मिस्र यात्रा की डायरी सुनील दीपक, 29 अप्रैल - 5 मई 2006

Egypt Cairo

कैरो, 29 अप्रैल 2006

हेलिओपोलिस का नया हिस्सा है जहाँ पिछले पाँच छः सालों में हर तरफ़ नये भवन बन गये हैं. यहीं हेलिओपोलिस में नये इटंरकोन्टिनेटल स्टार होटल में ठहरा हूँ. यात्रा आज सुबह सात बजे बोलोनिया से प्रारम्भ हुई थी. एलोक्ट्रानिक टिकट मुझे विश्व स्वास्थ्य संस्थान वालों ने भेजा था जिसके हिसाब से मुझे बोलोनिया से मिलान जाना था फ़िर वहाँ से कैरो की उड़ान पकड़नी थी. हवाई अड्डे जा कर मालूम चला कि मेरी बुकिंग मिलान की नहीं रोम की थी. खैर दोनो उड़ानों का समय करीब करीब एक जैसा था इसलिए बदलाव के बावजूद उड़ान लेने में दिक्कत नहीं हुई.

मिस्र में पहले भी तीन बार आ चुका हूँ और मुझे कैरो जिसे यहाँ के लोग "अल काहिरा" कहते हैं, बहुत अच्छा लगता है. फर्क केवल इतना है कि इस बार विश्व स्वास्थ्य संस्थान की तरफ से आया हूँ और उन्होने पाँच सितारा होटल में ठहराया है. नेपाल और मोज़ाम्बीक की पिछली दो यात्राओं में गाँवों के सीधे साधे जीवन के बाद इस बार ज़्यादा आराम से यह यात्रा बीतेगी पर पाँच सितारा होटल में ठहरने से यह अवश्य लगता है मानो देश के लोगों को ठीक से मिलने या जानने पहचानने का मौका नहीं मिलेगा. पाँच सितारा होटल में रहना एक जेल सी बन जाता है जिससे आम लोगों का जीवन बहुत दूर होता है.

जहाज़ से ऊपर से ग्रीस के समुद्री तट और फ़िर मिस्र के सागर तट का बहुत सुंदर दृष्य था पर मिस्र की रेगिस्तान जैसी धरती मुझे अच्छी नहीं लगती. बोलोनिया जब जहाज़ उतरता है तो वहाँ हर तरफ हरियाली दिखती है और यहाँ जिस तरफ देखो बस रेत ही रेत, बस बीच में नील नदी की एक नहर थी जिसके आस पास कुछ हरियाली थी. उतरते ही गर्मी चाँटे जैसी लगी और मैंने तुरंत अपना कोट उतार कर सूटकेस में बंद कर दिया. स्वयं को समझा रहा था कि 34 डिग्री तापमान बहुत अधिक नहीं है और दिल्ली में तो आजकल 40 डिग्री तापमान होगा.

इस बार की यात्रा में एक और अंतर है कि देश में घूमने का, जगह देखने का मौका भी नहीं मिलेगा. सारा समय मीटिंग में निकल जायेगा, जिसमें 8 विभिन्न अरबी देश भाग ले रहे हैं. यह मीटिंग 4 मई तक चलेगी और 5 मई को वापस इटली जाना है. फ़िर भी कम से कम पुराने कैरो में जाने का विचार है. यहाँ मेरे कई मित्र रहते हैं. उनमें से एक मित्र की 1 मई को शादी है, वहाँ जाने का विचार भी है. उसके अलावा, एक और मित्र, जेहान ने वादा किया है कि वह एक दिन मुझे पिरामिड दिखाने ले जायेगी.

दोपहर में होटल में सामान रख कर मैं होटल के साथ में बने शौपिंग माल में घूमने गया, वहाँ एक नाई की दुकान देखी तो वहाँ बाल भी कटवा लिए. बाल काटने के उसने 60 पाऊँड यानि कि करीब दस अमरीकी डालर ले लिए. फ़िर वहीं शौपिंग माल में ही एक रेस्टोरेंट में खाना खाया. अधिकतर औरतें पूरे हाथों और नीचे तक पैर ढ़कने वाली पोशाकें पहनती हैं और सिर पर स्कार्फ बँधा रहता है. उनके साथ के पुरुष तो सब आधी बाँहों वाली कमीजें पहने थे. हालाँकि बुरका पहनने वाली औरतें अधिक नहीं दिखीं पर इस तरह से शरीर को छुपाने वाली औरतों को देख कर मन में कुछ घबराहट सी होती है. शायद कुवैत और दुबाई जैसी जगह रहने वालों को इसकी आदत सी हो जाती होगी.

बचपन में कई साल तक पुरानी दिल्ली की ईदगाह के सामने रहते थे जहाँ बुरके वाली औरतों को देखना आम था और उनमें से कई को जानता था. तब परदे के पीछे शरीर छुपाना अजीब नहीं लगता था और मेरे महबूब, चौदह्वीं का चाँद और पाकीजा जैसी फिल्में रोमांटक लगती थीं पर इतने साल इटली में रहने से शरीर को खुला देखना स्वाभाविक लगने लगा है और बुरका पहने या शरीर ढ़की औरतें अज़ीब सी लगती हैं.

अब जेनेवा से आये विश्व स्वास्थ्य संस्थान के एक साथी के साथ मिलने जाना है, रात को देर हो जायेगी.

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सुबह ही विश्व स्वास्थ्य संस्थान के मध्य पूर्व अरबी देशों के दफ्तर में चले गये थे, जहाँ डा. तागी से मुलाकात हुई. पहले मिलते ही, वह मुझे कुछ अच्छे नहीं लगे. जाने क्यों कई बार ऐसे होता है कि कोई नया आदमी मिलते ही अच्छा नहीं लगता. पर जब सारा दिन उनके साथ बिताया और उनके बारे में जाना तो वह अच्छे लगने लगे. खुले विचारों वाले डा. तागी, मानसिक रोग चिकित्सक हैं और उनके खुले विचारों ने ही उन्हें जीवन के बहुत साल तक अपने देश, ईरान के गाँवों में जीवन बिताने के लिए मजबूर किया, शायद इसलिए कि देश में शासन करने वाले धार्मिक कट्टर लोगों को उनका खुलापन अच्छा नहीं लगा. फ़िर खातामी शासन उन्हें तेहरान विश्वविद्यालय में ले आया. अब पिछले आठ महीनों से वह विश्व स्वास्थ्य संस्थान में मानिसक स्वास्थ्य तथा विकलाँगता के विषयों पर काम कर रहे हैं.

शाम को मुझे लेने जेहान होटल में आई. जेहान से मेरी जान पहचान 8 या 10 साल पहले हुई थी जब वह हमारे एक प्रोजेक्ट में मिस्र में काम कर रही थी. उसके बाद बीच बीच में उससे मिलना जुलना होता ही रहा, एक बार मुम्बई में, एक बार ब्राज़ील में और कई बार मिस्र में.

जेहान मेरी नजर में आदर्श मुसलिम है. एक तरफ से धर्म की पाबंद, रोज सुबह उठ कर नमाज पढ़ती है. दूसरी तरफ से विचारों में खुलापन और अन्य धर्मों के प्रति कोतुहल. वह मुझे अल अजहार बाग में ले गयी जहाँ से पुराने कैरो को डूबते सूरज की रोशनी में देखने का मौका भी मिला और रात देर तक उससे बात करता रहा.

कुछ समय पहले सुना था कि उसकी शादी होने वाली है, पूछा तो बोली कि उसने वह रिश्ता तोड़ दिया है. बोली कि इस्लाम औरतों को यह हक देता है कि अगर वह न करदें तो उनकी जबरदस्ती शादी नहीं हो सकती. जिस लड़के से रिश्ता हुआ था उसे कोलिज के दिनों से जानती थी और वह उससे प्यार भी करता था पर जेहान को उससे प्यार नहीं था और न ही उन दोनों के विचार मिलते थे, इसीलिए उसने वह रिश्ता तोड़ दिया था. फिर बात अंतरजातीय विवाह की हुई तो जेहान ने बताया कि मिस्र में मुसलमान लड़के ईसाई और यहूदी लड़कियों से विवाह कर सकते हैं पर मुसलमान लड़कियाँ अपने धर्म से बाहर विवाह नहीं कर सकतीं, उनके लिए सिविल मेरिज भी नहीं है.

मेरा विचार था कि स्त्री को पुरुष से हर बात में बराबर मानने वाली जेहान को यह बात ठीक नहीं लगेगी पर वह बोली कि वह इस बात से सहमत है और अगर वह विवाह करेगी तो किसी मुसलमान लड़के से ही. पर अगर किसी दूसरे धर्म के लड़के से प्यार हो जाये तो, मैंने पूछा तो वह बोली, उसे भी मुसलमान बनना पड़ेगा, वह भी सिर्फ कहने के लिए नहीं, सचमुच में मुसलमान बनना पड़ेगा.

अकेली गाड़ी चलाती है, रात देर तक मेरे साथ घूम सकती है, न सिर ढ़कती है न परदा करती है, पर साथ ही साथ इस तरह सोचती है, यह बात मुझे कुछ अजीब सी लगी. उससे कहा तो वह हँसने लगी. बोली, "मैं आधुनिक लड़की हूँ पर मुझे इस्लाम बहुत अच्छा लगता है, और मैं जानती हूँ कि मुझे अपना साथी अपने जैसे विचारों वाला लड़का ही चाहिए, और वह मुसलमान हो, तो इसें गलत क्या है? हाँ यह अवश्य है कि इस तरह के लड़के मिलना आसान नहीं, अधिकतर पुरुष घर में रहने वाली औरत चाहते हैं जो पति की सेवा करे, बाहर काम न करे और पति से ज्यादा न पढ़ी लिखी हो. पर अगर मुझे मेरी पसंद का पुरुष नहीं मिलेगा तो मैं शादी नहीं करुँगी."

1 मई 2006

आज सुबह सुबह जेहान हमें लेने आ पहुँची. मुझे और जेनेवा से आये मेरे साथी फेडेरिको को उसने पिरामिड दिखाने ले जाने का वायदा किया था. फेडेरिको अमरीका महाद्वीप के देश कोस्टारिका से हैं और एक दुर्घटना की वजह से उनके शरीर का निचला हिस्सा पंगु है, इसलिए वह व्हील चेयर का इस्तेमाल करते हैं. जेहान को चिंता थी मिस्र में कोई जगह विकलाँग लोगों के लिए ठीक से नहीं बनी है और फेडेरिको को बहुत मुश्किल होगी पर घूमने में कोई विषेश दिक्कत नहीं आई. मिस्र के लोग मदद करने के लिए तुरंत तैयार होते हैं, कहीं भी सीढ़ियाँ आती तो तुरंत आसपास खड़े लोग व्हील चेयर को उठाने में मदद करने आ जाते.

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पिरामिड तो पहले भी कई बार देख चुका था पर जितना आनंद इस बार घूमने में आया उतना पहले कभी नहीं आया था. इसके दो कारण थे. पहला तो यह कि आज गर्मी नहीं थी, आसमान बादलों से ढ़का था. इसलिए रेत में चलना, इधर उधर घूमना आराम से हुआ. दूसरी बात यह कि इस बार हमारे पास समय बहुत था, सब जगह आराम से गये. पिरामिड के भीतर जाने का मेरा मन नहीं था, उसके अँधेरे सँकरे रास्ते मुझे अच्छे नहीं लगते, पर बाहर गीज़ा के तीन पिरामिडों के बीच दो घँटे तक घूमता रहा.

फिर जेहान हमें गीज़ा के एक जाने माने रेस्टोरेंट अंद्रेया में खाने के लिए ले गयी. रेस्टोरेंट बहुत सुंदर था हालाँकि खाना कुछ विषेश नहीं था. वापस आते समय रास्ते में जेहान ने बताया कि जिस जगह हम इस बार ठहरे हैं वह हेलियोपोलिस नहीं नास्र सिटी है, हेलियोपोलिस करीब ही है. रास्ते में जेहान ने वह स्टेडियम भी दिखाया जहाँ मिस्र के राष्ट्रपति नास्र का खून हुआ था. अँग्रेजी में नास्र को नासिर कहते हैं पर जेहान उस नाम को नास्र बोलती है.

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दोपहर को होटल वापस आये तो मुझे एक मित्र शानुदह की शादी में जाना था पर थकान हो रही थी, धूप में निकलने का मन नहीं किया, बिस्तर में घुस कर सो गया. ज़्यादा सोना नहीं मिला क्योकि एक होटलवाले ने "बार चेक करना है" कह कर उठा दिया, पर थोड़े से आराम से ही जान में जान आयी. फिर दोपहर भर कल की मीटिंग का काम तैयार करता रहा. अब रात के खाने के लिए फेडेरिको के साथ बाहर जाने का प्रोग्राम है. 

2 मई 2006

आज सुबह से सारा दिन मीटिंग में निकला. मीटिंग में पेलिस्टाईन और इराक के लोगों ने बहुत अच्छा बोला. बात हो रही थी विकलाँग लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की और पेलिस्टाईन से आयी हाना बोली कि उनका देश और उनके रहने वालों को सब लोग हिंसावादी कहते हैं और इस हिंसा के लेबल से वह लोग बच नहीं सकते पर उनके देश पर जो इसराइल का शासन है जिसमें उनके कोई अधिकार नहीं है, उसके खिलाफ़ कोई भी कुछ नहीं कर पाता. उसने कहा कि उन्हें प्रजातंत्र के भाषण तो बहुत लोगों ने दिये हैं पर प्रजातंत्र कैसे करें जब इज़राइल इसकी इज़ाज़त नहीं देता? इराक के बोलने वाले ने देश में हो रही घटनाओं के बारे में बताया.

दिन भर यही बातें होती रहीं. पाकिस्तान के भी लोग आये हैं इस मीटिंग में और उनसे बात करना बहुत अच्छा लगा. वहाँ के एक बड़े डाक्टर भी आये हैं, उन्होंने अपने भाषण में कई बाते कहीं, "आजाद जम्मु और कश्मीर" के बारे में, कैसे वहाँ सभी सुविधाएँ बहुत अच्छी हैं पाकिस्तानी सरकार की तरफ से, और जब वह यह सब कहते तो हर बार वह मेरी तरफ देखते. मुझे हँसी आ रही थी, पर मैंने कुछ नहीं कहा.

खैर शाम को छः बजे मीटिंग समाप्त हुई तो घूमता हुआ होटल वापस पैदल ही आया. सारा दिन मीटिंग के कमरे में बैठे बैठे, थक गया था, थोड़ा चलने से अच्छा लगा.

4 मई 2006

आज इस मीटिंग का आखिरी दिन है. रात को होटल वापस आते आते बारह बज गये थे, फ़िर भी सुबह जल्दी उठ कर विश्व स्वास्थ्य संस्थान के दफ्तर चला आया क्योंकि आज की मीटिंग के लिए काम तैयार करना था. सब काम पूरा कर के सुबह आठ बजे ही मैं यहाँ मीटिंग कक्ष में आ गया था. कल दिन में मीटिंग के दौरान कतार के राजा "आमीर" की बेटी राजकुमारी शेखा हिसा अल थानी से बातचीत की. शेखा हिसा को संयुक्त राष्ट्र के लिए विकलाँगता के विषय पर विषेश राजदूत का पद मिला है. इस बात से विकलाँग व्यक्तियों की संस्थाएँ बहुत खुश नहीं हैं क्योंकि उनका सोचना है कि यह पद शेखा हिसा को उसके परिवार के पैसे की वजह से मिला है और उन्हें विकलाँगता विषय पर कुछ जानकारी नहीं है. इसलिए मैंने सोचा कि उनसे साक्षात्कार करके उनके विचार जानना आवश्यक है. मुझे यह भी लगा कि बहुत से विकासित देशों के लोग उनके विरुद्ध इस लिए हैं क्योकि वह स्त्री हैं, मुस्लिम हैं, परदा करती हैं और एक अरब देश से हैं, और इस सब बातों की वजह से उनकी बातों को पूर्वाग्रहों के साथ सुनते हैं और आलोचना के लिए तैयार रहते हैं. वह तुरंत साक्षात्कार के लिए तैयार हो गयीं. यह बातचीत बहुत अच्छी रही और मुझे लगा कि शेखा हिसा ने साफ़ स्पष्ट शब्दों मे बात की, अपने बारे में भी बहुत कुछ कहा.

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शेखा हिसा ने बातचीत में यह भी बताया कि उन्हें काम की वजह से अपनी बेटी के पास रहने का समय नहीं मिलता है तो मैंने मन में सोचा कि शाही परिवार में राजकुमार और राजकुमारियों के लिए यह तो आम बात होनी चाहिए, क्योंकि मुझे लगता है कि वे लोग तो आया और नौकरों के साथ ही बड़े होते हैं, शायद यह बात मेरे मन में मुगलेआज़म जैसी फिल्मों से आई थी. जब उनसे मैंने यह कहा तो वह हँसने लगी, बोली कि मैं अकेली माँ हूँ, पति से अलग, और हर माँ की तरह अपने बच्चे के साथ रहना चाहती हूँ और मेरा परिवार आम परिवार की तरह ही है.

शेखा हिसा तीसरी राजकुमारी हैं जिनसे मिलने का मुझे मौका मिला है. उनसे पहले इंग्लैंड के प्रिंस चार्लस की पहली पत्नी, राजकुमारी डयाना से भी मिला था और इंडोनेसिया के दक्षिण सुलावेसी द्वीप की राजकुमारी नूरशाँती से तो कई बार मिला हूँ. शायद यह इत्तफाक ही है कि तीनो का विवाहित जीवन कठिन था और उनकी पति से नहीं बनी. पर फ़िर भी, डयाना के मुकाबले मुझे शेखा अधिक मजबूत और दृढ़ व्यक्तित्व की लगीं.

रात को हम लोगों को नील नदी पर एक नाव यात्रा पर खाने का निमंत्रण था. नील नदी पर बने भव्य ग्रैंड हयात होटल की नाव थी जिसमें खाने के दौरान मनोरंजन के लिए एक बेली डांसर भी थीं जिनका नाम बताया गया समरा. समरा जी का नाच देख कर कुछ अचरज हुआ. थोड़े से और तंग फ़िरोज़ी रंग की चमड़े की पौशाक पहने जिससे उनका वक्ष बाहर झाँक रहा था, उन्होंने खूब कूल्हे मटका कर और शरीर के निचले भाग को थर थर कँपन के साथ हिला कर नृत्य किया जो नृत्य कम लग रहा था और लोगों को सेक्स का खुला प्रदर्शन अधिक लग रहा था. शायद ऐसे ही नाच को देख कर पुरानी हिंदी फिल्मों में हेलन जैसी अभिनेत्रियों के नाच रखे जाते थे क्योंकि भारत में तो इस तरह के क्लब नृत्य कभी नहीं देखे. अचरज इस लिए हुआ कि एक तरफ तो हर जगह मिस्री औरतें शरीर को सर से पाँव तक ढ़क कर चलती हैं और दूसरी ओर, पुरुषों और औरतों की मिली जुली भीड़ में इस तरह के कपड़े पहन कर ऐसा नाच हो रहा था. उसे देखने वालों में बहुत सी औरतें भी थीं जो सिर से पाँव तक ढ़के वस्त्र पहने थीं.

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मेरे एक मिस्री मित्र ने मेरे पूछने पर कहा कि इस तरह के नृत्य तो 90 प्रतिशत मिस्री शादियों में होते हैं और उस समय नाचने वालियों के साथ साथ, सिर से पाँव तक ढ़की घर की औरतें भी खूब नाचती हैं, और करीब करीब हर मिस्री लड़की यह नाच सीखती है.

मुसलमान संसार में औरतों के विचारों के बारे में एक अन्य रुख मुझे दिखा जब मैंने इरान से आयी एक महिला को एक जानने वाली मिस्री युवती के साथ बात करते सुना. इरानी महिला मिस्र की महिलाओं के विभिन्न तरीकों से सिर पर रुमाल बाँधनें के बारे में पूछ रही थीं और बोली, "यहाँ तो बहुत सुंदर तरीके से फैशन वाले रुमाल बाँधते है, मुझे भी सीखना है और यह रुमाल खरीदने हैं. हमारे यहाँ तो सिर को ढ़कना सब औरतों के लिए आवश्यक है, चाहे वह मुसलमान हों या किसी और धर्म की. हम भी कोशिश करते हैं कि यह नियम मान कर भी अपनी मन के आकाक्षाएँ पूरी कर सकें इसलिए बहुत सी इरानी युवतियाँ आजकल छोटे छोटे रुमाल बाँधती हैं जिससे उनके बाल बाहर दिखते हैं और हालाँकि हमें मेकअप और श्रृंगार करना मना है पर युवतियाँ पूरा मेकअप करती हैं. एक चेहरा ही तो दिखा सकते हैं, कम से कम उसे तो मेकअप के साथ सुंदर बना कर दिखाएँ".

मेरी मिस्री मित्र जो बिना सर ढ़के बाहर नहीं जातीं बोलीं, "मैं सिर ढ़कती हूँ क्योंकि मुझे अच्छा लगता है पर ऐसा करने की जबरदस्ती हो, यह तो बहुत गलत बात है."

हमारे एक इरानी साथी ने जब भोज में वाईन माँगी तो मैंने उनसे पूछा कि क्या इरान में वाईन मिलती है. वह बोले कि गाँवों में करीब 50 प्रतिशत पुरुष और थोड़ी सी महिलाएँ भी वाईन पीती हैं, पर वे घर में बनाते हैं, बाज़ार में नहीं मिलती.

पश्चिमी देशों में मध्यपूर्व के अरब देशों की और मुसलमानों की जो तस्वीर दिखायी जाती है उसके सामने वहाँ के लोगों के विभिन्न विचार सुन कर लगा कि वह तस्वीर एक तरफा है और लोगों के विचारों की जटिलता से दूर है.

आज रात को खाने पर जन स्वास्थ्य अभियान के नये अंतर्राष्ट्रीय सभापति, मिस्र के डा. हानी से मिलना है.

5 मई 2006

रात को हानी का बहुत इंतज़ार किया पर वह नहीं आया, न ही उसका कोई टेलीफोन आया. मैंने टेलीफोन किया तो कोई उत्तर नहीं मिला. मुझे बहुत भूख लगी थी इसलिए साथ वाले शोपिंग माल में कुछ खाने के लिए गया तो भीड़ देख कर हैरान हो गया. मेला लगा था, हर तरफ लोग, सब रेस्टोरेंट लोगों से भरे थे, कहीं बैठने की जगह नहीं थी. बाहर सड़क पर कारों की लाईन लगी थी, जो पार्किंग की जगह ढ़ूँढ रही थी और सड़क पर चलना मुश्किल था. फ़िर समझ में आया कि यह सब सप्ताह अंत की भीड़ है, शुक्रवार छुट्टी का दिन जो है और 2 करोड़ की आबादी वाला कैरो छुट्टी का सोच कर इकट्ठा बाहर निकल आता है. शायद हानी भी इसी भीड़ में फँस गया था और इसीलिए मेरे मिस्री मित्रों ने मुझे को कल शाम को बाहर न जाने की सलाह दी थी.

आज दोपहर को इटली वापस जाना है. इस यात्रा के अंत में कैरो में बिताये दिनों के बारे में सोचूँ तो मुस्लिम जगत की क्या तस्वीर ले कर जा रहा हूँ? यह तस्वीर जटिल है. एक ओर लगता है कि धर्म आम जीवन में बहुत फैला हुआ है. औरतों के वस्त्र और उनका सिर से पाँव तक शरीर ढ़कने के बारे में तो पहले भी लिखा है, पर और भी निशान थे धर्म के आम जीवन में होने के. जैसे कि हमारी मीटिंग में बोलने से पहले बहुत से लोगों का अल्ला के नाम को ले कर या कुरान और मुहम्मद के नाम ले कर बोलना प्रारम्भ करना. यहाँ के विश्व स्वास्थ्य संस्थान के दफ्तर में टोयलेट में एक नीचा वाशबेसिन बना है जहाँ लोग दिन में नमाज पढ़ने से पहले हाथ और पाँव धोते हैं.

यह सब बातें और इस तरह धर्म की काम के दौरान इतना स्पष्ट रुप से दखलअंदाज़ी विश्व में कहीं किसी और धर्म के साथ नहीं देखी. दूसरी ओर कई मुस्लिम लोगों से बात करने में धर्म के इस तरह जीवन के हर पहलू पर तानाशाही के विरुद्ध विचार भी सुने.

सच कहूँ तो थोड़ा सा डर लगता है कि धर्म का जीवन के हर पहलू पर इस तरह का प्रमुख रुप हो. शायद यह मेरी धर्म के विषप में अपने विचार स्पष्ट न होने की वजह से है या इतने साल तक पश्चिम देश में रहने की वजह से है?

थोड़े से मिस्री पाऊँड बचे थे, और हवाई अड्डे जाने में अभी एक घँटा था, सोचा कि क्यों न कुछ खरीदा जाये. होटल के बाहर निकला तो नज़र मिस्री झँडे पर पड़ी. कुछ कुछ भारतीय झँडे से मिलता है हालाँकि उसमे हरे के बदले काला रँग है. सोचा तस्वीर खीचूँ और कैमरा निकाला तो तुरंत सुरक्षा वाला एक आदमी दोड़ा आया. बोला यहाँ कोई तस्वीर नहीं खींच सकते, झँडे की भी नहीं. यह तो है कि मिस्र में इतने बम फटते हैं कि पाँच सितारा होटल में सुरक्षा जाँच हर तरफ होती है. जब आया था तो उन्होंने सूटकेस को चेक किया था जैसे हवाई अड्डे पर करते हैं. आज कल आतंकवाद के दिनों में शायद इसके अलावा कोई चारा भी नहीं है. पर फिर घूमते हुए आगे बढ़ा तो होटल के पिछले गेट पर देखा कि सामान पहुँचाने वाली एक गाड़ी अंदर जा रही थी. वैसे तो उसकी आगे पीछे खूब जाँच की गयी, शीशे से उसके नीचे भी देखा गया कि कोई बम तो नहीं छुपा है, पर गाड़ी के अंदर ले जा रहे सामान की कुछ विषेश जाँच नहीं की गयी. यह तो अच्छा है कि मैं आतंकवादी नहीं, वरना मैंने भी होटल के अंदर कुछ भी सामान ले जाने का रास्ता देख लिया था.

कैरो हवाई अड्डे पर कुछ भारतीय महिलाओं का झुँड देखा. पासपोर्ट दिखाने की लाईन में उनके पीछे खड़ा था. उनकी आपस की बातों से पता चला कि वह भारत जा रहीं थीं. एक क्षण के लिए मन किया कि मैं इटली नहीं भारत वाले घर में जाऊँ. प्रवासी होने का अर्थ ही शायद यही है, हृदय का दो हिस्सों में बट जाना. एक हिस्सा वहीं रहता है जहाँ पले बड़े हुए, दूसरा वहाँ रहता है जहाँ अपना बेटा, पत्नि का परिवार है. कहीं भी रह लो, मन हमेशा अधूरा ही रहेगा अब. इसी तरह के विचार आ रहे थे, जब ख्याल आया कि दस दिनों में भारत से पुत्रवधु आने वाली है, और मन प्रसन्न हो गया. इस समय यह डायरी मिलान के हवाई अड्डे पर लिख रहा हूँ, अपनी बोलोनिया की उड़ान की प्रतीक्षा में.

6 मई 2006

यह यात्रा आखिर तक दिलचस्प रही. पहले बोले कि उड़ान एक घँटे की देरी के बाद चलेगी, फ़िर बोले कि उड़ान केंसिल हो गयी है, हमें बस द्वारा बोलोनिया ले जाया जायेगा. रात को घर पहुँचते पहुँचते एक बज चुका था. खैर देर आये, पर आये तो सही.

और एक खुशी यह कि अब दस पंद्रह दिनो तक कोई यात्रा नहीं और आज शाम को बोलोनिया कि सनातन परिषद द्वारा वैसाखी का त्योहार मनाया जा रहा है, वहाँ शायद कुछ अच्छा खाने को भी मिले!

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