तारों का शहर बिसाऊ ग्विनेया बिसाऊ और पुर्तगाल यात्रा की डायरी सुनील दीपक, 14 - 23 जून 2007

Guinea Bissau

14 जून 2007 लिसबन, पोर्तगाल

यात्रा का प्रारम्भ तो अच्छा हुआ है. जहाज में होस्टेस मुझे बुलाने आई और बोली कि मेरी सीट को अपग्रेड करके मुझे बिसजेस क्लास की सीट दी गयी है. यानि की भीड़ भाड़ में सीट पर तंग हो कर बैठने की बजाय मेरे पास टाँगे फैला कर बैठने की जगह थी और शायद खाना भी अधिक बढ़िया था. जहाज थोड़ी देर से चला पर मन में चिता नहीं थी. लिसबन पहुँच कर सामान ने आने में बहुत देरी की. करीब 45 मिनट तक सामान का इंतज़ार किया. जब बाहर निकला तो चार बजने वाले थे और मुझे मीटिंग में देरी हो रही थी पर बाहर टेक्सी लेने वालों की लम्बी लाईन लगी थी. लिसबन का मैट्रो हवाई अड्डे के करीब तो आती है पर हवाई अड्डे नहीं आती. जब तक टेक्सी मिली तो सोचा कि होटल जा कर सामान रखने की बजाय सीधा मीटिंग में जाया जाये.

Lisbon, Portugal

जब मीटिंग समाप्त हुई तो छहः बज रहे थे. टेक्सी ले कर होटल आया और सामान रख कर तुरंत निकल पड़ा कि कुछ देर के लिए लिसबन को देखा जाये. होटल के करीब ही काम्पो ग्राँदे नाम का मैट्रो स्टेशन है, वहाँ से मैट्रो ले कर काईस दो सोद्रे जो समुद्र तट के पास का मैट्रो स्टेशन है, वहाँ गया. मैट्रो का टिकट सस्ता है, केवल 1.35 यूरो में जाने और वापस आने का टिकट लगा. समुद्र तट के साथ साथ चलते चलते पहले तो भव्य "प्रासा दो कोमेर्सियो" की ओर गया. पिछली बार यहाँ लिसबन में करीब दस साल पहले आया था, कुछ कुछ याद था. शहर कुछ बदल गया लगता है, पहले से अधिक समृद्ध और विकसित लगता है.

फ़िर पहाड़ी पर चढ़ कर साँता मारिया माजोरे का बाहरी शताब्दी का गिरजाघर देखा और उसके पीछे से ऊपर जाती सड़क पर सन जोसे किले तक गया. वहाँ से समुद्र तट और नीचे फैले लिसबन शहर का अच्छा दृष्य दिखता है. जब तक नीचे आया रात के नौ बजने वाले थे. शहर के पुराने संकरी गलियों वाले भाग से होते हुए रोसिनी स्टेशन पर आ कर वापस होटल जाने की लिए मैट्रो पकड़ी.

Lisbon, Portugal

इस सुंदर शहर की भव्यता दूर दूर के देशों तक फैले पोर्तगाली साम्राज्य और गुलामों के व्यापार से आई है. तीमूर एस्ट, मकाऊ, गोवा, मोजामबीक, ग्वीनेया बिसाऊ, काबो वेरदे, ब्राजील जैसे देश पोर्तगाली साम्राज्य का हिस्सा थे. आश्चर्य इस लिए होता है कि पोर्तगाल छोटा सा देश है जिसकी छोटी सी जनसँख्या है, पर उसमें दूर दूर के देशों को दबाने की ताकत थी, शायद इस लिए भी क्योंकि तकनीकी पिछड़ेपन के साथ साथ सभी देश छोटे छोटे गुटों के आपस के झगड़ों में लगे थे.

Lisbon, Portugal

मैट्रो में भारत में पंजाब से आये वृद्ध सिख श्री गुरदयाल सिंह से मुलाकात हुई. बोले की वह यहाँ नौ साल से रह रहे हैं, इससे पहले जर्मनी, ग्रीस, फ्राँस, इटली आदि बहुत देशों में किस्मत आज़मा चुके हैं. गहरे नीले रंग की पगड़ी और बिलकुल सफेद दाड़ी वाले गुरदयाल जी का बात करने का तरीका बहुत मीठा था. गैरकानूनी तरीके से आ कर अपराधियों की तरह छुप छुप कर रहना, और रोजी रोटी के लिए भटकना ही उनकी कहानी थी. आज हालाँकि वह यहाँ कानूनी तरीके से रह रहें हैं पर परिवार साथ नहीं रख सकते. वह यहाँ अकेले रहते हैं, एक बेटा इटली में ब्रेशिया नाम के शहर में रहता है, बाकि सारा परिवार भारत में, जिन्हे देखने वह नहीं जा सकते क्योंकि जायें तो यहाँ वापस नहीं आने देंगे.

रात को होटल के कमरे में सोने से पहले थोड़ी देर तक टेलीविजन पर एलजज़ीरा की नयी अँग्रेज़ी चैनल को देख रहा हूँ. लंदन से प्रसारित होने वाली यह मिडिल ईस्ट की चैनल सीएनएन या बीबीसी से अधिक विश्वासनीय लगती है.

16 जून 2007, बिसाऊ

कल का सारा दिन तो यात्रा में निकल गया. सुबह सात बजे लिसबन में होटल से निकला था हवाईअड्डे जाने के लिए. वहाँ पहुँच कर पाया की बिसाऊ जाने वाले जहाज की लम्बी लाईन थी तो आगे खड़े सभी यात्री सामान से लदे थे. सबके पास चार पाँच बड़े बड़े सूटकेस, छोटे मोटे बैग, और टीवी रेडियो जैसे अलग अलग उपकरणों के डिब्बे थे. इस तरह का दृष्य पहले भारत जाते हुए दिखते थे पर अब तो भारत में सब कुछ मिलता है इसलिए अब भारत जाते हुए इस तरह का दृष्य नहीं दिखते.

लाईन में लगा ही था कि एक अफ्रीकी युवक पास आया और पूछने लगा कि क्या मैं उसका सामान ले जाने में मदद कर सकता हूँ, क्योंकि उसका सामान ज्यादा है और मेरे पास सिर्फ एक अटैची ही है. साफ़ साफ़ न करने में मुझे झिझक हो रही थी कि उसे जानता नहीं, किसी और का सामान अपने नाम से ले जाना मुझे ठीक नहीं लगता. उसने मेरी झिझक को समझ कर ज़ोर डालना शुरु कर दिया और बोला कि वह अपना सामान ले कर आ रहा है. उससे पहले की वह वापस आता एक अन्य अफ्रीकी युवक अपना एक बैग मुझे देने की कोशिश करने लगा. इस बार मैंने साफ़ मना कर दिया. इससे पहले कि पहले वाला युवक वापस आता, मेरे चैकइन की बारी आ गयी.

जहाज़ पर चढ़ने का समय आया तो हैरानी हुई कि कुछ धक्का मुक्की नहीं थी, सब लोग अपनी सीटों पर आराम से बैठे थे. बाद में समझ में आया कि यह जहाज़ आराम से चढ़ने वालों का था मानों किसी को उसकी यात्रा की जल्दी नहीं थी. सुबह 9.50 का समय था जहाज़ के चलने का और मैं 9.15 पर जहाज़ में पहुँच चुका था, पर बाकी यात्री 11 बजे तक धीरे धीरे आते रहे, और जहाज़ 11.30 पर चला.

बिसाऊ पहुँचे तो बहुत गर्मी थी. हवाई अड्डा बाहर से वैसा ही लगा जैसे कि ग्यारह साल पहले जब आखिरी बार यहाँ आया तो देखा था, बस दीवारों पर रँग नया लगता था. आगमन कक्ष में सभी खिड़कियों पर शीशे टूटे हुए थे जो शायद 1999 और 2002 के बीच में हुए गुह युद्ध की निशानियाँ थीं, क्योंकि तब सुना था कि हवाईअड्डे पर बहुत जम कर लड़ाई हुई थी. सामान आने में बहुत देर लगी हालाँकि उस समय कोई अन्य उड़ान नहीं थी. बिसाऊ हवाईअड्डे पर दिन में बस एक उड़ान आती है, हर रोज, पड़ौसी देश सेनेगल की राजधानी डकार से. उसके अतिरिक्त, केवल शुक्रवार को लिसबन से यह अकेली यूरोपीय उड़ान आती है. एक घँटे के बाद सामान धीरे धीरे आना शुरु हुआ. तब तक दफ्तर से मुझे लेने आने वाला ड्राईवर अंदर आ चुका था और मेरे साथ ही इंतजार कर रहा था. बाहर निकलने में दो घँटे लग गये.

बिसाऊ में हवाईअड्डे से सीधी शहर के बीचोंबीच आने वाली बस एक मुख्य सड़क है. हवाईअड्डा शहर के करीब पाँच किलोमीटर दूर है. उस रास्ते पर बाहर देखता हुआ मैं पुराने जाने पहचाने शहर को खोज रहा था.

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वह घर जहाँ 1988 में ठहरा था, अब वह खँडहर था.

पुराना अस्पताल जहाँ गंदगी, भूख और गरीबी से घिरे बीमार मरीजों की छवि को कभी भुला नहीं पाया था, तब वह राजयक्ष्मा और मानसिक रोगों का अस्पताल था. अब वह भी खँडहर था, ड्राईवर बोला कि अब वहाँ कोई मरीज नहीं हैं.

वह नया अस्पताल जो मेरे सामने ही बना था, वहाँ विदेशी सहायता आती है और धूप में वह साफ सुथरा चमक रहा था.

वह शेरेटन होटल जहाँ एक बार रुका था और रात को नींद खुली थी तो समझ नहीं पाया था कि किस देश में हूँ. उन दिनों बहुत यात्रा करनी पड़ीं थी, एक देश से आता और दूसरे देश चल पड़ता था. अंत में मुझे उठ कर होटल का कागज देखना पड़ा था देश का नाम पहचानने के लिए. अब उसका नाम लिबिया होटल हो गया था.

आसपास सड़क पर लगता था मानो कुछ नहीं बदला हो. वही भीड़, वही पैदल चलते लोग, वही ठसाठस भरी हुईं पुरानी खँडहर जैसी बसें, वही छोटी छोटी दुकानों में कुछ सामान लिए बैठीं औरतें, वही पुरानी गाड़ियों की टैक्सियाँ. हाँ सड़क के किनारे कुछ नये बड़े घर दिख रहे थे. रास्ते में सड़क के किनारे बना संसद भवन साफ सुथरा था मानो मरम्मत के साथ नया रँग दिया गया हो. जहाँ मुख्य सड़क समाप्त होती वहीं गोलचक्कर पर राष्ट्रपति का घर होता था, वह भी सुनसान सा लग रहा था और भवन पर गोले बारूद के निशान स्पष्ट दिख रहे थे. वहीं पास में लोबातो होटल में ठहरा हूँ.

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होटल पहुँचा तो तुरंत यक्ष्मा प्रोग्राम के डा. विक्टर मिलने आये. उनसे अपने प्रोग्राम के बारे में कुछ बात की, हाथ मुँह धोया और तुरंत स्वास्थ्य मँत्रालय में विक्टर के साथ डायरक्टर से मिलने गया. वैसे ही मेरी पुर्तगाली भाषा की समझ बहुत अच्छी नहीं है, हालाँकि पढ़ने में सब समझ लेता हूँ, पर यहाँ का बोलने का तरीका कुछ भिन्न है इसलिए बहुत ध्यान से सुनना पड़ता है. सारे दिन की यात्रा की थकान के बाद आधे घँटे की बातचीत ने मेरी बचीखुची शक्ति भी समाप्त कर दी. मँत्रालय, जो कि एक पुराना गिरता हुआ पुर्तगाली समय का भवन है जिसे मरम्मत और पुताई की बहुत आवश्यकता है, से बाहर निकले तो मैंने विक्टर से कहा कि तुरंत खाना खा कर होटल में जा कर आराम करना चाहता हूँ.

"पहले थोड़ी सी बियर पीते हैं", विक्टर बोला, "उससे रिलेक्स हो जाओगे." मालूम है मुझे कि विक्टर को थोड़ी सी मासिक पगार मिलती है और बाहर बियर पीना उसके लिए आसान बात नहीं है. रूस में मेडिकल कोलिज में पढ़ा है और रूसी के साथ साथ पुर्तगाली, फ्राँसिसी, इतालवी और अँग्रेजी अच्छी बोल लेता है. बहुत देशों में घूमा है. अगर चाहता तो विदेश जा कर बहुत अच्छा कमा लेता, पर वह कहता है कि अगर वह भी चला जायेगा तो यहाँ कोई यक्ष्मा स्पैशलिस्ट नहीं बचेगा. साधारण घर में रहता है जहाँ बिजली भी नहीं है. बीस साल से जानता हूँ उसे.

बीयर के साथ देर तक बातें करते रहे हम. उसके परिवार के बारे में, उसकी नयी पत्नी के बारे में जिससे उसके तीन बेटे हैं. ग्विनेया बिसाऊ के बारे में, राजनीति के बारे में, गृहयुद्ध के बारे में, शहर में पानी बिजली की कमी के बारे में, आदर्शों के साथ जीना कितना कठिन होता है इसके बारे में, उन सब लोगों के बारे में जो पहले यहाँ काम करते थे, कौन कहाँ गया, किसका क्या हुआ, यक्ष्मा और कुष्ठ रोग के प्रोग्राम के बारे में.

रात को होटल में वापस आया तो इतना थका कि कपड़े उतार कर ठीक से तय भी नहीं किये, वैसे ही कुर्सी पर छोड़ कर बिस्तर में घुस गया और नींद आने में देर नहीं लगी.

17 जून 2007, बिसाऊ

बिसाऊ तारों का शहर है. रात को सारा आसमान तारों से इस तरह भर जाता है मानो थाली में मोती बिखरे हों. इस तरह का आसमान देखने की आदत ही नहीं रही. बचपन में होता था इस तरह का आसमान. आजकल यूरोप में तो कहीं से आसमान में इतने तारे नहीं दिखते क्योंकि रात को हर तरफ इतनी बिजली की रोशनी रहती है कि उसकी चमक के सामने अधिकतर तारे छुप जाते हैं. बिसाऊ में यह दिक्कत नहीं होती, देश की राजधानी है पर यहाँ बिजली नहीं है. होटल आदि में जहाँ लोग विदेशी मुद्रा में बिल भरते हें, जेनेरेटर लगे हैं और सब सुख हैं. पर सड़कों पर रात को एक भी बत्ती नहीं जलती. घरों में भी सब घरों में बिजली नहीं अगर हो भी, तो भी अधिकतर समय बिजली काम नहीं करती और बिना जेनेरेटर वाले घरों में मिट्टी के तेल की लालटेन ही जलती हैं.

परसों रात को थकान और बियर की वजह से बाहर ध्यान से नहीं देखा था पर कल रात को वापस होटल आ रहे थे तो लगा कि कितना अँधेरा हो सकता है दुनिया में. गाड़ी की हेडलाईट में हर तरफ लोग दिखते थे, अँधेरे में टहलते, आपस में बातें करते, बाँहों में बाँहें डाले, बैंच पर बैठे. विक्टर कहता है कि गृहयुद्ध से पहले देश ने कुछ तरक्की की थी पर इस लड़ाई ने सब कुछ नष्ट कर दिया. युद्ध के बाद लड़ने वाले दो गुटों ने मिल कर सरकार बनाई है पर कोई सरकार अधिक दिन नहीं चलती और कुछ कुछ महीनों में सब मँत्री आदि बदल जाते हें.

कोई उद्योग नहीं हैं. देश का सबसे बड़ा उत्पादन है काजू और मछलियाँ. दक्षिण में कुछ बाक्साईट के खाने हैं. काजू का व्यापार भारतीय मूल के लोगों के हाथ में है. पिछले कुछ वर्षों में बाकि अफ्रीका से यहाँ भारतीय मूल के लोग आये हैं और उन्होने दुकाने खोली हैं. चीनी लोग कम ही हैं. विक्टर कहता है कि भारतीय मूल के लोगों के प्रति आम लोगों मे कुछ रोष है, क्योंकि यूरोपीय लोगों की तरह से वह भी यहाँ सिर्फ पैसा कमाने आये हैं, यहाँ के लोगों से मिलते जुलते नहीं और आपस में ही मिल कर अलग से रहते हैं. पिछले कुछ सालों में यहाँ भारतीय फिल्मों की डिवीडी भी बहुत चल पड़ी हैं.

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कल सुबह मैं विक्टर और डा. मिगेल के साथ कशेओ प्राँत गया था. डा. मिगेल को भी बहुत सालों से जानता हूँ वह आजकल यहाँ के राष्ट्रीय यक्ष्मा और कुष्ठ रोग प्रोग्राम के प्रमुख अधिकारी हैं. पहले हम लोग पलुँडो गाँव गये. वहाँ जाने का रास्ता नया बना है, बस बीच में थोड़ी सी सड़क का हिस्सा है जो पूरा नहीं हुआ है इसलिए उस हिस्से पर अभी भी कच्ची सड़क है. यह सड़क विश्व बैंक और यूरोप सरकार की मदद से बनी है और मनसोआ नदी पर नया पुल भी बना है. पहले तो मनसोआ नदी पर नाव का इंतज़ार करना पड़ता था और उसी में तीन घँटे लग जाते थे पर कल हमने सारा रास्ता करीब दो घँटों में पूरा कर लिया.

पलुँडो में कुष्ठ रोग के मरीजों की खोज का विषेश प्रोग्राम चल रहा है उसी को देखने गये थे. गाँव पहुँच कर मालूम चला कि उसी सुबह वहाँ एक वृद्ध महिला की मृत्यु हुई है इसलिए सबसे पहले काम था उस घर में जा कर परिवार से शोक करना. विक्टर उसी इलाके का है और उस गाँव में उसके कुछ रिश्तेदार भी हैं. मृत के घर के बाहर भीड़ लगी थी, औरतें एक तरफ और पुरष दूसरी तरफ, बाहर बैठे आपस में बात कर रहे थे. वहाँ गाँव के प्रधान से भी मिले.

फ़िर गाँव के प्राईमरी स्कूल में गये जहाँ गाँव के लोग और स्वास्थ्य कर्मचारी जमा थे. वहाँ डा. मारटीनियो भी थे जो कुष्ठ रोग विषेशज्ञ हैं और जिन्हें कई सालों से जानता हूँ. उनके साथ जितने कुष्ठ रोगी थे, उनकी जाँच की. मेरा काम था देखना कि रोग की जाँच और उपचार ठीक से होता है या नहीं, और साथ ही स्वास्थ्य कर्मचारियों की रोग की जानकारी को जाँचना. देख कर अच्छा लगा कि डा. मारटीनियो ने अपना काम अच्छी तरह किया था, और सभी रोगियों के कागज भी ठीक से बनाये गये थे. फ़िर सारे स्वास्थ्य सँबंधी रजिस्टर देखे. सब काम में तीन घँटे लग गये.

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वहाँ से काम समाप्त हुआ तो गाड़ी ले कर कनचुँगो अस्पताल गये. चीन की सरकार का नया सहायता प्रोग्राम है जिससे सारा अस्पताल ठीक किया जा रहा है. वहाँ भी पलुँडो की तरह मरीजों की जाँच की और स्वास्थ्य कर्मचारियों से देर तक बात की. जब वापस चलने का समय हुआ तो मैंने कहा कि स्वास्थ्य कर्मचारियों के घर देखना चाहता हूँ. मन में था वह घर देखना जहाँ सतरह साल पहले एक बार ठहरा था. तब मेरा एक इतालवी मित्र फ्राँचेस्को वहाँ का स्वास्थ्य अधिकारी था और मैं उसके घर पर एक रात रुका था. उन दिनों अस्पताल और घरों के बीच केवल खेत थे, इस बार सारा रास्ता घरों और दुकानों से भरा था. जगह बिल्कुल भिन्न लग रही थी. बस एक आम का पेड़ अपनी जगह पर था जहाँ से पिछली बार मैंने तोड़ कर आम खाये थे. उस समय फ्राँचेस्को की बहुत याद आई. दो वर्ष पहले हड्डी के कैंसर से फ्राँचेस्को की मृत्यु हो गयी थी.

वापस बिसाऊ आते आते शाम हो गयी थी. रात का खाना दफ्तर के सब लोगों के साथ था. सब लोग वही थे जिन्हें पिछले बहुत सालों से जानता था बस सिलविया, यहाँ की एकाऊँटस अफिसर और लीमा, ड्राईवर नये थे. विक्टर ने कहा कि खाना जिस रेस्टोरेंट में है वहा का मालिक भी भारतीय मूल का है. गानी नाम है उसका और मोजाम्बीस से आया है. जब गानी से मिले तो देखा कि उसके घुँघराले बाल और चेहरा भारतीय और अफ्रीकी दोनो का मिश्रण था. कुछ बातचीत हुई तो बोला कि उसकी माँ पाकिस्तान से थी पर उसे उर्दू नहीं आती और न ही उसका भारत या पाकिस्तान में रिश्तेदारों से कोई सम्बँध है. उसके बोलने के तरीके से लगा कि उसके मन में अपने परिवार की कहानी को ले कर कुछ कड़वापन है. सोचा कि शायद उसके पाकिस्तानी रिश्तेदारों ने उसकी माँ का अफ्रीकी से विवाह करना स्वीकार नहीं किया था. पर यह विचार मैंने अपने मन में ही रखे, वहाँ उससे और बात करने का मौका नहीं था. कितनी कहानियाँ हैं हमारे आसपास, लोगों के जीवन, हर जीवन की अपनी कहानी, अपने दुख, अपने रिश्ते.

खाने के दौरान सिलविया मेरे सामने बैठी थी. वह रोमानिया से हैं. उसका पति ग्विनिया का इंजीनियर है, जो रोमानिया में पढ़ रहा था. शादी के बाद से 1985 में वह लोग यहाँ वापस आये और तब से वह यहीं रहते हैं.

ग्विनेया के रहने वाले अफ्रीकी लोग विभिन्न जनजातियों के हैं, हर एक की अपनी भाषा है. वह लोग आपस में क्रियोल बोलते हैं जबकि सरकारी भाषा है पुर्तगाली. गाँवों में लोग अधिकतर केवल अपनी भाषा और कुछ कुछ क्रियोल ही जानते हैं. करीब दस लाख की जनसँख्या में 18 जनजातियाँ हैं जिनमे से 9 प्रमुख हैं. खाना खाते समय हमारे गुट में पाँच विभिन्न जनजातियों के लोग थे. विक्टर मनजाँको है, लीमा पेपल है, मिगेल नीलू है, मारटीनियो बेलुँडा और याईया याफुल्लो जनजाती का है. मनजाँको और पेपल आपस में मिलती हैं पर वह लोग मिगेल, मारटीनियो और याईया की भाषा नहीं समझ सकते.

आज का दिन खाली है. सोचा था कि सुबह इंटरनेट से ईमेल देखूँगा पर मालूम चला कि यहाँ होटल में ईमेल नहीं है और करीब की इंटरनेट कैफे का पता मेरी समझ में नहीं आया, यहाँ की सड़कों आदि के नाम जो नहीं मालूम. दोपहर को खाने पर मुझे शहर से थोड़ी दूर कुमूरा के कुष्ठ रोग के केंद्र के पास रहने वाले इतालवी फ्राँसिसकन पादरियों के यहाँ खाने पर जाना है. पहले वहाँ भी मेरे कई मित्र थे पर अब वह सब पुराने लोग कहीं और चले गये हैं और सब नये लोग हें जिनमें से किसी को नहीं जानता.

18 जून 2007, बिसाऊ

आज तबियत कुछ ठीक नहीं है. रात को एक बजे नींद खुली, पेट दर्द हो रहा था. थोड़ी देर बाद उल्टी आयी और पेट खराब हो गया. यहाँ के पानी का कुछ भरोसा नहीं और जितना भी ख्याल रखो कुछ न कुछ तो हो ही जाता है. शायद कल रात को जहाँ खाना खाया था वहाँ सफाई अच्छी नहीं थी!

पेट में अभी भी थोड़ा थोड़ा दर्द है पर आज बिस्तर में लेटने का दिन नहीं है. रोज़ की तरह, आज भी नींद सुबह पाँच बजे ही खुल गयी. इस शरीर की आदतों को बदलना आसान नहीं. रात को कम सोया, सुबह कुछ देर और सो लेता तो अच्छा था, मालूम है कि सारा दिन फ़िर नींद आती रहेगी, पर शरीर के भीतर जो घड़ी है वह तर्क नहीं सुनती. कुछ देर बिस्तर में करवटे लेने के बाद उठ गया, सोचा कि डायरी में कुछ जोड़ दिया जाये.

यहाँ की बत्ती फ़िर सुबह चली गयी और तब से जेनेरेटर ही चल रहा है, पर मेरे जैसे पैसे दे सकने वाले आगंतुकों के अलावा यहाँ रहने वाले किस तरह आधा समय बिना बिजली के जीते हैं, यह बात मन में आ रही थी. टेलीविजन पर एक ही अग्रेजी चैनल है, सीएनएन जिससे मुझे अधिक लगाव नहीं है, पर दुनिया में क्या हो रहा इसे मालूम करने के लिए उसे देखने की कोशिश कई बार की पर हर बार टीवी पर आता है "यह सिगनल इस समय उपलब्ध नहीं है, बाद में कोशिश कीजिये". "सीएनएन क्यों नहीं आ रहा, यह चीज़ ठीक काम क्यों नहीं कर रही, ड्राईवर ठीक समय पर क्यों नहीं आया", जैसे अपने विचारों से थोड़ी सी शर्म आती है कि यहाँ एक कमरे का जितना किराया एक दिन का देता हूँ, वह यहाँ बहुत से रहने वालों की दो महीने की पगार है. इस होटल में रहने वाले सभी विदेशी हैं, चाहे उनकी चमड़ी गोरी हो या भूरी या काली. सबको लेने गाड़ियाँ आती हैं, सब काले बैग सम्भाले इधर उधर मीटिंगों में व्यस्त हैं.

पर जैसे यहाँ के लोग रहते हैं वैसे रहना पड़े तो दो दिनों में ही मेरी छुट्टी हो जाये. कल शाम को बाहर इंटरनेट की दुकान खोजते हुए कुछ चलना पड़ा था तो थोड़ी देर में ही गरमी से बाजे बज गये थे. वहाँ अपनी ईमेल देख कर वापस आया तो सारा शरीर पसीने से नहाया था और कमरे में आ कर निढ़ाल हो कर बिस्तर पर लेट गया था.

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कल अधिकतर समय कमरे में ही बीता. सुबह पुरानी रिपोर्ट पढ़ने, किस बीमारी के साल में कितने मरीज बढ़े या घटे और क्यों, कितने लोगों की ट्रेनिंग हुई, कितने लोगों की ट्रेनिंग रहती है, ट्रेनिंग में क्या पढ़ाया गया, किसने पढ़ाया, गाँव में काम करने वाले स्वास्थ्य कर्मचारियों के काम के सुपरविजन किसने किये और कैसे किये, इत्यादि सब बातों के नोटस बनाये क्योंकि यह सब बातें इस सप्ताह में मुझे समझनी है.

दोपहर को खाने के लिए कुमूरा गये. विक्टर और मारटीनियो भी मेरे साथ थे. वहाँ फादर एरनेस्तो और सिस्टर वालेरिया को बहुत पहले से जानता था, उनसे पुराने दिनों की, पुराने लोगों की बहुत बातें हुईं. खाना खाने के बाद फ़िर वापस होटल में कमरे में आ गया. दोपहर को कम्पयूटर पर दो डीवीडी देखीं, हिंदी की "तारा रम पम" और अँग्रेजी की "द पेंटिड वेल". तारा रम पम बहुत नकली सी थी पर अँग्रेजी की फ़िल्म बहुत अच्छी लगी, 1920 में चीन में एक अँग्रेजी डाक्टर और उसकी पत्नी की कहानी थी.

शाम को कुछ दूर पर एक इंटरनेट केफे देखा था वहाँ ईमेल देखने गया. गर्मी और उमस से बुरा हाल था और इंटरनेट भी ठीक से काम नहीं कर रहा था. वहीं एक रेस्टोरेंट में खाना खाया और वापस कमरे में आया तो पसीने से तर, थका हुआ था. तभी से तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही थी और रात को और भी बिगड़ गयी.

21 जून 2007, बिसाऊ

दिन तेजी से भाग रहे हैं, वापस डायरी लिखने का समय नहीं मिला. अभी तक तबियत पूरी ठीक नहीं हुई है, हालाँकि पहले दिनों जैसा बुरा हाल नहीं है. चाहे तबियत कैसी भी हो, काम को तो नहीं रोका जा सकता.

कल उस अस्पताल में गये जिसके बनने पर 15 साल पहले मैं उसका निरीक्षण करने आया था. वहाँ भी पुराने कई लोग मिले जिन्हें जानता था. आजकल वह अस्पताल एक इतालवी संस्था चला रही है. सुंदर हरी घास वाला बाग, सब कुछ साफ़ सुथरा, अंदर सब इस तरह का मानों आप यूरोप के किसी अस्पताल में हों. यहाँ सरकार के पास मँत्रालय में भी बिजली चलाने के लिए जेनेरेटर के पैसे नहीं, वहाँ हर तरफ़ एयरकँडीशनर चल रहे थे. यह सब विदेशी पैसे की ताकत है. हालाँकि यह अस्पताल यहाँ के यक्ष्मा और एडस रोगियों का मुफ्त इलाज करता है और पैसे कमाने के लिए नहीं बना है, फ़िर भी सामान्य जीवन के स्तर और उस अस्पताल के स्तर को देख कर अच्छा नहीं लगा. थोड़ी देर पहले ही पूरे शहर के स्वास्थ्य निर्देशक से मिल कर आया था जो अपने दफ्तर के बाहर बैठी इंतज़ार कर रही थी कि कब बिजली लौटे क्योंकि अंदर दफ्तर तंदूर जैसा तप रहा था. पास में ही विश्व अन्न प्रोग्राम से मुफ्त अनाज पाने वाले गरीबों की भीड़ लगी थी.

फ़िर एक विकलाँग पुनर्स्थान कार्यक्रम को देखने गये. उनका भी बुरा हाल था. वहाँ काम करने वाले एक युवक ने दीवार पर लगे युनिसेफ के पोस्टर की ओर इशारा किया, बोला, "देखिये युनिसेफ के इस पोस्टर को, जिस बच्ची की तस्वीर लगी है वह बाहर बैठा है. उनका फोटोग्राफर आया और तस्वीर खींच कर ले गया. उसका पोस्टर बनवाया है, पर हमें और उस बच्ची को क्या मिला? वह बच्ची अभी भी उसी हाल में है." तस्वीर छोटी सी लड़की की थी जिसकी एक टाँग माईन बम्ब से कट गयी थी. वह बच्ची जो कुछ बड़ी हो गयी थी, बाहर बैठी थी अपने पिता के साथ.

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क्या भविष्य है ग्विनेया बिसाऊ का, मैंने प्रोफेसर फेरनानदो देलफिन देसिल्वा से पूछा जो इतिहास और दर्शनशास्त्र पढ़ाते हैं. वह बोले सबसे बड़ी कमी है सोचने वाले दिमागों की. जो बचे खुचे लोग थे वह गृह युद्ध के दौरान देश से भाग गये. राजनेतिक नेता हैं, उन्हें लड़ने से फुरसत नहीं, हर छह महीने में सरकार बदल जाती है. सारा देश केवल काजू के उत्पादन पर जीता है पर काजू का मूल्य घटता बढ़ता रहता है. पिछला साल बहुत बुरा निकला, यह साल भी बुरा ही जा रहा है. पैसा कमाते हैं भारतीय व्यापारी, जो सस्ता खरीद कर भारत ले जाते हैं और वहाँ तैयार करके उसे उत्तरी अमरीका में बेचते हैं.

भारतीय व्यापारियों के लिए यह कड़वापन अन्य कई अफ्रीकी देशों में भी देखा है जहाँ भारतीयों को शोषण और भेदभाव करने वाले लोगों की तरह से ही देखा जाता है. भारत के बारे में अच्छा बोलने वाले केवल यक्ष्मा अस्पताल के एक डाक्टर थे जो बोले कि भारत से अच्छी और सस्ती दवाईयाँ मिल जाती हैं वरना मल्टीनेशनल कम्पनियों की दवाईयाँ तो यहाँ कोई नहीं खरीद सकता. यहाँ एड्स की दवा भारत की सिपला कम्पनी द्वारा बनाई गयी ही मिलती हैं.

कल शाम को टीवी खोला तो ब्राजील का टेलीविजन आ रहा था. ब्राज़ील में भी पुर्तगाली ही बोलते हैं. बहुत अजीब लगता है ब्राज़ील का टीवी देखना. लगता है कि जैसे वह गोरों का देश हो, सब समाचार पढ़ने वाले, बात करने वाले, सब गोरे ही होते हैं, हालाँकि गोरो की संख्या ब्राज़ील में 15 प्रतिशत ही है. सोच रहा था कि भेदभाव में भारत भी किसी से कम नहीं, क्या हमारे टेलीविजन को देख कर भी कोई लोग यही भेदभाव पाते हैं? हमारे फ़िल्मी सितारे तो अधिकतर गोरे ही होते हैं पर क्या हमारा टेलीविजन भी जातपात के भेदभाव पर बना है?

यहाँ की यात्रा अब अपने अंतिम चरण पर है. आज स्वास्थ्य मँत्री से मेरी मुलाकात है. फ़िर सारा दिन कुष्ठ, यक्षमा और एड्स रोगियों के अस्पताल में गुज़रेगा. कल तो वापस ही जाना है.

22 जून 2007, बिसाऊ

आज वापास जाना है. दिन में कुछ मीटिंग भी हैं. सामान भी बाँधना है. कल सारा दिन बाहर रहा, रात को थका था जल्दी ही सो गया. क्या ले कर जाऊँगा ग्विनेया बिसाऊ से? बहुत सोचा कुछ समझ नहीं आया, तो अंत में कुछ आम खरीदे हैं और कुछ काजू.

आने से पहले मन में छवि थी ग्विनेया बिसाऊ की जो पिछली यात्राओं के अनुभवों से बनी थी जिसमें बहुत सारे मित्रों के चेहरे थे. उनमें से बहुत से चेहरे इस बार नहीं मिले, पर यहाँ के डाक्टरों, नर्सों और अन्य कर्मचारियों की अच्छी यादें ले कर जाऊँगा जो इतनी कठिनाईयों में और इतने कम पैसे के बावजूद गरीबों के बीच काम कर रहे हैं. कहते हैं कि स्वास्थ्य कर्मचारी हड़ताल करने वाले हैं, पाँच महीनों से तनखाह जो नहीं मिली. बिजली पानी न होने ही की याद भी साथ रहेगी. और घने काजुओं के जँगल सड़क के दोनो ओर.

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कल कुमुरा अस्पताल में देखे तीन बच्चे भी याद रहेंगे. बिनता सात साल की कुष्ठ रोगी है, रोगेओ ग्यारह साल की उसकी हड्डी में टीबी है और चार साल का गोलमटोल अलेगो जिसे मृत माँ से विरासत में एड्स मिली है और जो खेलने की जिद कर रहा था.

23 जून 2007, लिसबन

कल चलने लगे तो अचानक विक्टर ने बताया कि उसकी बड़ी बहन भी मेरे जहाज में ही अपने बेटे के पास लिसबन जा रही थी. अमी नाम है उसका. केवल अपनी जन जाति की स्थानीय भाषा बोलती है, आम बोलने वाली क्रियोल या पुर्गाली उसे नहीं आती. पर तबियत ठीक नहीं उसकी. बोला कि उन्हीं की जनजाति के कुछ लोग जो उस उड़ान से जा रहे हैं, उन्हें भी अमी का ध्यान रखने के लिए कहा है, पर अगर मैं भी जरुरत पड़ने पर उसका ध्यान रखूँ. हाँ तो कह दिया पर सोच रहा था कि भाषा न समझ पाने कुछ मदद नहीं कर पाऊँगा.

एक बार हवाईअड्डे में घुसे तो अमी ने मेरा हाथ पकड़ लिया. शायद साथ जाने वाले जिन लोगों से विक्टर ने उसे मिलवाया था, उनमे से उसे मैं अधिक विश्वासनीय लगा था. कारण कुछ भी हो, अमी ने मेरा साथ नहीं छोड़ा, उसकी अपनी भाषा बोलने वालों की तरफ़ आँख उठा कर भी नहीं देखा.

जब जहाज पर चढ़ने लगे तो मुझे समझ आया कि उसके कूल्हे में दर्द था और वह सीढ़ियाँ नहीं चढ़ पा रही थी. किसी तरह जहाज के अंदर पहुँचे तो मैंने तुरंत एयरहोस्टेस से बात की कि लिसबन पहुँच कर उसके लिए व्हीलचेयर मिल जाये. एयरहोस्टेस मेरी कठिनाई समझ गयी कि मैं अमी से बात नहीं कर पाता हूँ और उसने सब इंतजाम करवा दिये. लिसबन पहुँच कर बिल्कुल कुछ कठिनाई नहीं हुई. जब बाहर निकले तो अमी का बेटा उसका इंतजार कर रहा था. जाते समय अमी गले लग कर मिली मानो पुराना रिश्ता हो.

बस यात्रा अब तो पूरी ही हुई समझो. बस बोलोनिया की उड़ान लेनी है.

Guinea Bissau

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