जूलिया (कहानी, धर्मयुग) सुनील दीपक 13 नवंबर,1983

चाहे जूलिया को हिंदी न भी आती हो, पर यह कहानी मैंने उसी के लिए लिखी है. आप शायद इसको संजोग कहेंगे, पर जूलिया से मिल कर लगता है किसी ने सोच विचार कर के मुझे उस दिन बर्फीले तूफान में उसके घर के सामने रोक दिया था.

उत्तरी इटली में वेनिस के पास एक छोटा सा शहर है पादोवा, जहाँ मैं पिछले तीन वर्षों से रहता हूँ. वैसे इटली में भारतीय अधिक नहीं हैं. पादोवा में तो मैं केरल की केवल तीन ननस् को ही जानता हूँ. अजनबियों के बीच में अपनी भाषा तथा अपने स्वजनों मित्रों से कट कर रहना आसान नहीं है इसलिए जब फ्राँस से मेरे ममेरे भाई विजय का पत्र आया कि वह दो मास के लिए लियोन आया है, तो मैं उससे मिलने के लिए उतावला हो गया. सर्दी की वजह से काम से छुट्टी मिलने में कठिनाई नहीं हुई थी. फिर इतने दिनों के बाद, किसी से अपनी भाषा में बातें करने और गप्पे लगाने का अवसर मिल रहा था, उसे सिर्फ शीत और बर्फ के डर से कैसे निकल जाने देता ?

एक वर्ष पहले, कार से पेरिस तक की यात्रा की थी तो सारा रास्ता हाइवे पर ही तय किया था. सोचा इस बार हाइवे छोड़ कर, छोटे शहरों तथा गाँवों की छोटी सड़कों से हो कर ही यात्रा पूरी करुँ.पादोवा से चले अधिक समय नहीं हुआ था कि बर्फ गिरने लगी, इसलिए कार धीमी गति से चलानी पड़ रही थी. बर्फ की श्वेत मोटी रजाई ओढ़े, सरदी से ठियुरते छोटे छोटे गाँव और उनमें से गुजरती, कोहरे से आँख मिचौली खेलती ऊँची नीची घुमावदार सड़कें, लग रहा कि यथार्थ को छोड़ कर,बचपन की सुनी परियों के कल्पनालोक की किसी कहानी की दुनिया में आ गया हूँ. गिरजाघर और खलिहान, सब पर सफेद बर्फ की चादर तनी थी, केवल कहीं कहीं पर बर्फ में खेलते,रंग बिरंगे कपड़े पहने, बच्चों के झुँड ही उस श्वेत एकरसता को तोड़ते थे.

इटली और फ्राँस की सीमा के करीब पहुँच चुका था. कार के टेपरिकार्डर पर हरिओम शरण के भजनों का नया कैसेट बज रहा था. दिल्ली से साथ लाये हुए रेकार्डस् कैसेटस् सुन सुन कर थक गया था. इसीलिए कुछ दिन पहले, जब साड़ी पहने और माथे पर तिलक लगाये, हरे कृष्ण संप्रदाय की इतालवी युवती के पास हरिओम शरण का नया कैसेट देखा तो तुरंत खरीद लिया था. सोच रहा था कि अगर कोई होटल या बार दिखे तो वहाँ रुक कर थोड़ी देर टाँगें सीधी कर लूँ. कई घंटों से कार में बैठे बैठे, कंधे तथा कमर में दर्द होने लगा था. तभी अचानक अजीब सी खड़ खड़ की आवाज करते हुए इंजिन बंद हो गया. घबरा कर कार को सड़क के किनारे पर ला कर खड़ा किया. कुछ पल तो चुपचाप बैठा हरिओम शरण का भजन, "राधे राधे शयामल प्यारी, तारो जीवन नैया" सुनता रहा. अब यहां इस मुसीबत में से मुझे कौन निकालेगा? खुद पर गुस्सा आ रहा था कि इतनी लम्बी यात्रा पर चलने से पहले कार को मेकेनिक से चेक क्यों नहीं करवाया. पहले कभी मोटर मशीनों के बारे में अपने अज्ञान को गंभीरता से नहीं लिया था. सोचता था कि यह अज्ञान मेरे बुद्धिजीवी होना का प्रमाण है. अब रविवार को, इस सुनसान में किसी मेकेनिक को कहां से लाऊं ? बैटरी चुकने के डर से पहले तो टेपरिकोर्डर को बंद किया, फिर छतरी खोल कर बाहर निकल आया कि अगर कोई टेलीफोन दिखे तो किसी मेकेनिक को खोजूं. बर्फ और कोहरे में कुछ भी साफ नहीं दिख रहा था. कार के अंदर तो सरदी महसूस नहीं हुई थी, पर बाहर निकलते ही बर्फीली हवा ओवरकोट को चीर कर पसलियों में चाकू की नोक की तरह चुभने लगी. चारों ओर घूम कर देखा पर कुछ भी नहीं दिखायी दिया. टेलीफोन तो ढ़ूंढ़ना ही है वरना विजय मेरी चिंता करेगा, यह सोच कर आगे की ओर चल पड़ा. उस हवा में छतरी का होना न होना बराबर ही था. रुई जैसी बर्फ के मुलायम फाहे मेरे ओवरकोट पर गिर रहे थे. ओखली में सिर मैंने खुद ही दिया था, वरना अच्छा भला हाईवे से जा सकता था जहाँ कार खराब भी हो जाती तो आपातकालीन सहायता दल तुरंत पहुँच जाता. सौभाग्य से थोड़ी दूर चलने पर ही सामने एक छोटी सी पहाड़ी के पीछे एक चिमनी से धूँआ निकलता दिखा, इसलिए स्वयं को अधिक नहीं कोसना पड़ा. घंटी बजायी तो भीतर से एक स्त्री स्वर ने पूछा, "की ऐ?" यानि कौन है? पर इससे पहले कि मैं कुछ कहता दरवाजा खुल गया. सामने एक मोटी सी अधेड़ महिला खड़ी थी. छोटे कटे हुए सुनहरी बाल, छोटा सा गोल चेहरा और लाल रंग की फ़ूलों वाली लम्बी पौशाक तथा कंधे पर लिपटा, मोटा काला शाल. "बोना सेरा" कह कर मैंने अभिवादन किया और कार खराब हो जाने के बारे में बताया. पूंछ हिलाता, लम्बे काले बालों वाला एक कुत्ता पास आ कर मुझे सूंघने लगा. "वैंगा देंत्रो", महिला ने मुझसे अंदर आने को कहा. फिर कुत्ते के कारण मुझे झिझकते हुए देख कर बोली, "पैरी की चिंता मत करो. यह देखने में ही खतरनाक है,काटता नहीं है."

मैंने ओवरकोट तथा जूतों से बर्फ झाड़ी और अंदर घुसा. एक कोने में लकड़ियाँ जल रहीं थी, इसलिए कमरा काफी गर्म था. सोफे के सामने रंगीन टेलीविजन चल रहा था. कोई दूसरा वहाँ नहीं था. "मेरे पति सांद्रो को कारों की जानकारी है", वह बोली, "पर वे अभी बाहर गये हैं. यहाँ आसपास तो अन्य कोई मेकेनिक नहीं है. तुम बैठो, वे अभी आते ही होंगे." धन्यवाद कह कर एक कुर्सी को आग के पास खींच कर मैं बैठ गया. भाग्य अच्छा ही था, जो इस घर के करीब ही कार खराब हुई थी.

अपने विचारों में डूबा था कि वह काफी का प्याला ले कर आ गयी, "यह काफी पी लो, इसमें थोड़ा सा ग्रापा (शराब) मिला दिया है, वरना उस सर्दी में तुम जम जाओगे." इटली में, छोटे छोटे खिलौनों जैसे प्यालों में जैसी गाढ़ी और तेज काफी पीते हैं, वैसी मैंने अन्य किसी देश में नहीं देखी. वह मेरे सामने ही सोफे पर बैठ गयी और बोली,"मेरा नाम मारिया है. तुम बात करने के ढ़ंग से तो इतालवी नहीं लगते, विदेशी हो न?"

"हाँ, मैं भारतीय हूँ. यहां पादोवा विश्वविद्यालय में रिसर्च कर रहा हूँ", मैंने भी अपना परिचय दिया. उत्तर देते ही समझ गया था कि मेरी किसी बात से उसे धक्का लगा था. मेरा उत्तर सुनते ही उसके चेहरे का भाव बदल गया था.

"तुम्हारा रंग तो बहुत साफ है, मैं तो सोचती थी कि भारत मैं सबका रंग और अधिक गहरा होता है. तुम्हारे जैसा रंग तो दक्षिण इटली में बहुत से लोगों का होता है," वह बोली. यह बात पहले भी कई लोग कह चुके थे. चाहे मन में रंगभेद करने वालों के प्रति कितनी भी वितृष्णा हो, पर अपने साफ रंग के बारे में सुन कर मुझे हमेशा अच्छा लगता है और अपनी इस खुशी पर शर्म भी आती है और गुस्सा भी. इसीलिए क्षब्ध हो कर कह उठा था, "रंग साफ है,पर हूँ तो शुद्ध भारतीय ही".

उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया. क्षमा मांगते हुए बोली, "तुम हमारी बेटी जूलिया को नहीं जानते, वरना ऐसा नहीं सोचते, तुम्हारा अपमान नहीं करना चाहती थी, मैं बिना सोचे समझे ही बोल पड़ी थी". मुझे भी अपने क्रोध पर लज्जा आ गयी. थोड़ी देर तक वह चुपचाप सोचती रही फिर बोली, "शायद भगवान ने तुम्हें हमारी सहायता करने के लिए भेजा है. तुम भारतीय हो, तुम्हारी बात को जूलिया अवश्य सुनेगी. तुम्ही उसे समझा सकते हो." इससे पहले कि उससे कुछ पूछता, बाहर से किसी कार के रुकने की आवाज़ आयी और कुत्ता भौंकने लगा. मारिया तुरंत उठ खड़ी हुई, "यह मेरे पति सांद्रो की कार है. वे वापस आ गये हैं."

करीब पचास वर्ष की उम्र थी सांद्रो की, गंजा सिर और लकीरों से भरा हुआ चेहरा, मानो गुजरने वाला हर वर्ष अपना एक निशान छोड़ गया हो. मुझे देखकर द्वार से ही हँस कर बोला, "तुम्हारी कार खराब हो गयी है ? सड़क पर खड़ी कार को देख कर मैं पहले ही समझ गया था." मैंने आगे बढ़ कर उससे हाथ मिलाया तथा अभिवादन किया. मुझे कुछ और कहने का मौका ही नहीं मिला, मारिया उसका हाथ थाम कर उसे एक तरफ ले गयी और धीमे स्वर में उससे बात करने लगी. क्या कह रही थी, ठीक से तो नहीं सुन पाया पर सांद्रो के मेरी तरफ सिर उठा कर देखने से समझ गया कि मेरे ही बारे में कोई बात थी. फिर सांद्रो मेरे पास आ कर बोला, "तुम कार की चिंता मत करो, मैं अभी जा कर देखता हूँ कि उसमे क्या खराबी है ?" फिर मेरे दाँये हाथ को अपने दोनो हाथों में भींच कर बोला, "अगर तुम जूलिया को कुछ समझा सको तो तुम्हारा एहसान हम कभी नहीं भूलेंगे."

"कौन है जूलिया और मैं उसे क्या समझा सकता हूँ, यह तो मैं नहीं जानता लेकिन अगर मैं आप के उपकार का बदला चुका सकता हूँ तो मुझे बहुत खुशी होगी", मैंने कहा.

मारिया ने कहा, "जूलिया हमारी बेटी है. उसे आपसे बात करके बहुत प्रसन्नता होगी. वह अपने एक मित्र के साथ बाहर गयी है, पर मैं उसे टेलीफोन करके अभी बुलाती हूँ."

वे दोनो बार बार एक ही बात को दोहरा रहे थे, पर मेरी समझ में नहीं आ रहा था.

सांद्रो मुझसे कार की चाबी ले कर, अपना औजारों का थैला उठा, कार ठीक करने चला गया. मैं टेलीफोन के सामने सोफे पर बैठ गया, पर मन ही मन जूलिया के बारे में सोच रहा था. ऐसी क्या विषेश बात थी जो वह मुझसे करना चाह सकती थी ?

अधिक इंतजार नहीं करना पड़ा उसका. पहली बार उसे देखा तो बिजली का धक्का सा लगा. उसके अभिवादन का उत्तर तक नहीं दे पाया था, बस हक्का बक्का उसे देखता रह गया था. दुबली पतली, छोटा कद, गहरा साँवला रंग और कंधे पर बिखरे काले घने बाल. बड़ी बड़ी काली आँखों वाली ऐसी बंगाली लड़कियाँ मैंने पहले भी अनेक देखीं थीं पर यह यहाँ क्या कर रही थी ? मेरे पास आ कर उसने हाथ बढ़ा कर पूछा "सेई इंदियानो?" यानि आप भारतीय हैं ?

मैं बोल नहीं पाया केवल सिर हिला कर रह गया. मेरे चेहरे पर अविश्वास का भाव देख कर वह खिलखिला कर हँस पड़ी. बोली, "लगता है माँ ने तुम्हें मेरे बारे में ठीक से बताया नहीं. मैं भी शायद थोड़ी सी भारतीय हूँ. कम से कम, जन्म तो भारत में ही हुआ था. पर भारत के विषय में मुझे अधिक जानकारी नहीं है. जब सात आठ महीने की थी तो यहाँ आ गयी थी."

अब पहेली कुछ समझ में आने लगी थी. चौदह पंद्रह बरस की लगती थी. सिर पर ऊनी टोपी, गले में लिपटा लाल और सफेद धारियों वाला लंबा मफलर, रंग बिरंगी चारखानो वाली गद्देदार जैकेट और उसके नीचे, काले चमड़े की तंग मिनी स्कर्ट और घुटनों तक लंबे चमड़े के के जूते. मेरी घूरती हुई दृष्टि पर वह जरा झैंप गयी. आँखें झुका कर, निचले होंठ को दांतों तले दबाने का भाव एकदम से भारतीय लगा. मारिया ने बताया, "हम लोगों की अपनी संतान नहीं थी और हम लोग एक बच्चा चाहते थे. यहां गांव के पादरी के कुछ मित्र थे कलकत्ता में,उनकी सहायता से हम इसे पा सके."

"आप लोग कलकत्ता गये थे ?" मेरा प्रश्न सुन कर वह मारिया हँसते हुए बोली, "नहीं, हम लोग तो केवल रोम तक गये थे. कलकत्ते से एक पादरी इसे साथ लेकर आये थे. हमें तो सिर्फ एक बच्चा चाहिये था,चाहे कैसा भी, और हमारी किस्मत में जूलिया ही लिखी थी."

जूलिया को देखा तो उसके चेहरे का भाव देख कर चौंक गया. वह मरिया को अजीब तरह से देख रही थी. जब उसे महसूस हुआ कि मैं उसे देख रहा हूँ तो उसने आँखें नीचे झुका लीं. मारिया कह रही थी, "जूलिया के यहाँ आने ने हमारे जीवन को बदल दिया है. बहुत सी खुशियाँ और संतोष मिले हैं हमें. इसके बिना इतने दिन हम कैसे जिये, यह अब सोच नहीं पाती. हमारे लिए तो यह हमारी बेटी है, गोद ली हुई नहीं. एक दिन भी इसे न देखें तो मेरे पति व्याकुल हो जाते हैं. स्कूल में भी यह बहुत तेज है, सभी इसकी बुद्धि की प्रशंसा करते हैं. बस अब कुछ दिनों से इसकी जिद ने हमें चिंता में डाल दिया है. कहती है कि कलकत्ता जा कर अपनी असली माँ ..."

Image from Dharmyug, 1983जूलिया ने उसे बात नहीं पूरी करने दी. तीखे स्वर में बोली, "बस भी करो अब! जिस बात को नहीं समझ सकती हो, उसे मत करो."

मारिया की आँखों में आंसू छलक आये. आहत स्वर में बोली, "शायद हम लोग तुम्हें समझ नहीं पाते, पर तुम भी तो हमें समझना नहीं चाहती. तुम जो भी कहो, तुम हमारी बेटी हो और हमें ठुकरा कर, हमसे दूर जाना चाहती हो. यह नहीं सोचती कि तुम्हारे बिना हमारा क्या होगा ?"

जूलिया का क्रोध जैसे ज्वार की तरह उठा था, वैसे ही उतर गया. धीरे से मारिया के गाल को चूमती हुई बोली, "क्षमा करो मां, तुमसे फिर से झगड़ा करना नहीं चाहती." अपनी जेब से मार्लबरो का पैकेट निकाल कर, एक सिगरेट जला कर बोली, "मां मैं इनसे अकेले में बात करना चाहती हूँ."

जूलिया का कमरा पहली मंजिल पर था. सीढ़ियां चढ़ते समय सोच रहा था कि अगर यह भारत में होती तो क्या यूं एक अजनबी पुरुष को अपने कमरे में ले जा पाती ? मेरे विचारों की तंद्रा को तोड़ते हुए जूलिया ने पूछा, "आपने कलकत्ता देखा है ?"

उसके इतालवी तरीके से कलकत्ता को कलकूता कहने पर मुझे हँसी आ गयी. बोला, "दो बार गया हूँ वहां, पर बहुत अच्छी तरह से नहीं जानता."

उसका कमरा बहुत सुंदर था. दीवारों पर आसमानी रंग का कागज, उन पर टंगे सुंदर चित्र, दरवाजे और खिड़कियों पर नीले रंग के परदे. एक तरफ नीले वेलवेट के बेडकवर से ढ़का बिस्तर, खिड़की के साथ पढ़ने की मेज और कुर्सी, एक कोने में रखा गिटार और जलती हुई लकड़ियां. आग की रोशनी में उसका चेहरा बहुत सलोना लग रहा था. सभी सुख तो थे यहां पर, कलकत्ता में क्या खोजना चाहती थी वह ?

वह खिड़की के पास जा कर खड़ी हो गयी. मैं वहीं बिस्तर पर ही बैठ गया. वह सिगरेट का अंतिम कश खींच कर उसे आग में फैंकते हुए बोली, "किसी भारतीय से बात कर पाने की मेरी बहुत इच्छा थी. यहां गांव में तो कोई विदेशी नहीं आते. फ्रांस से आने जाने वाले यात्री कभी कभी गांव में रुकते हैं, पर कभी किसी भारतीय को मैंने नहीं देखा. मैं कलकत्ता जा कर अपनी असली मां को खोजना चाहती हूँ, पर ये लोग समझ नहीं पाते हैं. इनसे मुझे कोई शिकायत नहीं है और मां और पिता जी दोनो को बहुत प्यार करती हूँ. पर मेरे कलकत्ता जाने का इनके लिए एक ही अर्थ है कि मैं इन्हें प्यार नहीं करती और इनके प्यार में कोई कमी रह गयी है."

"तुम लोगों को अधिक तो नहीं जानता, पर आज जितना देखा सुना है, उससे इतना अवश्य समझा है कि मारिया और सांद्रो तुम्हें बहुत चाहते हैं. तुम क्यों कलकत्ता में अपनी असली मां को खोजना चाहती हो, यह नहीं समझ पाया हूँ ?" मैंने कहा.

वह मेरी तरफ मुड़ी और एक लंबी साँस लेकर बोली, "सब लोगों से अलग होना कितना कष्टदायक हो सकता है, यह शायद आप नहीं समझ सकते. छोटी सी थी तभी समझ गयी थी कि मैं इन सब से अलग हूँ. पहले सोचती थी कि काश, भगवान अगर मुझे गोरा कर दें तो मैं इनकी बेटी लगने लगूँ. पर धीरे धीरे इस बात की समझ आ गयी कि मैं कभी गोरी नहीं हो सकती."

उसके स्वर की उदासी मन को अंदर तक छू गयी. एक बार यहां रेडियों पर एक गीत सुना था, "दी क्वाले कोलोरे ऐ ला पैले दी दियो".यानि भगवान की त्वचा का रंग कौन सा है? वह गीत सहसा याद आ गया. अपने देश में भी तो "गोरी कन्या" और गोरा करने वाली क्रीम के कितने विज्ञापन छपते हैं. फिर अगर यहां जूलिया को गोरों के बीच में अपने काले रंग के लिए कुछ सुनना पड़े, तो इसमें क्या आश्चर्य है? उससे पूछा, "काले रंग के कारण लोग तुमसे बुरा व्यवहार करते हैं क्या ?"

फीकी सी हँसी हँस कर बोली, "नहीं यह बात नहीं, सब कहते हैं कि मेरा रंग बहुत सुंदर है. मेरा मित्र कारलो कहता है कि मुझ जैसी सुंदर लड़की और कोई हो नहीं सकती. पर यह रंग मेरे मां पिता जी के बीच दीवार बन गया है. इसकी वजह से मैं कभी उनका हिस्सा नहीं बन सकती. अजनबी लोग भी मुझे देखते ही पहली नजर में समझ जाते हैं कि मैं गोद ली हुई हूँ. लोग अन्य बच्चों को देखते हैं तो कहते हैं, इसकी नाक अपनी मां पर गयी है, इसके बाल अपनी नानी जैसे हैं, तो सोचती हूँ, मैं किसके जैसी हूँ? क्या अपनी मां जैसी ? किसके जैसी नाक है मेरी ? और जब इन प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते, तो भीतर से बहुत अधूरापन लगता है ... मुझे भी अपना बीता हुआ कल चाहिये, जिसका मैं हिस्सा महसूस कर सकूँ."

पहली बार उन बातों के बारे में सोचा था, जिनके बारे में अब तक सोचने की जरुरत ही नहीं पड़ी थी. सब कहते हैं कि मैं अपने पिता से बहुत मिलता हूँ, पर अगर मुझे यह मालूम नहीं होता, तो कैसा लगता? कौन सी बेचैनी घेर लेती मुझे ?... लेकिन इन प्रश्नों के उत्तर कौन दे सकता है उसे ? आग की रोशनी में वह बहुत मासूम और निस्सहाय लग रही थी. बात बदलने के लिए पूछा, "तुम्हारे गोद लेने वाले कागजों में तुम्हारे माता पिता के बारे में क्या लिखा था ?"

मेरे प्रश्न ने उसकी किसी दुखती हुई रग को छू लिया था, फूट कर बोली, "उनमें लिखा है कि मैं अनब्याही मां की संतान थी. मिशनरी अस्पताल में पैदा हुई और वह वहीं मुझे छोड़ कर चली गयी."

समझ में नहीं आया कि उससे क्या कहूँ. वह भी चुपचाप मेरी तरफ देखती रही. अंत में उसी ने सन्नाटा तोड़ा, "अपने अवैध होने का मुझे कोई दुख नही है. यहां बहुत से लोग बिना विवाह के साथ रहते हैं और उनके बच्चे भी होते हैं. दुख तो इस बात का है कि उसमें साहस नहीं था कि सबसे सामने मुझे स्वीकार कर सकती. शायद मैं उसके लिए बोझ थी."

भारत की सामाजिक स्थिति के बारे में उसे कुछ नहीं मालूम था, तभी तो वह ऐसा सोच पायी थी. मध्यमवर्गीय, मां बनने चाली अनब्याही लड़की के लिए तिरस्कार से बचने के लिए, कूँए या तालाब के अतिरिक्त अन्य कौन सा स्थान था? जूलिया मुड़ कर, कोने में रखी एक किताबों की अलमारी में से कुछ कागज निकाल कर ले आयी और बोली, "यह हैं मेरे कागज !" उसके हाथ से कागज ले रहा था तो देखा उसकी बड़ी बड़ी काली आँखों में आँसू चमक रहे थे. स्वयं को रोक नहीं पाया, उसका हाथ थाम कर बोला, "तुम अपना सौभाग्य नहीं जानती, तभी रो रही हो. तुम्हारी भाग्यरेखा शायद बहुत प्रबल थी, जो तुम्हें यहां ले आयी. उस अनाथ आश्रम में ही होतीं तो अब तक या तो मर गयी होतीं, या फिर ऐसा जीवन जी रही होतीं, जिसकी अब तुम कल्पना भी नहीं कर सकती हो."

कुछ पल के लिए वह एकटक मुझे ताकती रही, फिर धीरे से अपना हाथ छुड़ा कर वापस खिड़की के करीब जा कर खड़ी हो गयी. कमरे में अँधेरा होने लगा था, पर आग की रोशनी में कागज पढ़ने में दिक्कत नहीं हुई. कागज के एक कोने पर छपा था, "पवित्र हृदय कैथोलिक आश्रम, कलकत्ता". नीचे लिखा था, "नाम जूली, कन्या, जन्मतिथि अज्ञात, धर्म अज्ञात, यह एक अनब्याही मां की संतान है, इसकी मां ने इसे आश्रम में जन्म दिया और यहीं छोड़ कर चली गयी."

सारी जीवन कथा, सिर्फ दो पंक्तियों में समा गयी थी.केवल इतने भर से यह लड़की कलकत्ता में किसको खोज पायेगी ? बोला, "इससे से किसी को खोज पाना बहुत कठिन होगा. आश्रम के लोग तो कुछ नहीं बतायेंगे."

खिड़की से बाहर गिरती बर्फ को देखते हुए धीमे स्वर में वह बोली, "कैसे खोजूँगी, यह तो मुझे भी नहीं मालूम, पर वहां जाकर एक बार कोशिश तो अवश्य करुँगी. मैंने पार्ट टाईम काम करके काफी पैसा इक्ट्ठा किया है, मेरी यात्रा के लिए बहुत है."

उसकी नासमझी पर मुझे थोड़ा सा गुस्सा आने लगा था, "जानती हो, कलकत्ता में कितने लोग रहते हैं? एक स्त्री को खोजना चाहती हो, जिसका नाम पता कुछ नहीं मालूम. यह तक नहीं मालूम कि वह जिंदा है या मर गयी, कलकत्ते की रहने वाली थी या बाहर कहीं से आयी थी? और उसे खोज भी निकालो, तो उसके अनब्याही मां होने का ढ़िंढ़ोरा पीट कर उसके जीवन में तुम जहर नहीं घोल दोगी ?"

मेरी तरफ मुड़ कर वह उग्र स्वर में बोली, "मैं उसके जीवन में कोई जहर नहीं घोलना चाहती, केवल एक बार उसे देखना चाहती हूँ. यह जानना चाहती हूँ कि मेरे पिता कौन थे, क्या करते थे? एक बार उसके मुँह से यह सुनना चाहती हूँ कि क्या उसने कभी अपने उस बच्चे के बारे में सोचा भी है जिसे वह अनाथ आश्रम में फैंक आयी थी. इतना अधिकार तो है मुझे."

किस मृगतृष्णा के पीछे भाग रही थी वह ! यह नहीं समझ पा रही थी कि बीते हुए कल को खोजने में आज और आने वाले कल, दोनो ही नष्ट हो सकते थे. यह सोच कर बोला, "मैं यह नहीं कहता कि तुम भारत मत जाओ. वहां तुम्हे जन्मदायी मां न भी मिले, जन्मभूमि तो मिलेगी ही, अपने रंग जैसे लोग भी मिलेंगे. पर तुम अभी बच्ची हो, सच्चाई का सामना कर पाओगी? उस दुनिया और यहां की दुनिया में बहुत अंतर है. एक बार किसी अनाथ आश्रम में रहने वाले बच्चों को देखोगी, तो अपना सौभाग्य समझ पाओगी. इस समय तुम बच्चों की तरह, कोई सपना या खिलौना खोज रही हो, लेकिन कीचड़ और गंदगी में डूबी वहां की गरीबी देखोगी, तो खुद से घृणा तो नहीं करने लगोगी?"

वह मेरी बातें बहुत ध्यान से सुन रही थी, बोली, "भारत के विषय में स्कूल के भूगोल में पढ़ा था. यहां घर पर यह लोग नहीं चाहते कि मैं भारत के बारे में कोई भी बात करुँ. शायद मुझे खोने से डरते हैं. जब छोटी थी तो अपने भारतीय होने पर मुझे बहुत गुस्सा आता था.बच्चे मुझे "इन्डियाना" कह कर छेड़ते थे और मेरे माथे पर लाल पेन से गोल निशान बना देते थे. मेरी गर्दन और छाती के निशानों का मजाक उड़ाते थे."

"कौन से निशान हैं गर्दन और छाती पर ?" मैंने पूछा, तो अपनी जैकेट के बटन खोल कर कमीज को ऊपर खींचते हुए वह मेरे पास आयी. गले और छाती पर जलने के निशान थे. कई वर्ष पहले जब सफदरजंग अस्पताल में काम करता था, तो ऐसे निशानों वाले बच्चे देखे थे. गांव के ओझा बच्चे की "पसली चलने" का यह इलाज जलती लकड़ी से दाग कर करते हैं.

वह कमीज को नीचे खींच कर बोली, "मालूम नहीं किस चीज के निशान हैं ये? मां मुझे कई डाक्टरों को दिखलाने ले गयी, पर किसी की समझ में नहीं आया कि ये किस चीज के निशान हो सकते हैं."

जूलिया के कागजों तथा इन निशानों में कोई बात थी, जो मेल नहीं खा रही थी. मैं बिना कुछ सोचे विचारे ही बोल पड़ा, "यह गांव के ओझा की चिकित्सा के निशान हैं. वे अगर बच्चे को न्यूमोनिया हो जाये, तो यह चिकित्सा करते हैं. लेकिन समझ में नहीं आ रहा कि तुम्हारे तन पर ऐसे निशान कहां से आ गये, मिशनरी अस्पताल में तो कोई इन सब में विश्वास नहीं करता."

वह चुपचाप मेरी बात सुन रही थी. यह सब उससे कह कर मैं उसके लिए नयी परेशानी तो नहीं खड़ी कर रहा था? वह अपने बारे में जो कुछ सोचती थी, उसे मैं अपने संदेह से नष्ट कर सकता था. पर अगर मैं उसके जीवन के बारे में कुछ जोड़ सकता था, तो उसे उससे छुपाना उसके साथ अन्याय होगा. अपने बारे में जानने का उसे पूरा अधिकार है, यह सोच कर बोला, "जूलिया हो सकता है कि तुम्हारे कागजों में जो लिखा है, वह सत्य न हो. अगर तुम आश्रम में पैदा हुई थी, तो उन्होंने तुम्हारी जन्मतिथि को अज्ञात क्यों लिखा था? और यह निशान तुम्हारे शरीर पर कहां से आ गये? इनका अर्थ तो सिर्फ एक ही है कि गांव में किसी ने तुम्हारी चिकित्सा गांव के ओझा से करवायी थी."

जूलिया की सांस तेज हो गयी, कांपते हुए स्वर में बोली, "इसका अर्थ है कि मैं अनाथ आश्रम में नहीं पैदा हुई थी, किसी गांव में थी. पर वहां से अनाथ आश्रम कैसे आ गयी ?"

"मैं कैसे कह सकता हूँ कि उस वक्त क्या हुआ था? हो सकता है कि कोई इलाज करवाने के लिए तुम्हें कलकत्ता ले आया हो और फिर पैसे न होने की वजह से या फिर तुम्हारे बचने की कोई आशा न देख कर तुम्हें वहीं छोड़ गया हो. यह भी हो सकता है कि किसी ने तुम्हें पैसे के लालच में बेच दिया हो. विदोशों में गोद लेने के लिए बच्चे भेजना भी तो एक व्यापार है."

उसके चेहरे पर खुशी झलक आयी थी, बोली, "अगर यह सच है तो मैं आप का उपकार कभी नहीं भूलूंगी. हो सकता है कि मां ही नहीं, मेरे पिता, भाई बहन, सारा परिवार किसी गांव में हो. मैं अवश्य उन्हें ढ़ूंढ़ निकालूंगी."

शायद मैं जरुरत से अधिक बोल गया था. सांद्रो और मारिया क्या सोचेंगे कि समझाने के बजाय, मैं उसे और भड़का गया था. वह परिवार खोजने का जो निर्णय ले रही थी, उसे पूरा कर पाना क्या आसान था? इसलिए बोला, "तुम यहां के गांवों के ख्याल से जिस तरह सोच रही हो, भारतीय गांव वैसे नहीं हैं. वहां एक परिवार को खोजना बहुत कठिन होगा. कलकत्ते के कूड़ों के ढ़ेर में हजारों बच्चे अनाथ घूमते हैं, उन सबकी तुम्हारे जैसी ही कहानी होती है. अगर किसी परिवार को खोज भी लोगी तो कैसे जानोगी कि वही तुम्हारा असली परिवार है?"

मेरी बात सुन कर उसका उत्साह ठंडा हो गया, बुझे से स्वर में बोली, "मैं अपने परिवार में, अपने असली माता पिता के साथ रहना चाहती हूँ. इससे बढ़ कर मेरे लिए और कोई खुशी नहीं हो सकती. मैं तो समझ रही थी कि आप सहायता करना चाहते हें, मेरे दुख को समझते हैं...."

मुझे क्रोध आ गया, "किस दुख की बात कर रही हो तुम? दुख तुमने अभी देखे ही नहीं हैं. जिन माता पिता के लिए इतनी व्याकुल हो रही हो, अगर तुम्हारे सामने आ जायें तो शायद उन्हें छूना भी नहीं चाहोगी. टूटी फूटी झौंपड़ी में एक दिन भी नहीं रह पाओगी. इतने सुख में पली हो इसलिए नहीं समझ पाओगी कि उन परिवारों के बच्चों को तुम्हारे जैसा जीवन सपने में भी नहीं मिलता. जिस परिवार में पैदा हुई थी अगर वहीं रहती तो समझ पाती कि दुख क्या है. न पेट भर खाना, न कपड़े, न पढ़ाई! लाखों छोटे छोटे बच्चे शहरों में झाड़ू बर्तन का काम करते हैं, भीख मागँते हैं, गलियों में मारे मारे फिरते हैं, दुत्कारे जाते हैं, अगर मर भी जायें तो कोई परवाह नहीं करता, कीड़े हैं एक मरेगा तो दो अन्य आ जायेंगे. ऐसे परिवार का हिस्सा बन पाओगी?"

लेकिन वह अपनी बात पर ही अड़ी थी, बोली, "हो सकता है कि मेरा परिवार ऐसा न हो."

"ऐसा नहीं था, तो तुम अनाथ आश्रम में कैसे आ गयी? वे निशान कहां से आ गये तुम्हारे तन पर? उस जीवन के बारे में तुम कुछ नहीं जानती, और वह जीवन तुम्हारे लिए नहीं है. लड़के वालों के सामने सज धज कर अपनी नुमाईश कर पाओगी? दहेज के लिए ताने सुन पाओगी? एक स्कूटर या फ्रिज के लिए जीवित जल पाओगी? रसोई में दिन भर अंगीठी के सामने बैठ पाओगी? अवश्य जाओ कलकत्ता या किसी अन्य भारतीय शहर में पर परिवार खोजने की बातें भूल जाओ. जिस नर्क से निकल कर आ गयी वापस उसी कीचड़ में क्यों खुद को डुबोना चाहती हो?" खुद पर गुस्सा आ रहा था कि क्यों उसकी चिंता अपने सिर ले रहा था.

जूलिया ने उत्तर नहीं दिया. मैं उठ कर खिड़की के पास गया. बाहर देखा, बर्फ गिरनी रुक गयी थी. आकाश धीरे धीरे साफ हो रहा था और बादलों के बीच में से संध्या के पहले तारे टिमटिमाने लगे थे. दूर दूर फैली बर्फ, अंधेरे में पिघली हुई चांदनी की तरह चमक रही थी. फिर खिड़की के नीचे अपनी कार खड़ी दिखाई दी. शायद सांद्रो ने उसे ठीक कर दिया था. अभी लियोन तक करीब दो घंटे की यात्रा और करनी थी. अगर जल्दी करता तो रात अधिक होने से पहले पहुँच सकता था. यह सोच कर अपना ओवरकोट उठा कर कमरे से बाहर आ गया. जूलिया अपनी जगह निश्चल बैठी थी.

नीचे आया तो मारिया ने पूछा, "जूलिया क्या कहती है?" कुछ उत्तर देते न बन पड़ा. सांद्रो ने बतलाया कि कार ठीक हो गयी थी. पैसे लेने से इन्कार कर दिया उसने. मैंने हाथ मिला कर विदा ली और बाहर निकल आया.

कार का दरवाजा खोल रहा था तो ऊपर जूलिया के कमरे की तरफ देखा. वह खिड़की पर खड़ी थी. अंधेरे में उसका चेहरा नहीं दिख रहा था. मैंने उसे पुकार कर कहा, "मैंने अपना पता तुम्हारी मां को दे दिया है. अगर मुझे पत्र लिखोगी तो उत्तर अवश्य दूँगा. भारत जाने से पहले मुझे अवश्य लिखना. मैं तुम्हें अपने घर का पता दे दूँगा. वहां मेरी मां तुम्हें देख कर बहुत प्रसन्न होगी और तुम्हें घुमाने के लिए तुम्हारे बराबर की मेरी एक छोटी बहन भी है."

उसने कोई उत्तर नहीं दिया. मैं फिर और नहीं रुका. कार मोड़ते समय, आखिरी बार देखा. अंधेरे में ठीक से तो नहीं दिख रहा था पर लगा वह हाथ हिला रही थी. आज चार महीने हो चुके हैं, उससे मिले हुए. मैंने कलकत्ता में रहने वाले अपने मित्रों को लिखा था कि उस आश्रम में पता लगाने की कोशिश करें, पर अभी तक उसका कोई नतीजा नहीं निकला है. उन मृगनयनी आँखों ने कितने विश्वास से मुझसे सहायता माँगी थी, इसीलिए तो यह कहानी लिखी है. शायद आप में से कोई जूलिया को उसका खोया हुआ कल वापस दे सके.

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