सीमाहीन आसमान मँगोलिया यात्रा की डायरी सुनील दीपक 6 जुलाई 2008

भाग 1 भाग 2  भाग 3  भाग 4

Mongolia, Bayan Ulgii

09 जून 2008, उल्गीई, सुबह साढ़े छहः बजे

आज सुबह हम अल्टानसुग्टन की ओर उल्गीई के पूर्व में करीब पचास किलोमीटर गये. होव्ड नदी को पार करके सारा रास्ता पत्थरों वाली सड़क पर था जिसमें झटके खा खा कर कमर दुखने लगी. पर रास्ते की प्राकृतिक सुंदरता देखने वाली थी. रंग बिरंगी पहाड़िया, दूर बर्फ से ढके ऊँचे पर्वत, मीलों कोई आदमी नहीं दिखता पर पचासों घोड़ों, याक, भेड़ों आदि के झुंड दिखते हैं. बीच में कभी कभी कोई पुरुष दिखता, सिर पर हैट पहने, घोड़े पर अकेले बियाबान में मानों किसी पुरानी वेस्टर्न फ़िल्म के परदे से दुनिया में उतर आया हो.

Mongolia, Bayan Ulgii

Mongolia, Bayan Ulgii

Mongolia, Bayan Ulgii

सारे मँगोली साथी रास्ते भर चुटकले सुनाते, जोर जोर से हँसते, तेज स्वर में चिल्ला कर बात करते पर मेरी समझ में कुछ न आता था. कभी कभी मेरी अनुवादक, हँसने हँसाने के बीच में कोई चुटकला सुनाती पर मुझे उनमें हँसने वाली समझ में नहीं आती.

अल्टानसुग्टन में करीब 250 परिवार रहते हैं. जाने किस वजह से वहाँ बहुत सी लड़कियों को कूल्हे में कुछ कमजोरी होती है जिससे वह लँगड़ा कर चलती हैं. कई घरों में विकलाँग लोगो के परिवारों से मिलने गये. सारा दिन इसी तरह निकल गया. दोपहर का खाना वहाँ के मेयर के घर पर था जहाँ जाने किस जंतु का माँस बनाया था, बड़ी बड़ी हड्डियाँ थीं, शायद याक का माँस हो. खाली उबला हुआ था. मैंने कहा कि मेरे पेट में दर्द है, माँस नहीं खाऊँगा तो दही, पनीर वगैरा खाने को मिले. लोग बहुत भोले भाले लगे, मिलनसार भी. जिस घर में जाते, गरीब से गरीब भी तो जोर देते कि कुछ खाईये.

Mongolia, Bayan Ulgii

Mongolia, Bayan Ulgii

शाम को घर पहुँचे तो धूल और पसीने से सारा शरीर चिपचिपा हो रहा था. चाहे दूरे बर्फीले पहाड़ दिखते हैं पर करीब दो हजार मीटर की ऊँचाई पर होने की वजह से सूरज की धूप इतनी तेज होती है कि सारा शरीर जल जाता है. शीशे में देखूँ तो सारा चेहरा बिल्कुल काला काला लग रहा है. गाँव वाले कह रहे थे कि बस मक्खी, मच्छरों का मौसम आने वाला है और वे लोग घर छोड़ कर तम्बुओं मे रहने ऊँचे पहाड़ पर जाने की तैयारी कर रहे थे जहाँ मक्खी मच्छर नहीं होते. सारे जानवरों, घर का सब सामान ले कर चले जाते हें और पीछे खाली घर छोड़ जाते हैं बिना चिंता किये कि वापस आने पर मिले या नहीं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि उस बियाबान में उनके घरों को देखने कोई नहीं आयेगा.

कल सुबह सुबह उत्तर की ओर निकलना है, रूस की सीमा के पास. सुना है कि वहाँ बहुत सुंदर झील है. वहाँ से फ़िर उल्गीई वापस नहीं आयेंगे बल्कि उव्स राज्य में चले जायेंगे.

11 जून 2008, ओम्नगोबी, सुबह साढ़े पांच बजे

कल रात को ओम्नोगोबी जिले के शहर में पहुँचे. पता चला कि शहर के अकेला होटल में जगह नहीं क्योकि वहाँ राष्ट्रीय चुनाव में खड़े होने वाले क्राँतीकारी दल के उम्मीदवार और उनके साथी ठहरे हैं. चुनाव जून के अंत में होने वाले हैं. आखिर जगह मिली जिला अस्पताल में, जहाँ रात की ड्यूटी करने वाले डाक्टर साहब ने अपना कमरा मुझे दिया और बाकी के साथियों को वार्ड में जगह मिली. यह तो अच्छा हुआ कि अस्पताल में कुछ बिस्तर खाली थे वरना किसी को कार में या बाहर तम्बु लगा कर सोना पड़ता. कल शाम से ही इतनी तेज हवा चल रही है कि बाहर निकलना कठिन है. सारे जानवर, गाय, याक, भेड़ें, आदि झुंड बना कर हवा से लड़ने बैठे हैं, दूर दूर तक सब खुला जो है और छुपने के लिए कोई जगह नहीं.

अस्पताल का कमरा है तो अच्छा पर यहां पानी का नल नहीं और पाखाना अस्पताल के बाहर दूर बना है. बाल्टी में से कड़छी से पानी ले कर मुंह हाथ धोये तो बचपन के दिन याद आ गये. जब से मंगोलिया आया था कब्ज लगी थी पर आज सुबह सुबह पाखाना जाने की जरुरत महसूस हुई. सूरज की रोशनी तो सुबह चार बजे ही शुरु हो जाती है. बाहर वार्ड में निकला तो सब लोग सो रहे थे बस रात की ड्यूटी वाली नर्स जागी हुई थी, चाय पी रही थी. अस्पताल के बाहर निकला तो लगा कि हवा उड़ा कर ले जायेगी. पाखाना घर भी लकड़ी के बने हैं जिनमें बड़े बड़े छेद हैं और उसका दरवाजा भी बंद नहीं हो रहा था, अंदर हर तरफ से तेज हवा घुस रही थी. जब काम करके वापस अस्पताल में आया तो लगा मानो एवरेस्ट की चढ़ाई से लौटा हूँ.

Mongolia, Bayan Ulgii

Mongolia, Bayan Ulgii

कल सुबह चले थे उल्गीई से. हमारे साथ उल्गीई जिले के उपप्रधान थे. करीब दो घँटे की यात्रा के बाद चिखती गाँव पहुँचे जहाँ एक अस्पताल है. वहाँ जब तक मीटिंग समाप्त हो दोपहर के बारह बजने लगे थे, वहाँ कि नर्स बोली कि उनके घर में खाना खा कर जाना चाहिये. उनका घर करीब में ही था. यहाँ खाना नमकीन चाय और मीठे से शुरु होता है. उसके बाद आती है मीट की थाली जिसमें कभी कुछ तरकारी वगैरा भी मिल जाती हैं. हाथ से या काँटे सब लोग उसी थाली से ले ले कर खाते हैं. मैंने मीट खाने से मना कर दिया पर उसी थाली से मीट के बीच में चुन चुन कर गाजर और पास्ता खाया, तो सोच रहा था कि यहाँ कोई शाकाहारी आ जाये तो बेचारे का बुरा हाल हो जाये.

फ़िर वहा से चले तो एक अन्य गाँव में रकना था जहाँ गाँव के स्वास्थ्य कर्मचारी से बात करनी थी, पर वहाँ पहुँचे तो मालूम चला कि किसी गर्भवती औरत की तबियत खराब थी इसलिए स्वास्थ्य कर्मचारी से नहीं मिल सकते थे, तो वहाँ अधिक समय नहीं रुके और उत्तर की ओर अचिंत झील की ओर बढ़े. यह झील बहुत बड़ी है और उत्तर में रूस के साईबेरिया तक जाती है. उसी झील के पास है सीमा बायन उल्गीई और उव्स राज्यों की, जहाँ हमारे उल्गी के साथी हमें छोड़ने आये थे और जहाँ उव्स के लोगों का हमें इंतजार था. इंतज़ार करते करते वहां कुछ छोटे बच्चों से दोस्ती की, हालाकिं न उनको मेरी भाषा समझ में आती थी न मुझे उनकी. मेरे मंगोली साथी कार धोने में लगे जो कि धूल से इस तरह ढकी हुई थी कि उसका असली रंग तक नहीं दिखता था. जब उव्स के साथी पहुंचे तो तुरंत मीट निकाला गया और वोदका की बोतलें खोली गयीं. अगर उल्गीई से राज्य के उपप्रधान थे तो उव्स के दल में राज्य के प्रमुख मेडिकल ओफिसर थे, दोनो तरफ़ से झील के किनारे लम्बी लम्बी बातें हुईं और हर बात पर वोदका के गिलास चढ़ाये गये. मेरे न न करते करते भी, थोड़ा थोड़ा सा करके मेरी हालत भी कमजोर हो रही थी.

करीब एक घँटा यूँ ही चला फ़िर हम लोग चल पड़े उव्स राज्य में.

Mongolia, Bayan Ulgii

Mongolia, Bayan Ulgii

आधे घँटे बाद पहुँचे होव्ड नाम के जिले के मुख्य शहर में, जहाँ रुकने का कार्यक्रम तो नहीं था पर वहाँ के गवर्नर को जब मालूम हुआ कि विदेशी महमानों के साथ राज्य के बड़े अफसर हें तो उन्होंने आदेश दिया कि हम लोग उनका अस्पताल भी देखें और वहाँ खाना भी खायें. होव्ड से चले तो थोड़ी देर के बाद ही रास्ता बहुत पथरीला हो गया. पत्थर भी छोटे नहीं, फुटबाल जैसे. जीप ने ऐसे झटके खाये कि अंजर पिंजर ढीले हो गये. सात आठ किलोमीटर का रस्ता पूरा करने में इतना समय निकल गया, फ़िर सामने थी शिवरगोल नदी. बहाव तेज था पर पानी बहुत गहरा नहीं था और नदी का पाट भी बहुत अधिक चौड़ा नहीं था. शायद वे सारे गोल गोल पत्थर जो सात आठ किलोमीटर तक मिले थे, उसी नदी के बहाव से नीचे आये थे और गोल गोल बन गये थे.

उसके बाद शुरु हुआ चट्टानी पत्थरों वाली पहाड़ियों का रास्ता. नंगी, नुकीली चट्टाने बहुत भव्य हैं और सारा रास्ता देखने योग्य है. हमारे साथ चलने वाली मंगोली लड़की न्यूमा ने बताया कि चट्टानों के बीच में दिखने वाले पत्थरों के झुंड असल मरें पुराने समय के राजा और बड़े लोगों की कब्रें हैं. वहीं चट्टानों के बीच में है शेज़गेय झील. इतनी संदर जगह थी कि वहाँ से जाने का मन नहीं कर रहा था. पर साथ ही अजीब लग रहा था कि इतनी खूबसूरत जगह में हमारे अलावा कोई और नहीं था. मंगोलिया में अक्सर यही होता है, दिल लुभा लेने वाली सुंदर जगहें और देखने के लिए कोई नहीं. पूरे उव्स राज्य की जनसंख्या 75 हज़ार लोग है इसलिए व्यक्ति बहुत कम ही दिखते हैं.

पहाड़ों से निकलो तो नीचे ओम्नीगोबी जिले की संदर घाटी दिखती है. कल की यात्रा बहुत सुंदर रही. अचिंत झील पर कज़ाक बच्चों के साथ बिताये पल, चट्टानी भव्य रास्ता और शेज़गेय झील, सब याद रखने लायक हैं.

आज का कार्यक्रम भी लम्बा है. पहले यहाँ कि विकलांग पुनर्स्थान कमेटी से मिलना है फ़िर विकलांग लोगों के एक दल से. उसके बाद कुछ विकलांग लोगों के घर में जा कर उनसे मिलना है, फ़िर करीब के एक गांव जाना है. आखिर में करीब सौ किलोमीटर दूर उलानगोम शहर जाना है, जहाँ अगले तीन दिन तक रुकना है. पिछले छहः दिनों से ईमेल देखने का मौका नहीं मिला, शायद उलानगोबी में मिल जाये, नहीं तो शनिवार को जब उलान बातार जायेंगे तभी यह मौका मिलेगा.

12 जून 2008, उलानगोम, सुबह पांच बजे

कल रात को हम लोग उम्नोगोबी से उलानगोम शहर में आये जो कि उव्स राज्य की राजधानी है. रास्ता बहुत ही सुंदर था. हर रोज़ ही इतनी सारी सुंदर जगह देखने को मिलती हैं, हर बार लगता है कि सबसे सुंदर जगह यही है, पर उसके बाद उससे भी सुंदर जगह कोई दिख जाती है. वैसा ही हुआ कल शाम को भी. लगा था कि शेज़गेय की झील के आसपास का इलाका सबसे सुंदर है पर कल जब उम्नोगोबी और तराईलान के बीच में तीन हज़ार मीटर की ऊँचाई पर से गुजरते हुए वहाँ के पहाड़, खरगोश, मरमोट, छोटी छोटी पहाड़ी झरने और झीलें देखीं तो सोचा कि सबसे सुंदर जगह यही है.

फ़िर तराईलान के पास ऊँचे पहाड़ों से कुछ नीचे उतरे तो पाया कि वहाँ तूफ़ान और तेज़ बारिश जारी थे. आसपास हरी वादियां, उसमें घास चरते हज़ारों भेड़, बकरियाँ, घोड़े और ऊँट, और सामने के पहाड़ों पर घने बादल बहुत सुंदर लग रहे थे.उम्नोगोबी से चले तो तापमान ठीक ही था, करीब 22 या 23 डिग्री, ऊँचे पहाड़ों में तापमान गिर कर पाँच डिग्री हो गया था और फ़िर वादी में भी बारिश की वजह से सर्दी हो रही थी. मैं आधी बाँहों वाली कमीज पहने था, कँपकँपी लग गयी. उलानगोम पहुँचे तो बारिश थम गयी और सूरज निकल आया तो सर्दी भी कुछ कम हुई.

Mongolia, Bayan Ulgii

Mongolia, Bayan Ulgii

उम्नोगोबी में वहाँ करीब के एक गाँव में जाने का मौका मिला. वहाँ ग्राम प्रधान के तम्बुवाले घर पर कुछ लोगों से मिले. ग्रामप्रधान नवजवान युवक थे बोले कि वहाँ करीब ही सोना मिला है जिससे उनके गाँव को बहुत तकलीफ़ हो रही थी. आसपास अपराध बढ़ गये थे और लोग सोना निकालने के लिए पारे का इस्तमाल कर रहे थे जिससे सारी धरती और वातावरण प्रदूषित हो रहे थे. और बोले कि पिछले वर्षों में गाँव ने बहुत तरक्की की है, अब सब घरों में बिजली है, दूर दूर के तम्बुओं ने भी छोटे फोटोवोलटेज के उपकरण लगाये हैं जिससे उन्हें अपने घर के लिए बिजली मिल हजाती है और टेलिविजन देख सकते हैं.

Mongolia, Bayan Ulgii

Mongolia, Bayan Ulgii

उम्नोगोबी में ही सुबह अस्पताल में एक नयी बात को देखने जानने का मौका मिला, इस सामाजिक प्रथा का नाम है हूर्ग, यानि खुशबुदार तम्बाकू, कुछ कुछ भारतीय जर्दे जैसा. विवाह होने पर हर मँगोली पुरुष के पास हुर्ग की सुंदर पत्थर की या नक्काशीदार शीशी होती है. हमारे साथी ऐबे बोले कि उनकी शीशी जो करीब साठ साल पुरानी है की कीमत करीब पचास साठ हजार रुपये के करीब होगी. जब लोग पहली बार मिलते हैं तो पुरुष रंगीन सिल्क के कपड़ों में लिपटी हुर्ग की शीशियाँ निकालते हैं और एक दूसरे को सुंघवाते हैं, वहाँ पर बैठी औरतों को भी. हुर्ग की शीशियाँ औरतों के पास भी होती हैं पर बताने लगे कि औरतों की शीशी छोटी होती है. जब मैंने उन्हें कहा कि हुर्ग की खुशबु तो भारतीय जर्दे से मिलती है तो बोले कि हाँ भारत से आयात किया जाने वाला हुर्ग सबसे बढ़िया माना जाता है.

जब उम्नोगोबी से चले तो वहाँ के अस्पताल के प्रमुख डाक्टर और अन्य कुछ लोग अपनी जीप ले कर हमारे साथ कुछ दूर तक आये और फ़िर एक नदी पार करके एक जगह सब लोग रुके और जीपों से उतर गये. तुरंत वोदका की बोतल निकाली गयी, रंगीन कागज में लिपटी गोलियाँ टाफियाँ बाँटी गयीं, यानि दोस्तों से बिछुड़ने और विदा लेने की रीति. पिछले दिन में जब बायान उल्गीई के लोगों से विदा ली थी तब लोगों ने देख लिया था कि मुझे वोदका पीना अच्छा नहीं लगता इसलिए किसी ने मुझपर ज़ोर नहीं दिया कि पूरा गिलास पीयूँ, बस जब मेरी बारी आती तो मैं जरा से होठं छूने का नाटक कर देता. उस समय बहुत तेज़ हवा चलने लगी थी और कुछ धूल भी उड़ रही थी, इसलिए विदा रीति को जल्दी जल्दी निपटाया गया हालाँकि जब तक वोदका की बोतल समाप्त नहीं हुई जा नहीं सकते थे. मैं आसपास की तस्वीरें खींचने में वयस्त था. दूर रंग बिरंगे पहाड़ों की तस्वीरें और हम सब की और उत्सुकता से देखते एक बच्चे की तस्वीरें.

Mongolia, Bayan Ulgii

Mongolia, Bayan Ulgii

Mongolia, Bayan Ulgii

पहाड़ों में रास्तों पर जहाँ दो या तीन सड़कें मिलती हैं वहाँ पत्थरों के ढेर लगा कर पूजा स्थल बनाये जाते हें जिन्हें औवो कहते हें, इनमें नीले और कभी कभी सफेद कपड़े भी लगाये जाते हें और जाने वाले यात्री वहाँ रुक कर घड़ी की सूईयों की दिशा में उसका चक्कर लगा कर पूजा करते हें और तीन पत्थर उठा कर उस ढेर पर लगा देते हैं. हमने भी रा्ते में दो औवों पर पूजा की.

आज तो सारा दिन यहीं उलानगोम में ही मीटिंग में बीतेगा.

Mongolia, Bayan Ulgii

जब उल्गीई पहुँचे तो इतनी थकान लग रही थी मानो सारा दिन मेहनत की हो हालाँकि सारा दिन जीप में बैठ कर ही निकला था.

******

भाग 1 भाग 2  भाग 3  भाग 4

कल्पना पर सुनील दीपक के अन्य आलेख - कल्पना पर हिंदी लेखन की पूरी सूची