आधुनिक वेश भूषा : : नयी पीढ़ी : उच्छृंखलता डा. सावित्री सिन्हा का लेखन

ज़िद्द. वह भी किसी और की नहीं, नयी पीढ़ी की. किस "बुजुर्ग" में हिम्मत है कि "ना" कर सके. न जाने क्या समझ कर नवयुवक आग्रह कर रहे हैं कि मैं उनकी वेश भूषा पर राय दूँ, क्योंकि पिछले बीस वर्षों के विश्वविद्यालीय जीवन में अपनी वेश भूषा के प्रति लापरवाही के कारण मैं बदनाम ही रहीं हूँ. अब तक मेरी सहकर्मी मित्र मेरे रंगो के चुनाव, साड़ी पहनने के ढंग और दकियानूसी आदतों के लिए मेरा उपहास करती रही हैं और अब मेरी बेटियों को न मेरे वस्त्र पसंद आते हैं न मेरे बालों का ढंग और न मेरे पसंद किये हुए रंग. लेकिन फ़िर भी ये नौजवान मेरे छात्र कह रहे हैं कि मैं उनकी वेश भूषा पर कुछ कहूँ. नयी पीढ़ी, नयी बातें, उसका कहना न मानने पर "परसाई" की गिट्टियाँ, कहीं मेरे ऊपर ही न बरसने लगें. न भाई, इतनी बुजुर्ग नहीं हुई हूँ कि जमाने के रंग आँखों से न दिखायी दें और उसका स्वर मेरे कानों में न पहुँच सके. इसीलिए नयी पीढ़ी के सामने इंशा अल्लाह खाँ की शैली में सिर झुका कर यह पंक्तियाँ लिख रही हूँ.

मिट्टी खा कर आयी हुई बिटिया की तोतली बोली श्रीमति सुभद्रा कुमारी चौहान को उनके बचपन में खींच ले गयी थी और आज यह नयी पीढ़ी की यह "प्रश्नाकुलता" मुझे उस युग में पहुँचा आयी है जब मैं नयी पीढ़ी की थी. उनके प्रश्नों की सच्चाई और अनूभूति मैं अपने अतीत के माध्यम से कर रही हूँ. न दिल्ली का वातावरण, न उन्मुक्तता, न स्वच्छन्दता और स्वतंत्रता, लेकिन हर समय एक संदेह की दृष्टि का शिकार, हर गति और कार्य के लिए बुजुर्गों द्वारा मर्यादा के उल्लघंन और उच्छृंखलता का लांछन. कितने चित्र आँखों में उतरते हैं - एक लड़की जिसकी माँ तिरछी माँग निकाल कर दो चोटियाँ कर देती है, किताबों का बैग कंधे पर लटका देती है, पर वह घर से बाहर निकलते ही बाल खोल देती है. दोनो रिब्बनों को एक में बाँध कर सिर पर वैसे बाँध लेती है जैसे उसकी बँगाली सहपाठी रोज बाँधती है. किताबों का बस्ता बैठक के तख्त के नीचे छिपा कर सारी किताबें बाँहों पर ले कर जाना चाहती है, क्योंकि वह बड़े क्लास की छात्रा दिखना चाहती है. घर लौटने पर उस पर फैशनेबिल बनने का दोष लगाया जाता है, डाँट पड़ती है. सिर पर उसका पल्ला एक मिनट नहीं ठहरता, बहुत कोशिश करने पर भी. धमकी दी जाती है कि सिर खुला तो साड़ी के ऊपर कील ठोंक दी जायेगी. ऊँची एड़ी की सैंडिल, तेज चाल और कूद फाँद के कारण शिक्षित लड़कियों को शास्त्र उल्लिखित गजगामिनी के विपरीत अश्वगामिनी का नाम दिया जाता है और वह क्षुब्ध मौन आक्रोश में जलभुन कर राख हो जाती है. आज वे ही प्रश्न मेरे सामने हैं - कमीज़ की लम्बाई और ऊँचाई में परिवर्तन, सलवार के पायचों की चौड़ाई और तंगी, दुपट्टा ओढ़ने का ढंग क्या व्यक्तित्व के गुणों अथवा किन्ही सामान्य दुर्गुणों की प्रवृत्ति का परिचायक बन सकता है? जीवन में एक ही प्रकार के ढंग कितने नीरस हो जाते हैं. नयी पीढ़ी की सौंदर्यचेतना उसे वस्त्राभूषण के प्रति नयी दृष्टि देती है. जो पुराना है वह नीरस हो जाता है. नये प्रयोगों में सुख और संतोष मिलता है, क्या आप इसे उच्छृंखलता या विश्रृंखलता का प्रतीक मान सकते हैं?

आवृत और अनावृत अंगों का प्रश्न भी इसी नूतनता और परिवर्तनप्रियता के ही प्रमाण हैं, किसी दुर्गुण विषेश का परिचायक नहीं. फैशन के नाम पर कुछ दिनो तक भरी गर्मी में भी पूरी बाँहों का ब्लाउज पहना जाता था, कुछ दिनों के लिए बाँहें बिल्कुल ही उड़ गयीं, अब फ़िर वह कुहनियों तक आ गयी हैं. तो क्या यह मानना पड़ेगा कि ब्लाउज की बाँहें थर्मामीटर का पारा है जो उच्छृखलताओं के ज्वर के घटने बढ़ने के साथ ही उतरता चढ़ता रहता है? यदि यह तर्क भी समझ में नहीं आता, तो अपनी दादी माँ का बक्स खोल कर उनके विवाह के कपड़े देखिये, अपने प्रश्न का उत्तर आप को सहज मिल जायेगा. यदि यह भी संभव नहीं है, तो शौर्य और त्याग के देश राजस्थान की वेशभूषा पर निगाह भर डाल लीजिये, मुझे विश्वास है कि फिर आप के मन में कोई संशय बाकी नहीं रह जायेगा.

फैशन का एक वृत्त होता है जो अपनी परिधि में नये नये रंग बदलता रहता है. कभी केशों का क्षेत्र कान तक उतर आता है, कभी ऊपर पहुँच जाता है. "पोनी टेल" अभी हाल में ही फैशन में रहा है, लेकिन उसी के प्राचीन रूप के विरुद्ध हम अपने समय में "ढीली चोटी" का आग्रह करके अपने बुजुर्गों को रुष्ट किया करते थे. चाँदी की जो पायलें और पायजेबें हम अपने पैरों मे पहनना फैशन के विरुद्ध समझते थे, उन्हें आज की लड़कियाँ गले में पहनती हैं. बस इसी कारण से क्या वह उच्छृंखल हो गयीं? पहले के बुजुर्ग केशों की "बुलबुलिया" पर नाक भौं सिकोड़ा करते थे. अब के दकियानूसी उमरदार "बुफों" पर मुँह बिचकाते हैं. परन्तु क्या अजन्ता के चित्रों का केश विन्यास देखा है आप ने? यदि हाँ, तो मुझे अपनी बात स्पष्ट करने की और आवश्यकता नहीं है. आप अपनी इच्छानुसार सौन्दर्य के मूल्यों को स्वीकार कीजिये, पर ध्यान रखिये कि वही आप के जीवन में प्रमुख न हो जाये. आप की वेशभूषा आप के व्यक्तित्व निर्माण का साधन भर है, यदि वह साध्य बन गयी तो आप अपने व्यक्तित्व से हाथ धो बैंठेंगे.

एक बड़ी रोचक घटना याद आ गयी इस प्रसंग में. आज "ड्रेन पाइप" और "बीटल कट" बाल पुरानी आँखों में खटकते हैं. हमारे जमाने के युवक ढीले पायजामे, काली अचकन और बड़े बड़े बालों के शौकीन थे. इलाहाबाद के विद्यार्थी कलाकार और नवोदित कवि इन्हीं के द्वारा बच्चन और नरेंद्र शर्मा बनने की कोशिश किया करते थे. इन्हीं में थे मेरे एक चचेरे भाई, वेशभूषा,चाल ढाल, बाल सबमें कवि लगें ऐसी उनकी कोशिश रहती थी. एक दिन आ गये अपने पिता जी के पंजे में. उनकी कोप दृष्टि सबसे पहले भइया के बालों पर पड़ी और भइया, बच्चन और नरेंद्र शर्मा की जगह गंगा किनारे वाले पण्डा बन गये. आज मेरी "मन्द मन्द, मंथर मंथर" (मृदु नहीं) चाल और ... भइया की खलवट खोपड़ी देखने के लिए अगर वह बुजुर्ग ज़िन्दा रहते तो शायद समझ सकते कि समय का प्रवाह हर अश्वगामिनी को गजगामिनी बना देता है और मन की तरंग पर झूलने वाले हर युवक को पृथ्वी पर उतार लाता है. तो देखा आप ने, आज आप की आलोचना छोटे कटे बालों के कारण की जाती है, पर आप के आलोचक यह बुजुर्ग अपनी उम्र में क्या क्या कर चुके हैं? आप ईश्वर को धन्यवाद दीजिये कि आप के बुजुर्ग आप की समस्याओं को समझते हैं और उनके प्रति सुहानूभूति रखते हैं. एक बात सत्य है कि उच्छृंखलता न तब उद्देश्य था, न अब है. यह सब तो नयी उम्र के नये नये तकाजे होते हैं, माता पिता की छत्र छाया में ज़िन्दगी के चन्द दिन लड़के लड़कियाँ जीवन को नये रूप में नयी दृष्टि से देखना चाहते हैं. यदि यह सब न हो तो फ़िर नयी चेतना, नया उत्साह, नया रंग कहाँ से आयेगा? गुलशन में हँसते खेलते फ़ूलों और तितलियों के रंग धूमिल कर दीजिये, कुछ शेष रह जायेगा? इसलिए "जायसी" की इन पंक्तियों को याद रखिये और नयी पीढ़ी को आगे आने वाले संघर्षों और जंजालों को झेलने के पहले खुल कर खेल लेने दीजियेः

"झूल लेहूँ नइहर जब ताईं

फिर नहीं झूलन देइहैं साईं"

***

टिप्पणीः यह आलेख डा. सावित्री सिन्हा के आलेख संग्रह "तुला और तारे", (नेशनल पब्लिशिंग हाउस दिल्ली, 1966) से है. यह आलेख शायद दिल्ली विश्वविद्यालय की किसी विद्यार्थी संयोजित पत्रिका के लिए लिखा गया था. जिन इलाहाबाद के "बच्चन" जी का जिक्र इस आलेख में है वह हरिवंशराय बच्चन जी थे, फ़िल्म अभिनेता अमिताभ के पिता.

***

डा. सावित्री सिन्हा के अन्य आलेख - कल्पना पर प्रस्तुत लेखकों की पूरी सूची