ओमप्रकाश दीपक का लेखन कल्पना का हिन्दी लेखन जगत

स्मरण : ओम प्रकाश दीपक

मैत्री, किशन पटनायक, चौरंगी वार्ता, 21 अप्रैल 1975

ओमप्रकाश दीपक की मौत की खबर मुझे 12 दिन बाद मिली. यह मेरे लिए बहुत कष्टदायक बात रही. ओड़िसा के अखबारों में उनकी मृत्यु की खबर नहीं छपी. व्यस्तता के कारण दिल्ली के अखबार देख नहीं पाया. ६ अप्रैल को हैदराबाद पहुँचते ही केशवराव यादव ने दीपकजी की मृत्यु का जिक्र किया तो मैं समझ नहीं पाया. विश्वास ही नहीं हुआ. मैं उनसे बार बार कहता रहा कि मुझे विश्वास नहीं हो रहा है. मुझे एवरीमैन्स या दिनमान जिसमें समाचार छपा है दिखाईये. मेरे लिए यह पहला मौका था कि खुद अखबार पढ़े बिना पूरा विश्वास नहीं कर सका. शायद यह एक मनोवैज्ञानिक कौशल था कि दिल को तत्काल चोट न पहुँचे. इस बीच कमला जी, गुड्डू और पिंकी सबको याद कर चुका था. सबके बारे में कुछ सोच लिया था. अखबार में तस्वीर के साथ समाचार पढ़ते तक मैं अपने ऊपर घटना के असर को संभाल चुका था.

दीपकजी से मेरी विचित्र दोस्ती थी. शुरुआत तो व्यक्तिगत दोस्ती से हुई थी. 1959 की बात होगी, तारीखें मुझे याद नहीं रहती, दीपकजी की यादाश्त अद्भुत थी जिससे मुझे ईर्ष्या होती थी. हैदराबाद में दीपकजी सोश्लिस्ट पार्टी के अखिल भारतीय कार्यालय में संयुक्त मंत्री थे और मैं मासिक पत्रिका मैनकांइड में काम करने, डा. लोहिया उसके मुख्य संपादक थे, गया था. एक बार छुट्टियों में कमला जी अपने दो बच्चों पिंकी और गुड्डे के साथ हैदराबाद आयीं. उनके आने के बाद ही मुझे पता चला कि दीपकजी से मेरी दोस्ती हो चुकी थी. कमला जी मुझे बहुत बहुत अच्छी महिला लगीं और दोनो बच्चों का मुझसे काफी लगाव हो गया, जो अभी तक है. लेकिन बाद के दिनों में हमारी दोस्ती एक दूसरे स्तर पर आ गयी थी और अंत तक एक छुरे की धार पर दृढ़ रुप से टिकी रही. हम दोनो लोहिया को अपना गुरु मानते थे. ऐसा गुरु जिसका नाम जपना या जिसकी प्रशंसा करना हमारे स्वभाव के खिलाफ था. लोहिया की बातों में अंतर्निहित सत्य को बदलती स्थिति और समय के संदर्भ में प्रमाणित करना और उसके अनुसार समस्याओं को समझना और मार्ग निकालना, यही लोहिया के प्रति हमारी प्रतिबद्धता की सही कसौटी होगी, हम दोनो ने माना था. लोहिया के जीवन काल में ही हमको लगता था कि समाजवादी दल का नेतृत्व लोहिया के सिद्धातों को न समझता है और न मानने की कोशिश करता है. उस वक्त और भी साथी थे जो इस सम्बंध में मेरी या दीपकजी जैसी राय रखते थे. लोहिया की मृत्यु के बाद ऐसे साथियों की संख्या घटने लगी और हम लोग अकेले पड़ने लगे. हम लोगों से अधिक उम्र वालों में शायद ही कोई साथ रह गया. गोपाल गौड़ा हमेशा बीमार रहे और लम्बी बीमारी के बाद उनकी मृत्यु हो गयी. उनसे हम सम्पर्क नहीं कर पाते थे. रमा मित्र हर निर्णायक स्थिति में हमारा साथ देती थीं.

समाजवादी आंदोलन की गिरावट तेज होने लगी. बार बार समस्याएँ संकट का रुप धारण कर लेती थीं. हर संकट के मौके पर जब मैं कोई बात सोचता था और सारा समाजवादी नेतृत्व दूसरे ढ़ंग से सोचता था तो उस अकेलेपन में हर बार मेरे मन में एक ही सवाल उठा करता था, क्या दीपक मेरे जैसा ही सोच रहे होंगे? मैं अधीर हो उठता था कि दीपकजी क्या सोच रहे हैं और जब यह मालूम होता था कि उनकी राय मेरे जैसी है तो मन का संदेह पूरी तरह से खत्म हो जाता था और उस राय को प्रसारित करने में और कोई बाधा नहीं रहती थी. इस लिए नहीं कि दीपक मुझसे अधिक प्रभावशाली थे बल्कि इस लिए कि उनकी समझ पर मुझे भरोसा था. खासकर जिस प्रश्न पर मेरी उनकी राय एक हो जाती थी, मैं एकदम निश्चिंत हो जाता था. अन्य लोगों की राय लेना जरुरी नहीं लगता था. शायद यह अपने में कोई अनोखी या महत्वपूर्ण बात न होती अगर लोहिया के बाद समाजवादी आंदोलन में हमारे समर्थक और दोस्तों की संख्या लगातार घटती नहीं जाती. समाजवादी आंदोलन के ट्रेजेडी और उसमें हमारे अकेलेपन में हमारी दोस्ती को छुरे की धार पर टिका रखा था. दोस्ती के अन्य पहलू गौण होने लगे. हमारी दोनो की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी. लेकिन दीपकजी पिता भी थे इसलिए उनका अभाव मेरे से अधिक था. मेरा कार्य क्षेत्र अधिक व्यापक और दिल्ली से दूर था. आर्थिक तंगी के कारण दिल्ली में रहने के वक्त भी मैं उनसे बहुत अधिक नहीं मिल पाता था लेकिन जब भी सोच और राजनीतिक विश्लेषण के अवसर पर मुझे अकेलापन महसूस होता मैं उनसे अवश्य मिल लेता था. कई प्रश्नों पर खासकर इस सवाल पर कि हमको अपने सीमित साधन और सहयोगियों को ले कर क्या करना चाहिये, कभी कभी हमारी राय अलग हो जाती थी. जब राय में भिन्नता आती थी तो हम दोनों एक दूसरे को समझने की कोशिश करते थे. मैंने अपनी ओर से तय कर लिया था कि हम दोनों की राय अलग हुई तो मैं कर्म में दीपकजी की राय को मान कर चलूँगा. दीपकजी मुझसे उम्र में कुछ बड़े थे इसलिए भी हिचक कर जाता था. हम अलग रास्ते पर कभी नहीं चले.

कर्पूरी ठाकुर के एकतावादी सम्मेलन में 1972 में योग देना, भागलपुर सम्मेलन में अध्यक्ष के पद के लिए खड़े होना आदि कई घटनाएँ ऐसी थीं कि मेरी राय कुछ अलग थी लेकिन दीपकजी की बात मैंने मान ली. कुजात सर्वोदियों से दोस्ती और सहयोग करना दीपकजी ने शुरु किया और मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया. यह जयप्रकाश जी के आंदोलन से करीब एक साल पहले की बात थी. कोई नहीं जानता था कि जयप्रकाश के नेतृत्व में सच्चे सर्वोदयी और सच्चे समाजवादियों का रिश्ता घनिष्ठ होगा. लेकिन दीपकजी ने स्थिति को ठीक ही समझा था इसलिए एक दूरदर्शी शुरुआत उन्होंने की.

जयप्रकाश जी के नेतृत्व वाले आंदोलन में हम लोगों का अकेलापन कुछ खत्म होने लगा था लेकिन उस दोस्ती की जरुरत ज्यों की त्यों रही क्योंकि जयप्रकाशजी बहुत प्रकार के लोगों के नेता हैं. ऐसे लोग हैं जो उन्हें तात्कालिक राजनीतिक समर्थन दे रहे हैं और ऐसे लोग हैं जिनका दीर्घकालीन क्रांतीकारी लक्ष्य है. ऐसी हालत में जयप्रकाशजी खुद एक कदम आगे की बात ही ठोस ढ़ंग से कह सकते हैं. अंतिम कदम की बात भी कह सकते हैं. लेकिन बीच के दूसरे तीसरे कदम के बारे में हमी लोगों को सोचना था. इस चुनौती के सामने मेरा अकेलापन नहीं कटा था. निर्दलीय मंच अभी तक बना नहीं है और दीपकजी हमारे बीच से चले गये. अकेलापन और बढ़ गया है.

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