ओमप्रकाश दीपक का लेखन कल्पना का हिन्दी लेखन जगत

स्मरण : ओम प्रकाश दीपक

दीपक बुझ गया, नारायण देसाई, 1975

इलाहाबाद का युवा सम्मेलन, 22 और 23 जून 1974. आरम्भ से ही आवाहक लोगों पर विभिन्न छात्र नेताओं या उनके शागिर्दों की मार पड़ रही थी. एक अवस्था ऐसी आयी कि मालूम होता था कि सम्मेलन टूट जायेगा. बिहार आंदोलन के बाद प्रदेश के बाहर यह पहला युवा सम्मेलन था जिसमें जयप्रकाश जी आ रहे थे. इस सम्मेलन का भंग हो जाना न सिर्फ सम्मेलन के लिए बल्कि बिहार आंदोलन और जयप्रकाश जी के लिए एक कलंक सा बन जाता. सभा गृह में हो हल्ला था. एक के खड़े होते ही दूसरा उसे काटता था, एक के चिल्लाते ही दूसरा उससे अधिक जोर से चीखता था. भारत की तरुणाई अपना नग्न नाच दिखा रही थी. उस समय मंच दीपक जी ने सम्भाला. किसी को डांटने में कोई कसर नहीं रखी, "तुम मेरे मित्र हो, छात्र नेता हो या गुण्डे हो?" सभा में सन्नाटा छा गया. शराबी को मानो एक चांटा लगते होश आ गया. मशहूर जादूगर के चूहों की तरह लड़के दीपक जी की बांसुरी के सुर के पीछे डोलते चलने लगे.

सम्मेलन की कार्यवाही में आवश्यक परिवर्तन किया गया. मुख्य छात्र संगठनों के एक एक प्रतिनिधि को ले कर दीपक जी बैठ गये सम्मेलन के प्रस्ताव का मसविदा बनाने के लिए. लड़कों ने मुद्दे दिये. दीपक जी ने रात भर जाग कर दो प्रस्तावों के मस्विदे तैयार किये. दोनो ही प्रस्तावों में छात्रों की आकांक्षाओं ने दीपक जी की कलम से एक नयी तेजस्विता पायी थी.

बिहार आंदोलन ने एक ओर जहाँ हजारों छात्रों को सक्रिय बना दिया, वहाँ दूसरी ओर ऐसे अनेक लोगों को उनके बीच ला दिया, जो छात्रों से बड़ी उमर के थे. पीढ़ियों के बीच इस खाई को पाटने में सबसे सफल लोगों में दीपक जी थे.

डा. लोहिया का जुझारु व्यक्त्तित्व, उनके शिष्यों में से अनेकों को याद है. लेकिन कभी कभी उनकी मेधा की जो प्रतिभा थी, दृष्टि थी, दूरदर्शिता थी, विचारों की जो स्पष्टता थी, वह भुला दी जाती है. दीपक जी ने डा. लोहिया के इन्हीं गुणों को अधिक आत्मसात किया था. इसलिए जितने दिन भी वह बिहार आंदोलन में पटना में रहे, जयप्रकाश जी के मुख्य सलाहकारों में से एक बने रहे.

एक दिन नयी दिल्ली से फोन आया. बिलकुल ऊपरी सूत्रों से पता चला था कि जयप्रकाश जी की घर पकड़ करेंगे. हम लोगों की "काउन्सिल मीटिंग" बैठी. तय हुआ कि जेल जाने से पहले एक निवेदन जयप्रकाश जी को अवश्य देना चाहिये. पहले एक मित्र ने मस्विदा तैयार किया, फिर मैंने उसे पुनः लिखा. जे.पी. को बताया गया. उन्होंने उसे पास कर दिया. केवल उसकी भाषा को एक बार दीपक जी को दिखा देने के लिए कह कर जे.पी. सो गये. दीपक जी ने हमारा मस्विदा अच्छी तरह पढ़ लिया. मैंने उनसे कहा था कि इसी मस्विदे को सुधारने की आवश्यकता नहीं है, आप चाहें तो नये सिरे से लिख सकते हैं. उन्होंने जो मस्विदा तैयार किया उस पर उनकी जादूई कलम का असर दिखता था. मुझे वही मस्विदा मेरे मूल मस्विदे से अधिक प्रभावशाली मालूम हुआ.

दीपक जी में युवाप्रेम, राजनीतिक परिपक्वता, और तेजस्वनी लेखनी का मेल था. इसलिए वह समाजवादी युवजनों के नेता एवं सलाहकार रहे. आचार्य नरेंद्रदेव का "संघर्ष", डा. लोहिया के "जन" तथा जयप्रकाश जी के "एवरीमेन्स" निकालने में उनका काफी बड़ा हिस्सा रहा.

48 साल की छोटी आयु में दिल्ली में दिल का दौरा पड़ जाने से 25 मार्च की रात को नींद में ही दीपक बुझ गया. उनके परिवार के दुःख में हम भी सहभागी हैं.

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