सीमाहीन आसमान मँगोलिया यात्रा की डायरी सुनील दीपक 6 जुलाई 2008

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Mongolia, Bayan Ulgii

पिछले दिनों, चार जून से ले कर 24 जून तक मैं मँगोलिया यात्रा पर था. यात्रा का प्रारम्भ हुआ मँगोलिया की राजधानी उलान बातार में. फ़िर वहाँ से मँगोलिया के उत्तर पश्चिम में दो राज्यों, बायन उल्गीई और उव्स गये. उसके बाद कुछ दिन वापस उलान बातार में बिता कर, हम लोग पूर्व में खिन्टई राज्य में गये. यह उसी यात्रा की डायरी है.

8 जून 2008, उल्गीई

सारा दिन बाहर घूम कर वापस उल्गीई में होटल पहुँचे तो कमरे का दरवाज़ा बंद करके मेरा सबसे पहला काम था कम्यूटर लगा कर उस पर साथ लाये हुए "जाने तू या जाने न" फ़िल्म के गाने लगा कर नहाना. सारा दिन मँगोली भाषा सुन सुन कर और अनुवादक के द्वारा अँग्रेज़ी में बातचीत करके अब दिल करता है कि कुछ ऐसा सुनूं जिसमें कुछ सोचना न पड़े और दिमाग को आराम मिले. सारा शरीर धूल मिट्टी में सना लग रहा था, गले और आँखों में भी धूल महसूस हो रही थी, नहा कर बहुत अच्छा लगा.

मँगोलिया में 5 तारीख को सुबह पहुँचा था पर आज पहला दिन है कि डायरी में कुछ लिखने का समय मिल रहा है. यात्रा शुरु हुई थी बोलोनिया से, वहाँ से फ्रेंकफर्ट, फ़िर बेजिंग और वहाँ से मँगोलिया की राजधानी उलान बातार. बेजिंग में थोड़ा सा समय था पर वहाँ का नया अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डा देखा तो दंग रह गया. इतना बड़ा और भव्य हवाई अड्डा बनाया है जैसा यूरोप में भी नहीं. देख कर कुछ जलन हुई कि जाने हम भारत में इसके मुकाबले में कुछ बना सकेंगे. दिल्ली का हवाई अड्डा बेजिंग के पुराने वाले हवाई अड्डे के सामने भी गरीब घिसा पिटा सा लगता था, इस नये वाले के सामने तो बेचारा और भी गया गुज़रा लगेगा. फ़िर मन को दिलासा देने के लिए खुद से कह रहा था कि चाहे देखने में कैसे भी हो, पर बेचारे चीनियों को अँग्रेजी बोलना ठीक से नहीं आया, हवाई जहाज़ में भी एयर होस्टेस ठीक से नहीं बोल पाती थी. फ़िर लगा कि अँग्रेजी बढ़िया बोलने का गर्व ही शायद हमारे भारत की आधी से अधिक जनता को पिछड़ा बना देता है, जब तक अँग्रेजी बोलनी न आये, आप की कोई इज्जत नहीं और यह चीनी है कि बिना अँग्रेजी बोले भी इतनी तरक्की कर गये.

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खैर छोड़ें चीन और भारत की स्पर्धा की पुरानी बहस को और बात की जाये मँगोलिया की. उलान बातार में शाम को एक भारतीय रेस्टोरेंट में खाना खाने गये जिसका नाम है "हजारा". इसे चलाते हैं हरियाणा के एक सज्जन जो यहाँ मेवात का खाना बनाते हैं. खाना खाने लगे तो मेरे सभी मँगोली साथी बोले कि वहाँ का बीफ बहुत अच्छा है, वही खाना चाहिये. इतने साल हो गये देश विदेश घूमते, यह जानता हूँ कि "यह खाता हूँ, यह नहीं खाता", जैसी बातों से काम नहीं चलता. अगर खाने में झँझट करने लगूँ तो गाँवों में घूमना बड़ा कठिन है. तुरंत स्वयं को याद दिलाया कि मँगोलिया तो माँस खाने वालों का देश है जहाँ हर जीव जंतु का माँस खाते हैं. और कब किस जंतु का माँस खाना पड़ता है, यह न जानना ही बेहतर है. तुरंत अपनी अनुवादक को बताया कि जहाँ तक हो सकेगा मुझे माँस न खाना ही पंसद है पर वे लोग जैसा खाने को देंगे मुझे स्वीकार है, बस मुझे वह यह नहीं बताये कि किस जंतु का माँस है.

गुरुवार 6 तारीख को सुबह उलान बातार से मँगोलिया के पश्चिमी कोने के राज्य बायान उल्गीई की राजधानी उल्गीई चले. रास्ते में जहाज़ हुव्सगुल राज्य में रुका जिसे मँगोलिया का स्विटज़रलैंड भी कहते हैं और वहाँ की झीलों पर सैर करने बहुत पर्यटक आते हैं. फ़िर उल्गीई की ओर जहाज़ चला, सफेद बर्फ से ढके पहाड़ों के दृश्य बहुत मनोरम थे पर हवा बहुत तेज थी और जहाज़ पत्ते की तरह हिल रहा था. हवा की वजह से उल्गीई के हवाई अड्डे पर जहाज नहीं उतर पाया और अंत में जहाज को तीन सौ किलोमीटर दूर उव्स राज्य की राजधानी उलानगोम ले जाया गया.

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वहाँ पहुँच कर राज्य के प्रमुख मेडीकल डायरेक्टर को टेलीफोन किया गया जिन्हें हमारे दल के कुछ लोग जानते थे, वह तुरंत हवाई अड्डे आ कर हमें ले गये. उनकी बड़ी गाड़ी और सरकारी औहदे का बहुत रोब पड़ा, सब लोग सलाम बजा रहे थे. उलानगोम में बहुत गर्मी थी. शाम सात बजे तक उलानगोम रुके फ़िर समाचार मिला कि उल्गीई की हवा कम हो गयी है और जहाज दोबारा वहाँ जाने के लिए तैयार है. इस बार जहाज को उतरने में कोई कठिनाई नहीं हुई.

कल, शनिवार 7 जून, उल्गीई में ही निकला. कुछ मीटिंग में गये, कुछ विकलाँग लोगों को घर में देखने गये.

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आज रविवार 8 तारीख को सुबह सगसाई नाम के जिले की ओर चले जो उल्गीई से 25 किलोमीटर  दूर है. कच्ची पथरीली सड़क थी, शुरु के रास्ते में सड़क के साथ साथ होव्ड नदी बह रही थी. उसके बाद पहाड़ों के बीच में बहुत सुंदर रास्ता था. रंग बिरंगी मिट्टी वाले बिना पेड़ पौधों वाले पहाड़, उनके ऊपर अंतहीन आसमान, बहुत सुंदर थे. जी करता कि हर दृश्य की तस्वीर खींचता जाऊँ.

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पहाड़ों के बीच में घाटी में बसा सगसाई शहर बहुत सुंदर है. दो नदियाँ बहती हैं टगरन और सगसाई. टगरन में बाढ़ सी आ रही थी और पानी का बहाव बहुत तेज था. एक जगह जीप नदी पार करने के लिए पानी में उतरी तो लगा कि बह ही न जाये. वहाँ रहने वाले अधिकतर लोग कजाक जाति के हैं यानि मुसलमान, जबकि मँगोलिया में अधिकतर लोग बुद्ध धर्म के हैं. बायान उल्गीई मँगोलिया का अकेला राज्य है जहाँ अधिक मुसलमान हैं, उनकी भाषा भी भिन्न है. हरि नाम है यहाँ विकलांग कार्यक्रम के अधिकारी का, जो सुनने में हिंदू नाम लगता है पर वह है मुसलमान. बहुत हँसमुख है. कहने लगा कि यहाँ के मुसलमान बातचीत कपड़ों, आदतों में अन्य मँगोलिया वासियों जैसे ही हैं. लड़कियाँ और औरतें पर्दा नहीं करती, पैंट स्कर्ट आदि ही पहनती हैं. लोग वोदका भी बहुत पीते हैं, हाँ सुअर का माँस नहीं खाते. पर वह बता रहा था कि यहाँ के युवकों को साऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान जैसे देशों से छात्रवृति का लालच दे कर बुला लेते हैं और यह युवक वापस आ कर पुराने ढंग से रहने की बात करते हें पर इसका अब तक कुछ विषेश असर नहीं पड़ा है.

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सगसाई में पहले शहर के मेयर से मुलाकात हुई, फ़िर अस्पताल देखने गये और कुछ विकलांग लोगों के घर भी देखे. फ़िर अस्पताल के प्रमुख डाक्टर हमें अपने साथ शहर के बाहर एक पाराम्परिक तम्बु के बने घर में ले गये जहाँ उनके कुछ रिश्तेदार रहते हैं. उस परिवार वालों ने हमारा बहुत स्वागत किया और कहने लगे कि बिना खाना खिलाये नहीं जाने देंगे. उनका प्रमुख काम है जानवर पालना, विषेशकर बकरियाँ और लम्बे बालों वाली गायें. तम्बु में कैसे रहते हैं इसकी जानकारी मिली. तम्बु के मध्य में आग जलाने का स्टोव होता है जिसका मुँह हमेशा तम्बु के द्वार की ओर होता है. तम्बु में चार बिस्तर लगे थे, पर रहने वाले थे सात लोग, यानि कुछ लोग शायद रात को जमीन पर बिस्तर लगाते हैं. वे लोग घर की जगह बदलते रहते हैं और एक जगह नहीं रुकते. अब गर्मियाँ प्रारम्भ होने वाली हें और वह लोग जगह बदलने की तैयारी कर रहे हैं, कुछ ही दिनों में सब तम्बु समेट कर वहाँ से सत्तर किलोमीटर दूर एक झील के करीब चले जायेंगे.

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उनके खाने में दूध, दही, मक्खन, सूखा कड़ा पनीर, सूखा पत्थर जैसा दही, भुने आटे में चीनी मिला कर पंजीरी जैसा पकवान आदि भी थे, पर प्रमुख खाना था भाप से बना पास्ता और मीट. साथ में पहले तो नमकीन दूध वाली चाय मिली जैसी तिब्बत में भी पीते हैं फ़िर वोदका की बोतल खुली तो सब लोगों ने खूब वोदका पी. मैंने कहा कि मुझे वोदका पीने से सिर दर्द हो जाता है तो मान गये और पीने का ज़ोर नहीं डाला. उनके तम्बु में एक बिल्ली भी थी जिसे खाना खाते समय उन्होंने दरवाजे के पास रस्सी से बाँध दिया, ताकि तंग न करे. उनके पास दो कुत्ते भी थे पर वे दोनो तम्बू में नहीं घुसे.

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वहाँ से चले तो कुछ दूर पर एक और गोल तुम्बु पर जा कर रुके जहाँ शिकार के लिए ईगल यानि गरुड़ पाला हुआ है. सगसाई तालुक में इस तरह के गरुड़ पालने का प्रचलन है और हर वर्ष अक्टूबर में गरुड़ से शिकार करने की प्रतियोगिता होती है. जिले में इस समय 60 परिवारों में गरुड़ हैं. वहाँ एक तम्बु के बाहर गरुड़ बँधा था. उसकी चमकीली आँखें और नुकीली चौंच देख कर डर लगता था. उस घर में रहने वाले लोग बाहर कहीं गये थे बस घर में केवल बच्चे थे, जिन्होंने बताया कि उन्हें गरुड़ के पास जाना मना है. उन्होंने बताया कि वह गरुड़ छहः साल का है और केवल स्त्री गरुड़ पाले जाते हैं. कहते हैं कि जँगली अवस्था में ईगल सौ वर्ष तक जी सकता है पर पालतू गरुड़ की उम्र अधिक से अधिक तीस वर्ष तक पहुंचती है. इन गरुड़ों को जब छोटे होते हैं तब पकड़ा जाता है और घर में पालतू जानवर की तरह पाला जाता है. तीन साल का होने के बाद इन्हें शिकार करना सिखाया जाता है.

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अंत में हम लोग टुगरन नदी के किनारे पिकनिक करने रुके. साथ के मँगोली साथियों ने तुरंत एक अन्य वोदका की बोतल निकाली और फ़िर से पीने का कार्यक्रम शुरु हो गया. शाम होने लगी थी, सोच रहा था कि अब वापस उल्गीई की ओर चलेंगे पर वहां के तालुक शिक्षा अधिकारी कहने लगे कि उनके घर भी रुकना पड़ेगा. उनकी पत्नी रूसी भाषा पढ़ाती हैं, बच्चे सभी उलान बातार में रहते हैं. उनकी पत्नी ने हमारे लिए विषेश पकवान बनाया था घोड़े के माँस का, जिसे कहते हैं खीट और बनाने में कई घँटे लगते हैं. एक तो वैसे ही घोड़े के माँस का नाम सुन कर जी मिचला रहा था, जब यह मालूम चला कि घोड़ा उनका अपना था, घर में ही बड़ा हुआ था तो उसे हाथ लगाने की बिल्कुल भी इच्छा नहीं हुई. लेकिन सब लोग ज़ोर दे रहे थे कि विषेश मेरे स्वागत के लिए बनाया गया है और अगर न कर दूँगा तो उन्हें इतना बुरा लगेगा. मन कड़ा कर करके एक टुकड़ा निगला और बोला कि बस अब भूख नहीं है. बाकी सब लोग इस तरह चटकारे ले कर खा रहे थे.

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जब उल्गीई पहुँचे तो इतनी थकान लग रही थी मानो सारा दिन मेहनत की हो हालाँकि सारा दिन जीप में बैठ कर ही निकला था.

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