लंदन डायरी सुनील दीपक दिसम्बर 2005

6 दिसंबर 2005

उड़ान सुबह सुबह थी और यहाँ का समय यूरोपीय समय से एक घंटा पीछे है इसलिए जल्दी ही पहुँच गया. आईलेप की आम सभा के लिए आया हूँ. आईलेप कुष्ठ रोग के इलाज़ और शोध कार्य के लिए पैसा देने वाली विश्व की सब प्रमुख संस्थाओं को जोड़ कर बना है. इन सभाओं में भाग लेने से मन बहुत घबराता है. बीस साल हो गये इन सभाओं में भाग लेते पर चार वर्ष पहले इसका सभापति चुना गया था, डर तभी से आया है. बीस साल पहले जब इन सभाओं में भाग लेना शुरु किया था तो 70 या 80 लोगों में मैं अकेला विकासशील देश से आया अश्वेत होता था. तब कभी सोचा नहीं था कि एक दिन सबका सभापति बनूँगा. आज स्थिति बदल गयी है और मेरे जैसे अन्य बहुत से लोग अफ्रीका,एशिया और दक्षिण अमरिका से भी होते हैं. जब मैं सभापति बना था तो आईलेप का विश्व स्वास्थ्य संस्थान से गंभीर मतभेद चल रहा था और सभाएँ लड़ाई झगड़े की बातों से भरी होती थीं. पहली सभा का जब संचालन किया तो बहुत बुरा अनुभव हुआ.

कुछ यूरोपीय देश चाहते थे विश्व स्वास्थ्य संस्थान से सीधी टक्कर लेना. मुझे स्वयं लड़ाई झगड़ा अच्छा नहीं लगता और कोशिश रहती है कि बातचीत से ही हर मसला सुलझाया जाये. पहली सभा पर मेरे इन विचारों की वजह से मुझ पर बहुत वार हुए, कटु आलोचना भी हुई. मुझे लगा कि सबके सामने लोगों ने इस तरह वार करके मेरा अपमान किया हो और मन बहुत विचलित हुआ. उनका कहना था कि बातचीत कर के मसला सुलझाना कमज़ोरी की निशानी है. इतना तनाव था मन में कि सोचा था कि इस्तीफा दे दूँ, फिर खुद को समझा कर रोक लिया था, हारना या हथियार डाल देना मुझे अच्छा नहीं लगता. तब से ही इन सभाओं में भाग लेने से मन में घबराहट होती है कि जाने कौन वार करे या अपमान करे.

इसलिए सुबह पहुँचते ही, सामान होटल में रख कर सीधा आईलेप के दफ्तर गया, सभा के सभी मसलों पर विचार विमर्श करने और सभा की तैयारी करने. दोपहर को कुछ और काम नहीं था तो साउथहाल की तरफ निकल गया. अगर भारत गये हुए कुछ समय हो गया हो तो, मुझे भारतीय और पाकिस्तानी मूल के लोगों से भरे साउथहाल में आना बहुत अच्छा लगता है. कुछ खरीदना न भी हो तो दूकानों में हिंदी में बातचीत करने को मिलती है. हलकी हलकी बारिश हो रही थी और मैं छतरी नहीं ले कर गया था इसलिए अधिक नहीं घूमा. सड़क के किनारे फुटपाथ पर करोल बाग की तरह लोगों ने सड़क को घेर रखा है, जहाँ हर तरफ से भारतीय संगीत सुनाई देता है. सड़क पर यातायात का बुरा हाल है और कई कारों से तेज स्वर में भारतीय संगीत ही आता है.

मुझे लगता है कि हम भारतीयों को गाड़ी में बैठ कर कहीं भी जाने की बहुत जल्दी होती है. लंदन में अगर आप सड़क पार करना चाहें तो अधिकतर पैदल पारपथ की धारियों के पास गाड़ियाँ अपने आप रुक जाती हैं जब कि भारतीय गाड़ी चलाने वाले इस नियम का पालन करने में कुछ कमजोर लगते हैं. मैंने साउथहाल से कुछ डीवीडी खरीदीं और एक भारतीय रेस्टोरेंट में खाना खाया और वापस होटल लौट आया. अभी रात को बहुत कागज़ देखने हैं, उनसे नींद भी जल्दी आ जायेगी.

9 दिसंबर 2005

आज रात को सभा में आये सब लोग कोवेंट गार्डन में एक अफ्रीकी रेस्टोरेंट में खाना खाने गये. होटल से बस में बैठ कर चले. इन बीस सालों में जाने कितनी बार लंदन आया हूँ पर पहले कभी कोवेंट गार्डन नहीं गया था. जगह के नाम से मन में एक बाग की छवि थी लेकिन जब पहुँचे तो बहुत हैरानी हुई, आसपास बाग तो कोई नहीं था. कोवेंट गार्डन शहर के बीचों बीच सब्ज़ी और फ़ूलों की दूकानों की जगह है. वहाँ क्रिसमस के बाजारों और बच्चों के लगे खेलों से बहुत भीड़ भड़क्का था.

London

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अफ्रीकी रेस्टोरेंट में खाना कुछ खास अच्छा नहीं था पर जैसे आम तौर पर करना पड़ता है, मैंने भी सभापति के रुप में अपने भाषण में खूब तारीफ की और भोज देने वाली संस्था को धन्यवाद दिया. सभापति बनने के लिए अच्छी तरह से झूठ बोलना बहुत जरुरी है और यह गुण मुझमें आ ही गया है.

सभा अभी तक तो ठीक ही चल रही है,पर असली मजा तो कल आयेगा, जब आखिरी आम सभा होगी. उसी से मुझे डर लगता है! रात बहुत हो गयी है, सोना ही बेहतर होगा.

10 दिसंबर 2005

अगर आप ने कभी सार्वजनिक भाषण दिया है तो आप जानते होंगे कि अच्छा भाषण देना कितना कठिन है, पर यह भी है कि कभी कभी जादू सा हो जाता है, लोग आप की हर बात को ध्यान से सुनते हैं, आप के काबू में हो जाते हैं, आप जब चाहें उन्हें रुला या हँसा सकते हैं. ऐसा ही कुछ हुआ आज की अंतिम सभा में. आईलेप में बहुत से परिर्वतन होने हैं और सब देशों को खुश रखना आसान नहीं, कोई न कोई तो नाराज हो ही जाता है.

मैंने देखा है कि भाषण देने के लिए अगर बहुत तैयारी करुँ या भाषण पहले से लिखूँ तो बात अच्छी नहीं बनती. इसलिए आज के भाषण में मैंने पहले बहुत दिनों से सोचा था, पर कुछ लिखा नहीं और एक दिन पहले से ही उसके बारे में न सोचने की कोशिश की थी. मेरा ख्याल था कि एक बार सभा शुरु होगी तो अपने अचेतन मन से जो कुछ भी निकलेगा वही ठीक होगा. ऐसा ही हुआ. आठ घंटे की सभा पाँच घंटे में ही समाप्त हो गयी, सभी निर्णय सर्वमत से हुए और सभी देशों को कुछ न कुछ फायदा हुआ.

सभा समाप्त हुई तो बहुत से लोग बधाई देने आये. कई लोगों ने कहा कि इतनी अच्छी सभा पहले कभी नहीं हुई, कुछ बोले कि मैंने संस्था को जोड़ने का काम किया है, कई अन्य ने कहा कि वे मुझसे डिपलोमेसी सीखना चाहेंगे. यह सब प्रशंसा सुन कर अच्छा लगा पर यह भी जानता हूँ कि बहुत सी प्रशंसा मेरी नहीं, कुरसी की है जिस पर आज बैठा हूँ. मेरे हस्ताक्षर से आज लाखों रुपयों की बात बनती है, इसलिए झूठी प्रशंसा करने वालों की कमी नहीं है.

एक बार डा. एकाम्बरम के साथ हुई बात याद आ जाती है. उन्होंने अपना सारा जीवन कुष्ठ रोग और रोगियों के लिए बिता दिया, कई सम्मान और पद भी मिले थे उन्हें. तब वह वृद्ध हो गये थे, मुश्किल से चल पाते थे. मैं उन्हें अपना गुरु मानता था और पिता समान स्नेह था उनके लिए मेरे मन में. एक सभा में हम साथ खड़े थे कि कुछ बड़े अधिकारी और डाक्टर गण आ पहुँचे. किसी ने उनकी तरफ ठीक से देखा भी नहीं और मेरे सामने झुक झुक कर बातें कर रहे थे, प्रशंसा कर रहे थे. जब वे लोग चले गये तो डा. एकाम्बरम बोले, "तुम तो बहुत बड़े आदमी हो गये हो." मुझे बहुत लज्जा आयी और रोष भी हुआ. पर साथ ही समझ आ गया कि यहाँ ऊँची कुर्सी पर बैठने वाले की ही पूजा होती है, अनुभव या ज्ञान की नहीं.

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दोपहर को सोचा कि हैमरस्मिथ के करीब जो थेम्स नदी बहती है, उसके किनारे सैर की जाये. नदी के किनारे सैर के लिए एक विषेश रास्ता बना है जो अधिकतर नदी के साथ साथ चलता है पर बीच में कई जगह घूम कर घरों के बीच पहुँच जाता है. रास्ते में एक जगह बहुत भीड़ लगी थी, देखा तो वहाँ "रिवरसाइड स्टूडियो" का बोर्ड लगा था जहाँ किसी भारतीय नाम वाले निर्देशक के शो का निर्माण चल रहा था.

घूमते घूमते कई मील दूर निकल गया. रास्ते में नदी के इलावा कई बाग भी देखे, एक में लड़के फुटबाल और अमरीकी सोक्कर खेल रहे थे. जब थक गया तो सोचा, बीच में से निकल कर सीधा वापस होटल पहुँच जाऊँगा पर बीच का रास्ता सीधा नहीं निकला. कुछ ही देर में घरों के बीच अनजान रास्तों पर खो गया था. बहुत देर तक सोचा कि किसी सी पूछूँ नहीं, पर जब दो घंटे के बाद भी समझ नहीं पा रहा था कि कहाँ आ गया, तो आखिर पूछना ही पड़ा. मालूम पड़ा जहाँ जाना था उसके बिल्कुल उल्टा आ गया था तो वापस आने के लिए बस लेनी पड़ी.

इस समय टाँगें इतना दर्द कर रहीं हैं और थकान भी बहुत हो रही है. जल्दी खाना खा कर सोने का विचार है.

London

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11 दिसम्बर 2005

आज किसी से मिलने उत्तरी लंदन जाना था तो ट्यूब में गया. मेरे सामने एक अफ्रीकी मूल की लड़की बैठी थी, जिसकी भौंहें नहीं थी और काले रंग से उसने भौंहे बनायी थी. भौंहें बनाने से सुंदरता बढ़ाने का तुक मुझे समझ नहीं आता. प्राकृतिक भौंहों में क्या खराबी होती है कि सब लड़कियाँ धनुष जैसी तनी हुई भौंहें बनाती हैं ? मैंने ट्यूब में बैठी सभी लड़कियों की तरफ देखा पर एक भी ऐसी नहीं थी जिसकी भौंहें प्राकृतिक हों!

दोपहर में खाली था तो ब्रिटिश म्यूज़ियम में और राष्ट्रीय कला गैलरी में कुछ समय बिताया. लंदन की यह बात मुझे बहुत अच्छी लगती है कि यहाँ सभी म्यूज़ियम मुफ्त हैं और उनमें घुसने का कोई टिकट नहीं लगता. ब्रिटिश म्यूज़ियम तो मुझे बहुत प्रिय है और पहले भी कई बार वहाँ जा चुका हूँ.

इस बार वहाँ तिब्बत की एक मूर्ति देखी जिसमें बुद्ध धर्म के एक देवता गणेश को पैरों तले रौंद रहे हैं. यह मूर्ती बुद्ध धर्म और हिंदू धर्म के बीच तनाव का संकेत दे रही थी. असीरियन भाग में जटायू और शेर के मुख वाले प्राणियों की मुर्तियाँ देख कर लगा जैसे वे भारतीय देव कथाओं से जुड़ी हुई हों. प्राचीन समय में धर्म कैसे फैले और कैसे मानव मान्यताएँ एक हो कर विभिन्न हो गयीं यह सोचना मुझे बहुत अच्छा लगता है पर इसके बारे में अधिक गहराई में जाने के लिए तो मुझे एक और जीवन चाहिये.

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12 दिसम्बर 2005

London आज वापस जाना है. सुबह पापा की हस्तलिपि में लाई दो कहानियों को क्मप्यूटर पर लिखा. पापा के हाथ का लिखा देख कर बहुत अज़ीब सा लगता है, और यह सोच कर कि इसी कागज़ को उन्होंने अपने हाथ में रखा होगा, उस पर लिखते समय वैसे ही सोचा होगा जैसा मैं अब सोच रहा हूँ, बहुत अच्छा लगता है. बहुत सी बातें जो उन्होंने मुझसे नहीं की, वे बाते आज वह अपने शब्दों के माध्यम से कहते हैं, ऐसा लगता है. घर पहुँच कर इन कहानियों को, जो अधूरी हैं, कल्पना पर डालना है.

अखबार में लिखा है कि कल लंदन से करीब 30 मील दूर पेट्रिल के बड़े भंडार में बहुत बड़ा विस्फोट हुआ और 75 कि.मी. तक आसमान काले धूँए से भरा था. उसी से याद आया कि कल शाम को त्रफालगर स्कावयर में ओपेरा के भवन के पीछे बहुत काला घना बादल नज़र आ रहा था, शायद वह यही धूँआ था ? यहाँ तो हर बार कुछ न कुछ हो ही जाता है. मुझे तो घर वापस जाने की खुशी है!

London

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