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स्मरण : ओम प्रकाश दीपक

दीपकजी, कुछ स्मृतियां - शिवानंद तिवारी 1975

दीपक जी से अब कभी पटना में मुलाकात नहीं होगी, यह मन विश्वास नहीं करना चाहता. सच्चाई को जानबूझ कर न मानना अपने साथ छल करना है, पर यह कौन नहीं करता.

दीपक जी को मैंने 1967 में पहली बार दिल्ली में देखा था. उस वक्त दिल्ली में पुलीसवालों की हड़ताल चल रही थी, बिहार में संविद सरकार थी. मेरे पिता रामानंद तिवारी पुलिस विभाग के मंत्री थे. वह पुलीसवालों के नेता माने जानते रहे हैं. गया में उन्होंने एक बयान दे कर दिल्ली पुलिस की हड़ताल का समर्थन करते हुए सरकारी दमन की निंदा की और कहाः मैं हड़तालियों का समर्थन करने दिल्ली जाऊँगा. दूसरे दिन वह सरकारी विमान से दिल्ली रवाना हुए. दिल्ली हवाई जहाज में सफर के लालच से मैंने उन्हें अपने साथ मुझे ले चलने को कहा, वह राजी हो गये. दिल्ली में हवाई अड्डे से हम सीधे बिहार भवन गये. वहां दीपक जी पिताजी का इंतजार कर रहे थे और लगातार सिगरेट पिये जा रहे थे. मैं उन्हें सुनता देखता रहा. उन्होंने पिताजी से कहाः दमन से हड़ताली सिपाही भयभीत हैं इसलिये आप पुलिस बेरिको में चलिये, इससे उनमें आत्मविश्वास बढ़ेगा. इस बीच पिताजी ने चव्हाण को, जो उस समय गृह मंत्री थे, फोन किया. चव्हाण ने पिताजी से काफी आक्रामक लहजे में बातचीत की, कहा आपको हड़ताल के बारे में सार्वजनिक बयान नहीं देना चाहिये था. यह प्रकट हो गया कि पिताजी चव्हाण से बातचीत के बाद काफी दब गये हैं. ऐसा लगा कि वह तत्काल बारिकों में नहीं जाना चाहते. उनके इस परिवर्तन से दीपक जी काफी बैचेन हुए. उन्होंने कहाः हड़ताल तो अब चलने वाली नहीं है लेकिन तिवारी जी के जाने से सिपाहियों में हिम्मत पैदा होगी. पिताजी चव्हाण के यहाँ जाने लगे तो दीपकजी ने पिताजी से कहाः अगर आप बेरिकों में नहीं गये तो आप का दिल्ली आना व्यर्थ हुआ. वह उदास चल दिये. पिताजी बेरिको में नहीं गये. दूसरे दिन पटना लौट आये.

दीपकजी ने क्रोध में "जन" में लिखाः रामानंद तिवारी बेटे को हवाई जहाज से दिल्ली घुमाने लाये थे. शायद मुझे दीपकजी का यह लिखना बुरा नहीं लगा था. आदमी जो बात खुद न कहने का साहस करे, अगर वही दूसरा आदमी कहे तो उसके प्रति श्रद्धा जरुर करने लगता है. पता नहीं कब दीपकजी से अपनापन हो गया.

पहली बार उनमें जो रुखापन देखा था वह बाद में कभी नहीं दिखा. मुझे तो उन्होंने इतना स्नेह दिया कि मुझे लगता था कि वह मुझपर बहुत ज्यादा कृपालु हैं और मेरे दोषों को कम करके देखते हैं. बिहार आंदोलन के पहले सप्ताह में दीपक जी पटना आ कर बैठ गये. हम लोगों को उन्होंने आंदोलन के लिए सैद्धान्तिक तर्क दिये. हमें निर्देशन दिया और हमें मैदान में उतारा. जयप्रकाशजी ने तब तक आंदोलन का नेतृत्व नहीं सम्भाला था. हम लोगों ने दीपकजी से आग्रह किया कि वह संघर्ष के लिए एक बुलेटिन बना दें जिसे संघर्ष कार्यालय की तरफ से छापा जाये. 2, 3 मई को आदोंलन की पहली बुलेटिन "आदोंलन का चरित्र और हमारी कार्य दिशा" छपी. वह बुलेटिन "वार्ता" के 15 अप्रेल 1974 के अंक में "बिहार छात्र आंदोलन का चरित्र" के नाम से छपा है. इसमें आंदोलन का जो विश्लेषण किया गया वह आज तक ही क्या आगे भी मौजूद रहेगा. 27, 28 मार्च को ही दीपकजी ने हमें सुझाव दिया था कि मुहल्लों और गाँवों में संघर्ष समितियों के गठन का काम होना चाहिए.

उस समय से अब तक दीपक जी ने आंदोलन को जो सैद्धांतिक शक्ल देने का काम किया, उसके बारे में बहुत कम लोगों को पता है. हम जैसे सामन्य कार्यकर्ताओं को हमेशा ही उन्होने ताकत दी, हमारा उत्साह बढ़ाया. जब भी दिमाग में संदेह पैदा हुआ या किन्हीं कारणों से मन टूटने लगा तो दीपक जी ने हिम्मत दी, दिमाग के भ्रम को दूर किया.

बिहार आंदोलन में संवेदना के स्तर से कर्म के स्तर तक दीपकजी किस हद तक जुड़े थे, यह कौन जानता है? उनका हमेशा अपने को पीछे रख कर लगातार काम करते रहना, कभी कभी आश्चर्यजनक लगता था, खास कर मेरे जैसे लोगों को जो कहीं न कहीं महत्वाँक्षा के शिकार हो जाते हैं.

दीपकजी अब नहीं हैं. उनके लिए श्रद्धाजंलि लिखनी पड़ेगी, ऐसा सोचा नहीं था. उनके रहने पर हमेशा अहसास रहा कि हम लोगों का भी एक सहारा है. कहीं कोई आधार रहने पर अवचेतन में आदमी निश्चिंत रहता है. उस आधार के न रहने पर उसकी यह निश्चितंता समाप्त होने लगती है और तब वह सच्चाई को थोड़ी देर के लिए टाल कर अपने लिए झूठी तसल्ली का आधार बनाने की कोशिश करता है.

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