एक्वाडोर डायरी सुनील दीपक, जुलाई 2005

Ecuador images

14 जुलाई 2005, कीटो, सुबह 7 बजे

मेरे साथ वाले कमरे में जो भी है बहुत शोर मचाता है. कभी नाक सुड़ुकता है तो कभी खाँसी करता है या ऊँची आवाज़ कर के जम्भाईयाँ लेता है. जब चलता है तो मेरे कमरे का फर्श भी धम धम करके हिल उठता है. शायद यह सब उसका दोष नहीं, इस होटल के कमरो की दीवारें हीं ऐसी हैं कि हर छोटी से छोटी आवाज़ साथ वाले कमरों में आ जाती है. क्या मालूम उसे रात को मेरे खुर्राटों ने परेशान किया या नहीं?

Ecuador images कल दोपहर को चार बजे हमारा जहाज़ कीटो पहुँचा. मेडरिड से कीटो की यात्रा में करीब ग्यारह घंटे लगे, रास्ते में बिना कहीं रुके. बहुत सालों के बाद स्पेन की आईबेरिया एयरलाइनस् से यात्रा की है और जहाज़ कर्मचारियों का अच्छा बरताव, बढिया खाना, इत्यादी से काफ़ी सुखद अनुभव हुआ.

जहाज़ में होसे से मिला, वह भी मेरी तरह ही इस देश में कुछ दिन घूम कर ही कुएंका जाना चाहता है. होसे बोलिविया से है पर पिछले बहुत सालों से होलैंड में एमस्टरडाम में एक गैर सरकारी संस्था के लिये काम करता है और हम दोनो पहले भी कई बार कौन्फैरेंस और मीटिंग आदि में मिल चुके हैं. होसे ने कहा कि मैं उसके साथ कोटोपाशी ज्वालामुखी को देखने चलूँ पर मैंने मना कर दिया. 4000 मीटर की ऊँचाई पर स्थित इस ज्वालामुखी के बारे में, मैं पहले ही पढ चुका था. वहाँ बहुत सर्दी होगी और चलना भी बहुत पड़ेगा. कीटो 2800 मीटर की ऊचाँई पर है और यहाँ पर भी मुझे सिर खाली खाली सा लगता है, शायद ओक्सीजन की कमी से. आदत जो नहीं है इतनी ऊँची जगह पर रहने की.

हवाई अड्डे के आगमन कक्ष में एक्वाडोर के पर्यटन विभाग का दफ्तर है, वहाँ एक पुलिसवाली ने मुझे होटल ढूँढने में सहायता की. कीटो शहर के पुराने भाग में एक पहाड़ी पर एक पुरानी हवेली में बना है यह होटल और नाम है सन फ्राँसिसको सुकरे. 14 डालर किराया है कमरे का और यहाँ अधिकतर विदेशी ही ठहरे हैं.

Ecuador imagesआ कर, कल शाम को मैं आसपास कुछ घूमा. यहाँ का राष्ट्रपति भवन करीब ही है, जहाँ मशाले लिये लोग जलूस निकाल रहे थे और नारे लगा रहे थे. यूरोप से 7 घँटे का समय का अंतर है इसलिये शाम को जल्दी ही सो गया. रात को करीब एक बजे नींद खुली और फिर सुबह तक करवट बदलता रहा.

आज सारा दिन यहीं कीटो घूमना है और कल सुबह रियोबाम्बा की ओर निकल जाऊँगा, यही सोचा है. कीटो को टेक्सी से हवाई अड्डे से आते समय देख कर थोड़ा दुख सा हुआ. चारो तरफ ऊँचे सुदंर पहाड़ और बीच में कैंसर के नासूर की तरह हर तरफ सिमेंट के चकोर घर, एक के ऊपर एक, मधुमक्खियों के छत्तों की तरह, कहीं कोई हरियाली नहीं, कोई खाली जगह नहीं. छोटी संकरी सड़कें, उनमें भरा अंतहीन ट्रेफिक और हवा का प्रदूषण. आज यही देखना है, कि क्या सचमुच यूँ ही है कीटो जैसा हवाई अड्डे से आते समय लगा था, एक सुंदर घाटी में अंतहीन दुस्वप्न जैसा?

15 जुलाई 2005, कीटो, सुबह 8 बजे

Ecuador imagesसुबह नाश्ते में एक इतालवी दम्पत्ती से मुलाकात हुई. वे यहाँ एक हफ्ता पहले आये थे. पहले गलापागोस द्वीप देखने गये और आज लाताकुन्गा जा रहे हैं. मेरी भी इच्छा थी गलापागोस द्वीप देखने की जहाँ के अज़ीब प्राणी देख कर ही डारविन ने पृथ्वी पर जीवन विकास की थ्योरी लिखी थी, पर समय भी नहीं है और वहाँ जाना मँहगा भी बहुत है.

मुझे भी आधे घंटे में निकलना है रियोबाम्बा नाम के शहर की ओर. कल सारा दिन कीटो में घूमा. सुबह आठ बजे निकल पड़ा था होटल से और जब दोपहर को चार बजे होटल वापस आया तो इतनी थकान हो रही थी कि फिर दुबारा बाहर नहीं निकला. अभी 7 घंटे के समय के अंतर की आदत नहीं हुई है इसलिये जल्दी ही थकान हो जाती है.

Ecuador imagesपुराने कीटो में ठहरा हूँ जहाँ इस शहर का अपना पुराना रुप अभी भी कुछ बचा हुआ हैं. यह हिस्सा सुन्दर है. सड़कें तो ऐसी हैं जो पहाड़ों के ऊपर नीचे जाती हैं और उन पर चलने के लिये अच्छी सेहत का होना जरुरी है. कई बार सड़क ऐसे सीधे ऊपर की ओर तेज़ी से जाती है कि यहाँ के रहने वाले भी, रुक रुक कर साँस लेने के लिये मजबूर हो जाते हैं.

सान्तो दोमिंगो का चर्च और उसके सामने का स्क्वायर, आसमान की ओर मस्तक उठाये खड़ा भव्य बासिलिका चर्च, और शहर के बीचों बीच भारत के नाम का छोटा सा स्क्वायर जहाँ Ecuador imagesफुव्वहारों के बीच में लगी गाँधी जी की मूर्ती, रंग बिरंगे मकान, सब देखा. पर आधुनिक कीटो नहीं गया, उसको सिर्फ दूर से ही देखा. पुराने कीटो और नये कीटो के बीच में है अलमेदा पार्क. उसके दूसरी ओर शुरु हो जाता है कई मंजिलों वाले सिमेंट और शीशे के आधुनिक भवनों का सिलसिला. ट्रैफिक से भरा सिमेंट का जंगल. सब जगह यहाँ की जनजाति की गरीब इंडियोस् महिलायें सड़क पर कुछ बेच रही होती हैं और हर तरफ, बहुत सारे बच्चे दिखते हैं जो हर जगह स्कूल जाने के बजाय काम में लगे हैं. जैसी गरीबी भारत में दिखती है वैसी तो नहीं दिखी पर इन इंडियोस परिवारों की हालत बहुत अच्छी नहीं लगी.

15 जुलाई, रियोबाम्बा, दोपहर 4 बजे

यहाँ बस अड्डे के करीब होटल कानाडा में ठहरा हूँ. कमरे के एक रात की कीमत 10 डालर है, और कीटो के मुकाबले में कमरा अधिक अच्छा है. खिड़की से बाहर देखो तो सामने एक्वाडोर की सबसे ऊँची पर्वत चोटी शिमबोराज़ो हिम से ढका बादलों से घिरा ऊँचा मस्तक लिये खड़ी है. छोटा सा सुन्दर शहर है रियोबाम्बा. शहर के बीचों बीच बस एक लम्बी मुख्य सड़क है, जिसके आस पास घर बने हैं.

इतनी सुंदर जगह पर आ कर भी मन परेशान और उदास है. कीटो से आते समय बस में किसी ने मेरे बैग से मेरा कैमरा निकाल लिया. बाहर शहर में तो बहुत सतर्क था पर बस में पहुँच कर कुछ लापरवाह हो गया. सोचा चलती बस में से सिर के ऊपर रखे बंद बैग से कोई क्या ले लेगा. कीटो से बाहर निकलने के रास्ते में बस में कई खाने पीने की चीज़े बेचने वाले, जादुई दवा बेचने वाले लोग चढते उतरते रहे.

मैंने बस यही नज़र रखी कि कोई बैग न ले कर चलता बने. एक घंटे के बाद एक जगह जब बस रुकी तो सोचा कि कुछ फोटो ही खींच ली जायें, तभी पाया कि बैग में से कैमरा गुम है. दिल को बहुत धक्का लगा.

जब रियोबाम्बा पहुँचे तो मैंने बस के कन्डक्टर से बात की. कहने लगा कि अपने सामान का ध्यान रखना चाहिये, चोरी में उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है. मेरा ख्याल था कि अगर बस में चोरी हुई है तो अवश्य कन्डक्टर को मालूम होगा कि किसने की है. इसलिये मैंने उसे दस डालर दिये और कुएंका में अपने होटल का नाम दिया और कहा कि अगर मेरा कैमरा वहाँ पहुँच जायेगा तो मैं सौ डालर का इनाम देने के लिये तैयार हूँ. कन्डक्टर महोदय ने दस डालर का नोट फ़टाफ़ट जेब में डाला और बोले कि वे कोशिश करेंगे, शायद एक या दो दिन लगें.

बस यही आशा है कि वह लालच में आ कर मेरा कैमरा वहाँ पहुँचा देंगे. अगर यह चोरी इस यात्रा के अंत में होती तो इतना दुख नहीं होता. कम से कम सारी यात्रा की तस्वीरें तो आ जातीं. बार बार मन में पछतावा होता है. सोचा भी था कि कैमरे को हाथ में ही रखूँ ताकि रास्ते में कोई तस्वीर का मौका लगे तो उठ कर बैग से निकालने की ज़रुरत न पड़े, पर सिर्फ सोचा ही था, किया नहीं. खैर अब पछताने का कोई फायदा नहीं.

16 जुलाई 2005, रियोबाम्बा, सुबह 5.20 बजे

कहना कितना आसान है कि अब पछताने से क्या फायदा, पर यह सोच कर गुज़रे हुए कल को भूल पाना कितना कठिन है. विचार जैसे लहरें हैं, एक को रोकिये दूसरी लहर आ जाती है और कभी थमती ही नहीं. कोई ऐसी दवा निकाले या मंत्र बनाये जिससे अनचाहे और बेकार के विचार आप एक बक्से मे बंद कर सकते हों तो उसे प्राप्त करने के लिए, बहुत से लोग पैसा खर्च करने को तैयार हो जायेंगे. दुनिया में नींद की दवाईयाँ, चिंता कम करने के दवाईयाँ तो हैं ही और इनकी बिक्री भी हर साल बढती जाती है. यह सब बातें मन में आती हैं जब मन को कैमरे के खोने का दुख होता है.

कल शाम को रियोबामबा में घूमने निकला. कैमरे के साथ घूमने की इतनी आदत हो गयी है कि कोई भी विषेश चीज़ दिखे तो पहला ख्याल आता है उसकी फोटो लेने का और कैमरे के न होने से मुझे लग रहा था जैसे उस विषेश चीज़ का महत्व कम हो गया हो. जैसे शिमबोराज़ो पहाड़ के सूर्यास्त के समय बदलते हुए रंग. शाम को बादल छंट गये थे और पहाड़ पर गिरी बर्फ की चमक साफ दिख रही थी. पर उसकी सुन्दरता का रस लेने के बजाय मन बार बार यही सोच रहा था कि काश कैमरा होता तो इसकी फोटो लेता. शायद इसीलिये भग्वद् गीता संसार की वस्तुओं से मोह न रखने की शिक्षा देती है और उस चोर ने मुझे यही याद दिलाने के लिये मुझ पर यह चोरी करके उपकार किया है. क्या यादों में रहने वाली तस्वीरें इन डिजिटल कैमरे की तस्वीरों से कम सुन्दर होती हैं ? बहुत वर्ष पहले की अपनी एक स्विस मित्र की याद आ गयी जो यही कहती थी कि वह सुंदर जगह की फोटो नहीं लेना चाहती, कई बातें अपनी यादों में देखना ज्यादा अच्छा है.

यह होटल का कमरा अच्छा तो है क्योंकि सामने भव्य पर्वत दिखता है पर इसका यह अर्थ यह भी है कि आप रात भर सामने सड़क पर गुज़रती बसों और ट्रकों का अंतहीन शोर सुनिये. ऊपर से शायद किसी को शरारत सूझ रही थी या हो सकता है कि होटल में रात की कार्यकर्ता युवतियाँ हों जो ग्राहक ढूंढ रही हों, पर रात में तीन बार टेलीफोन की घंटी बजी. दो बार तो तब, जब मुश्किल से नीदं आयी थी. घंटी बजी तो हड़बड़ा के उठा. रिसिवर उठाया तो किसी कन्या के हँसने की आवाज़ आ रही थी. तीसरी बार जब घंटी बजी तो जाग रहा था, इस बार मैंने कुछ पूछा भी नहीं, बस रिसिवर उठाया और वापस रख दिया. उसके बाद कोई टेलीफोन नहीं आया.

सुबह 7.30 पर बस लेनी है कुएंका के लिये. पाँच घंटे का रास्ता है. मेरे ख्याल से यही रास्ता चार घंटे तक में तय हो सकता है पर ये सब प्राईवेट बस वालें हैं, हर जगह रुक रुक के चलतें हैं और जब तक यात्री बस में घुसा सकते हैं, घुसाते रहते हैं.

17 जुलाई 2005 कुएंका, रात 8.30 बजे

Ecuador imagesरियोबाम्बा से कुएंका की यात्रा सचमुच बहुत ही रोचक और सुंदर है. किताबों में पढा था इस यात्रा के बारे में, पर फिर सोचा था कि वही बढ़ा चढ़ा के बोलने की बात होगी, सचमुच ही इतना सुंदर होगा यह नहीं सोचा था.

ऊँचे पहाड़, कभी हलके और गहरे हरे के बीच में अनगिनत रंगो वाले, कभी भूरे, कभी जामुनी, कभी काले से. उन पहाड़ों पर चढ़ती उतरती तीखी ढलान वाली सड़कें, जहाँ से नीचे गिरो तो कई सौ मीटर नीचे खाईयों में जा गिरो. पहाड़ों का चप्पा चप्पा रुमाल जैसे खेतों में कटा बटा जहाँ पूरे के पूरे जन जातियों के परिवार मेहनत से काम कर रहे दिखते थे. सुनहरी और भूरी घास से ढ़की वादियाँ, जिनमें रेत रेगिस्तान होने का धोखा दे. लम्बे ऊँचे केक्टस के पेड़ों का जंगल. जामुनी रंग के फ़ूलों से भरी हरी भरी घाटियाँ. पुराने ज्वालामुखियों के बुझे हुये मुख जो आज पानी से भरे हुए हैं और गोलाकार झीलों जैसे लगते हैं. जानवरों को चरवाते बच्चे जो गुज़रती बस को देख कर हाथ हिला कर स्वागत कर रहे थे. पहाड़ की चोटी के करीब से दिखती बहुत नीचे वादी में घुमावदार नदी और उस पर बने पुल को ऊँचाई से देखना और थोड़ी देर के बाद, उसी पुल से गुजरते हुये समय ऊपर ऊँचे पहाड़ की चोटी को देखना.

ऐसा मुझे कुछ नेपाल में यात्रा के दौरान भी लगा था, पर इस यात्रा के सामने वह भी फीका पड़ जाता है. रियोबामबा और कुएंका के बीच में है अलाउसी, वहाँ से चलने वाली एक रेलगाड़ी जग प्रसिद्ध है क्योंकि वह इस यात्रा के आनंद को और भी बढ़ा कर महसूस कराती है जब तेज़ी से बहुत ऊँचाई से नीचे घाटी में आती है.

कुएंका आ कर तुरंत अपने काम के साथियों से मुलाकात हुई. मोज़ामबीक से जूलियो सामा, नेपाल से नारायण काजी, फ्राँस से नानस्, अमरीका से हशीम, भारत से अनीता. यह सब लोग मेरे होटल में ही ठहरें हैं. और भी अन्य कई मित्रगण हैं जिनसे कुछ सालों के बाद मिलने का मौका मिलेगा, जो अन्य होटलों में ठहरे हैं. यह सब लोग यहाँ मेरी तरह जन स्वास्थ्य अभियान की असेम्बली में आये हैं.

18 जुलाई 2005, कुएंका, सुबह 5.10 बजे

Ecuador imagesकल सारा दिन घूमने और लोगों से मिलने में निकल गया. जन स्वास्थ्य अभियान की दूसरी जनरल असेम्बली का प्राम्भ हुआ यहाँ की एक प्राचीन इंडियोस प्रार्थना की जगह पूमापुंगा में, जहाँ अब एक बाग बना है. अलग अलग आदिम जातियों तथा जन जातियों के प्रतिनिधियों ने अपनी अपनी पूजा की और गीत गाये. इनमें से अधिकतर प्रतिनिधि आये थे विभिन्न अमरीकी देशों से जैसे बोलिविया, वेनेज़ूएला, अरजेनटीना, उत्तरी अमरीका, इत्यादि. कुछ एक प्रतिनिधि आस्ट्रेलिया से भी आये थे, मुख पर राख या सफेद रंग लगाये, पारम्परिक पौशाकें पहने. उनकी पार्थनाओं में वही बातें थी जो हिंदू प्रार्थनाओं में होती हैं यानि, पृथ्वी माँ है, सूर्य शक्ति का दाता है, विभिन्न तत्व जैसे वायु, जल, अग्नि सब का संतुलन होना चाहिये, विभिन्न दिशाओं के विभिन्न देवी देवताओं को प्रणाम करें, इत्यादि.

इस पूरे समारोह में किसी ने यह नहीं कहा कि बाकी के धर्म जैसे ईसाई, ज्यू, मुसलमान आदि की भी कोई पार्थना होनी चाहिये. वह इसलिये कि "इन्डिजिनस पीपल", यानि आदिम जन जातियों की सभ्यता, धर्म वगैरा यूरोपीय औपनिवेशिक ताकतों के द्वारा दलित और नष्ट कर दिये गये हैं, तो उन्हें यह कहना कि आप बाकी के धर्मों को भी उतनी ही मान्या दीजिये, "पोलिटिकली करेक्ट" नहीं होता. अपने आप को आदिम जन जाति कहलाने के लिये आवश्यक है कि आप की सभ्यता और धर्म को अन्य सभ्यता और धर्म वाले ताकतवर समुदायों से खतरा हो.

पर आज क्या भूमंडलीकरण से जुड़ी शक्तियों हम सब एक जैसे नहीं बनते जा रहे? छोटी छोटी जगह की अपनी रीतियाँ, बातचीत का ढ़ंग, खाना बनाने के तरीके, सब मिल कर एक जैसे ही होते जा रहे हैं. जो ताकतवर समुदाय यह सब कर रहे हैं उन्हें कोई जोर जबरदस्ती नहीं करनी पड़ती, टेलिविज़न, फिल्म और संगीत के माध्यम से हम सब एक जैसे ही बनते जा रहे हैं.

आज से जन स्वास्थ्य अभियान की जनरल असेम्बली का कार्य शुरु होगा. मन में थोड़ा सा डर है कि कहीं यह भी वही पुराने लोगों की वही पुरानी बातें बन कर ही न रह जाये. कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो जोर से बोलना जानते हैं और कुछ भी बात हो, अपना ही राग आलापते हैं. मेरी आशा है कि नये लोगों से कुछ नया सुनने को मिले!

19 जुलाई 2005, कुएंका, सुबह 5.20 बजे

इटली से निकोला भी आया है कुएंका की इस जन स्वास्थ्य अभियान की असेम्बली में भाग लेने. कल शाम को उससे मुलाकात हुई. हमने इटली में टेलीफोन पर कई बार बात की थी Ecuador imagesपर इससे पहले मिलने का मौका नहीं मिला था. उसे देख कर थोड़ा सा अज़ीब लगा क्योंकि टेलीफोन पर बात करते समय मेरे मन जो उसकी छवि बनी थी वह उससे भिन्न था. वह हमारे होटल में एक मीटिंग के लिये आया था और मैं एक अन्य जगह जा रहा था एक और मीटिंग के लिये, इसलिये अधिक बात नहीं कर पाये. रात को करीब दस बजे जब मैं वापस होटल पहुँचा तो निकोला को वहीं पाया. रेस्टोरेंट में जब वह लोगों से बातें कर रहा था. किसी ने उसका बैग चुरा लिया जिसमें पैसे, हवाई जहाज़ की टिकट, पासपोर्ट, टेलीफोन, इत्यादि थे. रात काफ़ी देर तक मैं भी उसके साथ पुलिस से बात करने के लिये खड़ा रहा.

इस चोरी की बात से मन में थोड़ी सी दहशत सी आने लगी है. मैं स्वंय भी तो चोरी के डर से ही हमेशा पासपोर्ट, टिकट और पैसे साथ ले कर ही घूमता हूँ, पर शायद ऐसे उनके चोरी होने का ज्यादा खतरा है? उन्हें कमरे में अटैची में बंद रखना शायद बेहतर होगा. सोचता हूँ कि सिर्फ कैमरा खो कर भी मेरी किस्मत अच्छी थी जो उस दिन पासपोर्ट और पैसे नहीं खोये.

अनीता भी आयी है यहाँ और हमारे होटल में ही ठहरी है. उससे हिंदी या पंजाबी में बात करने में बहुत आनंद आता है. कल उसने साथ दिल्ली से लायी मठरी और अचार खिलाया, बहुत बढ़िया था.

यहाँ जन स्वास्थ्य अभियान की असेम्बली शुरु तो हो गयी है पर बहुत कन्फ्यूज़न है. एक मीटिंग यहाँ, तो दूसरी चार किलोमीटर दूर, फिर खाना खाने के लिये दूसरी जगह जाईये जो 3 किलोमीटर दूर है, पर उसके बाद की मीटिंग कहीं और है ! यह तो अच्छा है कि टेक्सी अधिक महंगी नहीं है, जहाँ भी जाओ, डेढ़ या दो डालर, पर फिर भी यहाँ से वहाँ जाने में बहुत दिक्कत आ रही थी. अनीता मेरे साथ थी और बार बार उसकी व्हील चैयर को टैक्सी की डिक्की में रखना आसान नहीं था. असेम्बली की बहुत सी जगह तो ऐसी हैं जहाँ व्हील चैयर से जाना संभव नहीं है. जहाँ खाना मिलता है वहाँ भी व्हील चैयर नहीं जा सकती. हालाँकि उस समय तो अनीता और मैं इन सब बातों पर हँस रहे थे, पर मन में बुरा लग रहा था. सब के लिये मानव अधिकारों की बातें करते हैं हम और अपने बीच में जो लोग हाशिये से बाहर निकल दिये गये हैं, जिनके आसपास समाज ने भौतिक, सामाजिक और मानसिक रुकावटें खड़ी कर रखी हैं, उनके अधिकारों को हम खुद ही भूल जाते हैं. जब ऐसी सभाओं में हम ही सबके लिये समान अधिकारों को मान्यता नहीं दे सकते तो बाकि समाज हमारे इन भाषणों को क्यों और कैसे सुनेगा?

कल फेडेरिको ने दो दिन के लिये मुझे अपना एक कैमरा दिया है क्योंकि उसके पास दो कैमरे हैं. हालाँकि उसके कैमरे से तस्वीरें उतनी अच्छी नहीं आती जितनी मेरे कैमरे से आती थीं, पर कम से कम, कुएंका की कुछ तस्वीरें तो होंगी.

20 जूलाई 2005, कुएंका, सुबह 4.50 बजे

आज एक्वाडोर में आये एक सप्ताह हो गया पर अभी भी यहाँ के समय की पूरी आदत नहीं पड़ी. सुबह सुबह आँख खुल जाती है.

जेएसए यानि जन स्वास्थ्य अभियान की सभा अब पूरे जोर शोर से है. कल सुबह मैंने भूमंडलीकरण और काम करने वाले लोगों पर उसके प्रभाव के बारे में एक सेशेन में भाग लिया. अधिकतर बोलने वाले लोग विभिन्न दक्षिणी अमेरिका के काम करने वालों की वर्करस् यूनियनों से थे. कुछ देर के लिये तो लगा कि मैं लेनिन के दिनों की रुसी फिल्म देख रहा हूँ. "पराईवेटाईज़ेशन, लिबरेलाईज़ेशन, अमरीकी उपनिवेशवादी मंसूबे", जैसे शब्द मानो कोई मंत्र हैं जिन्हें सभी जोर जोर से हर दो मिनट में दोहराते थे. जब वेनेज़ुएला के प्रतिनिधि अपने "कामरेड और कमाँडर" राष्ट्रपति शावेज़ की समाजवादी नीतियों के गुणगान कर रहे थे तो भरा हुआ हाल तालियों और सीटियों से कई बार गूँज उठा था. लगा जैसे सभी अपने अपने देशों में क्यूबा जैसे एक समाजवादी स्वर्ग के आने की आशा की बातें कर रहे थे. मुझे हँसी भी आ रही थी और कुछ खीझ भी. मानव अधिकार किसी एक सोच में नहीं बसे, यह कहना कि एक तरफ़ सब गलत है और दूसरी ओर सब ठीक, मुझे सही नहीं लगता.

एक अमरीकी प्रतिनिधि की आत्मकथा मुझे बहुत अच्छी लगी. वह विश्व के सबसे अमीर और ताकतवर देश में अपनी बीमारी और उसकी वजह से आयी गरीबी के बारे में बता रही थी. नेपाल से आयी सोहरतिया देवी थारु की आत्मकथा, गाँव की जवान युवतियों के बारे में, जो दिल्ली या मुंबई जैसे शहरों में वेश्या बना दी जाती हैं, भी बहुत अच्छी थी. मेरे विचार में, बजाय खोखले स्लोगन दोहराने के, ऐसी कहानियाँ वर्तमान परिस्थितियों का बेहतर विवरण देती हैं क्योंकि इन कहानियों में केवल विदेशी "इमपिरियलिस्म" या साजिश की बात नहीं होती, बल्कि समस्याओं के पीछे छुपी स्थानीय सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, विषमताओं और जिम्मेदारियों की झलक भी मिलती है.

कल दोपहर को विकलाँगता से जुड़े हुये कई सवालों पर एक वर्कशाप थी जिसका मैंने संचालन किया. बहुत अधिक लोग तो नहीं थे पर अच्छी रही. मीटिंग स्थल की ओर जाते समय रास्ते में अनीता की व्हील चैयर का एक पहिया टूट गया. थोड़ी देर तो बहुत चिंता हुई कि अगर ठीक नहीं हुई तो अनीता कैसे यहाँ रह पायेगी. पर भाग्यवश हमारी वर्कशाप में एक व्हील चैयर ठीक करने वाले भी थे, उन्होंने तुरंत उपाय ढ़ूढ़ निकाला और दो नये पहिये लगा दिये, यानि जो पहिया अभी नहीं टूटा था उसे भी बदल दिया.

वर्कशाप में कुएंका के एक मतेओ नाम के बच्चे जिसे मस्कुलर डिसट्रोफी की बिमारी है, के पिता कारलो ने अपनी भावपूर्ण कहानी सुनायी. अनीता ने स्त्री और विकलागँता से जुड़े अनेक सामाजिक प्रश्नों को उठाया. जैनेवा में विश्व स्वास्थ्य संस्थान के डा फेडेरिको मोनटेरो ने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में विकलाँग सम्बंधी जरुरतों के बारे में बोला. जब वर्कशाप समाप्त हुई तो कारलो हम सब को अपनी गाड़ी में कुएंका शहर की कुछ सैर कराने ले गया. रात को जब होटल पहुँचे तो बहुत थक चुके थे.

21 जुलाई 2005, कुएंका, सुबह 5.45 बजे

Ecuador imagesकल तो सारा दिन ही एक के बाद दूसरी मीटिंग में ही निकल गया. सोचा था कि दोपहर में किसी इंटरनेट कैफे में जा कर ई मेल देख लूँगा पर बिल्कुल समय ही नहीं मिला. सुबह अफ्रीका पर सेशन था. जिसके दौरान कई बार आइफो (AIFO)  का नाम आया. बोलने वालों में से गिनेया बिसाऊ के डा. मारटीनियो थे, अफ्रीकन ड्रीमस् कम्पीटिशन के विजेयता घाना के नियाजा सानतुआह थे, तनजानिया के चार्लस् थे. पर जितने भी भाषण हुये उनमें से मुझे केवल डा. डेविड सेंडरस् और नियाजा ही पसंद आये. मेरे विचार से इस सेशन में केवल विचारात्मक बातों को प्राथमिकता दी गयी, कुछ भावपूर्ण भी होता तो और भी अच्छा होता. हालाँकि दक्षिण अफ्रीका की एक नर्स जिसे एडस् की बीमारी हो गयी है और तनज़ानिया की एक बच्ची जिसके माता पिता को एडस् है, ने भी बोला पर वे भी भावात्मक नहीं थे, कुछ बनावटी से लगे थे.

शाम को मझसे डेविड सैंडरस ने पूछा कि मुझे वह सेशन कैसा लगा तो मैंने उसे सीधा ही भावात्मक कमी के बारे में कह दिया. कहते ही मुझे लगा कि इतने स्पष्ट रुप से नहीं कहना चाहिये था, क्योंकि उसका मुँह उतर सा गया. जस्टिफिकेशन देने लगा कि समय नहीं था, इत्यादि. मैंने तुरंत कुछ तारीफ की पर लगा कि डेविड को बहुत बुरा लगा है. अगर कोई मेरे किये की इस तरह बुराई करे तो मुझे भी बहुत बुरा लगता है पर क्या करता, तब तक गलती तो हो ही गयी थी. आलोचना करना बहुत आसान है और मुझे सोच कर आलोचना करने का तरीका सीखने की आवश्यकता है.

दोपहर को वृद्ध व्यक्तियों की समस्याओं पर वर्कशाप थी. पाम ने मुझसे कहा कि मैं वर्कशाप संचालन में उसकी मदद करुँ. मुझे लग रहा था कि पाम बहुत चितिंत है क्योंकि बोलने वाले बहुत लोग थे और समय कम था. सभाओं में बहुत से लोग जब बोलना शुरु करते हैं तो रुकते ही नहीं. मैंने पाम को कहा कि हम लोगों को हँसी मज़ाक में इस तरह से समय पर रुकने के लिये कहेंगे कि उन्हें बुरा न लगे. इसका तरीका था कि जैसे ही कोई व्यक्ति अपने समय से पाँच मिनट से अधिक ऊपर चला जायेगा, मैं नाचने की तरह से कोई ऊल जलूल हाथ हिलाते हुये उन्हें जाने के लिये कहुँगा और हँसने हँसाने में लोगों को बुरा नहीं लगेगा. ऐसा ही किया और मुझे बहुत मज़ा आया. लोग भी बहुत हँसे. पर बाद में कुएंका की दो महिलाएँ जिनके लम्बे भाषण मैंने यूँ ही रोक दिये थे मेरे पास आयीं और बोलीं कि रोकने का यह तरीका ठीक नहीं है, क्योंकि इससे उन्हें बहुत मानसिक तनाव हुआ!

वर्कशाप के बाद हम लोग "विश्व स्वास्थ्य रपट" के उद्घाटन पर गये. सुबह 8 बजे निकले थे कमरे से, रात को वापस लौटे तो करीब 9 बज रहे थे. अनीता ने दिल्ली से लायी पापड़ी खिलायीं, बहुत अच्छी लगीं. पूरा समान ले कर आयी है वह सूखी पापड़ियाँ, उन पर डालने के लिये भुना जीरा, काला नमक, एक बोतल में इमली की चटनी. सारे दिन की थकान मिट गयी.

22 जूलाई 2005, कुएंका, सुबह 4.15 बजे

शायद ये चटनी के साथ मठरी और पापड़ी खाने का ही असर है कि गला में हलका सा दर्द हो रहा है. सुबह नींद पौने ३ बजे ही खुल गयी. एक घंटा तो बिस्तर में ही लेटा रहा कि शायद Ecuador imagesफ़िर से नींद आ जाये, पर जब देखा कि कुछ नहीं हो रहा तो सोचा उठ कर कुछ काम ही कर लिया जाये.

कल सुबह बापस घर जाने की यात्रा शुरु हो जायेगी. पहले कुएंका से बस में ग्वायाकिल, फिर वहाँ से मेडरिड के लिये जहाज़ और फिर वहाँ से बोलोनिया के लिये दूसरा जहाज़. इतवार को शाम को 6 बजे बोलोनिया पहुँच जाऊँगा. अभी तक कैमरा चुराने वाले नहीं आये और अब लगता है कि आयेंगे भी नहीं. शायद उन्हें यहाँ चोर बाजर में उसका अधिक दाम मिल गया होगा या फ़ि डर हो कि मैं कहीं उन्हें जाल में फँसा कर पुलिस के हवाले न कर दूँ.

कल लंदन में एक बार और बम फ़टे. रिजु और आत्मप्रभा भी वहीं थे पर दोनो ठीक ठाक हैं. रिजु तो उसी गाड़ी में था जहाँ एक बम फ़टा पर उसने ईमेल में लिखा है कि सिर्फ थोड़ा धूँआ सा था और लोग भागा भागी कर रहे थे, पर और कुछ नहीं हुआ. बमों का सोच कर हवाई जहाज़ की यात्रा का सोच कर भी डर लगता है.

जेएसए के सेशन चल रहें हैं. कल सुबह अल्मा आटा का सेशन हुआ. सारे सेशन ऐसे ही हो रहे हैं, जैसे कोई विज्ञानिक सभा हो. हर कोई पावर प्वाईंट से अपनी बात विज्ञानिक तरीके से समझाना चाहता है, पर बार बार एक जैसी ही बातें होती हैं जिनमें भावनाओं और जीवन की कमी लगती है और भाषणबाजी अधिक. यहाँ के एक छोटे बच्चे ने सड़क पर जीवन बिताने वाले बच्चों के बारे में प्रस्तुति की. बच्चा होनहार कलाकार था और बहुत नाटकीय ढंग से उसने बहुत लम्बी कविता पढ़ी और खूब तालियाँ बजीं. पर मुझे लगा, यहाँ सड़कों पर इतने बच्चे हैं जो सचमुच यह जीवन जीते हैं, उन्हें अपनी बात कहने के लिए कविता या नाटक की आवश्यकता नहीं. अगर उनमे से कोई बच्चा अपनी बात कहता, तो चाहे वह इतनी खूबी से न बोल पाता पर वह जेएसए की आत्मा के अधिक निकट होता और उसका असर भी भिन्न तरीके का होता.

लोग बोलना शुरु करते हैं तो बोलते ही जाते हैं, जो मोडरेटर हैं वह उन्हें रोक नहीं पाते, चाहे वही पुरानी बाते ही बार बार कह रहे हों. कितने लोगों को अपनी आवाज़ और अपने कहने से इतना मोह है कि वह कुछ अन्य नहीं देख पाते. मुझे इस बात से गुस्सा आता है क्योंकि हम लोग इतना पैसा और अपना समय ले कर दूर दूर से आये हैं और इस तरह आधा समय तो भाषणबाजी में ही निकल जाता है. यह मौका फिर कई सालों तक दोबारा नहीं आयेगा.

इतनी उमंग के साथ आया था यहाँ, पर अधिकतर आशाएँ बेकार ही हुई हैं. बस सब लोगों से मिलना जुलना अच्छा लगा. कहते हैं कि अगली असेम्बली अफ्रीका में होगी. पर ऐसी ही होगी क्या? शायद, बाद में ईमेल लिस्ट के द्वारा इस बात पर कोई विचार हो.

आज जेएसए का आखिरी दिन है. दोपहर को शहर में जलूस निकालेंगे और शाम को संगीत नृत्य का फैस्टिवल होगा.

यहाँ की इन्डीयोस् पारम्परिक वेश भूषा वाले कई लोगों से बातचीत का मौका मिला. इस हफ्ते में स्पेनिश समझने और बोलने में काफ़ी अच्छा हो गया हूँ. वे लोग जब देखते हैं कि मुझसे बात कर सकते हैं तो तुरंत मुझे घेर लेते हैं. किसी जगह की भाषा जाने बिना उन्हें समझना आसान नहीं. पहले कीटो में और अब यहाँ आ कर पहले, एक दो दिन तक तक मैं उन्हें अनपढ़ गाँव वाले समझता था, पर जब उनसे बात करना शुरु की है तो पता चलता है कि उनमें से कोई स्वास्थ्य कर्मचारी है तो कोई शिक्षक है. वे लोग अपने जीवन के बारे में बताते हैं और मुझसे बहुत प्रश्न पूछते हैं. अगर मैं उनकी वेश भूषा को कौतुक से देखता हूँ तो वो भी मेरे लम्बे कुर्ते को अचरज से देखते हैं. कोई मुझसे ईमेल का पता पूछता है तो अचरज सा होता है क्योंकि मैं मन में सोच रहा था कि इन्हें क्या मालूम होगा कि ईमेल क्या चीज़ है. यही है यहाँ आने की सबसे सुंदर बात.

सुबह सुबह जाग कर कम्प्यूटर पर काम करने की वजह से एक अन्य बात अच्छी हुई है कि मेरी नयी कहानी करीब करीब पूरी हो गयी है.

23 जुलाई 2005, कुएंका, सुबह 5.50 बजे

आज बस चलने का समय आ गया. आज सुबह 9.00 बजे की बस पकड़नी है जो दोपहर 2 बजे तक ग्वायाकिल पहुँच जायेगी. क्योंकि ग्वायाकिल से उड़ान शाम को 7 बजे है, इसका अर्थ Ecuador imagesहोगा ग्वायाकिल हवाई अड्डे पर 5 घंटे इंतज़ार करना पड़ेगा पर अगर रास्ते में यात्रा में कोई कठिनाई हो जायेगी तो यह इंतज़ार का समय कम भी हो सकता है. अगर समय कम हो तो मुझे बहुत चिंता होती है, उस चिंता से बचने का यही तरीका है कि पहले चला जाये.

कल जब असेम्बली के समाप्त होने का उत्सव हुआ, तो उसमें यहाँ आये हुए अस्सी देशों के एक एक प्रतिनिधि को स्टेज पर जाना था. निकोला नहीं था, इसलिये जब इटली का नम्बर आया, मैं ही गया स्टेज पर. ऐसे मौकों पर मन में कुछ दुविधा सी हो जाती है. आज इटली ही मेरा देश है, मेरा पासपोर्ट भी इटली का ही है, पर मन से तो मैं खुद को भारतीय ही समझता हूँ और किसी अन्य देश का प्रतिनिधि बन कर कुछ झूठा सा महसूस करता हूँ. जब लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं कौन से देश से आया हूँ, तो लम्बा उत्तर देना पड़ता है, अपने भारतीय मूल और इटली की नागरिकता का.

कल दोपहर को सन बलाज़े स्क्वायर से जलूस निकलना था. नेपाल से आये नारायण काजी और सोहरतिया देवी पहले ही जा चुके थे और अपना ढोल मेरे लिये छोड़ गये थे. मैं उसी ढोल के साथ गया. छोटा सा सुंदर ढोल है और उसे देख कर लोगों में कुछ कौतुक भी था. एक्वाडोर की एक लड़की ने मुझसे पूछा इसे कैसे बजाते हैं? जब मैंने बजा कर दिखाया तो बोली कि वह उसे खरीदना चाहेगी. मैंने मना कर दिया क्योंकि मैं यह ढोल वापस बोलोनिया ले जाना चाहता हूँ, हमारे भारतीय उत्सवों में काम आयेगा. जब जलूस शुरु हुआ तो मैं, अनीता और हशीम वापस होटल में आ गये, जलूस के साथ नहीं गये क्योंकि इस शहर की पत्थर लगी सड़कों पर अनीता की व्हील चैयर नहीं चलती, बार बार अटक जाती है. मैं बहुत थकान भी महसूस कर रहा था. ज़ुकाम और गला खराब होने के लक्षण आ रहे हैं.

आज सुबह से ज़ुकाम से नाक बंद हो रही है. पर मुझे मालूम है, घर वापस जाने की खुशी में सब कुछ अपने आप ही ठीक हो जायेगा.

24 जुलाई 2005, बोलोनिया, रात 8.45 बजे

आखिरकार घर वापस पहुँच ही गये. इतनी लम्बी यात्रा थी कि लगता था कभी समाप्त ही नहीं होगी. कुएंका से ग्वायाकिल की यात्रा बहुत सुंदर थी. पहले ऊँचे पहाड़ों के अलपाईन पेड़ पौधे जब बस पुराने ज्वालामुखियों के बीच में से 4000 मीटर की ऊँचाई तक पहुँच जाती है. फ़िर जैसे जैसे समुद्र तट के करीब पहुँचते हैं टरोपिकल पेड़ पौधे, केले और अनानास के खेत आदि शुरु हो जाते हैं. ग्वायाकिल में बहुत गर्मी और उमस थी.

यात्रा की सबसे अच्छी बात थी कि बस में मुझे एक पलिस्तीनी मित्र अहमद मिल गये. मेरे जैसे हैं अहमद उम्र में पर उनके जीवन की कहानी इतने उतार चढ़ाव और दहशत से भरी है कि सच नहीं लगती. वह लेबनान में एक रिफ्यूजी कैंप में पैदा हुए थे. सारे जीवन में उन्होंने बहुत से लोगों को कत्ल होते देखा है, गोलियों और बमों के बीच में से अपने बच्चों को ले कर भागे हैं. बच्चों को, मित्रों को दफनाया भी है. बड़ा बेटा बिलाल एक सड़क दुर्घटना में घायल हो कर विकलाँग है और दूसरा बेटा मोहम्मद केवल 21 सालों का है पर यूरोप में तीन वर्षों से एसाइलम लेने के चक्कर में इधर से उधर भटक रहा है. बच्चों की बात करते करते बार बार उनकी आँखे भीग जाती हैं और आवाज़ भर्रा जाती है.

घर आ कर यात्रा की यही याद मन में ठहर गयी हे, बाहर ऊँचे पहाड़ों के बीच में पुराने बुझे ज्वालामुखियों के बीच घुमावदार सड़क और हवा में तैरते अहमद की जीवनकथा के शब्द.

******

कल्पना पर सुनील दीपक के अन्य आलेख - कल्पना पर हिंदी लेखन की पूरी सूची