बीते कल की खोज सुनील दीपक, अगस्त 2011

"जब घर जाना

तो उन्हें हमारे बारे में बताना कि

तुम्हारे कल के लिए

हमने अपना आज दे दिया."

विया एमिल्या (Via Emilia) इटली के पूर्वी समुद्र तट पर बने रिमिनी शहर से प्रारम्भ हो कर, फोर्ली और बोलोनिया से गुज़रते हुए उत्तरी इटली में मिलान शहर से कुछ पहले, प्याचेंसा तक पहुँचती है. दो हज़ार वर्ष पहले बनी विया एमिल्या जैसी सड़कों ने ही रोमन साम्राज्य का विस्तार किया था. विया एमिल्या पर बसा है रेजियो एमिल्या (Reggio Emilia) शहर जहाँ का पारमेसान पनीर दुनिया भर में प्रसिद्ध है और जहाँ की दूध देने वाली गायों की देखभाल के लिए पिछले बीस सालों में पँजाब से कुछ हज़ार सिख परिवार इटली में आ कर बस गये हैं. वहाँ के एक छोटे से शहर नोवेल्लारा (Novellara) में यूरोप का सबसे बड़ा गुरुद्वारा बना है. इसी विया एमिल्या पर यूरोप का सबसे बड़ा भारतीय सैनिकों का कब्रिस्तान भी है.

पिछले सप्ताह, 13 अगस्त को इन्हीं परिवारों के लोग बसों में भर कर फोर्ली (Forli) पहुँचे जहाँ भारतीय सैनिकों का वह सबसे बड़ा कब्रिस्तान है. इस कब्रिस्तान में इटली के सिख परिवारों ने मिल कर पैसा जोड़ कर नया शहीद स्मारक बनवाया है, उसी के उदघाटन समारोह में सभी सिख जमा हुए थे.

द्वितीय महायुद्ध में ब्रिटिश सेना का हिस्सा बन कर करीब पचास हज़ार भारतीय सैनिक इटली में आये थे. यह तीन अंग्रेज़ रेजिमैंटों का हिस्सा बने थे, चौथी, आठवीं तथा दसवीं पैदल सेना की रेजिमैंटें. इनमें भाग लेने वाले सैनिक मराठा, पँजाब, गोरखा राईफल्स, राजपूताना राईफल्स, सिख, गढ़वाल राईफल्स, मध्य भारत घुड़सवार सेना दलों से आये थे. सबसे पहले आठवी अंग्रेज रेजीमैंट के साथ भारतीय सैनिक 19 सितम्बर 1943 को दक्षिण इटली में ताराँतो शहर में पहुँचे थे और 29 अप्रैल 1945 तक भारतीय सैनिक इटली में रहे.

श्रीलंका मूल के कैनेडियन लेखक माइकल ओडाँटजी जिन्हें बुक्कर पुरस्कार मिला था, के प्रसिद्ध उपन्यास The English Patient (अंग्रेजी मरीज़), जिस पर इसी नाम से फ़िल्म बनी थी, उस समय के इटली का चित्रण करती है. उपन्यास में एक सिख सैनिक भी था किप यानी किरपाल सिंह. उपन्यास में किरपाल सिंह का भाई भारत में स्वतंत्रता सैनानी है, पर किरपाल मिले्ट्री में शामिल हो कर अंग्रेज़ी सैना का हिस्सा बन जाता है. युद्ध से विध्वस्त मध्य इटली के टस्कनी के सुंदर गावों में बमों की खोज में घूमने वाले किप की कहानी उस समय के भारतीय सैनिकों की कहानी थी. छोटे छोटे गुटों में भारतीय सिपाही रात को शैड में या मवेशियों के मवाड़ों में रहते थे और गुरखा सैनिकों को छोड़ कर, बाकी सैनिकों को बर्फ़ीली सर्दी की आदत न होने की वजह से सारी सर्दियों में बहुत परेशान भी हुए थे.

भारतीय सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल इ. डिसूज़ा ने इटली में युद्ध के उन दिनो को याद करते हुए बताया था, "जब मराठा सैनिक आर्नो नदी के पास फ्लोरेंस पहुँचे तो उन्होंने अपना हेडक्वाटर मोंतेगुफोनी नाम के किले में बनाया. सिपाहियों ने पाया कि किले के तहखानो में बोतीचेल्ली की वीनस जैसे जगतप्रसिद्ध चित्र छुपे पड़े थे, जिन्हें युद्ध के बाद फ्लोरेंस के संग्रहालय में रखा गया. .. जब पुराने पुल को पार करके भारतीय सैनिक फ्लोरेंस शहर पहुँचे तो वहाँ के लोगों ने उनका बहुत उत्साह से स्वागत किया था. तभी उन्हें मालूम चला कि वहाँ एक पार्क में कोल्हापुर के राजकुमार राजाराम छत्रपति की समाधी है तो सिपाही, वहाँ समाधी पर फ़ूल चढ़ाने गये. .. जब फौज बोलोनिया के उत्तर में ओकियोबैल्लो शहर पहुँची तो वहाँ सैनिकों ने शहर के बीच में सत्यनारायण पूजा का आयोजन किया और उसमें शहरवालों को भी आमंत्रित किया. पूजा के बाद सैनिकों और शहर के लोगों ने फुटबाल का मैच भी खेला .."

आज द्वितीय विश्व युद्ध की याद इटली में थोड़े से लोगों को ही है. पचास हज़ार भारतीय सैनिकों में से 23 हज़ार से अधिक घायल हुए थे और पाँच हज़ार सात सौ बयासी (5,782) लोग मरे थे. फोर्ली के कब्रिस्तान में 496 भारतीय सैनिक दफ़न हैं और वहाँ 769 हिन्दू और सिख सैनिकों का देह संस्कार हुआ था, जिनका स्मारक बनाया गया है. भारतीय सैनिकों ने कई सौ मैडल जीते थे अपनी बहादुरी के लिए, जिनमें से दस लोगों को विक्टोरिया क्रास भी मिला था, ब्रिटिश साम्राज्य का युद्ध में बहादुरी का सबसे बड़ा सम्मान.

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद धीरे धीरे दुनिया बदली और अब पिछले बीस सालों में भारत से आने वाले प्रवासियों ने उन्हीं शहरों में घर बसाये हैं, जहाँ कभी उनके पूर्वज़ों ने लड़ाई लड़ी थी. शुरु शुरु में आये सिख किसानों ने गाय पालने वाले इलाके में अपने काम की ऐसी धाक बिठायी कि उसके बाद जिस किसी फार्म में काम करने वालों की आवश्यकता होती, वह अपने सिख काम करने वालों से कहते कि अपने किसी साथी को बुलाओ. इस तरह इस इलाके में पिछले बीस सालों में यहाँ सिख गाँव बन गये हैं, किसी किसी छोटे शहर में यहाँ की पचास साठ प्रतिशत तक की आबादी सिख है. आज उनके बच्चे इतालवी स्कूलों में पढ़ कर बड़े हुए हैं, अच्छी इतालवी भाषा बोलते हैं, धीरे धीरे वही पुल बना रहे हैं, अपने परिवारों तथा यहाँ के इतालवी परिवारों के बीच.

आधुनिक तकनीकी विकास से सेटालईट टीवी, मोबाइल टेलीफ़ोन, इंटरनेट ने भारतीय सभ्यता और भारत में रिश्तेदारों से बात चीत कराना आसान कर दिया है. लेकिन यहाँ के समाज में इज़्जत, अपनी संस्कृति की इज़्ज़त, वह कैसे मिले?

पहले इटली से लोग विदेश जाते थे काम खोजने. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद इतालवी प्रवास का सिलसिला शुरु हुआ तो अमरीका, आस्ट्रेलिया, अरजेंटीना से ले कर जर्मनी, बेल्जियम में काम करने वाले इटली प्रवासी लाखों की संख्या हो गयी. तब इटली में प्रवासी नहीं आते थे. लेकिन पिछले बीस सालों में धीरे धीरे इटली में आने वाले प्रवासियों की संख्या अचानक ही बढ़ने लगी. अनुमान से अब इटली की करीब दस प्रतिशत आबादी विदेशी प्रवासियों से बनी है.

"प्रवासी आ कर हमसे हमारा काम छीन रहे हैं .. यह लोग गन्दे होते हैं, इनमें सभ्यता नहीं होती .. इनके दस दस बच्चे होते हैं, कुछ सालों में यह लोग बढ़ कर यहाँ राज करेंगे ... यह सब विधर्मी हैं, कट्टरपंथी हैं ... यह लोग पिछड़े हुए हैं, अपनी औरतों को पर्दे में रखते हैं, घर में बंद रखते हैं .." जैसी जाने कितने बातें कही जाती हैं विदेशी प्रवासियों के बारे में. उनके लिए घर किराये पर लेना, काम खोजना, आदि तो कठिन है ही, आम सड़क पर चलते फ़िरते, या बस में कभी कभी ताने या गालियाँ सुनना भी होने लगा है. प्रवासियों का डर दिखाने वाली "लेगा नोर्द" जैसी राजनीतिक पार्टियाँ अधिक वोट ले रही हैं और देश में प्रवासियों के प्रति घृणा की भावना फैला रही हैं.

इस तरह के वातावरण में सिख परिवारों का निर्णय लिया कि वे लोग पैसा जोड़ कर फोर्ली के कब्रिस्तान में भारतीय सिपाहियों का स्मारक बनायेंगे, जो यहाँ के रहने वालों को यह याद दिलायेगा कि इस देश की स्वतंत्रता में भारतीय सिपाही भी थे.

स्मारक का डिजाईन एक सिख कलाकार ने बनाया जिसमें दो सिख सैनानियों को दिखाया गया है जो कि एक घायल इतालवी स्वतंत्रता सैनानी को सहारा दे रहे हैं. सिख नेताओं तथा फोर्ली की नगरपालिका के अधिकारियों ने मिल कर इसी 13 अगस्त को इस स्मारक का उद्घघाटन किया. वे कहते हैं कि अब हर साल अगस्त में इसे तीर्थ स्थल की तरह मानेंगे और यादाश्त दिवस मनायेंगे. सब लोग मिल जुल कर वहाँ भारतीय सैनिकों को श्रधाँजलि देंगे और कब्रिस्तान में मेला लगायेंगे, साँस्कृतिक कार्यक्रम करेंगे, शब्द कीर्तन करेंगे.

यह एक तरीका है घृणा की बात करने वाली पार्टियों को एक संदेश देने का कि हम लोग चोर उच्चके नहीं, हमारी सभ्यता है, संस्कृति है. हम भी इन्सान हैं, हमारे भी अधिकार है कि हम लोग मिल कर उत्सव मनायें, अपने गौरव को मनायें.

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यह आलेख हिन्दी पत्रिका गर्भनाल की पाँचवीं वर्षगाँठ के मौके पर निकलने वाले विषशांक के लिए लिखा गया. इस आलेख के लिए भारतीय सैनिकों के बारे में जानकारी कई सूत्रौं से एकत्रित की गयी जिनमें 2007 में भारतीय दूतावास की एक लघुपुस्तिका जिसे कर्नल अमरजीत सिंह के निर्देशन में तैयार किया गया था का विषेश योगदान था.

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