क्षमा (कहानी) सुनील दीपक 2005

जुलाई 2005, अमरीका

मधुकर उन्हें व्हील चैयर पर बैठा छोड़ कर, कुछ खाने पीने के लिये ढूढंने गया. बीमारी और थकान से वसुंधरा ने आँखे बंद कर लीं. सारा बदन दर्द कर रहा था. पिछले तीन महीनों में उनका वज़न भी बहुत कम हो गया था. खाँसी आती तो उनका सारा बदन हिल जाता. सुबह 7 बजे एम्बुलैंस उन्हें ले कर बास्टन से चली थी. मधुकर एम्बुलैंस के पीछे पीछे अपनी गाड़ी में आया था. प्रदीप, मधुकर के स्कूल के दिनो का साथी और डाक्टर मित्र जो बास्टन के अस्पताल में काम करता था, सब कुछ उसी की सलाह से हो रहा था. दिल्ली में आल इडिंया इस्टिट्यूट वालों ने तो जवाब ही दे दिया था. डा. जोशी ने स्पष्ट समझाया था, "बहुत बढ गया है कैंसर, अब कुछ नहीं हो सकता. आपरेश्न नहीं कर सकते. आप चाहें तो कीमोथेरेपी की कोशिश कर सकते हैं, पर इस तरह के कैंसर पर कीमोथेरेपी का क्या असर होगा, कह नहीं सकते. उसमे भी जान का खतरा है."

अंत में उन्होंने केवल छाती से पानी निकाला था, जिससे कम से कम, उन्हें कुछ दिनों के लिए साँस लेने में कुछ आसानी हो गयी थी.

"लावण्या, मुझे अपने घर जाना है", उन्होंने रुँआसी हो कर कहा था, "जब मरना ही है तो अपने घर में ही मरना चाहती हूँ. यहाँ अस्पताल में तो मैं पागल हो जाँऊगी. एक तरफ तो कहते हैं कि कुछ हो नहीं सकता तो फिर रोज़ क्यों मेरा खून लेने आ जाते हैं? बार बार सूईँया चुभातें हैं. नहीं मुझे देहरादून जाना है."

"ऐसे कैसे हो सकता है मम्मी, वहाँ बियाबान में अकेले कैसे रहोगी?" लावण्या बोली थी, "अस्पताल में नहीं रहना तो ना सही पर मैं तुम्हें अकेले देहरादून नहीं जाने दूँगी. नहीं, तुम हमारे यहाँ ही रहो. कम से कम यहाँ कुछ भी जरुरत हो तो तुरंत दो मिनट में अस्पताल पहुँच सकते हैं."

उनको अपने देहरादून के बारे में इस तरह सुनना अच्छा नहीं लगा. "बियाबान? तुम उस बियाबान में बड़ी हुई हो, वहाँ स्कूल गयी हो. कुछ दिन दिल्ली क्या रही, सब कुछ बियाबान हो गया तुम्हारे लिए! और अकेली क्यों रहूँगी मैं, लख्खी है न मेरी देख भाल के लिये?", देहरादून में अपना घर था, वहाँ वह चाहे कुछ भी करे, कोई उसे रोक टोक नहीं सकता. वसुंधरा को कुछ यह भी डर था कि उनकी बीमारी के पीछे भाग भाग कर बेटी का अपना ही घर न बिगड़ जाये. इसलिये उन्होंने बेटी को समझाने की कोशिश की थी, पर लावण्या ने उनकी एक नहीं सुनी थी.

लाव्णया ने प्रेम विवाह किया था. माधवन, उसका पति तमिलनाडू का था. "छी मम्मी, कैसे सोचा तुमने कि माधवन तुम्हें अकेला देहरादून जाने देगा? तुम्हारे मन में ऐसी बात कैसे आयी ? यह मत कहना कि तुम "बेटी का घर" जैसी बातें सोचती हो. कैसी दकियानूसी पुराने ज़माने की बातें सोचती हो तुम मम्मी. वो तो मुझसे दिन में कितनी बार टेलीफोन कर के तुम्हारा हाल पूछता है. अगर मैं उसे बताऊँगी कि तुमने ऐसा सोचा तो उसे बहुत दुख होगा."

माधवन था तो अपनी पत्नी का दीवाना और सास की इज्जत भी बहुत करता था. पर बीमारी की तीमारदारी में क्या उन पति पत्नी का जीवन नहीं बिगड़ जायेगा? कहीं बाहर जाना हो, फ़िल्म देखने या दोस्तों के यहाँ, उनकी वजह से कुछ नहीं कर पायेंगे. पर फ़िर लावण्या के यहाँ अधिक रहने की नौबत ही नहीं आयी थी, क्योंकि मधुकर ने उन्हें अमरीका बुला लिया था. "नहीं माँ, मैने प्रदीप से बात कर ली है. मैं तुम्हें टिकट भेज रहा हूँ. सीधी फ्लाईट है, बस दिल्ली में बैठो और बास्टन में उतरो", मधु ने उनकी एक नहीं सुनी थी.

मधुकर उन्हें हमेशा माँ ही बुलाता था और लावण्या मम्मी. दोनो थे भी कितने भिन्न. मधु शर्मीला, अंतरमुखी, भोला सा और लावण्या ज़िद्दी, मुँहफट्ट, हमेशा दोस्तों सहेलियों से घिरी हुई. दोनो की उम्र में कुछ अंतर भी था. मधुकर सात साल का था जब लावण्या पैदा हुई थी. मधु बहन से प्यार तो बहुत करता था और लावण्या भी भाई को अपना नायक कहती थी, पर दोनों के बीच वह दोस्ती नहीं थी जो उम्र में करीब होने से भाई बहन में आ जाती है. लावण्या की एक साल पहले ही शादी हुई थी, जब कि मधुकर हर बार शादी की बात टाल जाता था. अब तो 42 वर्ष का हो गया था और वसुंधरा ने भी उससे शादी की बात करने की कोशिश छोड़ दी थी.

वह पहले भी कई बार मधुकर के पास अमरीका जा कर रह आयीं थी. जब सुधाकर ज़िन्दा थे तो पति पत्नी दो बार साथ साथ अमरीका गये थे और सुधाकर के बाद, वह अकेले भी यह यात्रा कर चुकीं थीं. इसलिये उन्हें अकेले यात्रा करने में कोई डर तो नहीं था पर फ़िर भी उन्होंने मधुकर से कहा था, "बेटा, कहाँ परदेस में मैं इस बीमारी को ले कर आऊँगी? यहीं ठीक हूँ मैं, जैसी भगवान की इच्छा होगी वही होगा. वहाँ अनजाने लोगों के बीच में ठीक से मर भी नहीं पाऊँगी."

मधुकर नहीं माना था और लावण्या ने भी अपने भाई का ही साथ दिया था. "मरोगी क्यों ? दद्दा वहाँ ठीक होने के लिए बुला रहा है तुम्हें. ऐसी बात लाओगी मन में, तो ठीक कैसे होगी? क्या बूढी दादी हो तुम? अभी तुम्हारी उम्र ही कितनी है, इतने में तो औरतें वहाँ बच्चे पैदा करना शुरु करती हैं. फ़िर तुम तो हमेशा हिम्मत वाली थी, ऐसी डरपोक कब से हो गयी? बिना कोशिश किये यूँ ही मरने में क्या हिम्मत है भला? वहाँ जा कर कोशिश करना ठीक है. प्रदीप दादा ने अगर दद्दा से कहा है कि इलाज हो सकता है, तो कुछ तो सोच कर ही कहा होगा. मुझे अपने बच्चे के लिये नानी चाहिये. तुम्हें उसके लिये खुद को ठीक करना ही पड़ेगा."

"तू माँ बनने वाली है?" वह हैरान हो गयी थीं. काम करने वाली लावण्या ने तो हमेशा यही कहा था कि अभी तीन चार साल तक उसे कोई बच्चा नहीं चाहिये.

लावण्या हँस पड़ी और फ़िर गम्भीर हो कर बोली, "मम्मी अभी तो कुछ नहीं होने वाला है, पर तुम अगर इलाज के लिये अमरीका चली जाओगी तो तुमसे वादा करती हूँ कि तुम्हारे वापस आने पर मैं तुम्हें तुम्हारा नाती अवश्य दूँगी."

माधवन ने भी लावण्या का ही साथ दिया था. मज़ाक करते हुए कहा, "मम्मी, अब आप न नहीं कर सकतीं. यह तो हमारे परिवार के भविष्य का सवाल है. आप अमरीका से इलाज करवा करवा कर, ठीक हो कर आईये, तो अपना भी परिवार बने."

अचानक उन्हें लगा कि पीछे से मधुकर की आवाज़ आ रही हो और उनकी यादों की लड़ी टूट गयी. उन्होंने व्हील चैयर से पीछे मुड़ कर देखा पर वहाँ मधुकर नहीं दिखा. बस दो लोग थे, एक सत्रह अठारह साल का लड़का और उसी उम्र की एक लड़की, जो आपस में बात कर रहे थे. लड़का सांवला था, भारतीय चेहरा मोहरा लगता था, कुछ जाना पहचाना सा लगा. लड़की तो देखने में चीनी या जापानी सी लगती थी. दोनो उनके सामने से निकले और उनकी तरफ बिना देखे आगे निकल गये. बरामदे के अंत में एक दरवाज़े के बाहर लड़की रुक गयी और लड़का दरवाज़े पर हलकी सी दस्तक दे कर अंदर चला गया. वो उसी तरफ देख रहीं थी कि पीछे से मधुकर भी आ गया, हाथ में काफी का गिलास उठाये.

"मधु, जहाँ वह चीनी लड़की खड़ी है, वहाँ एक लड़का भी था. उसकी आवाज़ बिल्कुल तेरे जैसी है, पीछे से सुना तो लगा कि मानो तू बोल रहा हो", वह खुद को रोक नहीं पायीं. मधुकर ने सिर हिला दिया, पर वह कुछ और ही सोच रहा था, पूछा, "अंदर से किसी ने तुम्हें बुलाया नहीं अभी तक? कुछ ज्यादा ही देर लग गयी."

तभी जिस कमरे के सामने वे लोग इंतज़ार कर रहे थे, उसमें से एक नर्स बाहर आयी और उन्हें अंदर चलने के लिये कहा. मधुकर उनकी व्हील चैयर को धक्का दे कर अंदर ले गया. अंदर एक लम्बी मेज़ के आस पास चार डाक्टर बैठे थे, और सामने एक श्वेत स्क्रीन पर बहुत सारे एक्सरे लगे थे. मधुकर ने बास्टन से लाये सभी कागज़ उस नर्स को दे दिये. फिर उसी नर्स ने मधुकर को बाहर जाने के लिये कहा. "माँ, मैं नीचे जा कर कैफे में ही इंतज़ार करुँगा. यह लोग तुमसे जो भी पूछें ठीक ठीक बता देना. मैंने इन्हें अपना मोबाईल का नंबर दे दिया है, कहते हैं कि कुछ घंटे लगेंगे सारी जाँच होने मे. जब सब काम हो जायेगा तो मुझे बुला लेंगे", उन्हे हौंसला दे कर मधुकर कमरे से चला गया.

डाक्टर वसुंधरा से सवाल पूछने लगे. उनमें से एक डाक्टर भारतीय थे. जब वसुंधरा को बाकी के डाक्टरों की कोई बात समझ नहीं आती, तो वह भारतीय डाक्टर उसे दोहरा कर उन्हें समझा देते. काफ़ी देर सवाल जवाब और उनके कागज देखने के बाद, उन्हें कपड़े उतार कर एक गाऊँन पहनवा कर एक बिस्तर पर लिटा दिया गया और चारों डाक्टरों ने उनका चैकअप किया. चैकअप के बाद उन्होंने अपने कपड़े पहने और पर्दे के पीछे से निकल कर आयीं तो देखा कमरे में एक अन्य डाक्टर आ गयी थी, जो उनकी तरफ पीठ किये बाकी के डाक्टरों से धीमे स्वर में कुछ बात कर रही थी और सभी लोग मुस्करा रहे थे. पहले वाले डाक्टरों में से एक बोला "यही तो मज़ा है बच्चों का, इतनी जल्दी बड़े हो जाते हैं कि मालूम ही नहीं चलता."

वसुंधरा पर्दे के पास ही झिझक कर रुक गयीं. डाक्टर लोग शायद अपनी ही कोई बात कर रहे थे. "मिसिज वडावन, आईये यहाँ बैठिये", नर्स ने उनसे कहा. वह आगे बढ़ ही रहीं थीं, जब नयी आयी लेडी डाक्टर उनकी तरफ मुड़ी. वसुंधरा को देख कर एक क्षण में ही उसके चेहरे का रंग उतर गया, और वसुंधरा भी पत्थर की तरह खड़ी रह गयी. इतने वर्षों के बाद मिलने के बाद भी दोनों ने एक दूसरे को तुरंत पहचान लिया था. इस तरह अचानक इतने सालों के बाद ऐसे मिलना होगा मिरियम से, यह तो कभी नहीं सोचा था.

पहले मिरियम ने ही स्वयं पर काबू किया. गंभीर मुख से बिना कुछ कहे, मुड़ कर मेज पर रखे कागज उठा कर उन्हें पढ़ने लगी, मानो उन्हें जानती ही न हो. "प्लीज सिट डाऊन मिसिज वडावन", नर्स फिर बोली तो वह चुप चाप कुर्सी पर बैठ गयीं. मिरियम यहाँ है, इस अस्पताल में! अब क्या होगा ? अगर मधुकर ने उसे देख लिया तो क्या होगा? उनके मन में तूफान सा उठ आया था. सिर घूम गया. लगा चक्कर खा कर गिर जायेंगी.

"डाक्टर थोमस हमारी एन्स्थटिस्ट हैं, अंतिम निर्णय इनका ही है कि हम आप का आप्रेशन कर सकते हैं या नहीं!" एक डाक्टर ने हँस कर मिरियम की तरफ इशारा कर के कहा, पर वसुंधरा कुछ सुन समझ नहीं पा रही थी. बार बार एक ही विचार आता मन में, मिरियम यहाँ है, अगर मधु ने देख लिया तो अनर्थ हो जायेगा.

मिरियम ने उनकी तरफ एक बार भी नहीं देखा. कुछ देर बाकी डाक्टरों से बात कर बोली कि दाखिल होने के बाद वार्ड में जा कर देखेगी क्योंकि अभी उसे एक जरुरी काम था, और फिर चली गयी. जाते जाते भी उनकी तरफ नज़र उठा कर नहीं देखा. थोड़ी देर के बाद नर्स ने मधुकर को बुला लिया और उन्हें अस्पताल के एक कमरे में भेज दिया गया. कमरे से जब नर्स चली गयी तो मधुकर ने खुशी से उन्हें बाहों में भर लिया. "सुना तुमने माँ, वह कह रहे हैं कि वह तुम्हारा आप्रेशन करेंगे? तुम्हारे ठीक होने की आशा है उन्हें. बस कुछ और टेस्ट करेगें और तीन चार दिनों में आप्रेशन हो जायेगा. मैं अभी कार से तुम्हारा सब सामान ले आता हूँ." इसी आशा से तो वे बास्टन से आये थे और वसुंधरा अस्पताल में रहने के लिए अपना सब सामान साथ ले कर आयी थी.

वसुंधरा कुछ बोल नहीं पायीं मानो मधुकर की बात सुनी ही न हो. मन का तूफान थमने का नाम नहीं ले रहा था. कुछ भी हो, ऐसा कुछ करना होगा कि यह मिरियम से न मिले, उन्होंने स्वयं से कहा.

"क्यों माँ, आप्रेशन के बाद कीमोथैरेपी से अभी से डर लग रहा है?" मधु समझ गया था कि माँ अचानक परेशान हो गयीं थीं पर वह परेशानी का करण नहीं समझ पाया. इतनी अच्छी खबर से तो उन्हें भी खुश होना चाहिये था. "डरने की कोई बात नहीं माँ, भगवान चाहेगा तो अब सब ठीक ही होगा. कह रहे थे 70 प्रतिशत चाँस है कि तुम इलाज के बाद पाँच साल बिना बीमारी के जियोगी. 70 प्रतिशत चाँस! मेरा मन कहता है कि तुम ठीक हो जाओगी."

"तुम घर चले जाओ मधु. मैं थक गयी हूँ थोड़ा सोने से शायद कुछ तबियत ठीक हो जाये.", आखिरकार वसुंधरा बोली, "जिस दिन आप्रेशन होगा आ जाना."

"क्या कह रही माँ, तुम्हें यहाँ अकेला छोड़ कर मैं वापस बास्टन चला जाँऊ? यहीं होटल में एक कमरा ले लूँगा. कुछ भी जरुरत हो तो यहाँ तुम्हारे पास कौन आयेगा?"

"नहीं रे, अभी क्या जरुरत है, जरुरत तो आप्रेशन के बाद होगी. तब तो तुझे यहीं रहना पड़ेगा. अभी से, बिना वजह के अपने काम के दिन बरबाद करने की क्या ज़रुरत है? यहाँ मेरे पास तो तुम्हें रहने नहीं देंगे, सुबह शाम बस थोड़ा सा मिलने के लिए तू सारा दिन कहाँ होटल में बैठा रहेगा? और मुझे यहाँ क्या होगा, इतनी नर्सें और डाक्टर हैं, कुछ भी बात होगी तो तुझे बुला लेंगे." उन्होंने कोशिश करके, प्यार से मुस्करा कर मधुकर की बाजू पर हाथ फ़ेरा, "जिस दिन आप्रेशन होगा उसके बाद छुट्टी ले लेना. मुझे तो यहाँ सारा दिन बस आराम ही करना है और मैं अपने पढने के लिये साथ में किताब भी तो लायी हूँ."

अंत में मधुकर को ही हार माननी पड़ी. कार से माँ का सामान ले आया और माँ को एक बार फ़िर बाहों में जकड़ कर दो दिन में वापस आने की कह कर वह चला गया. उसके जाने के बाद, वसुंधरा सिर पर चादर तान लेट गयी. बार बार उनके सामने मिरियम का चेहरा आ जाता. यह उनकी बीमारी ने कैसा अनर्थ करा दिया था! वह तो अच्छा हुआ कि मधुकर ने उसे नहीं देखा वरना तो और भी न जाने क्या होता.

फरवरी 1987, देहरादून

"लख्खी, यह कैसे सफाई की है, ज़रा देखो इस मेज़ पर कितनी धूल जमा हो रही है? जाओ गीला कपड़ा ले कर आओ और इसे अभी साफ करो", वसुंधरा ने आवाज़ लगायी.

"अच्छा मम्मी, मैं जा रही हूँ, शाम को देर से आऊँगी. आज परमजीत के साथ हम लोग फिल्म देखने जा रहें हैं." लावण्या ने पुकारा और झट से बाहर निकल गयी.

"अरे कैसी लड़की है यह, बना कुछ खाये ही स्कूल चली गयी. सुनो बबली बिना खाना खाये कहाँ जा रही हो? चलो पहले कुछ खा लो, नहीं तो फिर रास्ते में चक्कर खा कर गिर जाओगी", वसुंधरा बेटी के पीछे भागीं.

गेट पर लावण्या गुस्से से ठिठक कर रुक गयी, "ओफओ, मम्मी तुम भी! कितनी बार कहा तुम्हें, मुझे बबली नहीं बुलाया करो. लावण्या नाम है मेरा."

"ठीक है आगे से लावण्या ही बुलाऊँगी पर पहले कुछ खाओ तो सही."

पर लावण्या नहीं रुकी. देर हो रही है, कह कर चली गयी. वसुंधरा वहीं ड्राईंग रुम में सोफे पर बैठ गयीं. "क्या यही जीवन है, पति विदेश में, बेटा विदेश में और बेटी जो कुछ नहीं सुनती, सारा दिन बाहर रहती है? किसके लिए बनाऊँ पकाऊँ, अपने और लख्खी के लिए? इतना बड़ा घर, भूतों सा, खाली!"

शादी के बाद से धीरे धीरे सुधाकर अपने काम में वयस्त होता गया था और अपने घर, पत्नी और बच्चों के लिये उसके पास समय नहीं था. काम के सिलसिले में वह अक्सर टूर पर भारत में ही और विदेश यात्राओं पर भी जाता. चूड़ियाँ, कँगन आदि के निर्यात का काम था और वह विदेशी खरीददारों और कारीगरों के पीछे अक्सर घर से बाहर रहता. पहले कम से कम बच्चे तो थे घर में, जिनके आसपास भागा भागी में दिन निकल जाते थे. पहले तो मधुकर इंजिनियरिंग की पढाई में होस्टल चला गया था और अब पिछले एक साल से लंदन में था. बस लावण्याँ बची थी घर में, पर वह भी बड़ी हो रही थी. कुछ ही दिनों की बात है, फिर वह भी अपने पँख पसार के कहीं उड़ जायेगी. अभी 46 साल की तो है वसुंधरा, क्या अभी से उसे सन्यास और धार्मिक कीर्तन इत्यादि में ही मन रचाना पड़ेगा ? यही सोच रही थी वसुंधरा कि टेलीफोन की घंटी बजी.

मधुकर था, लंदन से टेलीफोन कर रहा था.

"क्या हुआ, सब ठीक तो है न ?" वसुंधरा का मन खटका. मधु तो हमेशा शाम को ही टेलीफोन करता था ताकि पापा, बहन सबसे बात कर सके. तो आज यह टेलीफोन, सुबह सुबह कैसे ?

"हाँ माँ, सब ठीक है, बहुत अच्छा है. तुम्हें एक अच्छा समाचार देने के लिये फोन किया है."

अच्छा समाचार यही था कि मधुकर को लंदन में कोई लड़की मिल गयी थी, जिससे वह शादी करने की सोच रहा था. अंग्रेज है क्या, वसुंधरा ने पूछा था. तो मधु ज़ोर से हँस दिया था, बोला, वैसा ही कुछ समझो. रिया नाम बताया था उस लड़की का. कुछ समझ नहीं आया वसुंधरा को. "वैसा ही का क्या अर्थ? या तो वह अंग्रेज़ है या नहीं है!" बाद में धीरे धीरे सब समझ आया था. मधु को जो लड़की मिली थी वह थी तो भारतीय ही पर ईसाई थी और मधुकर के कुछ साल बड़ी भी थी. डाक्टर थी और लंदन में पोस्ट ग्रेजुऐट की पढ़ाई कर रही थी. उसका परिवार नागपुर का था.

मधुकर को अपने पापा से कुछ डर लगता था इसलिये घर में अपने प्यार के बारे में सबसे पहले उसने माँ से ही बात की थी. टेलीफोन पर कहा था उसने, "माँ मैं रिया को अपने साथ ले कर घर आना चाहता हूँ, तुम प्लीज़ पापा से बात कर के उन्हें सब समझा दो."

वसुंधरा ने बात की थी पति से और सुधाकर ने कोई आपत्ति नहीं उठाई थी, बस इतना कहा था, "ईसाई है तो क्या हुआ, अगर हमारे परिवार में घुलमिल कर रह सकती है तो मैं इनकार नहीं करुँगा. अगर शादी के बाद पढ़ाई स्माप्त होते ही वे दोनों वापस यहाँ देहरादून में आ कर रहेंगे तो मुझे यह विवाह मंजूर है. लेकिन अगर वे दोनो शादी के बाद वहीं इंगलैंड या अमरीका में रहना चाहते हैं तो उन्हें हमारी रज़ामंदी की कोई ज़रुरत नहीं, जो उनके मन में आये वो करें."

अगर वसुंधरा पहले जानती मधुकर किसे साथ ला रहा था तो तुरंत कोई न कोई बहाना ढ़ूढ़ लेती कि वह शादी न हो पर वह रिया नाम से धोखा खा गयी थी. फिर मधु ने कहा था कि लड़की का परिवार नागपुर का है, इससे भी उन्हें धोखा हुआ. जिसे मधुकर रिया बलाता था उसका पूरा नाम था मिरियम थामस. यह वसुंधरा ने तभी समझा था जब देहरादून के रेलवे स्टेश्न पर उन्होंने मधुकर को मिरियम के साथ पहली बार देखा था.

जुलाई 2005, अमरीका

दोपहर में आयी मिरियम. वसुंधरा हाथ में किताब लिये हुए ही सो गयी थी, पर कच्ची नींद थी. उस कमरे में दो ही बिस्तर थे. दूसरी ओर कौन है, वह अभी तक नहीं देख पायीं थी, बीच में परदा सा जो लगा था. दूसरी ओर से लगातार कुछ मशीनों के चलने की आवाज आती, छँ...छक्क, छँ...छक्क, जैसे कोई पिचकारी सी चल रही हो और बीच बीच में इलैक्ट्रोकार्डियोग्राम की पिंग पिंग. कभी कभी नर्स आती और परदे के पीछे चली जाती, पर अन्य कोई नहीं आया उस दूसरे रोगी से मिलने.

हलकी सी फुसफुस की आवाज़ सुनी तो आँखे खोल दीं और बिस्तर के सामने मिरियम को पाया जो एक नर्स से बात कर रही थी. उनको जगा देख कर मिरियम ने नर्स से जाने के लिये कहा, "गुड, इट सीमस् शी इस अवेक नाओ. आइ विल मेनेज, एंड इफ आइ नीड समथिंग, आइ विल काल यू"

पहले तो सारी दोपहर वसुंधरा मिरियम के बारे में ही सोचती रही थीं, पर अब उसे अचानक सामने देखा तो हतप्रभ सी रह गयीं, कुछ समझ नहीं आया कि क्या कहे.

मिरियम ने कुर्सी करीब खींची और हाथ में कुछ कागज लिये सामने बैठ गयी. उसका चेहरा शांत और निर्विकार था. हलका सा मुस्करा कर बोली, "तो कैसी हैं मिसेस वधावन ? मुझे आप से कुछ सवाल पूछने हैं और चैकअप करना है. कल सुबह आपके ब्लड टैस्ट, एक्सरे इत्यादि होगें. फिर देखेंगे कि आप का ओप्रेशन हो सकता है या नहीं. ठीक है ?"

समझ गयी वसुंधरा कि डाक्टर और मरीज़ का नाटक करना है उन्हें. मिरियम ने प्रश्न करना शुरू कर दिया. कहाँ पैदा हुई, बचपन में क्या बीमारियाँ हुई, कितनी बार अस्पताल में भरती हुई, क्या दवाईयाँ ले रही है, और अन्य ढ़ेर सारे सवाल. जैसे वह कुछ नहीं जानती उनके बारे में. जब मिरियम ने बच्चों के बारे में पूछा तो वसुंधरा की आवाज़ उत्तर देते हुए काँप गयी, पर मिरियम ने सिर उठा कर नहीं देखा, बस चुपचाप कागज़ पर लिखती रही. जरा लम्बा साँस लीजिये, गहरा साँस ले कर रोक लीजिये, आगे झुक जाईये, इधर घूमिये, खाँसी कीजिये ज़रा. पूरा चैकअप किया.

जब पहली बार मिरियम के हाथ ने उन्हें छुआ तो वसुंधरा को कंपकंपी सी आ गयी, पर मिरियम के चेहरे पर से भाव नहीं बदला. जब चैकअप पूरा हो गया तो मिरियम ने अपने कागज़ समेट लिये और जाने के लिये तैयार हो गयी. वही हलकी सी शिष्ट हँसी, मरीज़ों को दिखाने वाली, "ठीक है मिसेस वधावन. आज रात को बारह बजे के बाद आप को कुछ खाना पीना नहीं है सिर्फ पानी पी सकती हैं. कल जब सारे टेस्ट हो जायेंगे, उसके बाद ही खाने को मिलेगा."

वसुंधरा से नहीं रहा गया, जाती हुई मिरियम को पीछे से पुकार लिया, "बेटी सुनो."

एक क्षण के लिये उन्हें लगा कि उनकी आवाज़ सुन कर मिरियम के कदम डगमगा से गये हों पर जब उसने मुड़ कर देखा तो उसका चेहरा पहले जैसा ही निर्विकार था, "जी, कहिये ?"

क्या बात करती वह उससे जो इस तरह अनजान बन रही थी, जैसे उनका अन्य कोई नाता ही नहीं था? एक पल के लिये तो वसुंधरा चुप रही फिर मन कड़ा कर के पूछा "अनीता कैसी है, कहाँ है ?"

मिरियम का चेहरा तमतमा आया, कुछ बोलने के लिए होंठ थोड़े खुले पर फिर बिना कुछ बोले ही, मुड़ी और वह कमरा छोड़ कर चली गयी. वसुंधरा को लगा मानो उसे थप्पड़ मार कर गयी हो. हताश हो कर वापस वह बिस्तर पर लेट गयीं.

फरवरी 1987, देहरादून

मधुकर पागल सा हो गया था. "कैसे चली गयी, कहाँ चली गयी? कल रात को सब कुछ ठीक था फिर आज सुबह अचानक ऐसा क्या हुआ कि वह एक चिट्ठी लिख कर छोड़ गयी?"

वह सुबह देर से उठा था. रात को मधु और मिरियम देर से घर वापस लौटे थे, मधु उसे देहरादून के अपने पुराने मित्रों से मिलाने ले गया था. मिरियम का बिस्तर लगा था लावण्या के कमरे में. वहीं महफिल लगी थी पूरे परिवार की. बस वसुंधरा ही नहीं गयी थी, अपने कमरे में जा कर लेट गयी थी. कहा था थकान हो रही है और ज़रा सिर दर्द हो रहा है. लख्खी ढोलक निकाल लायी थी और सुधाकर ने भी खूब गला फाड़ कर गाने गाये थे. होने वाली पुत्रवधु उसका मन भी हर ले गयी थी. "माँ, कैसी लगी तुम्हें रिया?" मधुकर ने माँ से पूछा था तो वसुंधरा कुछ देर तक सोचती रही थी फिर बोली थी, "बहुत सुंदर है." शायद कुछ और भी कहना चाहती थी पर मधु को इतने ही उत्तर से संतुष्टी हो गयी थी. इसी लिए नहीं समझ पा रहा था, सब कुछ तो ठीक था फिर अचानक मिरियम क्यों उसे छोड़ कर चली गयी?

लावण्या ने जब सुबह सुबह शोर सुन कर आँखे खोली थी तो उसने मिरियम को तैयार होते हुए देखा था. "इतनी सुबह सुबह कहाँ चली भाभी?" उसने नींद में ही पूछा था. पहले क्षण से ही मिरियम को उसने भाभी ही बुलाया था.

"भैया, मुझसे तो सिर्फ इतना कहा कि बाहर सैर के लिये जा रही हैं, क्योंकि रात को बहुत खाना खा लिया था", वह कई बार मधुकर के सामने दोहरा चुकी थी, "नहीं भैया, सूरत से कोई परेशान नहीं लग रही थी. ऐसा तो कुछ भी नहीं हुआ कि भाभी यूँ हमें छोड़ कर चली जाये."

उस दिन सुबह सभी लोग देर से उठे थे. "भाभी कहाँ है ?" लावण्या ने पूछा था. मधुकर जो चाय का प्याला हाथ में लिये जंहाई ले रहा था बोला, "दौड़ लगाने गयी होगी. जोगिंग करने की आदत है उसे, चाहे गरमी हो या बरफ, अपनी जोगिंग नहीं छोड़ती."

"पर भैया, वह तो सुबह सुबह अंधेरे में गयीं थी जोगिंग के लिये, अब तक नहीं लौटीं ?"

तब सभी लोग परेशान होने लगे थे. कमरे मे देखो, बाग में देखो, बाथरुम में देखो. लावण्या ने ही अपने कमरे में देख कर बताया था कि मिरियम का सूटकेस भी गायब था. कहाँ चली गयी ? देहरादून में तो और किसी को नहीं जानती थी. क्या बाहर जोगिंग करते समय उसे कुछ हो गया ? शायद, भागते भागते कहीं गिर गयी और चोट नग गयी उसे. पर फिर उसका सूटकेस कहाँ गया ? अंत में सुधाकर ने जब पुलिस को टेलीफोन करने की कही तो टेलीफोन के नीचे मधुकर के नाम का पत्र मिला था.

क्या लिखा था उस पत्र में, मधुकर ने पूरा तो किसी को नहीं बताया. बस इतना कहा कि मिरियम उससे शादी नहीं करना चाहती, इसीलिये चली गयी है. जरुर किसी ने कुछ कहा होगा, बार बार यही दोहराता और अंत में उसकी नजरें लावण्या पर ही रुक जातीं. "तुमने रात में कुछ कहा तो नहीं?" उसकी आँखों में एक बिना कहा हुआ प्रश्न था. लावण्या रो पड़ी, "सच दद्दा, मैंने तो कुछ नहीं कहा." रात को जब सब लोग सोने गये थे, मिरियम और लावण्या ने देर तक बातें की थीं पर ऐसा कुछ तो नहीं हुआ था जिससे लगे कि मिरियम नाराज़ थी. क्या सचमुच लावण्या ने अनजाने में ही कुछ गलत कह दिया था? पर ऐसा क्या गलत कह सकती थी वह, जिससे मिरियम इतनी नाराज़ हो जाये कि बिना किसी से कुछ बात किये एक चिट्ठी लिख कर चली जाये? बस वसुंधरा ही चुप रही थी. उसकी लाल आँखे और थके चेहरे को देख कर सबने यही सोचा था कि मिरियम के इस तरह घर को छोड़ कर चले जाने की चिंता का ही परिणाम था.

दोनों, देहरादून में एक हफ्ता रह कर, एक हफ्ता नागपुर में मिरियम के परिवार के साथ बिताने का प्रोग्राम बना कर आये थे. मधुकर पगला सा गया था. नागपुर भी गया पर मिरियम नहीं मिली. उसकी माँ से मिला. "भूल जाओ मिरियम को. वह यहाँ नहीं है और वह तुमसे नहीं मिलना चाहती. यही कह कर गयी है कि मधुकर आये तो उससे कहना कि मुझे भूल जाये. मैं उससे शादी कभी नहीं करुँगी." मधुकर उनके सामने बहुत रोया, पर उन्होंने हर बार यही बात दोहराई. उनकी अपनी भी बस एक ही सलाह थी, भूल जाओ उसे. कहाँ गयी मिरियम, इसका कोई उत्तर नहीं दिया. उसके रोने चिल्लाने से भी कुछ नहीं हुआ.

बुझा बुझा मधुकर वापस लंदन चला गया. वहाँ भी कोशिश की, पर मिरियम वहाँ भी नहीं मिली. मिरियम पढ़ाई अधूरी छोड़ कर चली गयी थी, वापस उस कालेज में नहीं लौटी. उसके सभी मित्र भी हैरान थे, किसी को कुछ नहीं मालूम था. होस्टल में अपने कमरे में जो सामान छोड़ गयी थी, उसे भी लेने नहीं आयी.

जुलाई 2005, अमरीका

शाम को साथ वाले मरीज़ की मृत्यु हो गयी. जैसे ही लगातार आती पिंग पिंग बंद हो गयी और लम्बी सी सीटी की आवाज़ आयी, वसुंधरा समझ गयी कि कुछ हो गया था, फिर तुरंत नर्स और डाक्टर भी आ गये. वसुंधरा चुप चाप अपने बिस्तर में लेटी रही. थोड़ी देर के बाद एक ट्राली पर शव को ले गये. वसुंधरा देख भी नहीं पायी कि कौन था उसके कमरे का साथी. कोई नहीं आया वहाँ रोने के लिए. बस सब लोग धीरे धीरे चले गये और अचानक सन्नाटा सा छा गया.

वह चुप चाप लेटी रहीं और रात घिर आयी. कमरे में अँधेरा था. नर्स ने पूछा था कि अगर वह चाहे तो हलकी सी रात्रि रोशनी जला दे पर वसुंधरा ने मना कर दिया था. अंधेरे में ही रहना चाहती थी. लेटे लेटे अपने विचारों में गुम, कब उन्हें नींद आ गयी मालूम ही नहीं चला. अचानक उनकी नींद खुल गयी. उनके पाँवों की तरफ, अँधेरे में एक काली सी परछांई दिखायी दे रही थी. चुपचाप, एक अचल, निस्तब्ध छाया.

"कौन है वहाँ ?" वसुंधरा ने बोलने की कोशिश की, पर ठीक से आवाज़ नहीं निकली. नयी जगह होने से उन्हें याद नहीं आ रहा था कि बत्ती कहाँ से जलती है. इधर उधर हाथ से टटोल कर उन्होंने बत्ती जालने के लिये स्विच को ढ़ूंढ़ने की कोशिश की. इतनी देर में ही वह छाया हिली और बढ़ कर रात्रि रोशनी का स्विच दबा कर हलकी सी रोशनी कर दी. उस रोशनी में उन्होंने उस छाया को पहचाना.

"मिरियम", वसुंधरा की नींद पूरी तरह से खुल गयी थी, "यहाँ आओ बेटी."

मिरियम की आँखे थोड़ी लाल और फूली सी लग रहीं थीं, जैसे रो कर आयी हो. चुपचाप आ कर पास की कुर्सी पर बैठ गयी. अभी भी वही दिन वाले कपड़े ही पहने थी. नीचे मुँह किये कुछ देर तक चुपचाप बैठी रही, कुछ बोली नहीं.

वसुंधरा ने धीरे से हाथ बढ़ा कर उसके हाथ पर रख दिया. एक पल के लिये मिरियम के शरीर में हलकी सी झुरझुरी सी आयी पर उसने अपना हाथ नहीं हटाया.

"कैसी हो बेटी ?"

कुछ नहीं बोली मिरियम, सिर्फ सिर हिला दिया.

"और अनीता ? रिटायर हो गयी होगी अब तो. मैं चौंसठ की हो रही हूँ तो वह भी पैंसठ की हो गयी होगी!" फिर एक बार मिरियम ने सिर हिला दिया पर कुछ नहीं बोली.

दोनों कुछ देर चुपचाप यूँ ही रहे फिर वसुंधरा ने गहरी साँस ले कर कहा, "तुम्हारे बाद मधुकर ने भी शादी नहीं की. तुमने शादी की क्या?"

मिरियम नीचे ही देखती रही, कुछ नहीं कहा, फिर धीरे से सिर हिला दिया. उसने भी शादी नहीं की थी. वसुंधरा और कुछ नहीं बोलीं बस उनका हाथ मिरियम के हाथ को छूता रहा. कुछ देर बाद मिरियम उठ खड़ी हुई और धीरे से बोली, "मैं जाती हूँ, कल सुबह फिर काम पर आना होगा."

"बेटी, अभी तो मधु वापस बास्टन गया है, जिस दिन मेरा आप्रेशन होगा, तब आयेगा", वसुंधरा बोली. मिरियम को कुछ और कहने की आवश्यकता नहीं थी, स्वयं सब समझती थी. उसे ख्याल रखना पड़ेगा कि मधु उसे न देख ले, यह वह जानती है.

मिरियम कमरे के दरवाज़े के पास पहुँची थी जब पीछे से वसुंधरा ने फिर पुकारा, "बेटी, यह सब मेरी वजह से हुआ है. मुझे क्षमा कर दो." मिरियम ठिठक गयी और फिर उसने सिर घुमा कर वसुंधरा की ओर देखा. उसकी आँखों में नमी चमकने लगी थी. फिर उसने सिर झुका लिया और चुपचाप कमरे से निकल गयी. वसुंधरा फिर बुदबुदायी, "सब मेरी वजह से हुआ है, मुझे क्षमा कर दो. किससे कहूँगी कि मैंने क्या किया और किससे क्षमा माँगूगी, तुम्हारे सिवाय और कौन समझ सकता है यह बात?"

फरवरी 1987, देहरादून

मिरियम सुबह सुबह उठी और धीरे धीरे, बिना शोर किये, तैयार होने लगी ताकि लावण्या की नींद न खुले. पर फिर भी कुछ शोर तो हुआ ही क्योंकि लावण्या ने आँखे खोल दी और नींद भरे स्वर में बोली, "भाभी, इतनी सुबह सुबह कहाँ जा रही हो ?"

"जोगिंग करने", मिरियम फुसफुसायी, "तुम भी चलोगी मेरे साथ भागने ?"

"नहीं भाई, इतनी सर्दी में क्या हम पागल हैं, जो बिस्तर से बाहर निकलें ! हमें नहीं करनी कोई जोगिंग वोगिंग." और लावण्या फिर से रजाई के अंदर घुस गयी.

मिरियम को मधुकर का परिवार बहुत अच्छा लगा था और उसका एक बड़ा कारण लावण्या भी थी. अकेली ही बड़ी हुई थी मिरियम, और उसके मन में हमेशा एक भाई या बहन पाने की इच्छा रही थी. एक दिन में ही लावण्या से ऐसे उसका घुलमिल जाना, लावण्या के स्नेह और मीठे स्वभाव के कारण ही हुआ था. पहले क्षण से ही मिरियम का मन अपनी होने वाली ननद के स्नेह को देख कर आनंद से भर गया था.

मिरियम ने धीरे से अपने पीछे दरवाज़ा बंद किया किया और ड्राईंगरुम की ओर बढ़ी. पहले तो उसे दिखा ही नहीं कि सोफे पर कोई लेटा है पर जब बाहर जाने के लिये दरवाज़ा खोला तो पीछे से एक आहट आयी तब उसने मुड़ कर पीछे देखा. एक शाल लपेटे वसुंधरा वहीं लेटी थी और अब मिरियम को देख कर उठ कर बैठ गयी. "सारी मम्मी, मैंने आप को जगा दिया. मुझे मालूम नहीं था कि आप यहाँ होंगी, वरना मैं पीछे बाग से निकल जाती."

"सोई नहीं थी मैं, जाग ही रही थी. तुम से कुछ बात करना चाहती हूँ, क्या मैं भी तुम्हारे साथ बाहर सैर को आ सकती हूँ ?" वसुंधरा ने पूछा और उत्तर की प्रतीक्षा किये बगैर ही उठ खड़ी हुई.

वसुंधरा के अस्त व्यस्त कपड़े, बिखरे हुए बाल, लाल न सोई आँखे, देख कर मिरियम का मन काँप सा गया. वसुंधरा तो अपने कपड़ों और सूरत के बारे में जैसे अनजान सी थी. "बाहर बहुत सर्दी होगी, आप की शाल क्या ...", मिरियम ने कुछ कहना चाहा, पर वसुंधरा नहीं रुकी. अपनी शाल को कंधे पर रख कर आगे बढ़ गयीं और बाहर निकल आयीं. घर के सामने एक पहाड़ी थी जिस पर कुछ बंगले बने थे और उनके पीछे एक जंगल सा था. घर से निकल कर वसुंधरा सड़क पार कर, पहाड़ी के ऊपर जाती एक पगडंडी की ओर चल दी. एक बार भी पीछे मुड़ कर मिरियम की तरफ नहीं देखा. उनके पीछे पीछे चुपचाप मिरियम को भी चलना पड़ा.

घर से अधिक दूर नहीं आये थे जब वसुंधरा रुकी और मिरियम की ओर मुड़ी. पहले तो कुछ देर चुपचाप उसे देखती रही फिर धीमे स्वर में बोलीं, "यह शादी नहीं सकती. तोड़ दो इस शादी को. चली जाओ इस घर से, इससे पहले के कोई अनर्थ हो जाये."

मिरियम सन्न रह गयी. एक बार मन में आया कि शायद मधुकर की माँ को कुछ पागलपन की बीमारी तो नहीं थी? बिना कुछ बोले वह वापस जाने के लिये मुड़ गयी. इस तरह सुबह अकेले में मधुकर की माँ के साथ निकल आना शायद पागलपन ही था. फिर सोचा, उससे ऐसी बातें क्यों कर रहीं थीं वे? उन्हें जो कहना है अपने बेटे से कहना चाहिये.

पीछे से वसुंधरा फिर बोलीं, "मिरियम मेरी बात सुनो. यह शादी नहीं होनी चाहिये. अनर्थ हो जायेगा. तोड़ दो इस शादी को और यहाँ से चली जाओ."

इस बार मिरियम से नहीं रहा गया, रुक गयी और गुस्से से बोली, "मैंने मधुकर से प्यार किया है. शायद आप को मेरा ईसाई होना पसंद नहीं है या मेरा मधुकर से उम्र में बड़ा होना ?"

"वह तुम्हारा छोटा भाई है." वसुंधरा धीरे से बोली.

मिरियम स्वयं को रोक नहीं पायी, हँस पड़ी. मधुकर की माँ अवश्य पागल ही थीं. "मेरा भाई ? यह कैसे सोचा आपने?"

"क्योंकि तुम मेरी बेटी हो. शादी से पहले हुई थी तुम. समय पर गर्भपात नहीं करा पायी थी मैं. अनीता को बच्चा चाहिये था. छहः महीने साथ रही हूँ अनीता के, जब तुम पैदा हुई तो वह तुम्हें अपने साथ ले गयी. सब को यही बताया कि तुम उसकी बेटी हो. बर्थ सर्टिफिकेट पर उसी का नाम लिखा गया, पर तुम मेरी बेटी हो."

"यह झूठ है. ऐसा नहीं हो सकता", मिरियम बिफर पड़ी.

"नहीं झूठ नहीं है. शीशे में अपना चेहरा देखो, क्या मैं नहीं दिखती तुम्हें अपने चेहरे में? तुम पैदा हुई थीं तो तुम्हें ले कर अनीता और एलफ्रैड हैदराबाद चले गये. कई सालों तक अनीता मुझे तुम्हारे बारे में चिट्ठी में सब बातें बताती थी. तुम्हारी तस्वीरें भेजती थी मुझे. तुम्हारे स्कूल के दिनों की, जब तुम कालिज जाने लगी थीं तब की, सब तस्वीरें हैं मेरे पास. दिखा सकती हूँ तुम्हें, अगर तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा. कुछ साल पहले मैंने ही मना किया अनीता को कि मुझे और पत्र न लिखे क्योंकि डरती थी कि कोई और उन पत्रों को न पढ़ ले. इसी लिए नहीं जानती थी कि एलफ्रैड के बाद अनीता नागपुर रहने चली आयी है. क्या कोई औरत ऐसी बात झूठ बोल सकती है? क्यूँ कहूँगी ऐसा झूठ तुमसे? तुम राज़ हो मेरा जिसे हमारे घर में कोई नहीं जानता और तुम्हारे सिवाय किसी और से इस बात को नहीं कह सकती मैं."

जुलाई 2005, अमरीका

फिर दुबारा नहीं आयी मिरियम उससे मिलने. वसुंधरा ने वार्ड की नर्स से पूछा तो मालूम चला कि डा. थामस ने अचानक छुट्टी ले ली है. वसुंधरा ने मिरियम के घर का टेलीफोन नम्बर पूछना चाहा पर अस्पताल वालों ने मना कर दिया. वसुंधरा ने कहा भी कि वह डा. थामस की पारिवारिक मित्र है, पर फिर भी कुछ नहीं हुआ.

तीसरे दिन मधुकर लौट आया. बोला कि सब काम ठीक कर के आया है और कुछ दिन अब वहीं रुकेगा. वसुंधरा ने उसे जाने के लिये कहा क्योंकि मन मन ही डरती थी कि कहीं मिरियम न आ जाये, पर न तो मधु ने उनकी सुनी और न ही मिरियम फिर आयी.

सब टेस्ट हो गये थे और आप्रेशन का दिन भी आ गया. मधु चिंता में था हालाँकि कोशिश करता कि माँ को कुछ न पता चले. मोबाईल टेलीफोन से वसुंधरा ने लावण्या और माधवन से भी बात की. वह शांत थीं, बस आप्रेशन से पहले एक बार मिरियम से बात करना चाहती थीं. जब वसंधरा को आप्रेशन के लिये ले जा रहे थे तो मधुकर माँ का हाथ पकड़ कर रो पड़ा.

आप्रेशन कक्ष में सभी लोग हरे गाऊन पहने और चेहरे पर मास्क लगाये हुये थे, पर फिर भी वसुंधरा मिरियम को पहचान गयी. वसुंधरा के हाथ की नस में इंट्रावीनस ड्रिप लगायी जा रही थी, तो वसुंधरा को लगा कि उसके सिरहाने मिरियम खड़ी है. उन्होंने सिर उठा कर पीछे देखने की कोशिश की तो मिरियम ने उसके कंधे पर हाथ रख कर उन्हें सीधा लेटे रहने के लिये कहा.

बेहोशी की दवाई का इन्जेक्शन दिया जा रहा था और वसुंधरा को लगा जैसे वह उड़ने लगी हों. जुबान से मानो अंकुश हट गया और बोली, "तुम्हारा बेटा देखा मैंने. बिल्कुल मधु जैसा है. मालूम ही नहीं था मुझे, पर मालूम भी होता, तो क्या करती मैं ? मधु को भी नहीं मालूम था कि तुम माँ बनने वाली हो, हैं न?"

मिरियम को मानो करंट का झटका सा लगा, उनके कंधे से उसना अपना हाथ हटा लिया और पीछे हट गयी.

वसुंधरा नींद में जा रही थी, बहुत कोशिश कर के बोली, "सब मेरा ही दोष था, मेरी वजह से सब हुआ. क्षमा कर दो मुझे."

सोते सोते वसुंधरा को लगा कि मिरियम ने उनका हाथ पकड़ कर दबाया हो. शायद सच था या कोई सपना था.

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