नदियों के देश गुयाना की यात्रा सुनील दीपक, 23 अक्टूबर से 7 नवम्बर 2006

23 अक्टूबर 2006, ब्रिजटाऊन हवाईअड्डा

सुबह 5 बजे से यह यात्रा शुरु हुई और अब करीब 17 घँटों के बाद बारबेडोस के ब्रिजटाऊन के हवाई अड्डे पर आज की अपनी अंतिम उड़ान का इंतज़ार कर रहा हूँ. यह यात्रा ब्रिटिश एयरवेस के साथ हो रही है. कोशिश तो बहुत की, कि किसी अन्य एयरलाईन से बात बन जाये पर अंत में हार कर ब्रिटिश एयरवेस पर ही आना पड़ा. यात्रा के अन्य सभी विकल्प, वेनेयुएला की राजधानी काराकास द्वारा या सुरीनाम द्वारा, बहुत अधिक मँहगे भी थे और यात्रा और भी लम्बी होती.

कुछ महीने पहले, जब से ब्रिटिश एयरवेस पर बम फटने का प्लान बनाने वाले लोग पकड़े गये जो किसी द्वय जैसे विस्फोटक पदार्थ को शीशी में ले जाने की सोच रहे थे, तब से यह लोग यात्रा में कुछ भी द्वय नहीं ले जाने देते, दाँत साफ़ करने के लिए टूथपेस्ट तक नहीं. यह सब सुन कर और उनके सुरक्षा सम्बंधी झँझटों के बारे में जान कर, ब्रिटिश एयरवेस से यात्रा करने का मन तो नहीं था पर क्या करता. सुबह लंदन गेटविक हवाई अड्डे पर पहुँचा तो पहले तो खूब जबरदस्त सुरक्षा जाँच हुई जिसमें जूते तक उतार के देखे गये. अंदर पहुँचा तो थोड़ी देर के बाद ही अलार्म बजने लगे, कहने लगे कि आग लगने का खतरा है, सब लोगों को बाहर निकलना होगा. हवाई अड्डे के बाहर निकाला और फ़िर अंदर आने के लिए दोबारा बहुत देर तक लाईन में खड़ा होना पड़ा और एक बार दोबारा सुरक्षा जाँच करवानी पड़ी. तीन घँटों का समय था लंदन में जहाज बदलने का, सारा इसी तरह भागा भागी में निकल गया. जो मन में ब्रिटिश एयरवेस से यात्रा करने की चिंताएँ थीं, सारी सच साबित हुईं.

खैर अब तो यात्रा के अंतिम चरण पर आ पहुँचे हैं. बस गुयाना की राजधानी जोर्जटाऊन पहुँच कर होटल के कमरे में आराम करने के सपने देख रहा हूँ.

Guyana

विमान से दिखता डेमेरारा नदी और अतलांतिक महासागर के बीच में जार्जटाऊन शहर

27 अक्टूबर 2006, जार्जटाऊन

गुयाना पहुँचे पाँच दिन हो गये हैं. डायरी लिखने का समय ही नहीं मिलता. सुबह उठ कर तैयार हो कर एक बार बाहर निकलता हूँ तो रात को देर तक वापस होटल में अपने कमरे में नहीं लौट पाता. फ़िर बस खाना खा कर बिस्तर ही सूझता है. अभी तक हर रोज़ इतनी भाग दौड़ होती है कि रात को बहुत थकान होती है और क्मप्यूटर खोलने का मन ही नहीं करता.

इस बार मुझे एक गेस्ट हाऊस में ठहराया गया है. छोटा सा कमरा है जो एक बड़े बिस्तर से भरा है. मेज़ कोने में है पर वह बैठ कर कुछ लिखने के लिए ठीक नहीं है इसलिए क्मप्यूटर पर लिखने के लिए भी बिस्तर पर ही बैठ कर लिखना पड़ता है, जो आसान नहीं है.

सुबह सुबह टीवी पर टी सीरीज़ के अनुराधा पोढ़वाल के भजन सुनने को मिलते हैं. रात को चाहो तो रोज़ एक हिंदी फ़िल्म देखने को मिलती है. पिछली बार यहाँ 2001 में आया था, तब से अब तक यहाँ की हालत बेहतर लगती है,सड़कें, घर आदि पहले से अच्छी हालत में लगते हैं.

सोमवार की रात को यहाँ पहुँचा था. मँगलवार को जोर्जटाऊन में ही कुछ मीटिंग में गया. बुधवार को यहाँ से 60 किलोमीटर दूर पारिको गये, वहाँ से तीव्र गति की स्पीडबोट से एसेकीबो नदी की पँद्रह किमोमीटर की यात्रा करके एसेकीबो जिले के कई शहर और गाँव देखे. कल पहले स्वास्थ्य मंत्री से मिला फ़िर वेस्ट बैंक डेमेरारा जिले में एक कम्यनिटी सैंटर में वहाँ काम करने वालों से मिलने गया. आज भी सारा दिन यहाँ से वहाँ घूमने में ही निकलेगा. सुबह जोर्जटाऊन में दो मीटिंग हैं, फ़िर ईस्ट बैंक और कुरुकुरुरु जाना है. रात को देर से लौटूँगा.

अभी तक यहाँ का सबसे रोचक अनुभव एसेकीबो नदी को पार करना था. तेज़ चलती नाव और नदी की उँची लहरें बहुत रोमांचक थीं.

29 अक्टूबर 2006, जार्जटाऊन

गुयाना आये आज एक सप्ताह हो गया और आज पहली बार दिन भर खाली है, आराम करने के लिए और सप्ताह में किये काम के बारे में सोचने के लिए. शाम को यहाँ काम करने वाली साथी जेराल्डीन ने यहाँ के ट्रेड फेयर ले जाने का निमंत्रण दिया है.

मैं यहाँ विकलाँग व्यक्तियों के लिए हो रहे समुदाय पर आधारित पुनर्स्थापन कायर्क्रम (community based rehabilitation programme) के सिलसिले में आया हूँ. गुयाना में यह मेरी चौथी या पाँचवी यात्रा है. पहले तो हर बार किसी न किसी के साथ आया था और देश बहुत घूमा था पर यहाँ के भूगोल को ठीक से नहीं समझ पाया था, सारा समय हमारी आपस की बातचीत में निकल जाता था. इस बार अकेला होने के कारण, सोचने और समझने का समय अधिक मिला है, इसलिए सड़कों, रास्तों, शहरों के भूगोल को समझना भी अधिक आसान है.

जोर्जटाऊन, गुयाना की राजधानी में स्लीपइन नाम के गेस्ट हाउस में ठहरा हूँ. वैसे तो यहाँ से सीधी सड़क है जो शहर के मुख्य केंद्र को जाती है पर रास्ता लम्बा है और अधिकतर, धूप इतनी तेज़ होती है कि अपने आप अकेले कहीं जा कर घूमने का मन नहीं करता. आज सुबह उठा था तो सोचा था कि कुछ सैर हो सकती है क्योंकि आकाश बादलों से घिरा था पर फ़िर ऐसी मूसलाधार बारिश शुरु हुई कि रुकने का नाम नहीं लेती, तो सोचा आराम से बैठ कुछ लिखने पढ़ने में ही भला होगा.

गुयाना का इतिहास भी अनोखा है. दो सौ साल पहले तक यह देश घने जँगलों से भरा था जिसमें यहाँ के आदिम लोग  रहते थे, जिन्हें आजकल अमेरंडियन (american Indians) कहते हैं, कोलोम्बस की याद में जो दक्षिण अमरीका की तरफ़ भारत को खोजते आये थे. फ़िर यूरोप की उपनिवेशी ताकतों ने यहाँ अपना सम्राज्य बनाने की लड़ाईयाँ शुरु कर दीं, कभी फ्राँस वाले जीतते, कभी होलैंड वाले तो कभी अंग्रेज़. होलैंड वालों का यहाँ बहुत दिन तक राज रहा जिसके निशान आज भी यहाँ के लकड़ी के मकानों में, नहरों के जाल में, समुद्री दीवारों और शहरों के नामों में मिलते हैं. होलैंड की तरह ही यहाँ की भूमि का स्तर समुद्र के स्तर से नीचा है इसलिए वे लोग अपने देश की सभी तकनीकों को यहाँ पर लागू कर सके. खैर लड़ाईयों से बचने का उपनिवेशी ताकतों ने फैसला किया और देश को तीन हिस्सों में बाँट दिया, एक बना फ्राँससी गुयाना जो आज भी फ्राँस का हिस्सा माना जाता है, दूसरा बना डच गुयाना जिसे आज सूरीनाम के नाम से जानते हैं तीसरा बना अँग्रेज़ी गुयाना जहाँ मैं इन दिनों में आया हूँ.

दक्षिण में है ब्राजील, जहाँ पुर्तगाली भाषा बोलते हैं क्योंकि वह पुर्तगाली उपनिवेश का भाग था. इस तरह साथ साथ बने यह चार देश, चार विभिन्न यूरोपीय भाषाएँ बोलते हैं. दशकों तक भाषाई रुकावटों की वजह से इन देशों में आपसी सम्बंध न के बराबर रहे हैं, पर अब पिछले कुछ वर्षों में धीरे धीरे ब्राजील का जोर बढ़ता दिखता है. पिछली बार जब आया था, तब तक गुयाना और ब्राजील के बीच सीधी कोई विमान यात्रा नहीं थी पर आज स्थिति बदल गयी है.

दुनिया के विभिन्न कोनों से आये गुयाना के लोग

यहाँ काम करने के लिए उपनिवेशी ताकतें पहले तो अफ्रीका से गुलाम ले कर आयीं, पर धीरे धीरे अफ्रीका से आये लोगों ने विद्रोह करना शुरु कर दिया और आदेश मानने से इन्कार करने लगे. तब गन्ने के खेतों में काम करने के लिए यहाँ भारत से लोग लाये गये. वैसे तो यहाँ भारत के उत्तर और दक्षिण दोनों ही हिस्सों के विभिन्न प्राँतों से लोग लाये गये पर उनमें पश्चिमी उत्तरप्रदेश और दक्षिणी बिहार के भोजपुरी बोलने वाले लोग सबसे अधिक थे. उन्हें पाँच साल के लिए लाया जाता था और कहा जाता था कि पाँच साल बाद उन्हें वापस भारत ले जाया जायेगा, कुछ वैसा ही था जैसा आज कल गल्फ के देशों में लोगों को काम के लिए ले जाया जाता है. यहाँ आने वाले अधिकतर लोग पुरुष थे जबकि महिलाओं को अधिक नहीं लाया गया था क्योकि उनसे खेतों में उतना काम नहीं ले सकते थे. 1838 में यहाँ भारत से पहला जहाज़ आया, और उसके बाद तो जहाजों की कड़ी ही लग गयी जो बीसवीं शताब्दी के पहले भाग तक चलता रहा. करीब दो लाख चालिस हजार भारतीय यहाँ लाये गये.

शुरु के कुछ साल छोड़ कर, अँग्रेज़ों ने फैसला किया कि यहाँ आने वाले लोगों को अपनी जहाज़ यात्रा का पैसा देना पड़ेगा, इस तरह पाँच साल का कह कर लाने वाले लोगों का पहला काम था काम करके पैसा कमाना ताकि जहाज़ यात्रा का कर्ज उतार सकें. वापस जाने के लिए पैसे जोड़ना नामुमकिन सा था इस तरह वह लोग यहाँ के बँधुआ मजदूर बन गये. इन भारतीय गुलामों के शोषण पर अभी एक नई फिल्म बनी है "गयाना 1838" जिसमें भारतीय अभिनेता कुमार गौरव ने भी काम किया है और यह फ़िल्म दो दिन पहले यहाँ के सिनेमा घरों में आई है.

पिछले दो दशकों को छोड़ दें तो यहाँ आये भारतीय मूल के लोगों के, अन्य लोगों से बहुत कम सम्बंध थे. भारतीय अधिकतर अपने गुटों में, अपने समुदायों में, अलग अलग रहते थे. घर में भोजपुरी ही उनकी भाषा थी और बाहर बोलने के लिए अँग्रेजी, भोजपुरी और कुछ अफ्रीकी भाषा के शब्द मिला कर उनकी भाषा बनी. यह सब लोग अपने आप को हिंदी भाषी कहते थे. अधिकतर लोग उन जातियों के थे जिन्हें भारत में छोटा माना जाता था, पर कम होने की वजह से या अन्य कारणों से, धीरे धीरे जाति भेद कम हो गया, हाँ गोरे रंग की कद्र बढ़ गयी, तो जाति भेद, वर्ण भेद के रुप में रह गया. अँग्रेजी शासकों ने सभी कोशिश की कि हिंदी को न पढ़ाया जाये, हालाँकि हिंदू और मुसलमानों को अपना धर्म और रीतियाँ अपने तरीके से मानने और मनाने पर रोक नहीं लगी, पर साथ साथ यह भी था कि अँग्रेजी तरीके जानने वाले लोग ऊँचे माने जाते थे.

1966 में जब देश आजाद हुआ तो थोड़े समय के बाद शासन में आई यहाँ की एनसीपी पार्टी जो अधिकतर अफ्रीकी मूल के लोगों से बनी थी और जिसने भारतीय मूल के लोगों से भेदभाव की नीति को अपनाया और सभी सरकारी कामों में अफ्रीकी मूल के लोगों को मौका दिया. तीस साल तक इस पार्टी ने शासन किया, चुनाव करवाने बंद कर दिये और विदेशों से अपने सम्बंध सीमित कर दिये. करीब 30 साल बाद, 1992 में जब पहले स्वतंत्र चुनाव हुए तो पीपीपी पार्टी जीती जो भारतीय मूल के लोगों और कुछ अफ्रीकी मूल के लोगों से बनी है, तब से भारतीय मूल के लोग ही यहाँ के राष्ट्रपति बने हैं हालाँकि उन्होंने अफ्रीकी मूल के लोगों को साथ जोड़ने के लिए, हमेशा अफ्रीकी मूल के व्यक्ति को प्रधानमंत्री का पद दिया है. भारतीय मूल के सत्ता में आने से यहाँ विभिन्न लोगों के बीच आपसी तनाव बढ़े और चुनाव के समय बहुत मारा मारा हुई. बस इस वर्ष कुछ महीने पहले हुए चुनाव पहली बार शाँतिपूर्ण हुए जिसमें पीपीपी पार्टी दुबारा विजयी हुई. जब इस बारे में लोगों से बात की तो लोग कहते हैं कि शायद अब हमारा देश आपस में साथ रह कर जीना सीख रहा है और यह सपना सा लगता है कि तनाव कम हो गये हैं.

नदियों और नहरों का देश गुयाना

इन सब बदलावों के साथ साथ भूमँडलीकरण के कारण आये परिवर्तनों ने भी दुनिया को बदल दिया है. दुनिया से कटा गुयाना आज फ़िर दुनिया से जुड़ गया है पर आज की नस्ल अपने आप को भारतीय मूल का तो मानती है पर साथ साथ, यह भी जानती है कि उनका भविष्य भारत नहीं यहीं है, वे अपने आप को गुयाना वासी पहले समझते हैं. इस लिए अब लोग भोजपुरी या हिंदी नहीं अँग्रेज़ी ही बोलते हैं और भोजपुरी और हिंदी केवल बूढ़ों की भाषाएँ बन कर रह गयी हैं. इस बीच भारतीय दूतावास ने हिंदी की कक्षाएँ प्रारम्भ की, कुछ लोगों को छात्रवित्ति पर भारत भी भेजा पर हिंदी को कुछ बनाये रखने में सबसे बड़ा हाथ है हिंदी फिल्मों का और हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों में काम करने वाले पुजारियों का. कुछ भी साँस्कृतिक कार्यक्रम हो तो अगर भारतीय मूल के लोग होंगे तो हिंदी गाने और भारतीय नृत्य भी अवश्य होते हैं पर जब विभिन्न जातियों के लोग मिल कर कुछ करते हैं तो "केरेबियन" सभ्यता को ही प्राथमिकता मिलती है.

पंद्रह साल पहले देखे और आज के गुयाना में बहुत अंतर आया है. सड़कें, घर सब बहुत अच्छी हालत में लगते हैं पर इनमें से बहुत से बदलाव विदेशों से आने वाले पैसे की वजह से हैं. दो लाख स्कवायर किलोमीटर के गुयाना की जनसँख्या केवल 7 या 8 लाख है और उससे अधिक गुयाना वासी विदेशों, विषेशकर केनेडा, अमरीका और इंगलैंड में रहते हैं. बहुत से परिवारों में कुछ लोग विदेश में हैं जो बाहर से पैसा भेज कर यहाँ रहने वालों का काम चलाते हैं. देश का अधिकतर भाग जँगलों से भरा है, और करीब 95 प्रतिशत लोग देश के उत्तर में समुद्रतट के साथ साथ रहते है. बीच के घने जँगलों और दक्षिणी उँची घास वाले पठारों में कुल मिला कर केवल 20,000 लोग रहते हैं, जो कि अधिकतर विभिन्न अमेरिंडयन जातियों से हैं. यह जँगल दक्षिण में, ब्राज़ील और वेनेजुएला के अमेजन जँगलों का हिस्सा हैं.

कहते हैं कि गुयाना शब्द किसी अमेरिंडियन भाषा से है और इसका अर्थ है नदियों का देश. सच में देश नदियों के जाल से घिरा है, पर उत्तर में अटलाँटिक महासागर की ओर आते आते उन छोटी नदियों से तीन प्रमुख नदियाँ बनती हैं - बरबीस, डेमेरारा और एसेकीबो. नदियों के इलावा सारे उत्तरी भाग में नहरों के जाल बिछा है जिनसे गन्ने के खेतों की ओर पानी ले जाया जाता था. बहुत सुंदर और मनोरम लगती हैं यह नहरें पर अगर सोचिये कि किन हालातों में अफ्रीकी और भारतीय गुलामों ने अपने खून पसीने से, बिना किसी मशीनों के धरती का सीना चीर कर इन्हें बनाया होगा तो मन कड़वा हो जाता है.

आज के बने आधुनिक मकान सभी सीमेंट के बन रहे हैं. लकड़ी के पुराने मकानों के सामने यह अधिक दिन चलते हैं पर इनके अंदर गर्मी और उमस अधिक लगती है इसलिए साथ साथ विद्युत सेवाओं का उपयोग भी बढ़ा है और बिना पँखे या वातानकूलन के इनमें रहना कठिन है.

30 अक्टूबर 2006, लेथम

आज सुबह सुबह जार्जटाऊन से लेथम के लिए रवाना हुए थे. कल रात को जेराल्डीन के साथ ट्रेडफेयर गया था. इतनी भीड़ थी कि लगता था कि सारे जार्जटाऊन के निवासी वहाँ चले आये हों. कारों का ताँता लगा था और छोटी छोटी सड़कों पर पार्किंग खोजने की होड़ लगी थी. साथ ही उमस और गर्मी भी थी. ट्रेडफेयर के कुछ हिस्सों में, विषेशकर उन जगहों पर जहाँ किसी बंद जगह पर घुसना पड़ता, साँस लेना दूभर हो रहा था. बीच बीच में कई जगह पर बड़े धूम धड़क्के से केरिबयन का केलिप्सो संगीत बजाया जा रहा था,जिसकी धम्म धम्म से कान तो बज ही रहे थे, साथ साथ सारा शरीर काँप उठता था. उस शोर शराबे में बातें करना भी आसान नहीं था. पर यह सब शायद मेरी उम्र का दोष था, आस पास नवजवान युवक युवतियाँ इस वातावरण में खुशी से थिरक रहे थे.

क्या अच्छा लगा, मुझसे जेराल्डीन ने पूछा. उसे क्या कहता कि सिर दर्द के मारे फटा जा रहा था. मैंने ही उससे कहा था कि मुझे ट्रेडफेयर दिखाओ और उसकी छुट्टी की शाम खराब की थी, तो उससे यह कहना ठीक नहीं लगा. मुझे सबसे विचित्र लगा लोगों का विभिन्न रँग बिरंगे पर्दों के सामने अपनी डिजिटल फोटो खिंचवाना. इस तरह के बहुत स्टाल बने थे. कहीं स्पाईडरमैन के साथ फोटो खिंचवाने का मौका मिलता था, कहीं कार में बैठ कर या फ़िर मोटरसाईकल पर या न्यूयोर्क के पर्दे के सामने. दिल्ली के उन पुराने दिनों की याद ताजा हो गयी जब बिरला मंदिर में फोटो खींचने वाले आप के शरीर को काट कर मोटर पर लगा देते थे या रंगीन पर्दों के सामने जवान युवतियाँ शादी के लिऐ लड़के को भेजने के लिए तस्वीर खिंचवाती थीं या फ़िर कश्मीरी और राजस्थानी पौशाकों में तस्वीरें खिंचवाई जाती थीं. फर्क केवल इतना था कि अब डिजिटल केमरे से तुरंत फोटों छाप कर दे सकते हैं. क्या मालूम क्या दिल्ली में आज भी कोई इस तरह की तस्वीरें खिंचवाता हो?

ट्रेडफेयर में जेराल्डीन ने मेरा परिचय गुयाना के भारतीय मूल के राष्ट्रपति श्री भरत जगदेअ की भारत से आई पत्नी श्रीमति वार्षनिक जगदेअ से कराया. बहुत छोटी उम्र की बच्ची सी लगतीं हैं वह. मैंने उनसे पूछा कि क्या मैं उनकी तस्वीर ले सकता हूँ तो मान गयीं. इसी तरह करीब दस या बारह साल पहले मेरी मुलाकात एक अन्य भारतीय मूल के गुयाना के राष्ट्रपति स्व. श्री जगन की पत्नि श्रीमति जेनेट जगन से हुई थी जो अपने पति की मृत्यु के बाद स्वयं राष्ट्रपति बनी थीं. श्री भरत जगदेअ के पूर्वज सन 1912 में उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले के एक गाँव से गुयाना आये थे. कुछ वर्ष पहले जब श्री जगदेअ एक शिखर सम्मेल्लन के लिए भारत आये थे तो अपने पूर्वजों के गाँव को भी देखने गये थे.

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सुश्री वार्षनिक जगदेअ, गुयाना के राष्ट्रपति श्री भरत जगदेअ की पत्नि

खैर रात को देर से होटल के कमरे में लौटा और ठीक तरह से सो नहीं पाया. मन में कुछ चिंता थी कि सुबह जल्दी जाना है कहीं सोता ही न रह जाऊँ. गुयाना के दक्षिणी कोने पर रुपुनूनी राज्य की राजधानी लेथम आना था. यहाँ करीब पँद्रह वर्ष पहले भी एक बार आया था. तब यहाँ थोड़े से घर थे, एक गेस्टहाऊस था जहाँ खाने का कुछ मिल जाता था और घास के एक खेत को हवाईअड्डा बनाया गया था. मन में जिज्ञासा थी कि देखें कितना बदला है यह शहर. तब जहाज यहाँ सप्ताह में दो बार आता था, अब तो हर रोज एक उड़ान होती है. अब सड़क भी बन गयी है जो लेथम को जार्जटाऊन से जोड़ती है पर उसके लिए करीब बीस घँटे चाहिए, हालाँकि दूरी केवल 600 किलोमीटर की है.

छोटा सा जहाज था जो जार्जटाऊन के दूसरे हवाईअड्डे ओगल से चला. जहाज से हालैंडवासियों के समय में बनाई गयी नहरें देख कर और भी अचरज होता है, लगता है किसी ने फुट्टा ले कर सीधी लकीरें खींच दीं हों. यात्रा प्रारम्भ होने के थोड़े समय बाद ही जहाज गुयाना के ट्रोपिकल जँगल (tropical rain forest) पर से गुजने लगा. जिधर देखो उधर हरे भरे पेड़, एक दूसरे से इतने सटे कि बीच में से जमीन बिल्कुल नहीं दिखती. इस जँगल को ब्राजील और वेनेजुएला के अमेजन जँगलों के साथ, धरती के फेफड़े माना जाता है. गुयाना में बहुत सा जँगल का भाग प्रकृति की सुरक्षा के लिए संरक्षित घोषित कर दिया गया है. इस जँगल में बहुत सी पशु और वनस्पति नस्लें मिलती हैं जो दुनिया में अन्य कहीं नहीं हैं.

रास्ते में जहाज अन्नाई और करनामब्लू में रुका. अन्नाई पर उतरे तो याद आया कि पिछली बार आया था तो मुझसे मिलने अन्नाई के कुछ लोग तीन दिन की नाव और पैदल यात्रा से लेथम तक पहुँचे थे. अब तो बस से यह यात्रा कुछ ही घँटों में की जा सकती है. अन्नाई में तो फ़िर भी कुछ घर दिख रहे थे पर करनाम्बलू में तो केवल जँगल ही जँगल दिखता है, सिर्फ एक तीर सा निशान है जो इशारा करता है कि "शहर" जाने के लिए किस तरफ जायें. जहाज जब दोबारा चला तो भी मैंनें आस पास देखने की कोशिश की पर दूर दूर तक कुछ नहीं दिखाई दिया.

लैथम पहुँचे तो आसपास कुछ नई इमारतें दिखीं पर हवाईअड्डे में कोई विषेश परिवतर्न नहीं आया, हाँ उसका रनवे अवश्य नया बना है. शहर अवश्य कुछ बढ़ा है, नये घर, नयी दुकाने दिखती हैं. हम लोग एक नये होटल टाकाटू में ठहरे हैं. है तो सादा सा, पर पिछली बार वाले गेस्टहाऊस के मुकाबले में बहुत अच्छा है. खाना खा कर दोपहर को कुछ लोगों से मिला, अब कुछ देर के लिए कमरे में आया हूँ. करीब एक घँटे के बाद जब थोड़ी शाम हो जायेगी तो बाहर घूमने जाने का कार्यक्रम है. करीब बहती टाकूटू नदी जो लेथम को ब्राजील के रोराईमा राज्य से अलग करती है, को देखना चाहता हूँ और वह अस्पताल भी देखना चाहता हूँ जहाँ मैंने पिछली बार कुछ देर काम किया था.

1 नवम्बर 2006, लेथम

अभी थोड़ी देर में वापस जार्जटाऊन जाने का विमान पकड़ना है. परसों शाम को वह अस्पताल देखने गया था, जहाँ डा. आईडुन मिले जिनके साथ पिछली बार काम किया था, वह मुझे देखते ही पहचान गये. उनसे मिलना बहुत अच्छा लगा हालाँकि अस्पताल में बहुत से परिवर्तन आ गये हैं और अन्य पुराने लोग नहीं मिले. डा. आईडुन ईरानी बहाई हैं, और चूँकि ईरान में बहाई धर्म वालों का जीना आसान नहीं है वह बहुत साल तक भारत में पूना में रहे हैं पर अब कनाडा निवासी हैं.

कल सुबह सुबह छः बजे जूड हमे लेने आ गया. जूड से भी पहले की जान पहचान थी हालाँकि उसे सिर्फ़ मेरा नाम याद था अन्य कुछ नहीं. तब वह गाँव में काम करने वाला सामुदायिक विकास कार्यकर्ता था जबकि आज वह अपनी अपजिले सैंडक्रीक में स्वास्थ्य अधिकारी है. गुयाना ने बाहर चले जाने वाले डाक्टरों, नर्सों, दाँत चिकित्सकों आदि को रोकने के लिए छोटे शिक्षण कोर्स प्रारम्भ किये हैं जैसे जूड ने दो साल का चिकित्सा सहायक का कोर्स किया है. 3,150 लोगों की जनसँख्या वाले उसके उपजिले में कोई डाक्टर नहीं, और वह अकेला स्वास्थ्य अधिकारी है जो गाँवों में स्वास्थ्य सेवकों के सहारे से काम करता है. 12 गाँव है सैंडक्रीक उपजिले में जिनका मुख्यक्षेत्र है सैंडक्रीक गाँव जहाँ करीब 188 परिवारों में 740 लोग रहते हैं. गाँव बहुत दूर दूर हैं जैसे पोटारीनाउ गाँव जहाँ 570 लोग रहते हैं और जो सैंडक्रीक से 20 मील दूर है. इससे मालूम चलता है कि यहाँ कितने बड़े इलाके में कितने कम लोग रहते हैं. जबकि भारत में किसी भी उपजिले में कम से कम कुछ लाख लोग तो मिल ही जाते हैं.

जूड वापाशाना अमेरिंडियन जाति का है. सैंडक्रीक में अधिकतर लोग वापाशाना जाति के हैं, सिर्फ़ एक गाँव है माकूशा जाति का. यहाँ की तीसरी जनजाति वाईवाई अधिकतर ब्राजील की सीमा के पार रहती है लेकिन पुरानी रीतियों के अनुसार उनके बहुत से पूजा स्थल रुपुनुनी में हैं इसलिए वह अक्सर इस तरफ आते जाते रहते हैं. हर जाति की अपनी भाषा है पर उनके रीति रिवाज़ मिलते जुलते हैं. आजकल सभी जनजातियों के लोग ईसाई है पर उनकी कोशिश है कि वह अपनी भाषा और कुछ पुराने रीति रिवाज बचा सकें. जूड को पुरानी जनजातियों की आधुनिकता से शिकायत नहीं क्योंकि उसके अनुसार यह तो स्वाभाविक ही है पर साथ साथ ही वह कहता है कि उनके पुराने ज्ञान और सभ्यता को बचाने की कोशिश करना आवश्यक है, जो धीरे धीरे खोता जा रहा है. धीरे धीरे बच्चे अपनी जाती की भाषा में बोलना भूल रहे हैं सब लोग सिर्फ़ अँग्रेजी बोलना चाहते हैं.

हम लोग करीब दो घँटे की यात्रा के बाद एक नदी को पार करके पाटारीनाउ गाँव पहुँचे जहाँ हम वहाँ के विद्यालय और नर्सरी स्कूल में छात्रों से मिले. मैंने वहाँ के विकलाँग छात्रों से भी बात की. फ़िर हम लोग सैंडक्रीक की ओर रवाना हुए. रास्ते में रुपुनुनी नदी पार करने में कुछ कठिनाई हुई क्योंकि नदी में पानी का स्तर ऊँचा था और हमें वहाँ गाड़ी के फँस जाने का भय था.

सैंडक्रीक पहुँचने में अन्य दो घँटे लगे. वहाँ बहुत धूम मची थी, क्योंकि अगले दिन वहाँ उपजिले के सभी विद्यालयों से छात्रों की एथलेटिक्स प्रतियोगिताएँ प्रारम्भ होने वाली थीं और दूर दूर के गाँवों से छात्र, ट्रेक्टरों या बैलगाड़ियों और साईकलों पर आ रहे थे. मैंने फ़िर से वहाँ के अस्पाल में करीब 20 विकलाँग लोगों का चैकअप किया और जूड तथा उसके साथियों को समझाया कि कैसे वह उन विकलाँग लोगों की सहायता कर सकते थे, उनके माता पिता तथा परिवार वालों से भी बात की. कल जितने विकलाँग लोगों से मिला उनमे से केवल एक बच्चे की ब्राजील के एक अस्पाल में कुछ जाँच हुई थी, बाकि सभी को कभी किसी डाक्टर ने नहीं देखा था.

दोपहर को वापस आने लगे तो तेज बारिश शुरु हो गयी. हम लोग एक पीछे से खुली जीप में यात्रा कर रहे थे, उसके ऊपर लकड़ी का पट्टा लगाया गया ताकि बारिश से कुछ बच सकें पर तेज हवा और बारिश से बचना कठिन था. उस पर से कच्ची सड़क के हिचकोले और झटके. साढ़े तीन घँटों के बाद जब वापस होटल पहुँचे तो मेरा सारा शरीर दर्द कर रहा था, कमर अकड़ सी गयी थी. खैर किसी तरह से खाना कर मैं तुरंत बिस्तर में लेट गया और आज सुबह थोड़ा सा कमर दर्द है पर बाकि सब ठीक है.

आज सुबह मैं अपने साथ आये टैरी के साथ टाकूटू नदी को देखने गया. हमारे होटल से करीब बीस मिनट का पैदल रास्ता है. टाकूटू नदी पर बहुत नावें हैं और दो मिनट में दूसरी और ब्राजील जाया जा सकता है. गुयाना वासियों को वहाँ जाने के लिए कोई वीसा नहीं लेना पड़ता और न ही वहाँ कोई पुलिस की कोई चैक पोस्ट ही है जो पासपोर्ट आदि देखे.

4 नवम्बर 2006, जार्जटाऊन

अब तो वापस आने का दिन करीब आ रहा है. आज शनिवार है और दोपहर को एक मीटिंग में भाग लेना है. कल जेराल्डीन के यहाँ दोपहर को खाने पर जाना है और वहीं कुछ लोगों से मिल कर उनके साथ बात करनी है. बस यही काम रह गये हैं. परसों सुबह सुबह की उड़ान है जिससे बारबेडोस जाना है और वहाँ से लंदन और फ़िर मंगलवार को सुबह बोलोनिया.

जार्जटाऊन वापस आया तो पेट खराब हो गया था. एक दो दिन ज़रा तकलीफ में गुज़रे पर फ़िर दवा लेने से ठीक हो गया. कल हम लोग सारा दिन गुयाना के पूर्वी कोने पर सूरीनाम के पास के न्यू एस्टरडेम और कोरेनटीन शहरों में गये. मेरे साथ थीं ग्वेन और इंद्राणी. इंद्राणी के पति चीनी, भारतीय और अफ्रीकी मिश्रित हैं इसलिए इंद्राणी के बच्चे सब एक दूसरे से बहुत भिन्न दिखते हैं. इंद्राणी ने बताया कि 18 साल तक उन्हें शराब के नशे में धुत रहने की आदत थी पर पिछले 9 सालों से वह शराब छोड़ चुकी हैं.

यहाँ के कई भारतीय मूल के लोगों से मिला पर बहुत बार उनका बोलने का तरीका कुछ ऐसा होता है कि उनकी बात समझ नहीं पाता और किसी से कहना पड़ता है कि मुझे अनुवाद करके बताये.

सबसे अधिक तकलीफ़ तब होती है जब विकलाँग बच्चों को देखने उनके घरों में मुझे ले जाया जाता है जिन्हें बीमारी धीरे धीरे खा रही हो और समझ नहीं आता है कि कैसे उनकी मदद की जाये. उन परिवारों की गरीबी और लाचारी देख कर बहुत दुख होता है. कई बार ऐसे लोग मिलते हैं जिनका सारा जीवन ही दुखों से जूझने में गुज़रा है तो अपना कुछ भी कहना झूठा लगता है.

कल बरबीस नदी को पार करने के लिए फैरीबोट लेनी पड़ी. जाने के लिए करीब दो घँटे इंतज़ार करना पड़ा और वापस आते समय तीन घँटे. फ़िर भी किस्मत अच्छी थी कि वापस आते समय फैरी में हमारी गाड़ी अंतिम थी, अगर एक अन्य कार हमारे आगे होती तो दो घँटे और रुकना पड़ता. रात को देर से लौटा और मुश्किल से खाना खाया. सारा दिन बोल बोल कर शाम को जब होटल में अपने कमरे में पहुँचता हूँ तो कमरे की चुप्पी बहुत अच्छी लगती है.

6 नवम्बर 2006, ब्रिजटाऊन

वापसी की यात्रा बहुत लम्बी है. कल दोपहर को जेराल्डीन के घर पर खाना था. सभी लोग केवल चेम्पियनशिप ट्रौफ़ी में वेस्ट इण्डीस के हारने की बात कर के दुखी हो रहे थे. पहले मुझे मालूम नहीं था कि वेस्ट इण्डीस नाम का कोई देश नहीं है दुनिया में और वेस्ट इण्डीस की टीम केरिबयन के पुराने अँग्रेज़ी उपनिवेशों देशों के द्वारा मिल कर बनाई जाती है, यानि गुयाना, ट्रिनिडाड, बारबेडोज़, जमायका, इत्यादि.

वह लोग मुझसे पूछ रहे थे कि क्या मुझे भारत की हार का दुख हुआ था? मुझे दुख क्या हो जब मैं क्रिकेट के बारे में अधिकतर चीज़ें भूल चुका हूँ. चैम्पियनशिप ट्रौफ़ी हो या विश्व कप, इण्लैंड और उसके पुराने उपनिवेशों देशों को छोड़ कर क्रिकट अन्य देशों में नहीं खेला जाता और न ही उसके मैच टेलिविजन पर प्रसारित किये जाते हैं. आज मेरी क्रिकेट की यादें अजीत वाडेकर, दिलीप सरदेसाई, बिशन सिंह बेदी, सुनिल गवासकर और कपिलदेव तक आकर रुक जातीं हैं.

आज सुबह सवा तीन बजे का अलार्म लगाया था, मुझे लेने कार को चार बजे आना था. अभी तैयार ही हो रहा था कि 3 बज कर चालिस मिनट पर ही गाड़ी आ गयी. सब कुछ जल्दी जल्दी सम्भाला और तुरंत निकल आया. मेरी उड़ान को ब्रिजटाऊन के बाद अमरीका जाना था और इसलिए बहुत कड़ी सुरक्षा जाँच हुई, सारी अटैची खोल कर देखी गई.

खैर सुबह साढ़े सात बजे जहाज ब्रिजटाऊन पहुँच गया. अगली उड़ान लंदन के लिए शाम को पाँच बज कर पचास मिनट पर है इसलिए यहाँ करीब दस घँटे रुकना है. वह इंतज़ार भी चैकइन काऊँटर के सामने खड़े हो करना पड़ता क्योंकि लंदन वाली उड़ान की चैकइन सीधा जार्जटाऊन से नहीं हो सकती और यहाँ ब्रिटिश एयरवेस का काऊँटर उड़ान से कुछ घँटे पहले ही खुलता है.

सोचा कि हवाईअड्डे में इतनी देर तक खड़े खड़े तो बाजे बज जायेंगे, इसलिए आसपास कोई गेस्टहाउस खोजने की सोची. पता चला कि थोड़ी दूर ही कुछ गेस्टहाउस हैं जहाँ तीस या चालिस डालर में कमरा मिल जायेगा. टैक्सी वाले से पूछा कि वहाँ जाने का कितना लगेगा तो बोला 25 अमरीकी डालर. यानि गेस्टहाउस में जाने का खर्चा कम से कम अस्सी या नब्बे डालर. मुझे विश्वास नहीं हुआ. सुना था कि बारबेडोस बहुत मँहगा है पर इतना मँहगे तो लंदन या न्यूयोर्क भी नहीं लगे कि दो किलोमीटर दूर जाने के 25 डालर लें. टैक्सी वाला बोला कि यह तो सरकारी रेट हैं, यानि कि शायद यहाँ कि सरकार चाहती है कि आप यहाँ तभी आईये अगर आप के पास बहुत पैसे हों.

खैर मैं अपनी अटैची ले कर सामने बने एक रेस्टोरेंट में आया, सोचा वहीं बैठ कर समय बिताया जाये. रेस्टोरेंट वाले से बात की तो कहने लगा कि करीब ही एक घर में कुछ घँटों के लिए वह मुझे एक कमरा दिला सकता है उसके चालिस डालर लगेंगे. मैंने कम करने के लिए कहा तो पैंतिस डालर में बात पक्की हुई. लगता है कि यहाँ हर कोई पर्यटकों का उल्लु बनाता है खैर मुसीबत में था क्या करता. अटैची घसीटता हुआ रेस्टोरेंट वाले के पीछे पीछे आया. एक घर में जिसमें एक परिवार रहता है, एक कमरा मिला है, जहाँ सुस्ताने का मौका मिला है.

जो भी थोड़ा बहुत यहाँ का कुछ दिखा है उससे लगता है कि यह जगह कार वालों के लिए बनी है, खुली सड़कें, नीला सागर और बहुत सी खाली जगह. खैर बारदेडोस की खूबसूरती यहाँ वालों को ही मुबारक, मुझे तो बस घर वापस पहुँचने की इच्छा है!

Guyana

सुंदर पर मँहगा बारबेडोस

7 नवम्बर 2006, बोलोनिया

यात्रा का अंतिम झटका लंदन आ कर लगा जब पता चला कि बुरे मौसम की वजह से बोलोनिया की उड़ान रद्द कर दी गई है और हमें वेनिस हवाई अड्डे ले जाया जायेगा, जहाँ से बस से हमें बोलोनिया ले जाया जायेगा. सोचा कि बोलोनिया में कहीं बर्फ का तूफान न आया हो, मेरे पास सर्दी की कोई विषेश वस्त्र भी नहीं थे, इस यात्रा में और न्यूमोनिया न हो जाये. खैर वेनिस की ब्रिटिश एयरवेस की उड़ान चली, थोड़े से ही यात्री थे जहाज में. वेनिस पहुँचे तो धूप निकली थी और सर्दी की खास नहीं थी. घर टेलीफोन किया तो मालूम चला कि बोलोनिया में भी धूप निकली है और कोई बुरा मौसम नहीं था.

सुना है कि पिछले महीनों में ब्रिटिश एयरवेस वालों को बहुत नुकसान हुआ है, और शायद बोलोनिया के यात्री बहुत कम थे, इसलिए उन्होंने पैसे बचाने के लिए यह "मौसम खराब है" वाला बहाना बनाया और उड़ान रद्द कर दी!

खैर जो भी हो, घर तो पहुँचे. टाँगे और बाँहें मच्छरों और अन्य कीड़ों के काटे छालों से भरी हैं, खुजली के मारे बुरा हाल है. वहाँ मच्छर भगाने वाली क्रीम तो बहुत लगाई थी पर शायद अमेजन के जँगल वाले कीड़े इस छोटी मोटी क्रीमों को कुछ नहीं समझते.

घर आकर एक विचित्र बात हुई. देखा कि मित्र ओम थानी का एक ईमेल आया है. मैंने उन्हे लिखा कि अभी गुयाना से वापस आया हूँ और बहुत थका हूँ. थोड़ी ही देर में उनका उत्तर आ गया, लिखा था, "मैं गुयाना पहुँचा हूँ और वहीं से तुम्हारा ईमेल पढ़ रहा हूँ."

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