हुआ. मैं अब तक उनके लेखन पर मुग्ध था, अब भाषण पर भी हुआ.

एक बार मैंने अपनी रचना गोष्ठी में उन्हें मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया. विषय था "हिंदी साहित्य की वर्तमान प्रवित्ति". उन्होंने अपने अनूठे ढंग से हिदी साहित्य की प्रवित्तियों का उस दिन जो विश्लेषण प्रस्तुत किया, उसे सुन कर मुझे दीपकजी के बारे में पहली बार "संदेह" पैदा हुआ कि यह व्यक्ति मूल रूप में क्या है - राजनीतिक व्यक्ति है या लेखक. मेरा "संदेह" गलत था क्योंकि दीपकजी की राजनीति के बारे में सोच और साहित्य के बारे में सोच की प्रेरणा एक ही थी. संवेदना और करुणा ही उन्हें राजनीति की ओर प्रेरित करती थीं और ये ही साहित्य की ओर भी. गोष्ठी में देवीदत्त पोद्दार ने उनके उपन्यास "कुछ ज़िन्दगियाँ बेमतलब" की भी चर्चा की. दीपकजी ने सामान्य आदमी को आधार बना कर हिंदी में बिल्कुल एक नये ढंग की यात्रा वृतांत शैली भी विकसित की. चाहे बंगलादेश के स्वत्रंता संग्राम का वर्णन हो (पैदल और किन किन कठिन परिस्थितियों में उन्होंने बंगलादेश की यात्रा की और मुक्तिवाहिनी के लोगों से सम्पर्क किया, यह तो शायद पूरी तरह दिनेशदास गुप्त ही जानते हैं), चाहे महाराष्ट्र के किसी आकाल क्षेत्र का, चाहे श्रीवस्ती की प्राचीन बस्ती के नजदीक से गुजरने का प्रसंग हो, उनकी दृष्टि हमेशा सामान्य आदमी की जिन्दगी को टटलोती रहती थी. इस जिन्दगी को समझने और उसे बदलने की कामना उनके राजनीतिक लेखन, यात्रा वृतांतों और उपन्यास में हर जगह है.

दीपक जी ने "दिनमान" के "आधुनिक विचार" स्तम्भ और "साप्ताहिक हिंदुस्तान" में पश्चिमी विचारकों, महत्वपूर्ण पुस्तकों और भारतीय समाज की "अनपची" समस्याओं पर जो लेख लिखे, उनका शायद सामाजिक महत्व से ज्यादा महत्व नहीं माना जाये लेकिन इन लेखों के पीछे उनकी कोशिश हिंदी के पाठक को गहराई से सोचने समझने के लिए प्रेरित करने की थी. उनके यह लेख भी पाठक को झिंझोड़ते थे और वह शायद पाठक को झिंझोड़ना चाहते भी थे.

1971 के बाद समाजवादी आंदोलन में बिखराव की स्थिति पैदा हुई. इस समय दीपकजी ने लोहिया की राजनीति को जीवित रखने की भरपूर चेष्टा की. इलाहाबाद में राजनारायण द्वारा बुलाये गये सम्मेलन में वह अपनी बात ठीक से उपस्थित न कर सके लेकिन पटना के कार्यकर्ता सम्मेलन में उनकी अहम भूमिका रही. सम्मेलन का नीति-वक्तव्य भी उन्होंने ही तैयार किया. लेकिन इस सम्मेलन से वह निराश हुए. नेताओं की उठा पटक देख कर वह राजनीति के "कुजात के" लोगों का संगठन बनाने की बात सोचने लगे. उन्होंने सर्वोदय के लोगों की गोष्ठियों में जाना शुरु कर दिया. नक्सलवादियों से भी सम्पर्क करने की कोशिश ली, हालांकि उनसे उनका कोई खास सम्बंध नहीं बन पाया. सर्वोदय के लोगों से उनका अलबत्ता अच्छा रिश्ता कायम हुआ. मुझे लगा कि वह मठी गांधीवादियों के गिरोह में शामिल होने जा रहे हैं. मैंने इस बारे में उन्हें एक तीखा पत्र भी लिखा. इसका उन्होंने जबाव नहीं दिया.

18 मार्च 1974 को बिहार आंदोलन शुरु हो गया तो दीपकजी अचानक दिल्ली से पटना आ धमके. उन्होंने मुस्कराते हुए मेरी पीठ पर हाथ रखा और कहा "मिल गया न तुम्हें अपनी शंकाओं का जवाब?" बिहार आंदोलन में सर्वोदय के युवा कार्यकर्ताओं ने जो भूमिका निभाई उसके बारे में यहां लिखने की जरूरत नहीं. मेरी शंकाएँ गलत निकली. लेकिन सर्वोदय के युवा कार्यकर्ताओं को आंदोलन से जुड़ने के पीछे किसी न किसी की मेहनत भी रही होगी. मैं मित्रों में चर्चा करता रहा कि किस प्रकार परिवर्तन के आग्रही कुजात सर्वोदयी कार्यकर्ताओं को दीपकजी ने पहचाना होगा, किस प्रकार उनसे संवाद कायम किया होगा और किस प्रकार वह उन्हें राजनीति और संघर्ष के मैदान तक लाये होंगे.

बिहार आंदोलन के वक्त दीपकजी दिल्ली से बोरिया बिस्तर ले आये और पटना के संघर्ष कार्यालय में रहने लगे. आंदोलन के विचार पक्ष, प्रचार पक्ष और संगठनात्मक पक्ष सभी को मजबूत करने में वह दिन रात जुटे रहे. युवा छात्र नेताओं और कार्यकर्ताओं से उनका सम्बंध अत्यंत मधुर था. जो युवा नेता किसी की भी बात मानते प्रतीत नहीं होते थे, बड़ी आसानी से दीपकजी की बात मान लेते थे.

बिहार आंदोलन में उनकी भूमिका का मूल्यांकन करना इस लेख का उदेश्य नहीं, यह तो एक स्नेह स्मरण मात्र है.

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